चाय

पी.वी. नरसिंहराव मेरे पसंदीदा राजनेताओं में से एक हैं। वे बहुत विद्वान व्यक्ति थे, कई भाषाओं के जानकार भी थे और अच्छे लेखक व अनुवादक भी। उन्होंने कई भाषाओं में पुस्तकों के अनुवाद किए और कई पुस्तकें स्वयं भी लिखीं। उन्हीं में से एक थी, ‘द इनसाइडर’। हालांकि, नरसिंहराव ने इसे एक काल्पनिक उपन्यास के रूप में लिखा है, लेकिन उसके नायक की कहानी बहुत हद तक उनके स्वयं के जीवन से मिलती-जुलती है। लेकिन आज मैं बात उस पुस्तक की नहीं करने वाला हूँ। बात मैं चाय की करने वाला हूँ। सोशल मीडिया पर कई लोगों की पोस्ट देखकर आगे पढ़ें …

सोशल मीडिया का राजनैतिक हिंदुत्व

जितने लोग सुबह-शाम भाजपा पर हिंदुत्व से हटकर विकास की ओर भटक जाने का इल्ज़ाम लगाते रहते हैं, उनमें से कितनों ने वाकई पिछले कुछ चुनावों के भाजपा के घोषणा पत्र पढ़े हैं? अगर पढ़े हैं, तो बताएं कि उसमें राम मंदिर या हिंदुत्व पर कितने प्रतिशत फोकस था और विकास पर कितने प्रतिशत था? भाजपा का एजेंडा क्या है, उससे ज्यादा बड़ी समस्या आजकल ये है कि सोशल मीडिया के ज्ञानियों का निजी एजेंडा क्या है। कुछ लोग बिना पढ़े कुछ भी ऊलजलूल लिखकर बाकियों को बहका रहे हैं और कुछ लोग अपने निजी कारणों से जानबूझकर दूसरों को आगे पढ़ें …

राफ़ेल (भाग – २)

राफ़ेल का पूरा मामला आखिर क्या है? क्या वाकई मोदी सरकार इसमें बेईमानी कर रही है? क्या रिलायंस को फ़ायदा पहुँचाने के लिए कोई हेराफेरी की गई है? जानने के लिए मेरा यह लेख पढ़ें।

राफ़ेल (भाग – १)

राफ़ेल का पूरा मामला आखिर क्या है? क्या वाकई मोदी सरकार इसमें बेईमानी कर रही है? क्या रिलायंस को फ़ायदा पहुँचाने के लिए कोई हेराफेरी की गई है? जानने के लिए मेरा यह लेख पढ़ें।

आपातकाल की यादें (अंतिम भाग) – अरुण जेटली

आपातकाल कैसे हटा? आपातकाल की अवधि बढ़ते जाने के साथ ही इंदिरा जी पर एक बात के कारण दबाव भी बढ़ने लगा था। अंतरराष्ट्रीय मीडिया और विश्व के नेता इस बात से  चकित थे कि नेहरु जी की बेटी ही लोकतंत्र की राह को छोड़कर तानाशाह बन गई थी। अंतरराष्ट्रीय जगत को यह समझाना इंदिरा जी के लिए बहुत कठिन होता जा रहा था कि आपातकाल का दौर वाकई अस्थायी है और हमेशा आपातकाल लागू नहीं रहेगा। हालांकि उनकी पार्टी की राय थी कि चूंकि संसद की अवधि दो वर्षों के लिए बढ़ाई जा चुकी है, इसलिए अब १९७८ से आगे पढ़ें …

आपातकाल की यादें – भाग -२ (अरुण जेटली)

आपातकाल के अत्याचार २६ जून १९७५ को आपातकाल लगाते ही श्रीमती इंदिरा गांधी ने धारा ३५९ के तहत नागरिकों के मौलिक अधिकार निलंबित करने का आदेश जारी कर दिया। इसके परिणामस्वरूप अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और व्यक्तिगत स्वतंत्रता दोनों पर पाबंदी लगा दी गई। केवल सेंसर की अनुमति से प्रकाशित समाचार ही उपलब्ध थे। २९ तारीख को इंदिरा जी ने भारतीय अर्थव्यवस्था में सुधार के नाम पर बीस-सूत्रीय कार्यक्रम की घोषणा की, हालांकि वास्तव में इसका उद्देश्य इस बात से ध्यान हटाना था कि भारत में लोकतंत्र को खत्म कर दिया गया है। इन बीस बिन्दुओं में कई तो वास्तव में आगे पढ़ें …

आपातकाल की यादें – भाग १ (अरुण जेटली)

(यह लेख तीन भागों में है) आपातकाल लगाने की नौबत क्यों आई? वर्ष १९७१ और १९७२ श्रीमती इंदिरा गांधी के राजनैतिक करियर के सुनहरे वर्ष थे। उन्होंने अपनी ही पार्टी के वरिष्ठ नेताओं को और विपक्षी दलों के महागठबंधन को चुनौती दी थी। १९७१ के आम चुनाव में उनकी स्पष्ट विजय हुई। अगले पाँच वर्षों तक वे राजनैतिक सत्ता का सबसे प्रमुख केंद्र बानी रहीं। उनकी पार्टी में कोई नेता नहीं था, जो उन्हें चुनौती दे सके। १९७१ में ही पाकिस्तान के आम चुनाव में शेख मुजीबुर्रहमान की अवामी लीग पार्टी को पाकिस्तानी संसद में स्पष्ट बहुमत मिला था, जिसके आगे पढ़ें …

हॉकिन्स की इंग्लैण्ड वापसी (विन – ४)

पिछले भाग में मैंने आपको बताया था कि हॉकिन्स के कई अनुरोधों और कोशिशों के बाद बादशाह जहाँगीर ने एक फ़रमान जारी करके अंग्रेज़ों को भारत में व्यापार करने की अनुमति दे दी। इससे उत्साहित होकर हॉकिन्स ने तुरन्त सूरत सन्देश भिजवाया और अपने साथी विलियम फिंच को आगरा बुलवा लिया। लेकिन उधर आगरा के मुग़ल दरबार में फिर कुछ ऐसा हुआ, जिसके कारण बादशाह ने अंग्रेज़ों को दिया फ़रमान रद्द कर दिया। आखिर ऐसा क्या हुआ था? इस पर आज बात करेंगे। पिछले भागों को पढ़कर आप जान ही गए होंगे कि अंग्रेज़ों के आने के बहुत पहले से आगे पढ़ें …

जहाँगीर के दरबार में विलियम हॉकिन्स का प्रवेश (विन -३)

(इसे पढ़ने से पहले कृपया यहाँ क्लिक करके पिछला लेख पढ़ लें।) मुग़ल बादशाह के आदेश पर विलियम हॉकिन्स आगरा में बादशाह के दरबार में पहुँचा। यहाँ उसे पता चला कि अकबर की मौत हो चुकी है और अब उसका बेटा जहाँगीर यहाँ का शासक है। जब से हॉकिन्स भारत पहुँचा, तभी से वह पुर्तगालियों के कहर से परेशान था। पुर्तगाली सन १४९८ से ही भारत के साथ व्यापार कर रहे थे। जब तक हॉकिन्स के रूप में अंग्रेज़ यहाँ पहुँचे, तब तक पुर्तगालियों को भारत आए हुए सौ साल से भी ज़्यादा समय हो चुका था। यहाँ के शासकों में आगे पढ़ें …

भारत में कंपनी का आगमन (विन – २)

(इसे पढ़ने से पहले कृपया यहाँ क्लिक करके पिछला लेख पढ़ लें।) इंडोनेशिया की राजधानी जकार्ता से लगभग डेढ़ सौ किमी की दूरी पर स्थित बांतेन आज एक छोटा-सा सुस्त शहर है। लेकिन ४०० साल पहले यह एक प्रसिद्ध और व्यस्त बंदरगाह था। अरब, तुर्क, ईरानी, भारतीय, चीनी और अन्य कई देशों के व्यापारी यहां के बाज़ार में अपने देशों से रेशम, चीनी मिट्टी के बर्तन, मसाले, कालीन और अन्य सामान लेकर आते थे। बदले में वे यहाँ से मिर्च और अन्य मसाले खरीदकर ले जाते थे। दिसंबर १६०० में ईस्ट इंडिया कंपनी को ब्रिटेन की रानी ने एशिया में आगे पढ़ें …