बिहार पर विचार…

कल बिहार विधानसभा चुनाव के परिणाम ने लगभग सभी को चौंका दिया है। चुनाव लड़ने वाला हर कोई जीतने या किसी को हराने के लिए ही लड़ता है (इन दोनों बातों में फर्क है!), इसलिए जो जीते हैं उनकी खुशी और जो हारे हैं उनकी निराशा स्वाभाविक है। लेकिन कल से ही मैं जीतने वालों का अहंकार और हारने वालों का क्रोध दोनों ही देख रहा हूँ। ये दोनों ही ठीक नहीं हैं। जीतने वाले कई लोग ऐसे उपदेश दे रहे हैं, मानो जनता ने उन्हें मनमानी करने का लाइसेंस दे दिया है और हारने वाले कई लोग मतदाताओं को मूर्ख कहकर अपमानित भी कर रहे हैं। आप चाहे जीते हों या हारे हों, लेकिन वोटर को अपमानित करने का आपको कोई अधिकार नहीं है। भारत का वोटर चाहे किसी आधुनिक महानगर में रहने वाला हाई-प्रोफाइल व्यक्ति हो या दूर किसी सुनसान पहाड़ी गांव में रहने वाला अनपढ़ व्यक्ति हो, लेकिन वह मूर्ख बिलकुल नहीं है। वह अपना फायदा-नुकसान देखकर ही वोट डालता (या नहीं डालता) है। खासतौर पर बिहार का वोटर तो राजनैतिक रूप से सबसे ज्यादा जागरुक है, इसलिए बिहार के वोटर को मूर्ख कहने वाले सिर्फ लोकतंत्र का ही अपमान नहीं कर रहे, बल्कि खुद के बौद्धिक दिवालिएपन का प्रदर्शन भी कर रहे हैं!
कल के बिहार चुनाव में कौन जीता, कौन हारा, किसको कितने सीटें मिलीं, कितने प्रतिशत वोट मिले ये सब मैं यहाँ नहीं लिखने वाला हूँ क्योंकि ये बातें हर चुनावी विश्लेषण में लिखी गई हैं और हर कोई जानता भी है। कई ज्ञानी लोग हमें कल से ही ये भी बता रहे हैं कि इस चुनाव में जो जीते वो क्यों जीते या जो हारे वो क्यों हारे! मैं आज ये भी नहीं लिखने वाला हूँ क्योंकि ये सब काल्पनिक बातें हैं। अगर परिणाम विपरीत आया होता तो यही बातें लिखने वाले लोग इसके विपरीत विश्लेषण भी लिख देते! मैं कोई विश्लेषण नहीं कर रहा हूँ, इसलिए मैं यह सब भी नहीं लिखने वाला हूँ।
पीछे क्या हुआ और क्यों हुआ, इस पर चर्चा करने की बजाय मेरा यह लेख इस बात पर केंद्रित है कि आगे क्या होने की संभावना लग रही है और क्या किया जाना चाहिए।
बिहार चुनाव में भाजपा की हार अप्रत्याशित नहीं है, लेकिन लालू की जीत अवश्य ही अप्रत्याशित है। लालू का एक पुराना दावा आज फिर सही साबित हुआ है। वे किंग नहीं बन सकते, लेकिन किंग मेकर ज़रूर बन गए हैं। यहाँ मुम्बई-पुणे में बैठे कई लोग अवश्य ये हवाई दावे कर रहे हैं कि जनता ने नीतीश कुमार के सुशासन को बहुमत दिया है, लेकिन वास्तव में ऐसा कहने वालों की अज्ञानता ही इससे प्रकट होती है। बिहार की जीत नीतीश कुमार के सुशासन से ज्यादा लालू के जातिवाद, प्रभावी वक्तृत्व, जनता की नब्ज पकड़ने के कौशल, जुमलेबाजी और भाजपा की आपसी गुटबाजी के कारण मिली जीत है। मांझी को पद से हटाने में विफल रहने पर जिस दिन नीतीश इस काम के लिए मदद मांगने लालू के दरबार में जा खड़े हुए थे, उसी दिन यह दिख गया था कि वे अब केवल एक मोहरा बन गए हैं। मोदीजी के खिलाफ उनके अहंकार और प्रधानमंत्री बनने की महत्वाकांक्षा के कारण लगातार वे एक के बाद एक गलतियाँ करते ही रहे और लालू से हाथ मिलाना भी ऐसी ही एक भयंकर भूल थी। वास्तव में नीतीश कुमार ने मांझी को मुख्यमंत्री बनाकर जो गलती की थी, लालू को संजीवनी देकर उससे भी बड़ी गलती की है। इस चुनाव में सबसे ज्यादा सीटें लालूजी की राजद को मिली हैं और इसके कारण स्पष्ट रूप से नीतीश की मुसीबतें बढ़ने वाली हैं। नीतीश कुमार जैसे एक बुद्धिमान और प्रतिभाशाली व्यक्ति का ऐसा पतन निश्चित ही दुखद है।
मुझे लगता है कि चुनाव परिणाम आने के बाद उनकी मुसीबतों का पहला चरण खत्म हुआ है और अब दूसरा शुरू होने वाला है। मेरा अनुमान है कि चूंकि लालू की सीटें नीतीश से ज्यादा हैं, इसलिए पहली सौदेबाजी मंत्रीमंडल में मलाईदारमंत्रालयों के लिए होगी। बहुत संभावना है कि लालू अपनी पत्नी या बेटे/बेटी को उपमुख्यमंत्री और/या गृहमंत्री बनाने की मांग कर दें। इसी तरह मंत्रिमंडल में ज्यादा से ज्यादा विभाग पाने के लिए भी नोंच-खसोट होगी ही। उसके बाद बिहार में दो स्तरों पर लूटपाट का ‘सर्वसमावेशक’ कार्यक्रम शुरू होगा। एक तरफ तो मंत्रीपद पाने वाले और विधानसभा में चुने गए लोग अपने स्तर पर योजनाओं और ठेकों में हिस्सा बटोरेंगे, और दूसरी तरफ उनके कार्यकर्ता गांव-गांव में रंगदारी, अपहरण, हफ्ता वसूली आदि से माल कमाएंगे। इसके अलावा अब जल्दी ही इस बात को लेकर भी घमासान मचेगा कि 2019 में मोदीजी को किसके नेतृत्व में हराना है। लालू तो घोषणा कर ही चुके हैं कि वे अब देशभर में घूम-घूमकर लोगों को मोदी के खिलाफ जगाएंगे। लेकिन 2019 में मोदीजी को हराने की लड़ाई का नेतृत्व चाहने वालों में नीतीश कुमार और केजरीवाल में भी संघर्ष छिड़ने वाला है। इसमें जीतेगा वही, जो मीडिया और कांग्रेस को खुश रख सकेगा। एक तरफ कांग्रेस और दूसरी तरफ लालू के दबाव और ब्लैकमेलिंग से उलझना नीतीश कुमार के सामने सबसे बड़ी चुनौती होगी।
इन सबके बीच बिहार वैसा ही पिसता रहेगा, जैसा इतने सालों तक पिसता रहा है। लेकिन बिहार का चुनाव परिणाम देश के कई दूसरे इलाक़ों को प्रभावित करने वाला है। अब महाराष्ट्र-गुजरात-दिल्ली और देश के दूसरों हिस्सों में पलायन करने वाले बिहारियों की बाढ़ जारी रहेगी (या शायद बढ़ेगी भी), इसलिए इन इलाकों में भी स्थानीय समस्याएं जस की तस बनी रहेंगी या शायद बढ़ती ही जाएंगी। इस कारण महाराष्ट्र में शिवसेना और मनसे जैसी पार्टियों को भी अपनी राजनीति चमकाने के लिए खाद-पानी मिलता रहेगा। जल्दी ही मुम्बई नगर निगम चुनाव भी आने वाला है। इसके अलावा भाजपा की हार से शिवसेना शायद इसलिए भी खुश है क्योंकि हिंदुत्व की राजनीति उसका सबसे बड़ा अस्त्र है और अगर तथाकथित ‘हिंदूवादी’ भाजपा मजबूत हो जाएगी, तो कई हिंदुत्ववादी मतदाता भाजपा की ओर खिसक सकते हैं और इससे शिवसेना का अस्तित्व ही खतरे में पड़ सकता है। संभवतः इसीलिए शिवसेना को भ्रष्ट लालू की जीत की चिंता नहीं, बल्कि भाजपा की हार की खुशी हो रही है। यही बात ईमानदारी के स्वघोषित ठेकेदार केजरीवाल पर भी लागू है और उन्हें भी लालू की जीत से कोई आपत्ति नहीं, बल्कि इसमें उनका भी योगदान ही रहा है। खुद को निष्पक्ष कहने वाला मीडिया भी इस पर मौन है और खुलकर भाजपा के विरोध में एकतरफा अभियान चलाता आ रहा है। अभी कम से कम 2019 तक तो इस स्थिति में बदलाव होने के आसार नहीं दिख रहे हैं। कुल मिलाकर देश पीछे जाता रहेगा और कुछ स्वार्थी नेताओं को नोट और वोट मिलते रहेंगे। देश की सारी कमियों का ठीकरा इसी मीडिया के माध्यम से मोदी पर फोड़ने की कोशिश भी जारी रहेगी। सही-गलत सोचे बिना सिर्फ जात-पात-पव्वा-पैसा देखकर वोट डालने वाले लोग आगे भी इसी तरह हां में गर्दन हिलाते रहेंगे और जो सोच-समझकर विकास और सुशासन के लिए सही जगह वोट डालते हैं, वे भी पहले की ही तरह आगे भी दूसरों की गलतियों की सज़ा भुगतते रहेंगे। जहां तक बिहार की बात है, तो बिहार बदहाल था, और अगले कुछ वर्षों तक बदहाल ही बना रहेगा!
बिहार के परिणाम और भविष्य के अनुमान की इस पूरी चर्चा में कांग्रेस पर बहुत कम लोगों का ध्यान है, जबकि बिहार में सबसे ज्यादा फायदा कांग्रेस को ही हुआ है। कांग्रेस की चाल देखकर लग रहा है कि उनकी योजना ऐसी है कि 2019 का लोकसभा चुनाव गठबंधन के अंतर्गत केजरीवाल, नीतिश या ऐसे ही किसी अन्य नेता का चेहरा सामने रखकर लड़ा जाएगा और अगर 2019 में भी हार ही हुई, तो ठीकरा उसी नेता पर फूटेगा, लेकिन यदि परिणाम आने के बाद कांग्रेस सबसे बड़ी पार्टी बनती है तो प्रधानमंत्री पद के लिए राहुल गांधी के नाम का दबाव बनाया जाएगा।
लेकिन मेरी चिंता सिर्फ भाजपा के प्रति है। अगर देश को बेहतर बनाना है, तो भाजपा से अच्छा कोई विकल्प नहीं है और भाजपा को अपनी कमियों का विश्लेषण व सुधार करना ही पड़ेगा। मेरी निजी राय है कि भाजपा के लोग आपसी गुटबाजी को खत्म करें। हर राज्य में प्रभावी प्रादेशिक नेतृत्व को उभारने पर पर्याप्त ध्यान दें। हर चुनाव में मोदीजी का नाम, चेहरा और भाषण दिखाकर उनकी छवि की धार कमज़ोर न करें। मोदी भाजपा का ब्रह्मास्त्र है, उसे हर छोटे-मोटे चुनाव में चलाकर अपना नुकसान न करें। फेसबुक-ट्विटर की आभासी दुनिया से बाहर निकलकर जमीनी हकीकत को भी पहचानें। प्रादेशिक और स्थानीय चुनावों में यूएनओ की स्थायी सदस्यता या मेक इन इण्डिया जैसी उपलब्धियों का ज्यादा महत्व नहीं है। वहां आटे-दाल और पेट्रोल की कीमत का असर ज्यादा होता है, इसलिए थोड़ा ध्यान उधर भी दें। और सबसे जरूरी ये है कि यूपीए के जमाने में कांग्रेस द्वारा किए गए भ्रष्टाचार और आज भी एकतरफा दुष्प्रचार करने वाले बिकाऊ मीडिया के खिलाफ बदले की भावना से काम करें। और सबसे बड़ी बात यह है कि भाजपा के निष्ठावान कार्यकर्ताओं की उपेक्षा बंद करें, दरबारियों और चापलूसों को बाहर निकालें, योग्य व्यक्तियों को आगे लाएं, अन्यथा 2019 का लोकसभा चुनाव जीतना कठिन होगा और उससे पहले के सारे विधानसभा चुनाव जीतना भी कठिन होगा। इसी कारण राज्यसभा में बहुमत पाना भी कठिन होगा, नए सुधार और क़ानून लागू कर पाना भी कठिन होगा और अपनी मर्जी के राष्ट्रपति-उपराष्ट्रपति बना पाना भी कठिन होगा। इसके अलावा भाजपा को यह भी फिर से सोचना चाहिए कि गठबंधन कहाँ-किससे-किस सीमा तक करना है और गठबंधन के किस सहयोगी दल को कितना महत्व देना है।
आगे क्या होगा या नहीं होगा, ये तो समय ही बताएगा। फिलहाल तो हम केवल यही आशा कर सकते हैं कि जैसी आशंका है, बिहार का हाल वैसा बुरा न हो और जैसी आशा है, वैसा अच्छा सुधार भाजपा में जल्द हो।
आपकी राय कमेन्ट बॉक्स में अवश्य बताएं!

(चित्र गूगल से)

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