औरंगज़ेब: क्रूरता का प्रतिमान

(दिल्ली की द्वारका EXPRESS पत्रिका के ‘औरंगजेब विशेषांक’ में प्रकाशित मेरा लेख)

पिछले लगभग एक हजार वर्षों का भारत का इतिहास बर्बर विदेशी आक्रांताओं की क्रूरता और राष्ट्रवादी हिन्दुओं द्वारा इसके सफल प्रतिकार का इतिहास है। इन क्रूर शासकों की सूची में मुगल बादशाह औरंगज़ेब का नाम निसंदेह सबसे ऊपर है। अपने उनचास वर्षों के शासन काल में औरंगज़ेब ने हिन्दुओं पर भीषण अत्याचार किए, इस्लाम के नाम पर अनगिनत मंदिर ढहाए, गैर-मुस्लिमों पर जज़िया कर लगाया, लाखों लोगों की नृशंस हत्याएं करवाईं, कश्मीरी हिन्दुओं पर जबरन इस्लाम स्वीकारने का दबाव डाला, गुरु तेगबहादुर का शीश कटवा दिया और गुरु गोविंदसिंह के चार साहिबजादों को दीवार में चुनवा दिया और छत्रपति संभाजी की निर्ममता से हत्या करवा दी। लेकिन आश्चर्य और अफ़सोस की बात है कि खुद को भारतीय कहने वाले कई लोग आज भी औरंगज़ेब को अपना आदर्श बताने में गर्व महसूस करते हैं। भारत संभवतः विश्व का एकमात्र देश है, जो अपने आक्रांताओं के स्मारकों और प्रतीकों का सम्मान-सहित संरक्षण करता है और उनकी रक्षा के लिए भारत के लोग आपस में ही लड़ते भी हैं

जन्म और बचपन

औरंगज़ेब
औरंगज़ेब (चित्र विकिपीडिया से)

शाहजहाँ और मुमताज महल की छठी संतान अबुल मुज़फ्फर मुहिउद्दीन मुहम्मद औरंगज़ेब का जन्म 4 नवंबर 1618 को वर्तमान गुजरात के दाहोद में हुआ था। जून 1626 में शाहजहाँ ने अपने पिता जहांगीर के विरुद्ध विद्रोह का बिगुल फूंका, लेकिन जहांगीर की सेना के हाथों हुई करारी हार के बाद उसे बिना-शर्त आत्मसमर्पण करना पड़ा और उसके दो पुत्रों दारा शुकोह और औरंगज़ेब को बंधक बनाकर लाहौर भेज दिया गया। जहांगीर की मृत्यु के बाद सन 1628 में शाहजहाँ ने तख़्त हासिल किया और इसके बाद ही दारा शुकोह और औरंगज़ेब लाहौर से मुक्त होकर शाहजहाँ के दरबार में आगरा पहुँच सके। यहीं औरंगज़ेब ने अरबी और फ़ारसी की औपचारिक शिक्षा पाई।

प्रारंभिक सैन्य अभियान
ओरछा के राजपूत राजा जुझार सिंह ने सन 1626 में ओरछा की गद्दी संभालते ही स्वयं को एक स्वतंत्र शासक घोषित कर दिया। इस विद्रोह को कुचलने के लिए दिसंबर 1634 में शाहजहाँ ने औरंगज़ेब को बुंदेलखंड की ओर कूच करने का आदेश दिया। यह औरंगज़ेब का पहला सैन्य अभियान था। इस प्रथम अभियान में ही औरंगज़ेब की धार्मिक असहिष्णुता स्पष्ट रूप से प्रकट हो गई। सन 1635 में जुझार सिंह की पराजय के बाद उनके परिवार की सभी स्त्रियों को मुगलों के हरम में भेज दिया गया। उनके दो पुत्रों से जबरन इस्लाम स्वीकार करवाया गया और धर्मांतरण से इनकार करने वाले तीसरे पुत्र की हत्या कर दी गई। ओरछा के राजमहल को मस्जिद में बदल दिया गया

सन 1636 में औरंगज़ेब दक्खन का सूबेदार नियुक्त हुआ। सन 1644 में कुछ घटनाओं से नाराज़ शाहजहाँ ने औरंगज़ेब से दक्खन की सूबेदारी छीन ली और सन 1645 में उसे दरबार से भी निष्कासित कर दिया गया। सात माह बाद शाहजहाँ ने उसे गुजरात का सूबेदार नियुक्त किया। सन 1647 में उसे बदख़्शान (उत्तरी अफगानिस्तान) और बाल्ख़ (अफ़गान-उज़्बेक) का सूबेदार बनाकर भेजा गया। मुगल साम्राज्य के ये इलाके उज़्बेक और तुर्कमान कबीलों के हमलों से जूझ रहे थे। औरंगज़ेब को कई प्रयासों के बावजूद उनसे निपटने में सफलता नहीं मिल सकी। अंततः हारकर मुगलों को उज़्बेकों से समझौता करना पड़ा। अब औरंगज़ेब को मुल्तान और सिंध का प्रशासक नियुक्त किया गया। यहाँ भी सन 1649 और 1652 में कंधार के सफाविदों को हटाने के औरंगज़ेब के सारे प्रयास विफल रहे। अंततः शाहजहाँ ने सन 1653 में फिर एक बार औरंगज़ेब को दक्खन भेज दिया।

सत्ता संघर्ष
शाहजहाँ अपने सबसे बड़े पुत्र दारा शुकोह को अपना उत्तराधिकारी बनाना चाहता था, जिसके कारण अन्य तीनों पुत्रों के मन में असंतोष उत्पन्न हो गया। सन 1657 में शाहजहाँ गंभीर रूप से बीमार पड़ा और उसके चारों पुत्रों के बीच सत्ता के लिए खूनी संघर्ष की शुरुआत हो गई, हालांकि मुख्य संघर्ष दारा शुकोह और औरंगज़ेब के बीच ही था। 29 मई 1658 को आगरा से आठ मील दूर सामूगढ़ में औरंगज़ेब और दारा शुकोह की सेनाओं के बीच युद्ध हुआ। इस युद्ध में दारा शुकोह की हार हुई। औरंगज़ेब ने 8 जून 1658 को आगरा पर अधिकार पा लिया और अपने पिता शाहजहाँ को बंदी बना लिया। इसके बाद औरंगज़ेब ने जल्दबाजी में 31 जुलाई 1658 के दिन खुद को बादशाह घोषित कर दिया और ‘आलमगीर’ की उपाधि धारण की। 14 अप्रैल 1659 को देवरई की लड़ाई में दारा शुकोह की फिर एक बार हार हुई और इसके बाद औरंगज़ेब के आदेश पर उसकी हत्या कर दी गई। इस युद्ध में सफल होने के बाद 15 मई, 1659 को औरंगज़ेब ने दिल्ली में प्रवेश किया, जहाँ लाल किले में 13 जून, 1659 को दूसरी औरंगज़ेब की ताज़पोशी हुई।

औरंगज़ेब का आततायी शासन
औरंगज़ेब का उनचास वर्षों का शासन-काल असहिष्णुता, कट्टरपंथ, क्रूरता, भेदभाव और बर्बरता की मिसाल है। उसने फतवा-ए-आलमगीरी नामक क़ानून-व्यवस्था लागू करवाई, जो पूरी तरह इस्लामी ‘शरीयत’ पर आधारित थी। इस के अनुसार मुस्लिमों और गैर-मुस्लिमों में भारी भेदभाव किया जाने लगा। गैर-मुस्लिमों के अधिकार अत्यंत सीमित कर दिए गए। मुस्लिमों को उनकी संपत्ति पर जबरन कब्ज़ा कर लेने, स्त्रियों को गुलाम बना लेने आदि जैसे कई अधिकार भी प्राप्त हो गए थे। औरंगज़ेब ने इस कानून का पालन सुनिश्चित करवाने के लिए हर बड़े शहर में उलेमाओं व मुहतसिबों (सार्वजनिक सदाचार निरीक्षकों) की नियुक्ति भी करवाई।

औरंगज़ेब के शासन में गैर-मुस्लिमों के साथ हर तरह से भेदभाव होता था। सन 1665 से हिन्दू व्यापारियों से दोगुनी चुंगी वसूली जाने लगी और मुस्लिम व्यापारियों के लिए चुंगी माफ़ कर दी गई। सन 1679 में औरंगज़ेब ने हिन्दुओं पर ‘जज़िया’ कर लागू किया। उसने धार्मिक सहिष्णुता या हिन्दुओं के प्रति थोड़ी भी सहानुभूति रखने वाले अधिकारीयों को प्रशासनिक पदों से हटवा दिया और उनके स्थान पर उसकी धर्मांध नीतियों को लागू करने योग्य मुस्लिम अधिकारियों की नियुक्ति की गई। दीपावली सहित सभी हिन्दू त्यौहारों पर पाबंदी लगा दी गई। हिन्दुओं के धार्मिक आयोजन प्रतिबंधित कर दिए गए। यहाँ तक कि पालकियों में बैठने या हाथियों व अरबी घोड़ों की सवारी करने का अधिकार भी उनसे छीन लिया गया! हिन्दुओं को लालच या भय से जबरन इस्लाम स्वीकार करवाना और इनकार करने पर उनकी हत्या करवा देना राज्य की घोषित नीति का ही अंग बन गया। औरंगज़ेब का सबसे बड़ा लक्ष्य ‘दारुल हरब’ (काफ़िरों के मुल्क) भारत को ‘दारुल इस्लाम’ (इस्लाम की भूमि) में बदलना ही था।

मंदिरों का विध्वंस
हिन्दू मंदिरों को ढहाना औरंगज़ेब की धार्मिक नीति का एक मुख्य उद्देश्य था। 12 सितंबर 1667 को उसने दिल्ली के कालकाजी मंदिर को ढहाने का आदेश जारी किया। 9 अप्रैल 1669 को उसने अपने राज्य के सभी हिन्दू मंदिरों व हिन्दू पाठशालाओं को ढहा देने का आदेश दिया। जनवरी 1670 में मथुरा के प्रसिद्ध केशव राय मंदिर को नष्ट करके वहाँ एक मस्जिद बनवा दी गई। इसके कुछ ही समय बाद वाराणसी के श्री विश्वनाथ मंदिर और सोमनाथ के प्रसिद्ध मंदिर को ढहाने का आदेश भी जारी हुआ। सन 1679 में उदयपुर और मारवाड़ के इलाके में लगभग तीन सौ हिन्दू मंदिर नष्ट करवा दिए गए। इसी तरह चित्तौड़ में 63 मंदिरों को ढहा दिया गया। 1 जून 1681 को औरंगज़ेब ने उड़ीसा के पवित्र जगन्नाथ मंदिर को ढहाने का आदेश जारी किया। कुछ ही महीनों बाद जब 1 सितंबर 1681 को औरंगज़ेब दक्खन के अभियान पर रवाना हुआ, तब भी उसने आदेश दिया कि मार्ग में पड़ने वाले सभी नए-पुराने मंदिरों को तोड़ दिया जाए। सितंबर 1682 में उसने बनारस के प्रसिद्ध बिंदु-माधव मंदिर को तोड़ने का आदेश भी जारी किया। वास्तव में, औरंगज़ेब के शासन-काल में कुल कितने हिन्दू मंदिर ढहा दिए गए या उन पर मस्जिदें बनवा दी गईं, इसकी सही संख्या का अनुमान लगाना कठिन है। उपरोक्त घटनाएं इसके केवल कुछ उदाहरण हैं।

हिन्दुओं द्वारा औरंगज़ेब का प्रतिकार
हिन्दुओं का महानतम संघर्ष तथा प्रतिकार मतान्ध तथा क्रूर अत्याचारी औरंगजेब के काल में हुआ। सबसे पहला उल्लेखनीय संगठित संघर्ष सन 1669 में गोकुल सिंह जाट के नेतृत्व में मथुरा से प्रारंभ हुआ। सतनामी सम्प्रदाय ने भी औरंगज़ेब के विरुद्ध संघर्ष की मशाल सतत जलाए रखी। इसी तरह मेवाड़, मारवाड़ और अन्य इलाकों में भी लगातार औरंगज़ेब का प्रतिकार जारी रहा। असम में भी मुगलों और अहोम सेनाओं का संघर्ष चलता रहा।

Shivaji
औरंगजेब के दरबार में ही उसे चुनौती देते शिवाजी महाराज

मुगलों के साथ सिख गुरुओं का संघर्ष गुरुनानक देव के समय से ही चल रहा था। औरंगज़ेब के काल में यह संघर्ष नवें गुरु तेगबहादुर जी ने जारी रखा। पंजाब और कश्मीर में उनके बढ़ते प्रभाव से औरंगज़ेब चिंतित था। अंततः उसने उन्हें धोखे से दिल्ली बुलाया। लेकिन उनके द्वारा इस्लाम को अपनाने से इनकार करने पर चांदनी चौक में उन्हें सरेआम कत्ल कर दिया गया। गुरु तेगबहादुर के बाद गुरु गोविंदसिंह ने मुगलों का प्रतिकार करने के लिए खालसा पंथ की स्थापना की। इन्हीं संघर्षों में उनके चारों पुत्रों का भी बलिदान हुआ

औरंगजेब का सबसे भयंकर संघर्ष मराठों के साथ हुआ था। छत्रपति शिवाजी के नेतृत्व में मराठों ने औरंगज़ेब को कभी चैन नहीं लेने दिया। सन 1680 में शिवाजी की अल्पायु में ही मृत्यु हो गई, लेकिन उनके बाद भी उनके पुत्र छत्रपति संभाजी के नेतृत्व में मराठों ने मुगलों से संघर्ष जारी रहा।

अंतिम संघर्ष
सन 1681 में औरंगज़ेब ने मराठों को कुचलने के लिए स्वयं ही दक्खन जाने का निश्चय किया। उसने औरंगाबाद में डेरा डाला। मराठों ने नौ वर्षों तक छत्रपति संभाजी के नेतृत्व में औरंगज़ेब को कड़ी टक्कर दी। अंततः 1689 में संभाजी पकड़े गए। औरंगज़ेब ने इस्लाम स्वीकार करवाने के लिए उन्हें भीषण यातनाएं दीं, लेकिन वह उन्हें झुका नहीं पाया। अंततः क्रूरतापूर्वक उनकी हत्या कर दी गई। संभाजी के बलिदान के बाद भी मराठों ने छत्रपति राजाराम और फिर रानी ताराबाई के नेतृत्व में संघर्ष जारी रखा।

अपने उनचास वर्षों के शासन-काल का लगभग आधा हिस्सा औरंगज़ेब ने दक्षिण में मराठों से लड़ते हुए बिताया। अपने अंतिम दौर में वह लगभग पच्चीस वर्षों तक दक्खन में ही उलझा रहा, लेकिन मराठों को कुचलने का उसका स्वप्न कभी साकार नहीं हो सका। अंततः 20 फरवरी 1707 को बूढ़े और बीमार औरंगज़ेब ने अपनी अहमदनगर में अपनी अंतिम सांस ली। मराठों को परास्त न कर पाने की कसक उसके मन में अंतिम क्षण तक बनी रही!

उपसंहार
औरंगज़ेब का शासन-काल भले ही लगभग आधी सदी तक चला, लेकिन वास्तव में औरंगज़ेब एक विफल शासक ही रहा। अपने पिता और भाइयों को हटाकर सत्ता पाने के अलावा वह अपने अन्य कोई उद्देश्य पूरे नहीं कर सका; न तो वह पूरे भारत को मुगल साम्राज्य के अधीन लाने में सफल हो सका, न हिन्दुओं को मिटाकर भारत को दारुल इस्लाम बनाने का उसका लक्ष्य कभी पूरा हुआ। यहां तक कि अपने साम्राज्य को मजबूत बनाए रखने में भी उसे सफलता नहीं मिल सकी। उसके जीवन-काल में ही उसके एक पुत्र ने विद्रोह का झंडा उठा लिया था। औरंगज़ेब की मृत्यु के बाद तो उसके पुत्रों में सत्ता के लिए संघर्ष ही छिड़ गया। वास्तव में औरंगजेब की गलत नीतियों ने इतने विरोधी पैदा कर दिये थे कि जल्दी ही मुग़ल साम्राज्य का अंत हो गया

स्रोत:

  1. https://en.wikipedia.org/wiki/Jahangir
  2. https://en.wikipedia.org/wiki/Shah_Jahan
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  6. https://www.sscnet.ucla.edu/southasia/History/Mughals/Aurnag_fatwa.html
  7. https://en.wikipedia.org/wiki/Fatawa-e-Alamgiri
  8. http://bit.ly/1EKpA3p
  9. http://www.aurangzeb.info/
  10. http://blog.sureshchiplunkar.com/2008/06/aurangzeb-kashi-vishwanath-temple.html
  11. http://blog.sureshchiplunkar.com/2015/08/maratha-queen-tarabai-and-aurangzeb.html
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  13. http://bit.ly/1JMyfBF
  14. https://en.wikipedia.org/wiki/Aurangzeb
  15. http://bit.ly/1Uvkr6E
  16. https://en.wikipedia.org/wiki/Guru_Tegh_Bahadur
  17. https://en.wikipedia.org/wiki/Guru_Gobind_Singh
  18. http://panchjanya.com/arch/2007/8/19/File8.htm

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