“स्टार्टअप नेशन” (अंतिम भाग)

इस लेखमाला के पिछले २ भागों में हमने इज़राइल की स्टार्टअप कंपनियों की सफलता के कुछ उदाहरण देखे हैं। (पिछले २ भाग आप यहाँ पढ़ सकते हैं: भाग -१ और भाग -२) हमने इस बारे में भी बात की थी कि किस तरह इज़राइल आधुनिक तकनीक के उपयोग, और सरकार, समाज व सेना के आपसी सहयोग के द्वारा इज़राइल में उद्यमिता के लिए अनुकूल माहौल बना, जिसके परिणामस्वरूप इज़राइल आज दुनिया के सबसे विकसित देशों की पंक्ति में पहुंच गया है, जबकि केवल ५०-६० वर्षों पहले तक यह अत्यंत गरीब और संघर्षरत देश था। आइये आज इस अंतिम भाग में आगे पढ़ें …

“स्टार्टअप नेशन” (भाग २)

इज़राइल की इस विशिष्ट परिस्थिति के कारण इज़राइल के बच्चे-बच्चे को घर में, स्कूल में और सेना की नौकरी में आक्रामकता और नवाचार की सीख मिलती है। धीरे-धीरे यह उसकी आदत ही बन जाती है। इसी कारण लोग कुछ नया करने, नई चुनौतियों को स्वीकारने या जोखिम उठाने में हिचकते नहीं हैं। इसी के परिणामस्वरूप आज इज़राइल कई क्षेत्रों में अपनी उपलब्धियों व सफलताओं के झंडे गाड़ चुका है, और इसमें सेना की बहुत बड़ी भूमिका है।

“स्टार्टअप नेशन” (भाग-१)

इज़राइल का नाम तो आपमें से हर किसी ने सुना होगा, लेकिन अक्सर इज़राइल की चर्चा अरब देशों से होने वाले झगड़ों, या फिर इज़राइल की कृषि की तकनीकों या आधुनिक सैन्य उपकरणों के संदर्भ में ही होती है। लेकिन इस बात पर कितने लोगों का ध्यान गया होगा कि दुनिया भर में स्टार्ट अप कंपनियों के मामले में भी इज़राइल सबसे आगे है? केवल ८० लाख जनसंख्या, लगभग शून्य प्राकृतिक संसाधन, और चारों तरफ के दुश्मन देशों से लगातार युद्ध में उलझे हुए इज़राइल में स्टार्टअप कंपनियों की संख्या भारत, जापान, कोरिया, कनाडा और ब्रिटेन से भी अधिक है। आगे पढ़ें …

ज़ी फैक्टर: सही वक्त, पर गलत आदमी

हाल ही में मैंने ज़ी मीडिया ग्रुप और कई अन्य उद्योग समूहों के संस्थापक डॉ. सुभाष चंद्रा की आत्मकथा ‘ज़ी फैक्टर’ पढ़ी। इस पोस्ट के माध्यम से उस पुस्तक की जानकारी आपके लिए प्रस्तुत कर रहा हूं। बहुत छोटी उम्र से परिवार और व्यापार की ज़िम्मेदारी संभालने वाले चंद्रा जी ने अपनी बुद्धिमानी, चालाकी, साहस, दूरदृष्टि, परिश्रम और संपर्कों के माध्यम से आगे बढ़ते हुए कई क्षेत्रों में हाथ आज़माया और कई कंपनियों के मालिक बन गए। किसी समय वे केवल १७ रूपये लेकर दिल्ली आए थे और आज उनका पूरा नेटवर्क और नेटवर्थ कितने हज़ार करोड़ का है, इसका आगे पढ़ें …

कहानी कम्युनिस्टों की (भाग – १)

मैं अगर कहूं कि भारत के प्रथम प्रधानमंत्री नेहरूजी थे, तो आप अवश्य ही मुझसे सहमत होंगे। मैं अगर कहूं कि वे कांग्रेस के नेता थे, तो भी आप मुझसे अवश्य ही सहमत होंगे। लेकिन अगर मैं कहूं कि नेहरूजी वामपंथी थे, तो आप सहमत होंगे? अगर मैं कहूं कि नेहरूजी भारत के सबसे बड़े कम्युनिस्ट थे, तो आप मानेंगे? शायद आप मुझे अज्ञानी कहेंगे या मूर्ख समझेंगे। लेकिन अगर वास्तव में यही सच हो, तो? इस बारे में अपनी पुरानी राय पर अड़े रहने या आंख मूंदकर मेरी बात मान लेने की बजाय आपको लेखक श्री संदीप देव (Sandeep आगे पढ़ें …

जयललिता की कहानी

कल सिंगापुर से अमरीका की फ्लाइट में मैंने एक नई पुस्तक ‘अम्मा’ भी पढ़ी। पत्रकार वासंती द्वारा लिखित यह पुस्तक तमिलनाडु की पूर्व-मुख्यमंत्री जे. जयललिता के बारे में है। यह तो सभी को मालूम है कि पिछले कुछ वर्षों से तमिलनाडु की राजनीति में करुणानिधि और जयललिता का ही वर्चस्व रहा है, लेकिन यह बात शायद कम ही लोग जानते होंगे कि राजनीति में इन दोनों नेताओं का पदार्पण कब और कैसे हुआ व इनकी राजनैतिक यात्रा कैसी रही है। इनमें से जयललिता के राजनैतिक जीवन का परिचय मुझे इस पुस्तक के माध्यम से मिला। करुणानिधि और उनसे भी पहले आगे पढ़ें …