तकनीक का दुरुपयोग?

महाराष्ट्र में जालना जिले के एक गाँव में एक गरीब दलित परिवार में जन्मे दिलीप म्हस्के ने अपनी प्राथमिक शिक्षा गाँव के ही स्कूल से पूरी की। उसके आगे की पढ़ाई नवोदय विद्यालय में करने के लिए केन्द्र सरकार से छात्रवृत्ति मिली। बारहवीं तक की पढ़ाई वहीं से पूरी हुई। जालना जिले में अकाल की परिस्थिति के कारण परिवार मुंबई चला आया। म्हस्के महोदय ने वहीं से कानून की डिग्री हासिल की। गरीबी के कारण मजदूरी भी करनी पड़ी। आगे उन्होंने मुंबई आईआईटी से प्लानिंग एंड डेवलपमेंट के विषय में कोई डिग्री ली। उसी दौरान वे सामाजिक और राजनैतिक कार्यों आगे पढ़ें …

कॉमनवेल्थ: गुलामी की निशानी

सोलहवीं शताब्दी से ब्रिटेन ने दुनिया भर के देशों पर कब्जा करना और उन्हें गुलाम बनाना शुरू किया। इन देशों को ब्रिटिश कॉलोनियां या उपनिवेश कहा गया। इन देशों का शासन पूरी तरह ब्रिटिश सरकार के अधीन था। भारत भी इनमें से एक था। उन्नीसवीं शताब्दी में इन देशों को स्वतंत्रता या स्वायत्तता मिलना शुरू हुई। सन १८६७ में कनाडा को डोमिनियन का दर्जा मिला। इसका मतलब ये था कि अब कनाडा का शासन ब्रिटिश सरकार नहीं, बल्कि कनाडा के लोग ही चलाएंगे। लेकिन, कनाडा पूरी तरह स्वतंत्र नहीं हुआ था। डोमिनियन होने का मतलब था कि अभी भी ब्रिटेन आगे पढ़ें …

चीन का नया महाद्वीप

पिछले हफ़्ते मैंने “China’s Second Continent” (चीन का दूसरा महाद्वीप) नामक पुस्तक पढ़ी। इसके लेखक एक अमरीकी पत्रकार हॉवर्ड फ़्रेंच हैं। पुस्तक अफ्रीका में चीन द्वारा किए जा रहे निवेश और वहाँ बड़ी संख्या में रहने जा रहे चीनी नागरिकों के बारे में है। पूरे अफ्रीका महाद्वीप के कई देशों में चीन अरबों डॉलर का निवेश कर रहा है। चीन की मदद से इन देशों में कई सरकारी इमारतें, पुल, स्टेडियम, परिवहन और कृषि व्यवस्था में सुधार आदि कई परियोजनाओं पर काम चल रहा है। इन परियोजनाओं में काम करने के लिए लाखों की संख्या में चीनी नागरिक इन अफ्रीकी आगे पढ़ें …

तेल के खेल में डूबता वेनेजुएला

कुछ दिनों पहले मैंने मालदीव और उसके बाद दक्षिण अफ्रीका की घटनाओं के बारे में दो लेख लिखे थे। मालदीव का संकट अभी सुलझा नहीं है, लेकिन दक्षिण अफ्रीका में राष्ट्रपति जैकब जुमा को उनकी पार्टी ने पद से हटाकर उपराष्ट्रपति सैम्युअल रैम्फोसा को नया राष्ट्रपति चुन लिया है, इसलिए वहां का मामला फिलहाल ठंडा पड़ चुका है। लेकिन दूर दक्षिण अमरीका के एक देश वेनेजुएला में भी पिछले कई महीनों से भीषण उथल-पुथल जारी है। आज के लेख में मैं उसी बारे में लिख रहा हूं। ५ मार्च २०१३ को ५८ वर्ष की आयु में वेनेजुएला के राष्ट्रपति ह्यूगो आगे पढ़ें …

अफ़्रीका में हलचल

कल अपने लेख में मैंने मालदीव के राजनैतिक संकट की बात की थी। आज दक्षिण अफ्रीका की बात करने वाला हूं। इन दिनों वहां भी राजनैतिक हलचल जारी है। लेकिन वहां तक पहुंचने से पहले हमें उत्तर प्रदेश जाना पड़ेगा क्योंकि द.अफ्रीका के कई लोगों की राय है कि उनके देश की वर्तमान सरकार के भ्रष्टाचार के पीछे उप्र के एक परिवार का बड़ा हाथ है। तो आइए आज कुछ नई कड़ियाँ जोड़ने का प्रयास करें। सन १९९३ तक दक्षिण अफ्रीका में रंगभेद बहुत बड़े पैमाने पर था। कई मामलों में यह केवल सामाजिक ही नहीं था, बल्कि कई मामलों आगे पढ़ें …

मालदीव का राजनैतिक संकट

#मालदीव हिन्द महासागर में बिखरा हुआ एक छोटा-सा देश है। मैं सोच-समझकर ही इसे हिन्दी महासागर में ‘फ़ैला हुआ’ देश नहीं कह रहा हूँ, बल्कि बिखरा हुआ देश कह रहा हूं क्योंकि यह देश वास्तव में यह बहुत छोटे-छोटे १,१९२ द्वीपों की एक श्रृंखला है। वैसे राजनैतिक अर्थ में भी यह बिखरा हुआ देश ही है क्योंकि यहां के शासन में पिछले कई वर्षों से बहुत अस्थिरता ही रही है। पिछले साल मैं कुछ दिनों के लिए मालदीव गया था, उस समय मैंने इस देश के बारे में दो लेख लिखे थे, जो आप यहां और यहां पढ़ सकते हैं। आगे पढ़ें …

अमरीका में हज़ार मील

आज मेरी कार 🚗 का ओडोमीटर १००० मील (किमी नहीं) पर पहुँच गया है। इसका मतलब यह भी है कि मैंने अमरीका में १००० मील से ज़्यादा गाड़ी चला ली है। (फोटो नीचे कमेन्ट में है :P) अभी फ़रवरी २०१८ चल रहा है और मुझे फ़रवरी २०१६ के दिन फिर से याद आ रहे हैं। तब मैं जीवन में पहली बार भारत 🇮🇳 से बाहर निकला था और सीधे अमरीका 🇺🇸 ही आया था। तब यहां की यातायात व्यवस्था और नियमों को समझने में बहुत दिक्कत होती थी। भारत में गाड़ियां सड़क 🛣️ की दायीं ओर चलती हैं, जबकि यहां आगे पढ़ें …

अपनी भाषा और अपनी ज़िम्मेदारी

भाषाओं से मुझे विशेष प्रेम है और अक्सर मैं अपनी भारतीय भाषाओं को अपनाने और आगे बढ़ाने की बात करता हूं। आज फिर इसी विषय को लेकर वापस आया हूं। भाषाओं की बात निकलती है, तो अंग्रेज़ी की बात भी आती है और अंग्रेज़ी के विरोध की बात भी उठती है। मैं अक्सर कहता हूं कि अंग्रेज़ी का नहीं, बल्कि अंग्रेज़ियत का विरोध कीजिए। अंग्रेज़ी अवश्य सीखिए, लेकिन अंग्रेज़ियत के गुलाम मत बनिये। अधिकतर लोग समझ नहीं पाते कि अंग्रेज़ी और अंग्रेज़ियत से मेरा क्या आशय है। मैंने एक बार पहले कहा था कि मैं इस बारे में विस्तार से आगे पढ़ें …

“स्टार्टअप नेशन” (अंतिम भाग)

इस लेखमाला के पिछले २ भागों में हमने इज़राइल की स्टार्टअप कंपनियों की सफलता के कुछ उदाहरण देखे हैं। (पिछले २ भाग आप यहाँ पढ़ सकते हैं: भाग -१ और भाग -२) हमने इस बारे में भी बात की थी कि किस तरह इज़राइल आधुनिक तकनीक के उपयोग, और सरकार, समाज व सेना के आपसी सहयोग के द्वारा इज़राइल में उद्यमिता के लिए अनुकूल माहौल बना, जिसके परिणामस्वरूप इज़राइल आज दुनिया के सबसे विकसित देशों की पंक्ति में पहुंच गया है, जबकि केवल ५०-६० वर्षों पहले तक यह अत्यंत गरीब और संघर्षरत देश था। आइये आज इस अंतिम भाग में आगे पढ़ें …

“स्टार्टअप नेशन” (भाग २)

इज़राइल की इस विशिष्ट परिस्थिति के कारण इज़राइल के बच्चे-बच्चे को घर में, स्कूल में और सेना की नौकरी में आक्रामकता और नवाचार की सीख मिलती है। धीरे-धीरे यह उसकी आदत ही बन जाती है। इसी कारण लोग कुछ नया करने, नई चुनौतियों को स्वीकारने या जोखिम उठाने में हिचकते नहीं हैं। इसी के परिणामस्वरूप आज इज़राइल कई क्षेत्रों में अपनी उपलब्धियों व सफलताओं के झंडे गाड़ चुका है, और इसमें सेना की बहुत बड़ी भूमिका है।