चाय

पी.वी. नरसिंहराव मेरे पसंदीदा राजनेताओं में से एक हैं। वे बहुत विद्वान व्यक्ति थे, कई भाषाओं के जानकार भी थे और अच्छे लेखक व अनुवादक भी। उन्होंने कई भाषाओं में पुस्तकों के अनुवाद किए और कई पुस्तकें स्वयं भी लिखीं। उन्हीं में से एक थी, ‘द इनसाइडर’। हालांकि, नरसिंहराव ने इसे एक काल्पनिक उपन्यास के रूप में लिखा है, लेकिन उसके नायक की कहानी बहुत हद तक उनके स्वयं के जीवन से मिलती-जुलती है।

लेकिन आज मैं बात उस पुस्तक की नहीं करने वाला हूँ। बात मैं चाय की करने वाला हूँ। सोशल मीडिया पर कई लोगों की पोस्ट देखकर पता चला कि आज शायद ‘अंतरराष्ट्रीय चाय दिवस’ है, तो मुझे राव की इस पुस्तक का वह प्रसंग याद आ गया, जिसमें उन्होंने वर्णन किया है कि उनके बचपन में उनके गांव में चाय की लत कैसे शुरू हुई।

वह आंध्रप्रदेश में हैदराबाद के आसपास कोई गांव था। ये अंग्रेज़ों के ज़माने की बात है। उस समय गांव में चाय का नाम किसी ने नहीं सुना था, चाय पीना तो बहुत दूर की बात थी। लोग सुबह दूध पीया करते थे और गर्मियों में कच्चे आम का शरबत। एक दिन अचानक किसी कंपनी की मेहरबानी से गांव में एक टी स्टॉल खुल गया। वहां चाय बिकती नहीं थी, बल्कि लोगों को मुफ़्त में चाय पिलाई जाती थी। लेकिन जब पहली-पहली बार गांव में चाय आई, तो किसी ने भी उसे ख़ास पसन्द नहीं किया। चाय खरीदना तो दूर की बात है, लोग मुफ़्त में भी पीने को भी तैयार नहीं होते थे।

चाय कंपनियों के लिए यह बड़ी चुनौती थी कि लोगों को चाय पीने के लिए कैसे मनाया जाए। कुछ आकर्षक मार्केटिंग ज़रूरी थी। अब कंपनियों ने इसके लिए विज्ञापन का सहारा लिया। धीरे-धीरे गांव की दीवारों पर चाय के रंगीन पोस्टर दिखने लगे, जिन पर चाय पीती हुई अर्धनग्न युवतियों के चित्र बने होते थे। यह प्रश्न निरर्थक था कि चाय की गुणवत्ता या स्वाद का उन चित्रों से क्या संबंध है? लेकिन बुर्के और घूंघट वाले उस गांव में इस तरह के पोस्टरों ने खलबली मचा दी। उन पोस्टरों को देखने के लिए पुरुषों का जमघट लगने लगा। कई बार तो इतनी भीड़ लग जाती थी कि उन संकरी गलियों में जाम लग जाता था। कई लोगों के लिए यह एक कल्चरल शॉक जैसा था क्योंकि इस तरह की चीज़ें गांव में पहले कभी नहीं देखी गई थीं। फिर चाय कंपनियों ने एक नया नारा भी दिया – गर्मियों में गर्म चाय ठंडक पहुंचाती है! ये भी बेतुकी बात थी, लेकिन ये नारा भी चल गया।

धीरे-धीरे उन मुफ़्त की दुकानों पर चाय पीने वालों की भीड़ बढ़ने लगी। आखिर इसमें अपनी जेब से जाता ही क्या है? वहां बैठे-बैठे दिनभर मुफ़्त की चाय पीनी है और दुनियाभर की बातों पर चर्चा करनी है, इसमें कौन-सा खर्चा है! भीड़ बढ़ने लगी, चाय का उपयोग बढ़ने लगा और धीरे-धीरे गांव में चाय पीना ‘आधुनिकता’ का प्रतीक बन गया। अगले छह महीनों में गांव के कई फैशनेबल लोग आधुनिक और प्रगतिशील दिखने के लिए चाय पीने लगे। सुबह के दूध की जगह अब सुबह की चाय ने ले ली। लोगों को खुद भी यह अहसास नहीं था कि कब उन्हें इसकी लत लग गई।

अब एक अप्रत्याशित घटना हुई। जिस तरह एक दिन अचानक गांव में मुफ्त चाय बांटने वाला स्टॉल खुला था, उसी तरह एक दिन अचानक रातोंरात वह स्टॉल गायब हो गया! अगले कुछ दिनों में उस तरह के सारे मुफ़्त वाले टी स्टॉल गायब हो गए। अब लोगों को अहसास हुआ कि उन्हें चाय की लत लग चुकी है और अब उन्हें किसी भी हाल में चाय चाहिए थी।

कुछ दिनों बाद गांव में फिर चाय के कुछ नए स्टॉल खुल गए। लेकिन जब लोग वहां पहुंचे, तो उन्हें पता चला कि अब वहां मुफ़्त चाय नहीं मिलती, बल्कि उन दुकानों में चायपत्ती के छोटे-बड़े कई आकारों के डिब्बे, पैकेट, पाउच आदि मिलते थे, जिन्हें ‘पैसे देकर’ खरीदना पड़ता था। एक और नई बात ये थी कि आप जितना बड़ा डिब्बा खरीदेंगे, चाय आपको उतनी सस्ती पड़ेगी। मतलब आप जितनी ज्यादा चाय पीयेंगे, आपकी उतनी ही ज्यादा बचत भी होगी! इतने महीनों तक मुफ़्त में खूब चाय पीने वालों को अब तक इसकी लत लग चुकी थी और चाय के बिना जी पाना अब उनके लिए मुश्किल था, इसलिए अब वे यहां से खरीदकर चाय पीने लगे। इस तरह गांव के हर घर में धीरे-धीरे चाय पहुँच गई!

मुझे नहीं पता कि इस कहानी में कितनी सच्चाई और कितनी कल्पना है, लेकिन मुझे बहुत हद तक ये कहानी सही लगती है। क्या भारत के हर गांव-शहर में उस ज़माने में इसी तरह चाय की लत लगाई गई होगी? यह भी संभव है। इंग्लैंड में भी और भारत में भी अंग्रेज़ों के बीच चाय बहुत लोकप्रिय थी। बहुत स्वाभाविक है कि अंग्रेज़ों की तरह बनने की कोशिश में उनके रहन-सहन की नकल करने वालों ने चाय की इस आदत को भी हाथोंहाथ अपनाया हो और मुफ़्तख़ोरी तो आज भी अपने समाज की एक भीषण बीमारी है। लोग मुफ़्तख़ोरी के वादे पर वोट डालकर आ जाते हैं, फिर मुफ़्त की चाय रोज़ मिलती हो, तो कौन मना करेगा? ये सब सोचकर मुझे लगता है कि नरसिंहराव ने अपने गांव में चाय की जो कहानी लिखी है, वह शायद सच ही होगी और भारत में शायद हर जगह चाय इसी तरह पहुंची होगी।

लेकिन यहां मुझे यह भी स्पष्ट कर देना चाहिए कि चाय से मेरा कोई झगड़ा नहीं है और वो कहानी भी मैंने सिर्फ आपकी जानकारी और मनोरंजन के लिए ही यहां सुनाई है। आपको चाय दिवस की हार्दिक शुभकामनाएं! ☕

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