आडवाणी जी के बहाने काँग्रेस की बेशर्मी

आजकल काँग्रेस के लोगों को आडवाणी जी की चिंता सता रही है। वैसे इसकी शुरुआत तभी से हो गई थी, जब २०१४ में मोदीजी प्रधानमंत्री बने। पहले काँग्रेस को यह चिंता हुई कि मोदी ने आडवाणी जी को प्रधानमंत्री नहीं बनने दिया, उसके बाद यह चिंता हुई कि राष्ट्रपति भी नहीं बनाया और अब चिंता हो रही है कि उन्हें इस चुनाव में टिकट भी नहीं दिया जा रहा है।

यह वही काँग्रेस है, जो उससे पहले लगातार ५० सालों तक आडवाणी जी की आलोचना और अपमान करती रही है। यह वही काँग्रेस है, जिसने १९७५ में आपातकाल लगाकर आडवाणी जी को जेल में प्रताड़ित किया था। यह वही काँग्रेस है, जो १९९२ से २०१४ तक लगातार आडवाणी जी को ‘बाबरी विध्वंस का गुनहगार’ कहती रही, और यह वही काँग्रेस है, जिसके खिलाफ आडवाणी जी ज़िंदगी भर लड़ते रहे।

फिर अचानक ऐसा क्या हुआ कि काँग्रेस को आडवाणी जी की चिंता होने लगी है?

वास्तव में यह काँग्रेस की सहृदयता, करुणा या चिंता नहीं, बल्कि धूर्तता, स्वार्थ और बेशर्मी है। और यह आज की नहीं है। यह काँग्रेस का पुराना गुण है।

अंग्रेज़ों  के खिलाफ १८५७ की लड़ाई में हिन्दू और मुसलमान मिलकर लड़े थे। अंग्रेज़ों को इस एकता से भय हुआ और उन्होंने ‘फूट डालो – राज करो’ की नीति अपनाई। परिणाम ये निकला अगले ९० वर्षों तक इन दोनों समुदायों को लगातार एक-दूसरे के खिलाफ भड़काया गया,  लड़वाया गया और उलझाए रखा गया। इस तरह अंग्रेज़ भारत में राज करते रहे और जाते-जाते दो टुकड़े करके चले गए।

यह सोचने वाली बात है कि अंग्रेज़ों ने १९४७ में भारत की सत्ता काँग्रेस को ही क्यों सौंपी? शायद उन्हें यह विश्वास था कि ‘फूट डालो – राज करो’ वाली उनकी नीति को काँग्रेस ही आगे बढ़ाती रहेगी और अपने स्वार्थ के लिए काँग्रेस के नेता भारत का नुकसान करते रहेंगे। अंग्रेज़ तो चाहते ही थे कि भारत आगे न बढ़े और काँग्रेस के लोगों ने भी अपने स्वार्थ के कारण इसकी पूरी व्यवस्था की। आज़ादी के बाद भी भारत के लोगों को एक साथ जोड़ने की बजाय काँग्रेस लोगों को अगड़े-पिछड़े, हिन्दू-मुसलमान, बहुसंख्यक-अल्पसंख्यक,सवर्ण-दलित आदि किसी न किसी बहाने से लड़वाती रही और अपनी राजनैतिक रोटियाँ सेंकती रही।

काँग्रेस के बड़े नेताओं में सिर्फ सरदार पटेल थे, जिन्होंने देश को तोड़ने के बजाय जोड़ने का काम किया। साढ़े पाँच सौ टुकड़ों में बंटे भारत को उन्होंने जोड़कर एक बनाया। जोड़ने वाले लोग काँग्रेस को कभी पसंद नहीं रहे। इसीलिए काँग्रेस ने हमेशा सरदार पटेल की उपेक्षा और अपमान किया। जिस व्यक्ति ने पूरे भारत को जोड़कर एक भव्य राष्ट्र का निर्माण किया, उसके सम्मान में एक भव्य प्रतिमा भी भाजपा के मोदी को आकर बनवानी पड़ी क्योंकि काँग्रेस ने तो उनकी मौत के बाद ही उन्हें भुला दिया था और इस बात की पूरी व्यवस्था भी कर दी थी कि उनको कोई याद न करे। दिल्ली में गाँधीजी की समाधि है, नेहरु-इंदिरा-राजीव सबकी समाधि है, सरदार पटेल की समाधि इस देश में है? नहीं है! इतना ही नहीं, जब सरदार पटेल की मौत हुई, तो नेहरुजी ने यह कोशिश भी की थी कि राष्ट्रपति डॉ. राजेन्द्रप्रसाद से उनके अंतिम संस्कार में भी न जाएँ। हालाँकि राजेन्द्रप्रसाद ने उनकी बात नहीं मानी, और सरकार उन्हें तो नहीं रोक सकती थी, लेकिन नेहरुजी अन्य सरकारी अधिकारियों के लिए आदेश जारी कर दिया था कि कोई भी पटेल के अंतिम संस्कार में सरकारी खर्च पर न जाए। उसी दिन दूसरा आदेश यह भी जारी किया गया कि सरदार पटेल जिस सरकारी गाड़ी का उपयोग करते थे, वह तुरंत जब्त करके विदेश मंत्रालय को दे दी जाए। क्या आपको पता है उस समय भारत का विदेश-मंत्री कौन था? जवाहरलाल नेहरु!

लेकिन सरदार पटेल का अपमान यहीं खत्म नहीं हुआ। १९५५ में नेहरुजी ने स्वयं को ही भारत-रत्न से सम्मानित कर लिया था। इंदिरा जी ने भी १९७१ में स्वयं को भारत-रत्न दे दिया। और सरदार पटेल को भारत-रत्न कब मिला? १९९१ में उनकी मौत के ४१ सालों बाद, वो भी इसलिए क्योंकि तब देश में कांग्रेस की सरकार नहीं थी। देश को एकता के सूत्र में जोड़ने वाले सरदार पटेल की पुण्यतिथि के दिन राष्ट्रीय एकता दिवस मनाया जाता है। उसकी शुरुआत भी कांग्रेस ने नहीं, बल्कि भाजपा के नरेन्द्र मोदी ने २०१४ में की थी! उनके सम्मान में विश्व की सबसे ऊँची प्रतिमा भी मोदी सरकार ने बनवाई और काँग्रेस आज तक उसका विरोध करके यह बता रही है कि उसे सरदार पटेल से कितनी नफ़रत है।

यही काँग्रेस ने डॉ. राजेन्द्र प्रसाद के साथ किया था। पहले उन्हें राष्ट्रपति न बनने देने के लिए नेहरु जी उनसे झूठ बोला कि नेहरु और पटेल ने मिलकर यह तय किया है कि देश का राष्ट्रपति चक्रवर्ती राजगोपालाचारी को बनाया जाना चाहिए। जबकि नेहरु और पटेल के बीच ऐसी कोई बात ही नहीं हुई थी! सोमनाथ मंदिर के उद्घाटन के समय भी नेहरु ने राजेन्द्रप्रसाद को वहाँ जाने से मना किया था, लेकिन फिर एक बार उन्होंने बात नहीं मानी। नेहरुजी ऐसी बातों से इतने नाराज़ हुए कि जब देश के पहले राष्ट्रपति डॉ. राजेन्द्रप्रसाद की मौत हुई, तो प्रधानमंत्री नेहरुजी उनके अंतिम संस्कार तक में नहीं गए।

डॉ. आंबेडकर के साथ भी काँग्रेस ने कुछ अलग नहीं किया था। १९५२ में भारत के पहले लोकसभा चुनाव में डॉ. आंबेडकर ने मुंबई से चुनाव लड़ा था। काँग्रेस ने वहाँ उनके खिलाफ अपना प्रत्याशी खड़ा करके उन्हें हराया, ताकि वे लोकसभा में न पहुँच सके। दूसरी बार डॉ. आंबेडकर १९५४ के एक उपचुनाव में महाराष्ट्र के भंडारा से खड़े हुए। काँग्रेस ने उस उपचुनाव तक में उनके खिलाफ अपना प्रत्याशी उतारा और उन्हें हरवाया। अगला लोकसभा चुनाव १९५७ में हुआ, लेकिन तब तक आंबेडकर जी की मौत हो चुकी थी, वरना मुझे पूरा भरोसा है कि काँग्रेस फिर से उन्हें हराने में कोई कसर न छोड़ती। जिनके बनाए संविधान की काँग्रेस रोज मोदी को याद दिलाती है, उन आंबेडकर का खुद कांग्रेस ने इस तरह लगातार अपमान किया था। और यह अपमान उनकी मौत के बाद भी बंद नहीं हुआ। ऊपर जाकर कृपया फिर से पढ़िये कि नेहरु और इंदिरा को भारत-रत्न कब व किससे मिला था। और अब ये जान लीजिए कि डॉ. आंबेडकर को उनकी मौत के ३५ साल बाद १९९० में मिला और वह भी इसलिए क्योंकि तब कांग्रेस की सरकार नहीं थी।

नरसिंहराव के साथ काँग्रेस ने क्या किया, सीताराम केसरी के साथ क्या किया, ये तो आप में से अधिकतर लोग जानते ही होंगे, और मैं भी पहले इस बारे में लिख चुका हूँ, इसलिए अब उसे नहीं दोहराऊँगा। इतना ही क्यों, २००४ से २०१४ के दस वर्षों में रोज डॉ. मनमोहन सिंह का कितना अपमान होता था, ये सबको पता है। किस तरह उनकी सरकार के अध्यादेश को राहुल गांधी ने सरेआम प्रेस कांफ्रेंस में फाड़कर फेंक दिया था, ये तो सबने देखा है, न देखा हो, तो यूट्यूब पर फिर से देख लीजिए। बाकी आपने एक्सीडेंटल प्राइम मिनिस्टर में देख ही लिया होगा।

काँग्रेस में अपने नेताओं को अपमानित करने की परंपरा इतनी पुरानी और समृद्ध है कि उस पर शायद पूरी पुस्तक ही लिखी जा सकती है। लेकिन मेरे ख्याल से इस बात को समझने के लिए ये दो-चार उदाहरण भी कम नहीं हैं।

इसके विपरीत भाजपा में पुराने नेताओं को भी पूरा सम्मान मिलता है। अटलजी जब तक जीवित थे, उन्हें पार्टी में पूरा सम्मान मिला और मोदी-शाह के दौर में भी वह कायम रहा। सोनिया सरकार के दौरान आडवाणी जी ने ही माँग की थी कि अटल जी को भारत रत्न दिया जाए। तब इसी काँग्रेस ने आडवाणी जी का मज़ाक उड़ाया था और अटल जी को भी अपमानित किया था। लेकिन आडवाणी जी की वह इच्छा मोदी सरकार ने ही पूरी की। अटलजी के निधन के बाद पूरे सम्मान के साथ उनका अंतिम संस्कार हुआ है और उनके लिए दिल्ली में स्मारक का निर्माण करवाया गया है, उससे भी मोदी जी ने यह दिखाया है कि पुराने नेताओं का पूरा सम्मान आज भी कायम है।

आडवाणी जी के मामले में भी यह बात सही है। आज उनकी उम्र ९१ वर्ष है। अपने घर-परिवार, आस-पड़ोस या मोहल्ले में ९० साल के किसी बुजुर्ग को एक बार देख लीजिए। अक्सर इस उम्र में व्यक्ति को कुर्सी पर बैठने-उठने तक के लिए मदद की ज़रूरत पड़ती है, दो कदम चलना हो, तो सहारा लेना पड़ता है, कई तरह की बीमारियाँ घेर लेती हैं, स्मरण-शक्ति कमज़ोर हो जाती है, कई परेशानियां होती हैं। जिनको ऐसी कोई बीमारी या दिक्कतें न हों, फिर भी इतनी उम्र होने के बाद शरीर तो थक ही जाता है। ऐसे व्यक्ति को सम्मान सहित आराम देने के बजाय उन्हें चुनाव लड़वाना, भीषण गर्मी के मौसम में प्रचार के लिए भागदौड़ करवाना और जीतने के बाद उनसे काम करवाना, उनका सम्मान नहीं बल्कि क्रूरता है। अगर आप ९० सालों तक जीये, तो क्या आप चाहेंगे कि आपके बच्चे या बहुएं आपको घर में आराम देने की बजाय किसी न किसी काम के लिए आपको बसों की भीड़ में धक्के खाने या बैंकों की लाइन में घंटों खड़ा रहने पर मजबूर किया करें? यह कहाँ की मानवीयता होगी?

अच्छे बेटे का कर्तव्य यही है कि वह घर की ज़िम्मेदारियाँ अपने कन्धों पर उठाए और पिता को बुढ़ापे में आराम करने दे। मोदी-शाह यही कर रहे हैं। अटल जी और आडवाणी जी जीवन-भर इस एक सपने को लेकर संघर्ष करते रहे कि देश से काँग्रेस हटे और भाजपा की सरकार देश को सही दिशा में आगे ले जाए। यही उन्होंने २००४ तक एनडीए सरकार के द्वारा किया और यही २०१४ से अब तक मोदी सरकार ने किया है। निश्चित रूप से आडवाणी जी इससे संतुष्ट हैं, इसीलिए पिछले पाँच सालों में उन्होंने एक बार भी सरकार की आलोचना नहीं की है, न किसी मामले में सरकार से नाराज़गी जताई है।

भाजपा में आडवाणी जी को हमेशा सम्मान मिला है और आज भी मिल रहा है। वे सांसद रहे, मंत्री रहे, उपप्रधानमंत्री रहे, पार्टी के अध्यक्ष रहे, और उन्होंने ही कई लोगों को सांसद, मंत्री और अध्यक्ष बनाया भी है। जिस व्यक्ति को जीवन में इतना कुछ मिल चुका है, उसके बारे में कोई काँग्रेसी ही ऐसा सोच सकता है कि इस उम्र में भी आडवाणी जी को सांसद बनने की ही लालसा हो रही होगी, क्योंकि काँग्रेस की संस्कृति यही है कि व्यक्ति अंतिम साँस तक पद का लालच नहीं छोड़ पाता है और अंततः उसके ही संगी-साथी उसे अपमानित करके बाहर निकाल देते हैं। यह परंपरा भाजपा की नहीं है, इसीलिए काँग्रेस को यह बात बड़ी अविश्वसनीय लग रही है कि टिकट और पद के बिना भी कोई कैसे रह सकता है!

लेकिन मुझे उम्मीद है कि अगर आप काँग्रेसी नहीं हैं, तो आप इतना ज़रूर समझते होंगे कि आडवाणी जी को टिकट न देकर मोदी सरकार ने उनका अपमान नहीं किया है, बल्कि शायद उनकी ही इच्छा रही हो कि अब चुनाव नहीं लड़ना है और मोदी-शाह ने उनकी बात का सम्मान किया हो। वैसे भी अभी सारे प्रत्याशियों के नाम घोषित नहीं हुए हैं और आडवाणी जी चाहें, तो आज भी कह सकते हैं कि उन्हें चुनाव लड़ना है। मुझे नहीं लगता कि भाजपा में कोई भी उनकी बात को मना करेगा। लेकिन जब तक आडवाणी जी स्वयं ऐसा नहीं कहते, तब तक मैं इस बात को मानने वाला नहीं हूँ, और काँग्रेस के कहने से तो बिल्कुल भी नहीं मानने वाला हूँ।

आपको आडवाणी जी पर भरोसा है या काँग्रेस पर, ये आप खुद तय कीजिए और कमेन्ट लिखकर मुझे भी बताइये।

(स्त्रोत: सभी चित्र गूगल से लिए गए हैं)

Comments

comments

2 thoughts on “आडवाणी जी के बहाने काँग्रेस की बेशर्मी”

  1. बेहद संतुलित और तथ्यात्मक लेख।
    बिना पूर्वाग्रह के सटीक और कांग्रेस के मूल स्वभाव को उद्घाटित करती व्याख्या।
    सरल शब्दों से सजी और निरुत्तर करने वाले उदाहरणों से पोषित लेखमाला।
    साधुवाद सुमंत जी।

प्रातिक्रिया दे

आपका ईमेल पता प्रकाशित नहीं किया जाएगा.