१५ अगस्त १९४७: स्वतंत्र देश या स्वतंत्र उपनिवेश?

अधिकतर लोगों को भ्रम है कि १५ अगस्त १९४७ को भारत एक स्वतंत्र देश बन गया था। लेकिन वास्तव में उस दिन भारत स्वतंत्र देश नहीं बना, बल्कि केवल एक स्वतंत्र उपनिवेश बना। इसका अर्थ ये है कि उस दिन केवल सत्ता का हस्तांतरण हुआ और शासन की बागडोर एक विदेशी वायसरॉय ने एक भारतीय मूल के प्रधानमंत्री को सौंपी। भारत उस दिन आजाद नहीं हुआ, भारत उस दिन एक स्वतंत्र देश नहीं बना, बल्कि भारत उस दिन केवल एक स्वतंत्र उपनिवेश बना, स्वतंत्र अधिराज्य बना। इसका अर्थ ये है कि भारत तब भी ब्रिटिश शासन के अधीन ही एक राज्य था।
मुझे मालूम है कि अधिकांश लोग यह बात नहीं मानेंगे क्योंकि बचपन से हमारे मन में यह बात बिठा दी गई है कि भारत १५ अगस्त १९४७ को स्वतंत्र हुआ। लेकिन मेरी बात को मानने या न मानने की बजाय क्यों न आप स्वयं से ही एक सवाल पूछें? आप यह तो जानते ही होंगे कि हमारे राष्ट्र का प्रमुख प्रधानमंत्री नहीं, बल्कि राष्ट्रपति होते हैं। सरकार भले ही प्रधानमंत्री के नेतृत्व में बनती है, लेकिन प्रधानमंत्री वास्तव में राष्ट्रपति के आदेश से ही शासन करते हैं। आपको यह भी पता होगा कि भारत के प्रथम राष्ट्रपति डॉ. राजेन्द्र प्रसाद थे और आपको शायद ये भी पता ही होगा कि वे पहली बार २६ जनवरी १९५० को राष्ट्रपति चुने गए। लेकिन जरा खुद से पूछकर बताइये कि वाकई अगर भारत १५ अगस्त १९४७ को ही एक स्वतंत्र देश बन गया था, तो २६ जनवरी १९५० तक राष्ट्रपति कौन था? इस राष्ट्र का प्रमुख कौन था? तत्कालीन प्रधानमंत्री किसकी आज्ञा से शासन कर रहे थे? उत्तर ये है कि तब ब्रिटेन के राजा जॉर्ज षष्टम भारत के राष्ट्रप्रमुख थे और उनके प्रतिनिधि के रूप में गवर्नर जनरल यहां की सरकार के काम पर निगरानी रखते थे व भारत सरकार उनके आदेश के अनुसार काम करती थी। इसका सरल अर्थ यह है कि १५ अगस्त १९४७ को भारत स्वतंत्र राष्ट्र नहीं बना, बल्कि उस दिन भारत और पकिस्तान नामक दो नए स्वतंत्र उपनिवेश बने, जो ब्रिटेन के राजा जॉर्ज षष्टम के अधीन थे। वास्तव में, ये दो उपनिवेश १४ अगस्त को ही बन गए थे, जब पाकिस्तान का निर्माण हुआ।
शासन की बागडोर भले ही भारतीय मूल के प्रधानमंत्री के हाथों में थीं, लेकिन भारत का मुखिया ब्रिटिश सम्राट ही था और उसी के द्वारा नियुक्त गवर्नर जनरल के आदेशानुसार भारत के प्रधानमंत्री कार्य करते थे। २६ जनवरी को जब हमने अपना संविधान अपनाया, तब जाकर भारत एक स्वतंत्र, संप्रभु गणराज्य बना और उस दिन ब्रिटिश सम्राट का शासन समाप्त हो गया। इसीलिए उस दिन गवर्नर जनरल का पद भी समाप्त हो गया और उसके स्थान पर राष्ट्र के मुखिया के रूप में राष्ट्रपति की नियुक्ति हुई।
आपको ये तो मालूम होगा कि १५ अगस्त १९४७ और २६ जनवरी १९५० के बीच लॉर्ड माउंटबैटन और चक्रवर्ती राजगोपालाचारी गवर्नर जनरल रहे। लेकिन क्या आपको ये मालूम है कि उस पद पर इनकी नियुक्ति किसने की थी? उन्हें इस पद पर भारतीय संसद या भारत के प्रधानमंत्री के आदेश पर नहीं, बल्कि ब्रिटिश सम्राट के आदेश पर नियुक्त किया गया था! अगर भारत सचमुच १५ अगस्त १९४७ को स्वतंत्र हो गया था, तो फिर यहां कोई भी नियुक्ति ब्रिटिश राजा के आदेश पर क्यों हो रही थी? ब्रिटेन के राजा का आदेश क्यों माना जा रहा था? क्यों भारत के प्रधानमंत्री द्वारा हर कार्य के लिए गवर्नर जनरल के माध्यम से ब्रिटिश सम्राट से अनुमति मांगी जाती थी? इसका कारण यही है कि भारत वास्तव में १५ अगस्त १९४७ के दिन स्वतंत्र देश नहीं, बल्कि केवल एक स्वतंत्र उपनिवेश बना था। वास्तविक स्वतंत्रता और संप्रभुता हमें २६ जनवरी १९५० को संविधान अपनाने के बाद ही प्राप्त हुई। हालांकि यह दूसरा विषय है कि स्वयं डॉ आंबेडकर ने ही इस संविधान के विरोध किया था और यह बात २ सितंबर १९५३ के दिन राज्यसभा में दिए गए उनके भाषण में उन्होंने ही स्पष्ट रूप से कही थी, लेकिन उस बारे में हम किसी दूसरे ब्लॉग पोस्ट में विस्तार से चर्चा करेंगे।
अब जबकि आपको ये समझ आ गया है कि १५ अगस्त १९४७ को भारत वास्तव में स्वतंत्र देश नहीं बना था, बल्कि केवल एक स्वतंत्र उपनिवेश (डोमिनियन) बना था, तो अब जरा ये सोचकर देखिये कि किसने अपने किस स्वार्थ के लिए हमसे यह वास्तविक इतिहास छिपाकर रखा और हमें हमेशा गलत इतिहास क्यों पढ़ाया गया?
मुझे विश्वास है कि इसका कारण समझने और उत्तर ढूंढने में आपको ज्यादा दिक्कत नहीं होगी। अगर समझ गए हैं, तो नीचे कमेंट लिखकर सबको बताएं। आखिर भारत के वास्तविक इतिहास पर चर्चा होनी चाहिए या नहीं?

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