अजेय अपराजित योद्धा

आपने जूलियस सीज़र से लेकर सिकंदर तक और नेपोलियन से औरंगज़ेब तक न जाने कितने सम्राटों, सेनापतियों और योद्धाओं के बारे में पढ़ा होगा। लेकिन क्या आप मुझे उस सेनापति का नाम बता सकते हैं, जो अपने जीवन में एक भी लड़ाई न हारा हो? क्या आप मुझे उस कुशल प्रशासक का नाम बता सकते हैं, जिसने ग्वालियर के सिंधिया, इंदौर के होलकर और बडौदा के गायकवाड़ जैसे राजघरानों की नींव रखी? क्या आपने कभी उस महान भारतीय योद्धा का नाम भी सुना है?

अविश्वसनीय पराक्रम का प्रदर्शन करने वाले उस अजेय अपराजित योद्धा का नाम है – पेशवा बाजीराव प्रथम! छत्रपति शिवाजी महाराज ने मराठा साम्राज्य के कुशल व सक्षम प्रशासन के लिए “पेशवा” (प्रधानमंत्री) का पद निर्माण किया था। पेशवाई की यह महान परंपरा सन 1674 में शिवाजी के राज्याभिषेक से प्रारंभ हुई, जो सन 1818 तक जारी रही। पेशवा बाजीराव प्रथम इसी महान परंपरा के कुशल वाहक थे।

18 अगस्त 1700 को जन्मे बाजीराव केवल 20 वर्ष की आयु में सन 1720 में “पेशवा” (मराठा साम्राज्य के प्रधानमंत्री) पद पर नियुक्त हुए। 28 अप्रैल 1740 को उनकी मृत्यु हो गई। लेकिन मराठा साम्राज्य के सेनापति के रूप में केवल 20 वर्षों के अपने संक्षिप्त कार्यकाल में उन्होंने इतनी महान उपलब्धियां प्राप्त की हैं, जिनके लिए उनका नाम इतिहास में स्वर्णाक्षरों में लिखे जाने योग्य है।

पुणे स्थित शनिवारवाडा में बाजीराव की प्रतिमा

20 वर्षों के अपने कार्यकाल में बाजीराव ने 41 से अधिक निर्णायक युद्ध लड़े और वे सभी में विजयी रहे। इनमें मालवा, धार, पालखेड, बुंदेलखंड, दिल्ली और भोपाल के युद्ध प्रमुख हैं। पेशवा पद के सूत्र संभालते ही बाजीराव ने सर्वप्रथम दक्खन के निजाम को परास्त किया और उसे संधि करने पर मजबूर कर दिया। सन 1728 में बाजीराव की सेना ने मालवा पर आक्रमण किया और मुगलों के चंगुल से मालवा को स्वतंत्रता दिलाई।

सन 1727 में मुगल सेना ने मुहम्मद खान बंगश के नेतृत्व में बुंदेलखंड पर आक्रमण कर दिया था। महाराजा छत्रसाल ने पूरी वीरता के साथ मुगल सेना का सामना किया, लेकिन आख़िरकार जैतपुर की लड़ाई के दौरान वे घायल हो गए और मुगल सेना ने उन्हें बंदी बना लिया। सन 1729 में बाजीराव अपनी सेना लेकर उनकी सहायता के लिए पहुँचे और उन्होंने न सिर्फ छत्रसाल को मुक्त कराया, बल्कि मुगल सेना को भी युद्ध के मैदान में धूल चटा दी। इस सहायता के बदले महाराजा छत्रसाल ने अपने साम्राज्य का एक-तिहाई भाग बाजीराव को सौंप दिया, जिसमें सागर, बांदा और झांसी का प्रदेश शामिल था।

मुग़ल सम्राट के आदेश पर सरबुलंद खान गुजरात पर नियंत्रण हासिल करने के इरादे से आया था। सन 1730 में पेशवा की सेनाओं ने उसे परास्त किया और एक संधि के द्वारा बाजीराव को गुजरात में चौथ वसूली व सरदेशमुखी के अधिकार प्राप्त हुए।

सन 1735 तक पूरे गुजरात व मालवा प्रदेश पर मराठा सेनाओं का अधिकार हो चुका था। हालांकि कुछ स्थानीय मुगल अधिकारियों व ज़मींदारों ने मराठों का आधिपत्य स्वीकार नहीं किया। मुग़ल सम्राट मुहम्मद शाह के द्वारा भी मराठों को चौथ व सरदेशमुखी के अधिकार देने में आनाकानी की जा रही थी। आखिरकार बाजीराव ने मुगल सल्तनत को सबक सिखाने का निश्चय किया। दिसंबर 1737 में स्वयं बाजीराव ने मराठों की एक बड़ी सेना लेकर दिल्ली की ओर कूच कर दिया। मुग़ल सेना को चकमा देकर बाजीराव के सैनिक दस दिनों की यात्रा केवल अड़तालीस घंटों में पूरी करके 28 मार्च 1737 को दिल्ली आ पहुँचे। मुगल बादशाह मराठा सेनाओं से डरकर लाल किले में छिप गया। मीर हसन कोका के नेतृत्व में आठ हज़ार मुगल सैनिकों ने बाजीराव की मराठा सेना को रोकने का असफल प्रयास किया। मुग़ल सेना को धूल चटाकर मराठा सेना वापस पुणे की ओर लौट आई।

खरगोन (मप्र) जिले के रावेरखेड़ी में बाजीराव की समाधि

अब मुगल सम्राट ने  मराठों से बदला लेने के लिए निज़ाम उल मुल्क को सत्तर हज़ार सैनिकों की विशाल सेना के साथ भेजा। मराठों से हिसाब चुकाने के उद्देश्य से यह सेना भोपाल पहुँची। लेकिन मराठे तो पहले ही तैयार बैठे थे। बाजीराव के नेतृत्व वाली मराठा सेना ने मुगलों को चारों तरफ से घेरकर उनकी रसद बंद कर दी। आख़िरकार हारकर मुगलों को संधि करनी पड़ी। 7 जनवरी 1738 को हुई इस संधि में मुगलों ने मालवा प्रदेश पर मराठों का आधिपत्य स्वीकार कर लिया और साथ ही युद्ध के हर्जाने के तौर पर मराठों को 50 लाख रूपये भी दिए।

28 अप्रैल 1740 को अचानक उनकी मृत्यु हो गई। ऐसा माना जाता है कि मृत्यु का कारण बुखार या हृदयाघात था। उस समय बाजीराव एक लाख की विशाल सेना लेकर दिल्ली की ओर बढ़ रहे थे और उनका पड़ाव वर्तमान मध्यप्रदेश में इंदौर के पास खरगोन जिले में था। 28 अप्रैल 1740 को ही नर्मदा के किनारे रावेरखेड़ी नामक स्थान पर उनका अंतिम संस्कार किया गया। उनकी समाधि आज भी यहाँ मौजूद है।

पेशवा बाजीराव प्रथम निसंदेह भारतीय इतिहास के महान नायकों में से एक थे। किन्तु दुःख की बात है कि आज भी इनके बारे में हम बहुत कम ही जानते हैं। अफ़सोस है कि अधिकांश लोग बाजीराव को केवल एक मराठा सेनापति के तौर पर ही पहचानते हैं, जबकि वास्तव में उनका कार्यक्षेत्र महाराष्ट्र से लेकर वर्तमान मप्र, उप्र, गुजरात और दिल्ली तक फैला हुआ था। इसके ज़िम्मेदार चाहे मुगल हों या अंग्रेज़ अथवा स्वतंत्रता के बाद वाले वामपंथी इतिहास-लेखक या राजनेता, लेकिन इसमें कोई संदेह नहीं है कि पेशवा बाजीराव प्रथम को अभी तक इतिहास में उचित स्थान नहीं मिला है। कल 28 अप्रैल को उनकी पुण्यतिथि थी, लेकिन शायद ही किसी को यह बात याद रही हो।

कहा जाता है कि जो अपने स्वर्णिम इतिहास को भूल जाते हैं, वे कभी उज्ज्वल भविष्य का निर्माण नहीं कर सकते। अब ये हमें सोचना है कि हम अपने इतिहास के स्वर्णिम पृष्ठों पर जमी धूल हटाकर सत्य सामने लाना चाहते हैं या भावी पीढ़ियों को भी आत्म-विस्मृति के गर्त में ही धकेलना चाहते हैं।

पेशवा बाजीराव जैसे नायक किसी एक समुदाय अथवा एक क्षेत्र के नहीं, बल्कि संपूर्ण राष्ट्र के नायक हैं। आइये उनकी पुण्यतिथि पर उन्हें नमन करें!

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12 thoughts on “अजेय अपराजित योद्धा”

  1. Sachmuch bajiraoji keep bare me janane she pahale mujhe apnea Hindu it I has par bari sharmindagi mahsus hot I this lek in jabse bajirao Ji keep bare me Jana tabse unke bare me ROj Nazi Nazi bate janane ki I cha hot I he air ye mahsus bhi kiya ki it I has me unhe uchit St Han nahi diya gaya he aaj agar him apne SAP ko Hindu kahpa rage he to uski vajah surf ore surf shivaji maharaja air bajiraoji hi he it I has me shivaji maharaja ko bhi side pesh kiya gaya he mano we hare hue yodha ho air aurangjeb be unka hind I samrajya ka swap pura nahi hone diya lek in jab him bajirao Ji keep barre me janate ha tolagata ha unka swapn pura hua

  2. भाई सुमंत, अपने गौरवशाली इतिहास के बारे में महत्वपूर्ण जानकारी साझा करने का हृदय से धन्यवाद!आपसे ऐसे और अधिक प्रयासों की प्रतीक्षा रहेगी।साभार

satyendra kumar shende को प्रतिक्रिया दें जवाब रद्द करें

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