हैलो ट्रैक्टर!

आज मैंने अफ्रीकी देश केन्या की एक कंपनी के बारे में खबर पढ़ी। इस कंपनी का नाम हैलो ट्रैक्टर है। जैसे भारत में अक्सर हम लोग कहीं आने-जाने के लिए टैक्सी चाहिए हो, तो ओला या उबर के ऐप से कैब बुलवाते हैं, उसी तरह यह कंपनी केन्या में (और शायद नाइजीरिया में भी) किसानों को खेत जोतने के लिए छोटे ट्रैक्टर किराए पर उपलब्ध करवाती है। मैंने जो लेख पढ़ा, उसके अनुसार इन अफ्रीकी देशों में ट्रैक्टर का औसत मूल्य लगभग ४० हज़ार डॉलर है। इतनी बड़ी रकम जुटाना हर किसान के लिए संभव नहीं है। कुछ मामलों में आगे पढ़ें …

अकेलापन…

लोग आते रहे-जाते रहे मैं अकेला था, अकेला ही रहा। हर बार कोई आने वाला, कुछ साथ लिए आता है। जाते-जाते जाने वाला, टुकड़ा मन का ले जाता है। ऐसे टुकड़े मेरे मन के, बनते रहे, बिखरते रहे। उन सभी अकेले टुकड़ों में, मैं अकेला था, अकेला ही रहा। जीवन एक यात्रा है अनंत, सदियों तक चलती जानी है। यह एक जन्म की व्यथा नहीं, कई जन्मों की कहानी है। सौ जन्मों की इस यात्रा में, लोग मिलते रहे, बिछड़ते रहे। उन सभी अकेले जन्मों में, मैं अकेला था, अकेला ही रहा। यही अकेलापन मेरा, जन्मों-जन्मों का साथी है। जब आगे पढ़ें …

झरना…

अब खुश और संतुष्ट लोग बहुत कम मिलते हैं. हम किसी से भी बात करें – वह शिकायतों का पिटारा खोल देता है. ‘मेरे पास समय ही नहीं रहता, मेरे पास पैसे नहीं हैं, दुनिया की इस दौड़ में मैं कैसे टिकूंगा, ओह, आज तो बारिश हो रही है, आज मेरा मूड नहीं है!’ ये सब अपनी खुशी को ‘टालने’ के बहाने हैं. कुछ काम ऐसे हैं, जिनसे हमें ही खुशी मिलेगी – लेकिन हम ही उन बातों की खुशी गंवा रहे हैं! क्या यह अजीब नहीं लगता? किसी फूल की खुशबू का मज़ा लेने में कितना समय चाहिए? उगते-डूबते आगे पढ़ें …

कश्मीरी पण्डितों के दर्द को व्यक्त करती एक कविता…

मेरी बेटी की ओढ़नी तार-तार की गई- सब खामोश रहे। मुझे विवश किया गया अपना घर-द्वार छोड़कर संस्थापित से विस्थापित बनने के लिये कोई कुछ नहीं बोला। मैं अपने परिवार के साथ न्याय की गुहार लगाते हुए वर्षों से दिल्ली के फुटपाथ पर हूँ किसी को कोई फर्क नहीं पड़ता। कोई भी मानवाधिकारवादी कोई भी टीवी चैनल कोई भी राजनीतिक ध्वजाधारी मेरे विषय में चर्चा नहीं करता, मेरा आर्त्तनाद नहीं बनता किसी भी प्रगतिवादी साहित्यकार की कथा का विषय। मेरी त्रासभरी आँखें नहीं बनतीं किसी भी जनवादी पत्रिका का मुख-पृष्ठ मैं अपने प्रान्त से बहिष्कृत अपने परिवेश से तिरस्कृत अपने आगे पढ़ें …

तस्वीरों के पार

मैं अपनी तस्वीरों में हूँ भी और नहीं भी मैं अपने पोस्टर में हूँ भी और नहीं भी इसमें न कोई विरोध न कोई विरोधाभास. तस्वीर आत्मा जैसी नहीं है वह तो पानी में भीगती है आग में जलती है बह भीगे या जले मुझे कुछ नहीं होता आप मुझे मेरी तस्वीर में या पोस्टर में खोजने का मिथ्या प्रयत्न न करें. मैं तो निश्चिंत बैठा हूँ अपने आत्मविश्वास में- अपनी वाणी, व्यवहार और कर्म में आप मुझे मेरे कर्मों से जानें कर्म ही मेरा जीवन-काव्य है लयताल है. घर में गीतासार आंगन में कर्मधार आप सभी के लिए अकारण आगे पढ़ें …