याचना या संघर्ष? (काँग्रेस कथा – २)

(पहला भाग यहाँ पढ़ें)

पिछले भाग में मैंने आपको बताया था कि अंग्रेज़ अधिकारी ह्यूम को इस बारे में जानकारी मिली कि अंग्रेज़ों की क्रूरतापूर्ण नीतियों के कारण पूरे भारत में अंसतोष बढ़ रहा है और लोग फिर से १८५७ जैसी क्रांति करने की तैयारी में हैं।

ह्यूम ने इस बारे में ब्रिटिश सरकार को पत्र लिखकर बताया कि –

मुझे सात बड़ी-बड़ी फ़ाइलों में भारत के लगभग हर जिले, तहसील और शहर से कुल मिलाकर लगभग ३० हजार से अधिक सूचनाएँ मिली हैं, जिनसे पता चलता है कि लोगों में अंग्रेज़ों के खिलाफ़ भारी गुस्सा है। कई जगहों से यह ख़बरें भी मिली है कि लोग पुरानी बन्दूकें, तलवारें और भाले इकट्ठा कर रहे हैं। वे एक-दूसरे के साथ मिलकर कुछ न कुछ कर डालने की तैयारी में हैं और इसका सीधा मतलब है अंग्रेज़ों के विरुद्ध हमला!

ह्यूम को एक बड़ी चिंता यह थी कि ये सारे लोग मिलकर पूरे देश में अराजकता फैला देंगे, छोटे-छोटे गुट मिलकर एक बहुत बड़ी शक्ति बन जाएँगे और अंग्रेज़ उनके सामने टिक नहीं सकेंगे। लेकिन उससे भी बड़ा डर यह था कि अगर देश के पढ़े-लिखे लोगों ने उन विद्रोहियों को एकता के सूत्र में बाँध दिया, तो यह १८५७ से भी बड़ा राष्ट्रीय संग्राम बन जाएगा और निश्चित रूप से भारत में ब्रिटिशों का नामो-निशान ही मिट जाएगा।

इसलिए ह्यूम ने इस बारे में गंभीरता से विचार किया कि सबसे पहले भारत के शिक्षित वर्ग को इससे अलग किया जाए। इसके लिए उन्होंने तत्कालीन गवर्नर जनरल को सुझाव दिया कि इन लोगों का गुस्सा ठंडा करने के लिए एक राष्ट्रीय संस्था की स्थापना की जाए। इसमें ऐसे उच्च-शिक्षित भारतीय लोग होंगे, जिनसे अंग्रेज़ों को कोई सीधा खतरा न हो और जो ब्रिटिश सरकार को भारत के आम लोगों की समस्याओं और माँगों के बारे में बताते रहें।

गवर्नर जनरल ने इस बात की सहमति दे दी, लेकिन साथ ही यह भी बता दिया कि किसी को यह पता नहीं चलना चाहिए कि इस संस्था का निर्माण वास्तव में अंग्रेज़ सरकार के हित में और उसकी सहमति से किया गया है। ह्यूम ने इस आदेश का पालन किया।

वायसरॉय से सहमति मिलने के बाद ह्यूम ने कलकत्ता विश्वविद्यालय के छात्रों को एक पत्र लिखकर अपील की कि वे अपने देश की सेवा के लिए आगे आएँ और इस संस्था की स्थापना में सहयोग करें। उस समय भारत के विभिन्न भागों में कई अन्य छोटी-छोटी संस्थाएं और संगठन भी काम कर रहे थे। ह्यूम ने उनसे भी संपर्क किया और साथ आने की अपील की।

मार्च १८८५ में यह तय हुआ कि दिसंबर में क्रिसमस की छुट्टियों में इस संस्था का पहला अधिवेशन पुणे में आयोजित किया जाएगा और संस्था की विधिवत स्थापना हो जाएगी। लेकिन पुणे में हैजा फैल जाने के कारण वह सम्मेलन मुंबई में हुआ और इस तरह २८ दिसंबर १८८५ को मुंबई में महारानी विक्टोरिया की जय-जयकार के साथ कांग्रेस की स्थापना हो गई। उमेशचन्द्र बनर्जी इसके पहले अध्यक्ष थे। ह्यूम को छः वर्षों के लिए इसका महासचिव चुना गया।

आरंभिक वर्षों में काँग्रेस का उद्देश्य स्वतंत्रता या स्वराज्य नहीं था। उस समय के अधिकाँश नेता अंग्रेज़ों के भक्त थे और उन्हें पूरा विश्वास था कि ब्रिटिश शासन वास्तव में बहुत दयालु, सहिष्णु और न्यायवादी है। उस समय काँग्रेस के सभी अधिवेशन महारानी की जय और ब्रिटिश शासन के प्रति अपनी राजभक्ति के प्रदर्शन के साथ ही शुरू होते थे। उन दिनों काँग्रेस की अधिकतर मांगें शासन-व्यवस्था में सुधार, सिविल सेवा की परीक्षाओं में भारतीय छात्रों को अधिक अवसर दिए जाने, धारा सभा (संसद) में भारतीय प्रतिनिधियों की संख्या बढ़ाने आदि से संबंधित होती थीं। उस समय स्वराज की कोई माँग नहीं होती थी क्योंकि उस समय के काँग्रेस के उन नेताओं को विश्वास था कि ब्रिटिश शासन ही भारत के लिए उपयोगी है और वास्तव में यह भारत के लिए ईश्वर का वरदान ही है। दादाभाई नौरोजी, उमेशचन्द्र बनर्जी, बदरूद्दीन तैयबजी, सुरेन्द्रनाथ बनर्जी, गोपालकृष्ण गोखले, महादेव गोविन्द रानडे और फिरोजशाह मेहता जैसे लोग इनमें प्रमुख थे।

उस समय की काँग्रेस के अधिकतर नेताओं की कार्यशैली अनुनय-विनय और प्रार्थना वाली ही थी, लेकिन लोकमान्य तिलक जैसे कुछ नेता इसके अपवाद थे।

तिलक जी का जन्म २३ जुलाई १८५६ को महाराष्ट्र के रत्नागिरी में हुआ था। एल.एल.बी की पढ़ाई पूरी करने के बाद उन्होंने वकालत करने की बजाय देश की स्वतंत्रता के लिए समाज को जगाने का मार्ग चुना। ‘स्वराज्य मेरा जन्मसिद्ध अधिकार है और मैं इसे लेकर रहूँगा’ की उनकी घोषणा ने युवाओं को बड़ी संख्या में आकर्षित किया। सन १८९१ में उन्होंने ‘केसरी’ और ‘मराठा’ नामक दो समाचार-पत्रों का प्रकाशन प्रारंभ किया। इन अखबारों में वे ब्रिटिश शासन के अत्याचारों के विरुद्ध खुलकर आग उगलते थे। उनका कहना था कि यह देश हमारा है और इस पर शासन करने का अधिकार भी केवल हमारा है। जो वस्तु हमारी ही है, उसे पाने के लिए ब्रिटिशों के आगे हाथ जोड़ने और गिड़गिड़ाने का क्या तुक है? यह तो मूर्खता की बात है!

स्वाभाविक है कि अंग्रेज़ों को तिलक जी फूटी आँख नहीं सुहाते थे। सन १८९७ में अंग्रेज़ों ने युवाओं को भड़काने के आरोप में उन्हें गिरफ्तार कर लिया और राजद्रोह का दोषी ठहराकर १८ महीने कैद की सज़ा सुना दी। लेकिन इसके कारण उनकी लोकप्रियता और बढ़ गई। निर्दोष होते हुए भी उन्होंने जिस धैर्य के साथ इन आरोपों का सामना किया था, उसके कारण हजारों युवक उनसे प्रेरित होने लगे।

जेल से छूटने के बाद तिलक जी ने अपनी गतिविधियाँ फिर शुरू कर दीं। उन्होंने महाराष्ट्र में ‘गणेश उत्सव’ और ‘शिवाजी की जयंती’ के कार्यक्रम शुरू किए। फिर एक बार अंग्रेज़ों ने उन्हें एक हत्या के आरोप में फँसाने की कोशिश की, लेकिन उसमें सफल नहीं हो सके। अंततः १९०८ में उन पर प्रेस एक्ट के अंतर्गत हिंसा भड़काने का नया आरोप लगाकर फिर उन्हें राजद्रोह का दोषी ठहराया गया और ६ वर्ष के सश्रम कारावास की सज़ा सुना दी गई। इसके खिलाफ पूरे मुंबई प्रांत में कई दिनों तक लगातार आन्दोलन और विरोध-प्रदर्शन होते रहे। अंततः इससे घबराकर ब्रिटिश सरकार झुक गई और सश्रम कारावास को साधारण कारावास में बदल दिया गया।

अब तिलक जी को दूर मंडाले (बर्मा) की जेल में भेज दिया गया। लेकिन वहाँ भी उन्होंने हिम्मत नहीं हारी और निराश होने की बजाय जेल की इस अवधि का उपयोग उन्होंने पुस्तकें लिखने के लिए किया। इसी जेल में उन्होंने अपनी प्रसिद्ध पुस्तक ‘गीता-रहस्य’ लिखी थी। जेल से छूटने के बाद वे फिर एक बार देश की आज़ादी के प्रयास में जुट गए।

यह बात तो समझ में आती है कि अंग्रेज़ों को तिलक जी से बैर था। लेकिन अफ़सोस और अचरज की बात ये है कि काँग्रेस के अधिकतर नेता भी तिलक जी को पसंद नहीं करते थे। तिलक जी ही काँग्रेस के वह पहले नेता थे, जिन्होंने स्वराज्य और स्वदेशी की बात कही। वे १८९८ से ही काँग्रेस से जुड़ गए थे, लेकिन उनकी स्पष्ट राय थी कि काँग्रेस को अंग्रेज़ों के आगे गिड़गिड़ाना बंद करना चाहिए, जबकि काँग्रेस के अधिकतर नेताओं की राय थी कि हमें ब्रिटिशों से लड़ने के बजाय उनसे अनुरोध और याचना जारी रखनी चाहिए। तिलक जी और काँग्रेस के अन्य नेताओं के बीच यह मतभेद हमेशा बना रहा। दुर्भाग्य से काँग्रेस के तत्कालीन नेता तिलक जी की बात कभी नहीं समझ पाए। इसका परिणाम यह हुआ कि १९०७ के सूरत अधिवेशन में काँग्रेस दो टुकड़ों में बंट गई। इसके साथ ही काँग्रेस ने लोगों का यह विश्वास भी खो दिया कि वह देश को आज़ादी दिला सकती है। इससे पहले १९०६ में ही मुसलमानों ने भी काँग्रेस से दूर रहने के लिए ऑल इण्डिया मुस्लिम लीग नाम से अपना एक अलग संगठन बना लिया था।

लेकिन १९०७ के सूरत अधिवेशन में टूट की स्थिति तक काँग्रेस कैसे पहुँच गई और फिर उसके बाद काँग्रेस का क्या हुआ? ये मैं आपको अगले भाग में बताऊँगा।

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