चीन का नया महाद्वीप

पुस्तक का मुखपृष्ठ

पिछले हफ़्ते मैंने “China’s Second Continent” (चीन का दूसरा महाद्वीप) नामक पुस्तक पढ़ी। इसके लेखक एक अमरीकी पत्रकार हॉवर्ड फ़्रेंच हैं। पुस्तक अफ्रीका में चीन द्वारा किए जा रहे निवेश और वहाँ बड़ी संख्या में रहने जा रहे चीनी नागरिकों के बारे में है।

पूरे अफ्रीका महाद्वीप के कई देशों में चीन अरबों डॉलर का निवेश कर रहा है। चीन की मदद से इन देशों में कई सरकारी इमारतें, पुल, स्टेडियम, परिवहन और कृषि व्यवस्था में सुधार आदि कई परियोजनाओं पर काम चल रहा है। इन परियोजनाओं में काम करने के लिए लाखों की संख्या में चीनी नागरिक इन अफ्रीकी देशों में मजदूरी और अन्य कामों के लिए आते हैं। प्रोजेक्ट पूरा होने के बाद इनमें से अधिकतर लोग चीन वापस नहीं जाते, बल्कि अफ्रीका में ही कोई कामकाज या व्यापार शुरू कर देते हैं। कुछ लोगों ने यहां होटल, बार, रेस्तरां आदि खोल लिए हैं, कुछ खेती-बाड़ी करने लगे हैं और कुछ लोग चीन से सस्ता सामान मंगवाकर अफ्रीका में बेचते हैं। बड़े उद्यमी या चीन की सरकारी कंपनियां खनन, तेल, हीरे की खदानों आदि जैसे उद्योगों में शामिल हैं।

चीन के बढ़ता दखल अफ्रीकी जीवन के कई पहलुओं को प्रभावित कर रहा है। अफ्रीका के अधिकांश देश बहुत लंबे समय तक युद्ध या आपसी लड़ाइयों में उलझे रहे हैं। गरीबी, बेरोजगारी, अशिक्षा, बीमारियां, मूलभूत सुविधाओं की कमी, नई तकनीकी जानकारी का अभाव आदि यहां की बड़ी समस्याएं हैं। अधिकतर देशों में लोकतंत्र भी स्थिर नहीं है या केवल नाममात्र का है। इसलिए बड़े पैमाने पर भ्रष्टाचार भी व्याप्त है। हिंसा और असुरक्षा बहुत आम समस्याएं हैं। लोग अपने दैनिक जीवन में रोजी-रोटी के लिए भी संघर्षरत रहते हैं।

ऐसी कठिन स्थितियों में चीनी आप्रवासी एक नई चुनौती हैं। आज अफ्रीका में रह रहे चीनियों की संख्या लगभग १० से २० लाख के बीच है। इनके कारण कई अफ्रीकी देशों में स्थानीय नागरिकों में भारी असन्तोष रहता है। कई बार उनके बीच संघर्ष या टकराव की स्थिति बन जाती है। चीनी व्यापारियों से मुकाबला करना स्थानीय व्यापारियों के लिए कठिन होता जा रहा है। आम आदमी के स्तर पर यह एक बहुत बड़ी समस्या है।

सामान्यतः यह माना जाता है कि किसी भी देश में अगर बड़ी मात्रा में विदेशी निवेश आता है तो उससे आर्थिक विकास होता है क्योंकि नए उद्योग लगते हैं, लोगों को रोज़गार मिलते हैं, नई तकनीकों का आगमन होता है और जीवन-स्तर सुधरता है। लेकिन अफ्रीका में अधिकांशतः ऐसा नहीं हो रहा है।

अधिकतर अफ्रीकी देशों में लोकतंत्र या तो है ही नहीं या बहुत कमज़ोर है। इन देशों के शासकों को खरीद लेना चीन के लिए बहुत आसान है। जहां तानाशाही या सैनिक शासन है, वहां यह काम शासकों को बड़ी धनराशि देकर आराम से किया जा सकता है। जहां लोकतंत्र है, वहां शासकों से गुप्त समझौते करने के अलावा चीन इंफ्रास्ट्रक्चर की परियोजनाओं में भी मदद करता है। जैसे कई देशों में चीन सड़कें, रेल लाइनें, खेलों के लिए बहुत बड़े स्टेडियम, अस्पताल, हवाई अड्डे, संसद भवन और अन्य सरकारी इमारतें आदि मुफ्त बनवाने का प्रस्ताव देता है। जिन अफ्रीकी देशों में लोकतंत्र है, वहां की सरकारें चुनावों में ऐसी चीज़ों को अपनी उपलब्धि के रूप में प्रस्तुत करती हैं और इनके आधार पर उन्हें चुनाव जीतने में मदद मिलती है।

लेकिन क्या इससे वाकई अफ्रीका को बहुत लाभ ही रहा है? नहीं। क्या चीन ये सारे काम वाकई मुफ्त में परोपकार के इरादे से कर रहा है? नहीं। चीन जब भी किसी देश में कोई निर्माण कार्य करवाने का प्रस्ताव देता है, तो पहली शर्त यह होती है कि इसका ठेका किसी चीनी कंपनी को मिले। वैसे भी अफ्रीकी देशों के पास ऐसे बड़े प्रोजेक्ट्स के लिए ज़रूरी पैसा नहीं होता है, और इनमें पूरा पैसा चीन ही लगाता है, इसलिए उसकी शर्तें मानने के अलावा उनके पास कोई चारा भी नहीं होता। इसलिए ऐसे सारे ठेके चीन की बड़ी सरकारी कंपनियों या वहां के शासकों की पसंदीदा कंपनियों को ही मिलते हैं।

ये कंपनियां इन प्रोजेक्ट्स में काम करने के लिए चीन से ही लोगों को लाती हैं। यहां तक कि ज्यादातर मजदूर भी चीन से ही लाए जाते हैं। इसलिए इनमें बहुत कम ही अफ्रीकियों को रोजगार मिलता है। जहां मिलता भी है, वहां बहुत छोटे स्तर पर मिलता है और उन्हें मजदूरी भी बहुत कम दी जाती है। इसके अलावा ज्यादातर काम चीनियों से ही करवाए जाने के कारण अफ्रीकियों को नई तकनीकें या कामकाज के तरीके सीखने का अवसर भी बहुत कम मिलता है। कई मामलों में तो इन इमारतों के बल्ब बदलने जैसी छोटी चीज़ों के लिए भी अफ्रीकी देशों को चीन पर निर्भर रहना पड़ता है। यह एक तरह की गुलामी ही तो है!

दूसरा नुकसान ये है कि इन प्रोजेक्ट्स के साथ-साथ थोड़ी-सी रकम और देकर चीन इसके बदले में इन अफ्रीकी देशों की खदानें या तेल के कुएं कई सालों के लिए लीज़ पर मिल जाते हैं। चीन को अपने देश के उद्योगों के लिए इन खनिजों की ज़रूरत है। इसके अलावा चीन इन देशों में हजारों एकड़ जमीन भी हासिल कर रहा है क्योंकि इसकी बढ़ती जनसंख्या के लिए भविष्य में इसे भारी मात्रा में खाद्यान्न की आवश्यकता होगी, जो कि केवल चीन में उपलब्ध कृषि-योग्य भूमि के द्वारा पूरी नहीं हो सकेगी।

लेकिन अफ्रीकी देशों के लिए यह वास्तव में नुकसान का सौदा है। वे आज की तात्कालिक ज़रूरतें पूरी करने के लिए केवल कुछ करोड़ डॉलर या कुछ निर्माण परियोजनाओं के बदले अपने प्राकृतिक संसाधन चीन के हवाले कर रहे हैं। लेकिन इससे उनके युवाओं को नया तकनीकी ज्ञान या नए अवसर नहीं मिल रहे हैं। चीन से आज मिल रही धनराशि कुछ सालों बाद खत्म हो जाएगी। चीन की बनाई इमारतें या पुल भी समय के साथ जर्जर हो जाएंगे। प्राकृतिक संसाधन भी अगले कुछ दशकों में समाप्त हो जाएंगे। दूसरी तरफ जनसंख्या लगातार बढ़ती जा रही है। ऐसे में ये देश पैसे, संसाधन और तकनीकी ज्ञान के बिना उस समय क्या करेंगे? अपने तात्कालिक लाभ के लिए शायद वहां के शासक इन बातों पर कोई ध्यान नहीं दे रहे हैं या फिर चीनी आर्थिक मदद के जाल में इस तरह फंस गए हैं कि कुछ कर नहीं पा रहे हैं। आमतौर पर ये देश अमरीका या यूरोप के देशों से अथवा विश्व बैंक अथवा आईएमएफ जैसे संगठनों से मदद हासिल नहीं कर पाते हैं क्योंकि ऐसी मदद के साथ लोकतंत्र की स्थापना या बहाली और मानवाधिकारों की रक्षा जैसी कई शर्तें जुड़ी होती हैं, जो अधिकतर अफ्रीकी शासकों को मंज़ूर नहीं हैं। इसके विपरीत चीन को लोकतंत्र या मानवाधिकार जैसे मुद्दों से कोई मतलब नहीं है। उसे सिर्फ अपने फायदे से मतलब है, इसलिए चीन से मदद पाना इनके लिए आसान काम है।

अफ्रीका तो गरीब और पिछड़ा हुआ है, इसलिए वह बाहरी मदद का मोहताज है, लेकिन चीन तो विकसित देश है, फिर वहां के नागरिक अफ्रीका की इन भीषण परिस्थितियों के बावजूद भी लाखों की संख्या में यहां क्यों आ रहे हैं?

इसके दो मुख्य कारण है। चीनी सरकार दुनिया में भले ही अपने देश की छवि कितनी ही अच्छी बनाकर प्रस्तुत करती हो, लेकिन सच्चाई यही है कि चीन के कई इलाकों में आज भी भीषण गरीबी है और जीवन बहुत कठिन है। इसलिए लोग नए अवसरों की तलाश में बाहर निकलना चाहते हैं। अफ्रीका में बड़ी मात्रा में उपजाऊ भूमि, खनिज संसाधन और बहुत ढीले कानून होने के कारण यह चीनियों के लिए एक आकर्षक स्थान है। दूसरा कारण यह भी है कि चीन में कम्युनिस्ट पार्टी का तानाशाही शासन है, जहां नागरिकों की स्वतंत्रता बेहद सीमित है और उनकी हर गतिविधि पर सरकार की कड़ी नज़र रहती है। ऐसे माहौल में लोग बहुत घुटन महसूस करते हैं और वे अपनी आज़ादी चाहते हैं। अफ्रीका उन्हें चीन के घुटन भरे माहौल से बाहर निकलने का एक बढ़िया विकल्प प्रतीत होता है। इस कारण भी बड़ी संख्या में चीनी लोग अपना देश छोड़कर नए सिरे से ज़िन्दगी शुरु करने के प्रयास में अफ्रीका आते हैं।

चीन और अफ्रीका के इस सौदे में हर किसी के अपने कारण, अपने सपने और अपने फायदे-नुकसान हैं। चाहे व्यक्ति हो या देश, हर कोई अपने-अपने लक्ष्य पाने की कोशिश में है। लेकिन इतना पक्का है कि अफ्रीका में चीन के इस बढ़ते दखल ने अफ्रीकी जीवन को बड़े पैमाने पर प्रभावित किया है और जैसे-जैसे चीन एक वैश्विक शक्ति के रूप में उभरता जाएगा, अफ्रीका के देशों और विश्व के कई अन्य देशों में भी चीन का दखल और प्रभाव भी लगातार बढ़ता ही जाएगा।

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