अपनी भाषा और अपनी ज़िम्मेदारी

भाषाओं से मुझे विशेष प्रेम है और अक्सर मैं अपनी भारतीय भाषाओं को अपनाने और आगे बढ़ाने की बात करता हूं। आज फिर इसी विषय को लेकर वापस आया हूं।

भाषाओं की बात निकलती है, तो अंग्रेज़ी की बात भी आती है और अंग्रेज़ी के विरोध की बात भी उठती है। मैं अक्सर कहता हूं कि अंग्रेज़ी का नहीं, बल्कि अंग्रेज़ियत का विरोध कीजिए। अंग्रेज़ी अवश्य सीखिए, लेकिन अंग्रेज़ियत के गुलाम मत बनिये। अधिकतर लोग समझ नहीं पाते कि अंग्रेज़ी और अंग्रेज़ियत से मेरा क्या आशय है। मैंने एक बार पहले कहा था कि मैं इस बारे में विस्तार से पोस्ट लिखूंगा; आज वही लिख रहा हूं।

मैं बहुत लंबी पोस्ट नहीं लिखना चाहता और न बहुत बड़ी बातें करना चाहता हूं क्योंकि वैसे भी अपने देश के अधिकांश लोग हर समय यही करते हैं। कई लोगों की एक बहुत बुरी आदत यह है कि हर बात के लिए किसी न किसी को दोष देकर खुद की तसल्ली कर लेते हैं, लेकिन कभी अपने भीतर झांककर अपनी गलतियों को सुधारने पर ध्यान नहीं देते और न किसी मामले में ईमानदारी से अपनी ज़िम्मेदारी पूरी करते हैं।

भाषाओं के मामले में भी बिल्कुल ऐसा ही हाल है। जब भाषाओं की बात निकलती है, तो लोग अपनी भाषा की दुर्दशा के लिए अपने अलावा हर किसी को दोषी ठहराते हैं। कुछ बहाने बिल्कुल कॉमन हैं, जैसे-सरकारों ने आज तक अपनी भाषाओं के ‘उत्थान’ के लिए कुछ नहीं किया, अदालतों में अपनी भाषाओं में कामकाज होना चाहिए, सारी शिक्षा-प्रणाली से अंग्रेज़ी को बाहर किया जाना चाहिए आदि। इसके अलावा भी कुछ और तर्क सुनने को मिलते हैं जैसे- अंग्रेज़ी के बिना कोई अच्छी नौकरी नहीं मिलती या करियर में आगे बढ़ने के लिए अंग्रेज़ी एक मजबूरी है।

मुझे इनमें से किसी बात से इनकार नहीं है। यह सब सही है और यह सब बदलना चाहिए। लेकिन मैं कुछ अन्य बातों की ओर आपका ध्यान ले जाना चाहता हूं और आपके सामने कुछ सवाल रखना चाहता हूं। कृपया पिछली लाइन को फिर से पढ़िये। मैं आपके सामने कुछ सवाल ‘रखने’ वाला हूं, मैं आपसे कोई सवाल ‘पूछने’ नहीं वाला हूं और मैं इनके जवाब भी नहीं जानना चाहता। फिर मैं ये सवाल आपको क्यों बता रहा हूं? वो इसलिए क्योंकि मैं चाहता हूं कि आप अकेले में ये सवाल खुद से पूछें और ईमानदारी से खुद को ही जवाब दें। इसलिए मैं आपके सामने ये सवाल सिर्फ रख रहा हूं, आपसे पूछ नहीं रहा हूं।

मैं इस बात से असहमत नहीं हूं कि अंग्रेज़ी का प्रभाव भारत में कम होना चाहिए और इसके लिए संसद, सरकार और संविधान के स्तर पर बड़े बदलाव आवश्यक हैं। मैं इस बात से भी सहमत हूं कि फिलहाल भारत में स्थिति यही है कि अच्छे अंग्रेज़ी बोलने वाले को आमतौर पर नौकरी और व्यवसाय के बेहतर अवसर मिल जाते हैं। लेकिन अपने जीवन की कई ऐसी बातें हैं, जिनमें हमने अंग्रेज़ी को बेवजह अपने सिर पर लाद रखा है, और अपनी भाषाओं को दुत्कार रहे हैं। ये ऐसी चीज़ें हैं, जिनका किसी सरकार, क़ानून और नौकरी से कोई संबंध नहीं है, बल्कि केवल आपसे संबंध है। कृपया अपने आप से ये सवाल पूछिये और खुद को ही जवाब दीजिए-

१. आपके फ़ोन की भाषा क्या है? क्या फ़ोन का इंटरफ़ेस अंग्रेज़ी में है या अपनी भाषा में?
२. जब आप एटीएम पर जाते हैं, तो कौन-सी भाषा चुनते हैं? अंग्रेज़ी या अपनी भाषा?
३. आपके जीमेल, फ़ेसबुक, ट्विटर आदि सभी में इंटरफ़ेस अंग्रेज़ी में है या अपनी भाषा में?
४. फ़ेसबुक पर रोज़ ही किसी के जन्मदिन, एनिवर्सरी आदि की पोस्ट रहती हैं। मैं उसमें लोगों के कमेंट्स देखता हूं, और अक्सर मैंने यही पाया है कि ९९% लोग दूसरों को शुभकामनाएं अंग्रेज़ी में ही देते हैं, अपनी भाषा में नहीं। फिर उन शुभकामनाओं के जवाब भी अंग्रेज़ी में ही होते हैं। इसी तरह किसी की मृत्यु से संबंधित विषय की पोस्ट हो, तो उस पर भी संवेदनाएं व्यक्त करने वाली अधिकांश टिप्पणियां अंग्रेज़ी में RIP वाली होती हैं। मुझे नहीं पता कि RIP लिखने वाले कितने लोगों को इसका अर्थ मालूम है और कितने लोग सिर्फ दूसरों को देखकर भेड़चाल में उनकी नकल कर रहे हैं।
५. अपने शहर में कभी दुकानों के बोर्ड देखिएगा। ९९% दुकानों के बोर्ड पर नाम अंग्रेज़ी में ही बड़े-बड़े अक्षरों में लिखा होता है। पुणे जैसे शहरों में नीचे कहीं कोने में छोटे अक्षर में मराठी में भी लिख देते हैं। मेरे बालाघाट शहर में भी यही हाल है। अधिकतर दुकानों के नाम अंग्रेज़ी में ही लिखे होते हैं। क्या आपको लगता है कि मेरे उस छोटे-से शहर में कोई अंग्रेज़ या अमरीकी व्यक्ति किराना खरीदने या पान खाने आता होगा? जब सारे दुकानदार उसी शहर के हैं और सारे ग्राहक भी उसी शहर के हैं, तो दुकानों पर नाम आपने विदेशी भाषा में किसके लिए लिख रखे हैं? यही हाल भारत के अधिकांश शहरों में है।
६. आप किसी कंपनी के कॉल-सेंटर में कॉल लगाते हैं, तो किस भाषा में बात करते हैं? किसी बड़े रेस्त्रां में खाना खाने जाते हैं, तो किस भाषा में बात करते हैं? किसी मॉल में किसी बड़े स्टोर में जाते हैं, तो कौन-सी भाषा में बोलते हैं? हवाई अड्डों पर या हवाई जहाज में किस भाषा का उपयोग करते हैं?

इन सवालों के जवाब ढूंढिए, आपको भाषाओं की दुर्दशा के कारण भी समझ आ जाएंगे।

भाषाओं के सम्मान के नाम पर राजनीति खूब होती है और राजनीति करने वालों की आलोचना भी खूब होती है। लेकिन इस बात पर विचार नहीं होता कि ऐसी स्थिति क्यों बनी कि कोई भाषा पर भी राजनीति कर सके? वह स्थिति आपकी गलतियों के कारण बनी है।

भारत की कौन-सी सरकार ने आपसे कहा है कि अपना फ़ोन अंग्रेज़ी में ही चलाइये? अब तकनीक बहुत आगे बढ़ चुकी है और अधिकांश फोन अब भारतीय भाषाओं और भारतीय कीबोर्ड के साथ उपलब्ध हैं। फिर भी आप अपना फ़ोन, जीमेल, फेसबुक, ट्विटर सब अंग्रेज़ी में ही उपयोग करते हैं, तो इसमें सरकार का क्या दोष है? एटीएम का उपयोग करते समय अगर आप अंग्रेज़ी की बजाय अपनी भाषा का विकल्प चुनेंगे, तो आपकी नौकरी पर इससे कौन-सा खतरा टूट पड़ेगा? अगर आप किसी के अच्छे-बुरे वक्त में अपनी शुभकामनाएं और संवेदनाएं अंग्रेज़ी की बजाय अपनी या उस व्यक्ति की भाषा में देंगे, तो उससे आपके करियर में क्या मुसीबत आ जाएगी? इससे आपकी नौकरी, तरक्की या करियर का क्या संबंध है? इससे किसी अदालत में सुनवाई की भाषा या किसी सरकारी कानून की कौन-सी अड़चन है? फिर आप ये क्यों नहीं करते?

भाषाओं के उपयोग से जुड़े ऐसे बहुत-से सवाल हैं और ऐसे बहुत-से काम हैं, जिनका किसी सरकार, किसी अदालत, किसी कानून और किसी करियर में रुकावट से कोई संबंध नहीं है। उनका संबंध सिर्फ आपसे है। अंग्रेज़ी और अंग्रेज़ियत का अंतर भी सिर्फ इतना ही है।

जहां अंग्रेज़ी ज़रूरी है, वहां बोलिये। जहां उसकी उपयोगिता है, वहां उपयोग कीजिए। लेकिन उसका ये मतलब नहीं है कि हर जगह आप उसी को लादकर घूमते रहें। पेट की भाषा को वहीं तक सीमित रखिये, उसे अपने दिल और दिमाग पर हावी मत होने दीजिए।

आपकी भाषाएं इसलिए खत्म हो रही हैं क्योंकि आप उन्हें खत्म कर रहे हैं। अंग्रेज़ी को दोष देने से समस्या हल नहीं होगी क्योंकि समस्या की जड़ अंग्रेज़ी नहीं है। ऊपर वाले सवालों में मैंने जितने काम गिनाए हैं, अगर उनमें से एक में भी आप अंग्रेज़ी का उपयोग करते हैं, तो समस्या की जड़ आप भी हैं। और कई और सवाल हैं, जिनमें आप शायद अंग्रेज़ी वाले गुट में ही पाए जाएंगे। यही मानसिक गुलामी है और यही अंग्रेज़ियत की श्रेष्ठता का भ्रम है, जो आपके दिमाग से उतरना चाहिए।

मुझे आशा है कि अंग्रेज़ी और अंग्रेज़ियत का अंतर कम से कम अब स्पष्ट हो गया होगा। मैं फिर दोहराना चाहता हूं कि अंग्रेज़ी जहां ज़रूरी है,वहां उसका उपयोग अवश्य कीजिए, लेकिन यह भी याद दिलाना चाहता हूं कि अंग्रेज़ी जहां ज़रूरी है, केवल वहीं उसका उपयोग कीजिए।
अगर आप वाकई खुद को भारतीय मानते हैं, तो फिर भारतीय ही बने रहिये। मैं अमरीका में रहकर भी भारतीय हूं, तो आप भारत में रहते हुए भी अंग्रेज़ क्यों बनना चाहते हैं? मुझे कोई शर्म नहीं है कि मैं बहुत अच्छी अंग्रेज़ी नहीं बोलता, बस कामचलाऊ अंग्रेज़ी जानता हूं। मुझे कोई शर्म नहीं है कि मैं अंग्रेज़ी की बजाय अपनी भाषा में अपनी बात ज्यादा अच्छी तरह कह पाता हूं। मुझे कोई शर्म नहीं है कि मेरा फ़ोन, जीमेल, फेसबुक, और इंटरनेट की हर सुविधा में हिन्दी भाषा सेट है। मैं भले ही अमरीका में गाड़ी चलाता हूं, लेकिन मेरा गूगल मैप हिन्दी में सेट है और मैं उसके निर्देश हिन्दी में ही सुनना पसंद करता हूं। आप अगर अपनी भाषा की बजाय अंग्रेज़ी में ज्यादा सहज महसूस करते हैं, तो अपनी गलती सुधारिये।

कोई भाषा मिटती है, तो केवल कुछ अक्षर खत्म नहीं होते। भाषा के खत्म होने का मतलब है कि उस समाज का इतिहास, संस्कृति, साहित्य, परंपराएं और धरोहर भी मिट जाती है। आपके बच्चे अगर आज थर्टी फोर समझते हैं, लेकिन चौंतीस नहीं समझते, तो उसमें दोष आपका भी है। आप अपनी ज़िम्मेदारी पूरी नहीं कर रहे हैं, इस पर ध्यान दीजिए।

सरकार, संसद और अदालतों को भाषाओं के प्रति उनकी ज़िम्मेदारी अवश्य निभानी चाहिए, लेकिन भाषाओं के प्रति आपकी जो ज़िम्मेदारी है, उसे कौन निभाएगा? कृपया अपनी ज़िम्मेदारी निभाइये, किसी और के लिए नहीं, बल्कि खुद के लिए और अपनी अगली पीढ़ीयों के लिए; खुद को और अपनी भावी पीढ़ियों को मानसिक गुलामी से मुक्त करने के लिए। सिर्फ देश की जय के नारे लगाने या साल में दो बार देश पर गर्व कर लेने से अपनी ज़िम्मेदारी पूरी नहीं होती है। और देश के लिए कुछ करना हो, तो बहुत बड़ी-बड़ी बातें या बड़े-बड़े काम करना ही एकमात्र विकल्प नहीं है। कई छोटे-छोटे कामों से भी देश के लिए योगदान किया जा सकता है और अपनी भाषाओं का उपयोग बढ़ाना भी ऐसा ही एक काम है।

मैं अपनी यह ज़िम्मेदारी लगातार निभा रहा हूं। क्या आप भी इसे निभाते हैं? मैं मानसिक गुलामी से पूरी तरह मुक्त हैं, क्या आप हैं? ये सारे सवाल खुद से पूछिए और खुद को ही जवाब दीजिए क्योंकि बदलाव आपको ही करना है और उसकी शुरुआत आपके भीतर से ही हो सकती है। सादर!

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2 thoughts on “अपनी भाषा और अपनी ज़िम्मेदारी”

  1. उत्तम विचार है आपके किंतु यहाँ सबसे बड़ा भ्रम यह फैला हुआ है कि अंग्रेजी एकमात्र अंतराष्ट्रीय भाषा है जबकि हमारे देश मे पधारने वाले पर्यटक अंग्रेजी से परिचित नही होते वह या तो दुभाषिये का सहारा लेते है या संकेतों से काम चलाते है। यह अंतरराष्ट्रीय भाषा होने का भ्रम जितनी जल्दी टूटे उतना अच्छा

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