काँग्रेस का घोषणापत्र (२०१९)

काँग्रेस का घोषणापत्र मैंने आज देखा। मेरी समझ में जो आया, उनमें से कुछ मुख्य बातें आपकी जानकारी के लिए यहाँ दे रहा हूँ – १. अर्द्ध-कुशल युवाओं को कोई हुनर सिखाने की बजाय काँग्रेस उनसे तालाब खुदवाएगी और बंजर जमीनों पर मजदूरी करवाएगी। इस तरह लाखों रोजगार दिए जाएँगे। तालाब खोदने और मज़दूरी करने को रोजगार माना जाए या नहीं, ये आपको तय करना चाहिए। २. सरकारी विभागों के बीस लाख पद जब तक नहीं भर जाते, तब तक राज्यों के विकास कार्यों का फंड रोककर रखेगी। विकास कार्यों के रुक जाने से देश के करोड़ों लोगों जो तकलीफ आगे पढ़ें …

उथल-पुथल (काँग्रेस कथा – ५)

सन १८९७ में अंग्रेज़ों ने तिलक जी पर पहली बार राजद्रोह का मुकदमा चलाया था। मुंबई के वकील दिनशॉ डॉवर ने उनका मुकदमा लड़ा था। तब उन्हें अठारह माह की सज़ा सुनाई गई थी। अगली बार १९०८ में फिर एक मुकदमा चला। संयोग से वही दिनशॉ डॉवर अब जज बन चुके थे और मुकदमा उन्हीं की अदालत में चला। इस बार मुंबई के वकील मोहम्मद अली जिन्ना ने अदालत में उनके पक्ष में पैरवी की। यह बात बड़ी अजीब लगती है कि पहले वाले मुकदमे के दौरान तिलक जी की ज़मानत की अपील करते समय उनके वकील डॉवर ने जो आगे पढ़ें …

काँग्रेस का विभाजन (काँग्रेस कथा – ४)

सन १८८५ में काँग्रेस की स्थापना के समय से ही इसका नियंत्रण नरम दल वाले नेताओं के हाथों में रहा था। लेकिन १९०५ में बंग-भंग की घोषणा (बंगाल का विभाजन) हुई और नरम दल वालों की सभी याचिकाओं और आवेदनों को अंग्रेज़ों ने कूड़े में दाल दिया, तब यह बात उनकी समझ में आई कि अंग्रेज़ों के आगे गिडगिडाने से कुछ हासिल होने वाला नहीं है। ये नेता आम जनता से भी दूर रहते थे, और न लोगों की समस्याओं को ठीक से समझते थे, इसलिए इन्हें कोई ख़ास जन-समर्थन भी हासिल नहीं था। दूसरी ओर गरम दल वाले नेता आगे पढ़ें …

बंगाल का विभाजन (काँग्रेस कथा – ३)

(पिछले भाग यहाँ पढ़ें) लोकमान्य तिलक सन १८९० में काँग्रेस से जुड़े। उस समय काँग्रेस की नीति सरकार से याचना करने, अपनी माँगों के लिए प्रार्थना-पत्र लिखने, और ब्रिटिश शासन की कृपा के लिए धन्यवाद देते रहने की ही थी। काँग्रेस के अधिकतर नेता वाकई मानते थे कि ब्रिटिश शासन भारत के लिए एक वरदान है और ब्रिटिशों के कारण ही भारत के लोगों को आधुनिक शिक्षा पाने के अवसर मिल रहे हैं। उन नेताओं का यह विश्वास भी था कि ब्रिटिश शासक सचमुच विश्व के सबसे ईमानदार और निष्पक्ष शासक हैं और अंग्रेज़ भारत के सच्चे हितैषी हैं। उस आगे पढ़ें …

याचना या संघर्ष? (काँग्रेस कथा – २)

(पहला भाग यहाँ पढ़ें) पिछले भाग में मैंने आपको बताया था कि अंग्रेज़ अधिकारी ह्यूम को इस बारे में जानकारी मिली कि अंग्रेज़ों की क्रूरतापूर्ण नीतियों के कारण पूरे भारत में अंसतोष बढ़ रहा है और लोग फिर से १८५७ जैसी क्रांति करने की तैयारी में हैं। ह्यूम ने इस बारे में ब्रिटिश सरकार को पत्र लिखकर बताया कि – ‘मुझे सात बड़ी-बड़ी फ़ाइलों में भारत के लगभग हर जिले, तहसील और शहर से कुल मिलाकर लगभग ३० हजार से अधिक सूचनाएँ मिली हैं, जिनसे पता चलता है कि लोगों में अंग्रेज़ों के खिलाफ़ भारी गुस्सा है। कई जगहों से आगे पढ़ें …

“शिप ऑफ़ फूल्स” (मूर्खों का जहाज)

पिछले कुछ दिनों से मैं यह पुस्तक पढ़ रहा था, जो कि आज पूरी हुई। पुस्तक मुख्यतः अमरीकी राजनीति पर केंद्रित है और अमरीकी वामपंथ के विरुद्ध है। यह ध्यान रखें कि अमरीका में वामपंथ का स्वरूप भारत से बिल्कुल अलग है। लेखक का तर्क है कि अमरीका का पूरा नियंत्रण राजनेताओं और उद्योगपतियों के एक छोटे-से वर्ग के हाथों में आ गया है। ये लोग जनता से पूरी तरह कटे हुए हैं और अमरीका के आम आदमी के मुकाबले इनकी दुनिया पूरी तरह अलग है। उनकी समस्याएं और उनके इरादे भी बिल्कुल अलग हैं। उन्हें आम लोगों से, उनकी आगे पढ़ें …

आडवाणी जी के बहाने काँग्रेस की बेशर्मी

आजकल काँग्रेस के लोगों को आडवाणी जी की चिंता सता रही है। वैसे इसकी शुरुआत तभी से हो गई थी, जब २०१४ में मोदीजी प्रधानमंत्री बने। पहले काँग्रेस को यह चिंता हुई कि मोदी ने आडवाणी जी को प्रधानमंत्री नहीं बनने दिया, उसके बाद यह चिंता हुई कि राष्ट्रपति भी नहीं बनाया और अब चिंता हो रही है कि उन्हें इस चुनाव में टिकट भी नहीं दिया जा रहा है। यह वही काँग्रेस है, जो उससे पहले लगातार ५० सालों तक आडवाणी जी की आलोचना और अपमान करती रही है। यह वही काँग्रेस है, जिसने १९७५ में आपातकाल लगाकर आडवाणी आगे पढ़ें …

एक्सिडेंटल प्राइम मिनिस्टर (भाग – १)

हैदराबाद के संजय बारू ने कई सालों तक पत्रकारिता के क्षेत्र में काम किया। इस दौरान कई सालों तक वे ‘द बिज़नेस स्टैंडर्ड’, ‘इकोनॉमिक टाइम्स’ और ‘टाइम्स ऑफ इंडिया’ जैसे अखबारों और पत्रिकाओं में रहे। इनमें से कोई भी अखबार नरेन्द्र मोदी या भाजपा का समर्थक नहीं है। इंदिरा गांधी के प्रेस सचिव, और उनके भाषण लिखने वाले, एच. वाय. शारदा प्रसाद और उनके परिवार से संजय बारू की पत्नी के पारिवारिक संबंध थे। जिस समय मनमोहन सिंह भारत के वित्त सचिव थे, उस दौरान बारू के पिता भी उनकी टीम में काम करते थे। इनमें से भी कोई भाजपा आगे पढ़ें …

वीर सावरकर को सादर नमन

जिन सावरकर जी की लिखी पंक्तियाँ अंदमान जेल से पिछली सरकार ने उखाड़कर फेंक दी थीं, उसी अंदमान जेल में जाकर देश का प्रधानमंत्री सावरकर जी की स्मृति में शीश झुकाता है, ये भी मेरे लिए अच्छे दिन हैं। नकारात्मक विचारों वाले लोग इस बात का हिसाब लगाने और शिकायती स्वर में रोते रहने के लिए स्वतंत्र हैं कि इस सरकार ने क्या-क्या काम नहीं किए। मैं हर मामले में सकारात्मक पहलू को देखने वाला व्यक्ति हूँ और मेरा ध्यान इसी बात पर रहता है कि कहाँ क्या अच्छा हो रहा है। पिछली सरकार से भी मेरी नाराज़गी इस बात आगे पढ़ें …

यूरोप से भारत का समुद्री मार्ग

राजनीति के अलावा इतिहास भी मेरा पसंदीदा विषय है। इन दिनों मैं पुर्तगालियों के बारे में एक पुस्तक पढ़ रहा हूँ, जो इतिहास के लगभग ६०० साल पुराने कालखंड के बारे में है। ये वो दौर था, जब यूरोप के देशों में आपसी होड़ मची हुई थी कि भारत तक पहुँचने का समुद्री मार्ग ढूँढना है। कोलंबस भी भारत ही ढूँढने निकला था लेकिन वह वेस्ट इंडीज़ जा पहुँचा। समुद्री मार्ग से भारत तक पहुँचने वाला पहला यूरोपीय नाविक वास्को डी गामा था, जो १४९८ में कालीकट आया था। उसके पहले भी कई दशकों तक पुर्तगाली यह मार्ग ढूँढने का आगे पढ़ें …