तकनीक का दुरुपयोग?

महाराष्ट्र में जालना जिले के एक गाँव में एक गरीब दलित परिवार में जन्मे दिलीप म्हस्के ने अपनी प्राथमिक शिक्षा गाँव के ही स्कूल से पूरी की। उसके आगे की पढ़ाई नवोदय विद्यालय में करने के लिए केन्द्र सरकार से छात्रवृत्ति मिली। बारहवीं तक की पढ़ाई वहीं से पूरी हुई। जालना जिले में अकाल की परिस्थिति के कारण परिवार मुंबई चला आया। म्हस्के महोदय ने वहीं से कानून की डिग्री हासिल की। गरीबी के कारण मजदूरी भी करनी पड़ी।

आगे उन्होंने मुंबई आईआईटी से प्लानिंग एंड डेवलपमेंट के विषय में कोई डिग्री ली। उसी दौरान वे सामाजिक और राजनैतिक कार्यों में भी सक्रिय होने लगे थे। उन्होंने महाराष्ट्र में अण्णा हजारे के कुछ आन्दोलनों में हिस्सा लिया, लोकसत्ता पार्टी नामक एक राजनैतिक दल में भी सक्रियता से जुड़े।

आईआईटी के दिनों में ही उन्होंने एक रिसर्च पेपर लिखा था। वह किस विषय पर था, यह जानकारी बहुत ढूँढने पर भी मुझे नहीं मिल पाई है। वह रिसर्च पेपर अमरीका के पेंसिल्वेनिया विश्वविद्यालय तक पहुँचा। आगे इस यूनिवर्सिटी से उन्हें पीएचडी करने के लिए छात्रवृत्ति का ऑफ़र मिला।

सन २००७ में वे पीएचडी की पढ़ाई के लिए अमरीका आ गए। इसके बाद हार्वर्ड यूनिवर्सिटी से उन्होंने स्वास्थ्य विज्ञान के विषय में मास्टर्स डिग्री ली और फिर स्वास्थ्य सलाहकार के रूप में न्यूजर्सी में अपना क्लिनिक खोला। आगे न्यूयॉर्क और वॉशिंगटन की प्रादेशिक सरकारों के साथ भी कुछ प्रोजेक्ट्स पर काम किया।

भारत के समान ही म्हस्के जी यहाँ अमरीका में भी राजनीति से जुड़े रहे। बराक ओबामा के चुनाव अभियान में भी काम किया। लेकिन साथ ही भारत में भी राजनैतिक संपर्क कायम रखे। उनका दावा है कि सामाजिक समानता के लिए काम करना ही उनका उद्देश्य है।

आगे वे अरविन्द केजरीवाल के नेतृत्व में बनी आम आदमी पार्टी में शामिल हो गए। सन २०१४ के लोकसभा चुनाव में आम आदमी पार्टी के टिकट पर महाराष्ट्र से चुनाव भी लड़े, जिसमें उनकी हार हुई। उसके बाद वे अमरीका वापस लौट आए।

संभवतः २०१४ में भाजपा और मोदीजी की जीत के बाद म्हस्के जी को महसूस हुआ कि भारत खतरे में है और उसे बचाने के लिए कुछ किया जाना चाहिए। उन्होंने दुनिया भर में फैले दलित प्रोफेशनल्स का एक गुप्त नेटवर्क तैयार करना शुरू किया। उनके अनुसार अभी इसमें ब्रिटेन, अमरीका, ऑस्ट्रेलिया और मध्यपूर्व के देशों में रह रहे लगभग १०० लोग जुड़े हुए हैं। इनमें से अधिकतर लोग आईटी प्रोफेशनल्स हैं।

ब्रिटेन की एक कंपनी की मदद से उन्होंने इस बात का अध्ययन किया कि सोशल मीडिया पर दलितों की सक्रियता कितनी है और दलित आन्दोलन के लिए समर्थन जुटाने हेतु सोशल मीडिया का उपयोग किस तरह किया जा सकता है। इस अध्ययन के आधार पर उन लोगों ने एक विस्तृत रिपोर्ट तैयार की।

इस रिपोर्ट से उन्हें पता चला कि भारत की लगभग १०० लोकसभा सीटों पर दलित वोटरों की संख्या प्रभावी है। इनमें से अधिकतर सीटें उप्र, मप्र, बिहार और महाराष्ट्र में हैं। उन्होंने यह निष्कर्ष भी निकाला कि अगर किसी तरह इन १०० सीटों के दलित वोटरों को उकसाया जा सके, तो २०१९ के चुनाव में भाजपा को हराया जा सकता है और इसमें सोशल मीडिया को हथियार बनाया जा सकता है।

इस निष्कर्ष के आधार पर इन प्रोफेशनल्स ने आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, जीआईएस मैपिंग और बिग डेटा जैसी तकनीकों का उपयोग करके बड़े पैमाने पर इन १०० चुनाव क्षेत्रों के लोगों के बारे में पूरी जानकारी इकट्ठा की और उसका अध्ययन किया। चुनाव आयोग की वेबसाइट पर उपलब्ध वोटरों के डेटा का भी उन्होंने अध्ययन किया। साथ ही उन्होंने पूरे भारत में दलित कार्यकर्ताओं का एक सक्रिय नेटवर्क भी तैयार किया। विभिन्न ऑनलाइन प्लेटफॉर्मों पर कई ग्रुप्स भी बना लिए, जिनके माध्यम से खबरें फैलाकर लोगों को भड़काया जा सके।

इतने सालों के अध्ययन और तैयारी के बाद इस समूह को यह विश्वास हो गया था कि वे लोगों को उकसाने और सरकार के खिलाफ भड़काने के लिए सोशल मीडिया की मदद से एक प्रभावी अभियान चला सकते हैं। लेकिन पूरी तरह आश्वस्त होने के लिए ये लोग एक ट्रायल करना चाहते थे। इसके लिए उन्होंने इसी वर्ष की १४ अप्रैल को आंबेडकर जयंती की तारीख चुनी।

१४ अप्रैल के लिए उनकी तैयारी चल ही रही थी कि इसी बीच २० मार्च को एससी/एसटी एक्ट में सुधार के संबंध में सुप्रीम कोर्ट का आदेश आया। पूरे देश में विपक्षी दलों ने इसका विरोध शुरू कर दिया। म्हस्के जी और उनके समूह को लगा कि यह लोगों को उकसाने का बहुत अच्छा मौका है। तुरन्त ही उनकी टीम काम में जुट गई।

कई तरह के मैसेज तैयार करके विभिन्न सोशल मीडिया प्लेटफॉर्मों और ग्रुप्स में फैला दिए गए। लोग बिना सोचे-समझे इस तरह के संदेशों को फॉरवर्ड करते रहे। किसी को पता भी नहीं था कि वास्तव में इन संदेशों की शुरुआत हुई कहाँ से थी और उनमें लिखी बातों में सच्चाई कितनी है। बहुत-से लोगों को तो यह भी नहीं मालूम था कि सुप्रीम कोर्ट का फैसला किस बारे में है और उसका मतलब क्या है। लेकिन केवल भड़काऊ मैसेज भेज-भेजकर लोगों को उकसाया गया और देशभर में कई जगह २ अप्रैल को लोग सड़कों पर हिंसा के लिए उतर आए।

म्हस्के महोदय का कहना है कि इस आंदोलन के लिए लोगों को भड़काने का उनका उद्देश्य तकनीक की मदद से सफलतापूर्वक पूरा हुआ। उनका यह भी कहना है कि तकनीक के उपयोग का उनका ट्रायल भी २ अप्रैल को सफल हो गया। क्या इसका अर्थ यह लगाया जाए कि अब आगे लोकसभा चुनाव तक और भी बड़े पैमाने पर हिंसा, तोड़फोड़ और लोगों को आपस में लड़वाने जैसे कामों के लिए उनकी टीम पूरी तरह तैयार है? निष्कर्ष निकालने के लिए आप स्वतंत्र हैं।

म्हस्के जी का दावा है कि इस काम में पिछले ३ वर्षों में उन्होंने लगभग ५ लाख अमरीकी डॉलर खर्च किए हैं। भारतीय मुद्रा में यह रकम करोड़ों में है। बहुत खोजने के बाद भी अभी मुझे यह जानकारी नहीं मिल पाई है कि इतनी बड़ी रकम किन स्त्रोतों से प्राप्त हुई, किस तरह खर्च की गई और भारत में किस-किसको इस काम के लिए कितने पैसे दिए गए।

मुझे अखबारों और अन्य स्रोतों से जितनी जानकारी मिल सकी, वह मैंने आपके लिए उपलब्ध करवा दी है। अब इस पैटर्न को समझने और किसके तार किससे, कहाँ और कैसे जुड़े हैं, यह सोचने का जिम्मा मैं आप पर छोड़ता हूँ।

मुझे इस बात से कोई आपत्ति नहीं है कि समाज में समानता होनी चाहिए। किसी भी आधार पर किसी के खिलाफ किसी भी तरह का भेदभाव नहीं होना चाहिए। लेकिन समाज को जोड़ने, भेदभाव मिटाने और समानता लाने का सही तरीका यह है कि लोगों को एक-दूसरे से जोड़ने, समाज में दूरियां मिटाने और सबको एक करने की भावना से काम किया जाए और धर्म, जाति, भाषा, क्षेत्र जैसे भेदभाव से परे हमारी साझा संस्कृति, धरोहर और राष्ट्रीयता को आधार बनाया जाए। लोगों को लड़वाने से समानता नहीं आएगी, भेदभाव नहीं मिटेगा, बल्कि केवल कटुता और वैमनस्य बढ़ेगा। आज यही हो रहा है और इसमें आम लोगों का केवल नुकसान ही होता है, फायदा केवल आम लोगों को भड़काने वालों का होता है।

डॉ. आंबेडकर ने कहा था कि शिक्षा मनुष्य की सबसे बड़ी शक्ति है। दलित समाज के लिए भी उनका सबसे बड़ा सन्देश यही था कि लोग खूब पढ़ाई करें और अधिक से अधिक ज्ञान प्राप्त करें क्योंकि ज्ञान से ही बुराइयों को मिटाना संभव है और अज्ञान ही सबसे बड़ी बुराई है। मुझे अफ़सोस है कि दिलीप म्हस्के और उनकी टीम के लोगों ने ज्ञान और पैसे का उपयोग आंबेडकर जी की राह पर चलकर लोगों को शिक्षित करने या उनकी मदद करने की बजाय उन्हें उकसाने और भड़काने के लिए किया और उससे भी ज्यादा मुझे इस बात का अफसोस है कि ऐसी हिंसा और विनाश को वे अपनी सफलता मानते हैं। इस सारी तकनीक और पैसों का उपयोग उनकी टीम लोगों तक सही जानकारी पहुंचाने या दलितों के लिए शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार, किताबों, पढ़ाई, प्रशिक्षण आदि से जुड़े किसी अच्छे प्रोजेक्ट के लिए करती तो क्या बेहतर नहीं होता?

मुझे इस बात का अफसोस ज़रूर है कि उन्होंने दूसरा रास्ता चुना, लेकिन उससे ज्यादा अफ़सोस इस बात का है कि आपमें से कई लोग भी उस दौरान बिना सोचे-समझे भड़काऊ संदेश लिखने या फॉरवर्ड करके आगे फैलाने में लगे रहे, जबकि मामले की वास्तविकता कुछ और ही थी। यही परिणाम कश्मीर की घटना की खबर के मामले में भी हो रहा है और मुझे आशंका है कि इसी तरह की गलतियां आप लोग अगले वर्ष-भर लगातार कई बार करते रहेंगे।

यह देखकर अफसोस होता है कि हम भारत के लोग एकजुट होकर साथ रहने और मिल-जुलकर देश को आगे बढ़ाने के लिए प्रयास करने की बजाय आपस में लड़ने-झगड़ने, देश को बांटने और तोड़ने के लिए हमेशा ही उतावले रहते हैं। क्या यह स्थिति बदलेगी या और बदतर होती जाएगी? फैसला आपको ही करना है। सादर!

(यह लेख न्यू इंडियन एक्सप्रेस, टाइम्स ऑफ इंडिया और इंटरनेट पर अन्य स्रोतों से प्राप्त जानकारी पर आधारित है।)

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