जयललिता की कहानी

कल सिंगापुर से अमरीका की फ्लाइट में मैंने एक नई पुस्तक ‘अम्मा’ भी पढ़ी। पत्रकार वासंती द्वारा लिखित यह पुस्तक तमिलनाडु की पूर्व-मुख्यमंत्री जे. जयललिता के बारे में है।

पुस्तक का मुखपृष्ठ

यह तो सभी को मालूम है कि पिछले कुछ वर्षों से तमिलनाडु की राजनीति में करुणानिधि और जयललिता का ही वर्चस्व रहा है, लेकिन यह बात शायद कम ही लोग जानते होंगे कि राजनीति में इन दोनों नेताओं का पदार्पण कब और कैसे हुआ व इनकी राजनैतिक यात्रा कैसी रही है। इनमें से जयललिता के राजनैतिक जीवन का परिचय मुझे इस पुस्तक के माध्यम से मिला। करुणानिधि और उनसे भी पहले के तमिलनाडु के नेताओं, जैसे एमजीआर, के बारे में पढ़ना अभी बाकी है।

तो कहानी ऐसी है कि जयललिता केवल दो वर्ष की थीं, जब उनके पिता का देहांत हो गया। उनकी मां अपने बच्चों को लेकर वापस बेंगलुरु में अपने मायके आ गई। कुछ वर्षों बाद एक फ़िल्म प्रोड्यूसर ने उनकी मां को देखा और अपनी फिल्म में अभिनेत्री की भूमिका निभाने का प्रस्ताव दिया। अब मां अक्सर शूटिंग के लिए चेन्नई में ही रहती थीं और बच्चे अपनी मौसी और नाना-नानी के साथ बेंगलुरु में रहते थे। नन्हीं जयललिता रोज़ अपनी मां से मिलने के लिए तरसती रहती थी और मां अपनी फिल्मों में व्यस्त रहती थी। उसी समय से जयललिता को फिल्मों से नफरत हो गई क्योंकि उसे लगता था कि फिल्मों ने ही मां को उनसे दूर कर दिया है। बचपन में ही उस बच्ची ने तय कर लिया था कि वह जीवन में कभी फिल्मी दुनिया में कदम नहीं रखेगी।

अकेलापन दूर करने की कोशिश में वह किताबों की ओर मुड़ी और खूब किताबें पढ़ने लगी। उसका सपना था कि वह बड़ी होकर आईएएस अधिकारी या डॉक्टर बनेगी। और निजी जीवन में वह किसी आम गृहिणी की तरह विवाह करके सामान्य जीवन बिताना चाहती थी।

लेकिन होना कुछ और ही था। बेंगलुरु में जो मौसी जयललिता की देखभाल करती थी, उसका विवाह हो गया और जयललिता को मां ने अपने पास चेन्नई बुला लिया। यहीं जयललिता ने स्कूल की पढ़ाई पूरी की। अब कॉलेज शुरू होने तक दो महीनों का समय खाली था। संयोग से एक प्रोड्यूसर ने जयललिता को देखा और अपनी अगली फिल्म में अभिनेत्री बनने का प्रस्ताव दिया। जयललिता ने अपनी मां के दबाव में इसे स्वीकार भी कर लिया। शायद उनके मन में यह विचार भी रहा होगा कि इससे कुछ नए अनुभव भी मिलेंगे और दो महीनों का खाली समय भी कट जाएगा। फ़िल्म भी उन्होंने इसी शर्त पर साइन की थी कि शूटिंग २ महीनों में ही पूरी हो जाए, ताकि वह कॉलेज की पढ़ाई शुरू कर सके।

लेकिन इस फ़िल्म के बाद जयललिता को लगातार नई फिल्मों के ऑफर मिलने लगे। फिर भी जयललिता ने आगे की पढ़ाई के लिए कॉलेज में एडमिशन लिया और वहां गई भी, लेकिन पहले ही दिन क्लास में एक शिक्षिका के हाथों हुए अपमान के कारण वे कॉलेज से लौट आईं और फिर कभी कॉलेज का मुंह नहीं देखा।

अब वे पूरी तरह फिल्मों में डूब गई। काम अपने मन का हो या न हो, लेकिन जो काम शुरू किया है, उसमें पूरी मेहनत करना और सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन करना उनका स्वभाव था। इसी दौरान तमिल फिल्मों के सुपरस्टार एमजी रामचन्द्रन से उनका संपर्क हुआ। लगभग ५० वर्ष के एमजीआर और १७ वर्ष की जयललिता की जोड़ी परदे पर भी और परदे के बाहर भी चर्चा का विषय बन गई। एमजीआर अब हर फिल्म में अपने साथ जयललिता को ही लेने के लिए प्रोड्यूसरों पर दबाव बनाने लगे। हालांकि प्रोड्यूसरों को भी इसमें आपत्ति नहीं थी क्योंकि यह जोड़ी परदे पर हिट थी।

अभिनय के अलावा एमजीआर का राजनीति में भी दखल था। करुणानिधि के साथ वे डीएमके के सक्रिय नेताओं में से एक थे। मुख्यमंत्री अन्नादुरई की मृत्यु के बाद उन्होंने ही आगे बढ़कर करुणानिधि का नाम मुख्यमंत्री पद के लिए प्रस्तावित किया था, जिसके बाद करुणानिधि पहली बार तमिलनाडु मुख्यमंत्री बने। स्वाभाविक अपेक्षा यही थी कि एमजीआर के कारण करुणानिधि को मुख्यमंत्री पद मिला है, इसलिए एमजीआर को भी केबिनेट में महत्वपूर्ण मंत्रालय मिलेगा। लेकिन करुणानिधि को अपनी राजनैतिक उन्नति में एमजीआर से ही खतरा महसूस होता था। इसलिए चालाकी से उन्होंने एमजीआर को मंत्रिमंडल से बाहर रखा और इसके लिए उन्हें डीएमके का कोषाध्यक्ष बनाने का दांव चला।

नाराज़ एमजीआर ने कुछ समय बाद अपनी नई पार्टी एआईएडीएमके बना ली और चुनाव जीतकर मुख्यमंत्री भी बन गए। पार्टी की रैलियों में भीड़ खींचने के लिए उन्हें एक आकर्षक चेहरे की आवश्यकता थी और यह काम उन्होंने जयललिता को सौंपा। एमजीआर की बात टालना जयललिता के लिए असंभव था और इस तरह अब फिल्मों से जयललिता राजनीति में आ गईं।

लेकिन लोगों के अनुमान के विपरीत जयललिता केवल सजावटी चेहरा बनकर नहीं रही, बल्कि अपने स्वभाव के अनुसार यहां भी उन्होंने अपना सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन किया। उनके भाषण प्रभावी होते थे और हर रैली में वे डीएमके और करुणानिधि पर तीखे प्रहार करती थी। जल्दी ही जयललिता पार्टी में नंबर दो की स्थिति में पहुंच गईं।

मुख्यमंत्री एमजीआर संसद में भी अपनी पार्टी की प्रभावी उपस्थिति चाहते थे और इसलिए उन्होंने जयललिता को राज्यसभा में भेजा। बढ़िया अंग्रेज़ी बोलने वाली जयललिता ने जल्दी ही दिल्ली के राजनैतिक गलियारों में भी अपनी अलग पहचान बनाने में सफलता पा ली। अपने फिल्मी दिनों के विपरीत अब उन्होंने मेकअप करना छोड़ दिया और अपनी सादगीपूर्ण छवि बना ली।

पार्टी में जयललिता की लगातार बढ़ती शक्ति से कई अन्य नेता परेशान भी हुए। उन्होंने जयललिता को एमजीआर से दूर करने के प्रयास शुरू कर दिए। दूसरी ओर जयललिता ने भी अपने अहंकार के कारण कुछ गलतियां की। परिणामस्वरूप एमजीआर से विवाद बढ़ने के कारण वे राजनीति से कुछ समय के लिए दूर हो गई। लेकिन फिल्मों में अब उनका महत्व कम हो चुका था और उन्हें अहसास हो गया कि अपनी प्रसिद्धि और ग्लैमर कायम रखने के लिए राजनीति में वापस लौटना ही एकमात्र विकल्प है। यह समझने के बाद उन्होंने फिर एमजीआर से संपर्क करने के प्रयास शुरू किए और अंततः वे राजनीति में अपनी वापसी के लिए एमजीआर को मनाने में सफल हो गई।

सन १९८७ में एमजीआर की मृत्यु हो गई और पार्टी दो गुटों में बंट गई। एक तरफ जयललिता थी और दूसरी तरफ एमजीआर की पत्नी जानकी रामचंद्रन। चुनावी संघर्ष के बाद अंततः जयललिता गुट की भारी जीत हुई और जानकी ने राजनीति से संन्यास ले लिया। अब जयललिता ही एआईएडीएमके की निर्विवाद नेत्री थीं।
दुख और अकेलापन जयललिता के जीवन में हमेशा साथ रहा। बचपन में पिता की मृत्यु के बाद मां के इंतज़ार में कटती शामें, २१ वर्ष की उम्र में मां की मृत्यु के बाद का अकेलापन, प्रेम-प्रसंगों की परिणति विवाह में न होने का दुःख आदि आदि हमेशा जीवन में बने रहे। एमजीआर की मृत्यु के बाद आखिरी सहारा भी छिन गया था। अब जयललिता अपनी सहेली शशिकला पर और भी ज्यादा निर्भर हो गई। लेकिन यहां भी शायद उन्हें सहारा कम और मुसीबतें ही ज्यादा मिलीं। शशिकला के परिवार पर भ्रष्टाचार और सत्ता के दुरुपयोग के कई आरोप लगे। जयललिता को कई वर्षों तक भ्रष्टाचार के आरोपों के कारण अदालतों में लड़ना पड़ा।

अपने दत्तक पुत्र के विवाह में जयललिता द्वारा किए गए अनाप-शनाप खर्च के मुद्दे ने भी तमिलनाडु की राजनीति में भूचाल ला दिया था। आगे एक इंटरव्यू में जयललिता ने भी स्वीकार किया था कि विवाह में धन-संपत्ति का वैसा प्रदर्शन करना उनकी एक बड़ी भूल थी। एक समय ऐसा भी आया, जब शशिकला को अपनी बहन समान बताने वाली जयललिता ने उससे और उसके परिवार से सारे संबंध तोड़ने की सार्वजनिक घोषणा कर दी, लेकिन कुछ वर्षों बाद फिर जयललिता के जीवन में शशिकला और उसके परिवार का आगमन हो गया और उनका दखल भी बढ़ता गया। इस सारे झमेले में जयललिता अपने अंतिम समय तक परेशान ही रही। भ्रष्टाचार के मामलों के कारण ही उन पर मुकदमे चले, उन्हें चुनाव लड़ने से अपात्र घोषित किया गया, उन्हें मुख्यमंत्री का पद पन्नीरसेल्वम को सौंपना पड़ा और अदालतों के चक्कर काटने पड़े।

एमजीआर की मृत्यु के बाद से अपनी मृत्यु तक जयललिता छः बार तमिलनाडु की मुख्यमंत्री बनीं और सब मिलाकर कुल १४ वर्षों तक वे इस पद पर रहीं। लेकिन इस पूरे दौर में उनकी राजनीति मुख्यतः करुणानिधि और डीएमके से लड़ने, बदला लेने और उस पार्टी को खत्म करने पर ही केंद्रित रही। दूसरी ओर, डीएमके और करुणानिधि की राजनीति के केंद्र में भी जयललिता को हराकर राजनीति से बाहर करने का लक्ष्य ही था। इसके लिए दोनों ही नेताओं ने हर तरह के प्रयास किए, एक-दूसरे के विरुद्ध दुष्प्रचार के लिए अपने-अपने मीडिया चैनलों का भरपूर उपयोग किया, चुनावी सभाओं और घोषणापत्रों में एक-दूसरे के भ्रष्टाचार की जांच करने और एक-दूसरे को जेल भेजने की बातें की, और चुनाव जीतने के बाद वाकई इसके लिए प्रयास भी किया। केंद्र में भी अपने फायदे के अनुसार भाजपा या कांग्रेस का समर्थन करने की इन पार्टियों की नीति का आधार भी हमेशा यही रहा कि एक-दूसरे को नीचा दिखाने में भाजपा या कांग्रेस में से कौन मददगार हो सकता है और अपने भ्रष्टाचार के मामले दबाने में किस पार्टी से मदद मिल सकती है।

अपने इस आपसी संघर्ष में कई बार जयललिता और करुणानिधि दोनों को ही अपमानित भी होना पड़ा और तमिलनाडु के राजनैतिक इतिहास पर कालिख पोतने वाले कुछ प्रसंग भी हुए। एक बार विधानसभा में करुणानिधि के साथ धक्कामुक्की, विधायकों द्वारा एक-दूसरे के साथ हाथापाई की घटना और विधानसभा में ही जयललिता के साथ दुर्व्यवहार की घटना भी हुई। बदले में जयललिता ने भी चुनाव जीतने के बाद करुणानिधि की गिरफ्तारी करवाई और आधी रात को पुलिस उन्हें घसीटते हुए गिरफ्तार करके ले गई। करुणानिधि के परिवार के लोगों पर भी भ्रष्टाचार के आरोप लगे और परिवार की आंतरिक कलह व राजनैतिक उत्तराधिकार के लिए करुणानिधि के दो बेटों अज़ागिरी और स्टालिन के झगड़े का लाभ भी जयललिता को मिला। इसी प्रकार कांची कामकोटि पीठ के शंकराचार्य जी की गिरफ्तारी भी जयललिता के शासनकाल में ही हुई थी।
तमिलनाडु की राजनीति में मतदाताओं को मुफ्त सामान बांटने की परंपरा शायद करुणानिधि ने शुरू की थी, जिसका जवाब देने के लिए जयललिता की पार्टी भी इस होड़ में शामिल हो गई और अब तो भारत के कई राज्यों की सरकारें उसी राह पर चल रही हैं। अपने अंतिम कार्यकाल में जयललिता ने कई कल्याणकारी योजनाएं भी चलाईं। ऐसी हर योजना के साथ उनका विशेषण ‘अम्मा’ भी जुड़ा रहा और यह तमिलनाडु में एक ब्रांड ही बन गया। आज जयललिता के जाने के बाद भी यह ब्रांड तमिलनाडु में चल रहा है।

कुल मिलाकर मुझे लगता है कि जयललिता की कहानी एक उदास, अकेली, किंतु दृढ़-निश्चयी, साहसी और संघर्षशील स्त्री की कहानी है। उनके कई सपने कभी पूरे नहीं हो पाए और जीवन में कई बार अनपेक्षित मोड़ आए या अपने मन के विपरीत काम करने पड़े। लेकिन जयललिता ने अपने आत्मविश्वास, चतुराई और संकल्पबद्धता के द्वारा हमेशा अपनी क्षमता सिद्ध की और हर काम में निपुणता भी दिखाई। उनकी राजनैतिक विचारधारा क्या थी और वह सही थी या गलत, यह विवाद का विषय हो सकता है, लेकिन एक महिला के रूप में उनका संघर्ष और तमिलनाडु जैसे प्रदेश की राजनीति में स्थापित होकर अपने वर्चस्व को साबित कर दिखाने की उनकी उपलब्धियां निश्चित रूप से प्रशंसनीय और बहुतों के लिए प्रेरणादायी भी हैं।

संक्षेप में यह पुस्तक अच्छी है और इससे मुझे जयललिता के जीवन के बारे में बहुत-सी नई जानकारियां मिली और तमिलनाडु की उस दौर की राजनीति को भी जानने-समझने का अवसर मिला। हालांकि यह पुस्तक जयललिता के निधन से पहले लिखी गई थी, इसलिए इसमें उनके जीवन के अंतिम दिनों और उनकी मृत्यु के बाद पार्टी में शुरू हुए संघर्ष का विवरण नहीं है। मैंने मूल अंग्रेजी पुस्तक का हिन्दी अनुवाद पढ़ा था। लेकिन अनुवाद भी अच्छा हुआ है, हालांकि कई जगह ऐसा भी लगा कि कुछ वाक्यों को बेहतर ढंग से व्यक्त किया जा सकता है। संभव है इसका कारण यह रहा हो कि मैं जब भी कोई अनूदित कृति पढ़ता हूं तो मेरे भीतर का अनुवादक भी उस अनुवाद का मूल्यांकन करता रहता है।

आपको यह पोस्ट कैसी लगी, कृपया मुझे कमेंट बॉक्स में अवश्य बताएं, ताकि भविष्य में मैं आपके लिए जानकारी बेहतर ढंग से प्रस्तुत कर सकूं। सादर!

(चित्र अमेज़न से)

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