एक्सिडेंटल प्राइम मिनिस्टर (भाग – १)

हैदराबाद के संजय बारू ने कई सालों तक पत्रकारिता के क्षेत्र में काम किया। इस दौरान कई सालों तक वे ‘द बिज़नेस स्टैंडर्ड’, ‘इकोनॉमिक टाइम्स’ और ‘टाइम्स ऑफ इंडिया’ जैसे अखबारों और पत्रिकाओं में रहे। इनमें से कोई भी अखबार नरेन्द्र मोदी या भाजपा का समर्थक नहीं है।

इंदिरा गांधी के प्रेस सचिव, और उनके भाषण लिखने वाले, एच. वाय. शारदा प्रसाद और उनके परिवार से संजय बारू की पत्नी के पारिवारिक संबंध थे। जिस समय मनमोहन सिंह भारत के वित्त सचिव थे, उस दौरान बारू के पिता भी उनकी टीम में काम करते थे। इनमें से भी कोई भाजपा या मोदी के समर्थक नहीं थे।

सन २००४ में जब मनमोहन सिंह को भारत का प्रधानमंत्री बनाया गया, तो उन्होंने अपना प्रेस सलाहकार बनने के लिए संजय बारू को चुना। बारू २००४ से २००८ तक प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के प्रेस सलाहकार और मुख्य प्रवक्ता रहे। इसके बाद वे ब्रिटेन के एक थिंक टैंक ‘इंटरनैशनल इंस्टीट्यूट ऑफ स्ट्रैटेजिक स्टडीज़’ में आर्थिक व रणनीतिक विभाग के डायरेक्टर रहे। बाद में वे भारत की आर्थिक संस्था ‘फिक्की’ के महासचिव भी रहे।

संजय बारू ने २०११ में ‘द एक्सीडेंटल प्राइम मिनिस्टर’ नाम से एक किताब लिखी थी। उस किताब में उन्होंने इस बारे में लिखा है कि २००४ से २००८ के दौरान मनमोहन सिंह के साथ काम करने के दिनों के उनके अनुभव क्या थे और कांग्रेस में मनमोहन सिंह का क्या हाल था। अब उस किताब पर एक फ़िल्म बनी है, जिसका ट्रेलर आपने पिछले हफ्ते देखा होगा। फ़िल्म का ट्रेलर देखते ही कांग्रेस के लोग भड़क गए और फ़िल्म पर बैन लगाने की धमकियां भी आ गई। कांग्रेस के नेताओं ने और सोशल मीडिया पर भी कई लोगों ने यह भी घोषित कर दिया कि यह फ़िल्म भाजपा के इशारे पर बनी है। लेकिन ज्यादातर लोग भूल गए (या शायद उन्हें पता ही नहीं होगा) कि यह फ़िल्म संजय बारू की उस किताब पर बनी है।

संजय बारू का इतना लंबा परिचय मैंने आपको इसलिए बताया, ताकि आपको पता चल सके कि उन्होंने भाजपा में या भाजपा से जुड़े किसी संगठन में कभी काम नहीं किया है और न भाजपा से कभी उनका कोई संबंध रहा है। इसके उलट वे हमेशा कांग्रेस के विश्वसनीय लोगों के नज़दीक रहे हैं।

अपनी किताब में संजय बारू ने खुद लिखा है कि जब २००८ में उन्होंने प्रधानमंत्री कार्यालय छोड़ा, तब उनका ऐसी कोई किताब लिखने का इरादा बिल्कुल नहीं था। लेकिन जब उन्होंने देखा कि २००९ के बाद यूपीए सरकार के दूसरे कार्यकाल में मनमोहन सिंह का लगातार अपमान हो रहा है, तो बारू को इसका दुःख हुआ और उन्होंने मनमोहन सिंह के व्यक्तित्व और कामकाज के सकारात्मक पक्ष को सामने लाने के इरादे से यह पुस्तक २०११ में लिखी।

कृपया ध्यान रखें कि इस पूरे कालखंड के दौरान नरेन्द्र मोदी न तो दिल्ली में थे और राष्ट्रीय स्तर पर इतने प्रभावी थे। इसलिए इस बात की कोई संभावना दूर-दूर तक नहीं है कि उनको फायदा पहुँचाने के इरादे से या उनके किसी दबाव में बारू ने यह पुस्तक लिखी थी। उन दिनों तो मोदी खुद ही गुजरात दंगों के आरोपों की जांच, यूपीए सरकार के मोदी-विरोधी दबाव और मीडिया में लगातार होने वाली आलोचना से निपटने में उलझे रहते थे, इसलिए कम से कम आप इस दुष्प्रचार में मत फँसना कि यह किताब मोदी के इशारे पर लिखी गई थी।

तो फिर इस किताब से और अब इस फ़िल्म से कांग्रेस क्यों नाराज़ है? उसका जवाब आपको उस किताब में ही मिल जाएगा। किताब की प्रस्तावना में ही बारू ने स्पष्ट लिखा है कि कांग्रेस का कोई भी नेता ईमानदारी, प्रशासकीय अनुभव, अंतरराष्ट्रीय छवि जैसे मामलों में मनमोहन सिंह की बराबरी नहीं करता, सोनिया गांधी और राहुल गांधी भी मनमोहन की बराबरी नहीं कर सकते। स्वाभाविक है कि यह बात चाहे पूरी तरह सही क्यों न हो, लेकिन कांग्रेस के लोग इसे बर्दाश्त नहीं कर सकते। इसलिए वे तो इसका विरोध करेंगे ही।

लेकिन बात सिर्फ इतनी ही नहीं है। बारू ने किताब में कई ऐसी बातें लिखी हैं, जिनसे ‘सोनिया जी’ के त्याग की पोल खुलती है और उनकी तानाशाही उजागर होती है। अभी तक तो यह सब सिर्फ किताब में था, और वह भी अंग्रेजी किताब में, जिसे भारत के ज्यादातर लोगों ने नहीं पढ़ा है। लेकिन अब यह सच एक हिन्दी फ़िल्म में सामने आ रहा है, जिसे गांव-गांव के लोग देखेंगे और जानेंगे। कांग्रेस को शायद इसी बात का डर सबसे ज्यादा सता रहा है।

लेकिन बारू ने अपनी किताब में आखिर लिखा क्या-क्या है? इसके बारे में मैं आपको अगले दो-तीन लेखों में जानकारी दूंगा। लेकिन पहले मैंने यह लेख इसलिए लिखा, ताकि आप इस मुद्दे की थोड़ी-बहुत पृष्ठभूमि समझ जाएं। अब आपको इस विषय पर मेरे अगले लेख समझने में कोई दिक्कत नहीं होगी।

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