बंगाल का विभाजन (काँग्रेस कथा – ३)

(पिछले भाग यहाँ पढ़ें)

लोकमान्य तिलक सन १८९० में काँग्रेस से जुड़े। उस समय काँग्रेस की नीति सरकार से याचना करने, अपनी माँगों के लिए प्रार्थना-पत्र लिखने, और ब्रिटिश शासन की कृपा के लिए धन्यवाद देते रहने की ही थी। काँग्रेस के अधिकतर नेता वाकई मानते थे कि ब्रिटिश शासन भारत के लिए एक वरदान है और ब्रिटिशों के कारण ही भारत के लोगों को आधुनिक शिक्षा पाने के अवसर मिल रहे हैं। उन नेताओं का यह विश्वास भी था कि ब्रिटिश शासक सचमुच विश्व के सबसे ईमानदार और निष्पक्ष शासक हैं और अंग्रेज़ भारत के सच्चे हितैषी हैं।

उस समय की काँग्रेस के लगभग सभी प्रमुख नेता या तो ब्रिटेन में ही पढ़े हुए थे या ब्रिटिश शिक्षा प्रणाली के समर्थक थे। उनमें से लगभग किसी का भी भारत की आम जनता से सीधा संबंध नहीं था। उनका रहन-सहन, सोच-विचार, उनकी दृष्टि, उनकी जीवनशैली सभी कुछ भारत के आम, गरीब, पीड़ित नागरिक से बिल्कुल उलट थी।

उनमें से ज्यादातर नेताओं में कष्ट सहने या जेल जाने का साहस भी नहीं था, इसलिए भी वे ऐसा कोई काम नहीं करना चाहते थे, जिससे ब्रिटिश सरकार नाराज़ हो जाए और उनके जीवन या व्यवसाय पर कोई आँच आए। अपने जीवन की सुख-सुविधाओं को सुरक्षित रखते हुए वे भारत के लिए कुछ करना चाहते थे। ऐसा नहीं है कि उनकी नीयत में कोई खोट था, लेकिन तत्कालीन परिस्थितियों में या उनकी पृष्ठभूमि के कारण शायद उन्हें वही बात ठीक लगती थी। इसी कारण उन वर्षों में काँग्रेस अपने हर वार्षिक अधिवेशन में किसी न किसी बात के लिए ब्रिटिशों को धन्यवाद देने वाले प्रस्ताव पारित करती थी और किसी न किसी बहाने ब्रिटिश शासन के प्रति अपनी राजभक्ति का प्रदर्शन भी करती थी।

चूँकि इन नेताओं का आम-जनता से सीधा संबंध बहुत ज्यादा नहीं था, इस कारण काँग्रेस भी उस समय तक भारत में एक जन-आंदोलन का रूप नहीं ले सकी थी। काँग्रेस उस समय एक केवल भारतीय समाज के उच्च-वर्ग (एलिट क्लास) के सदस्यों की एक संस्था जैसी थी। ब्रिटिश सरकार के लिए भी यह फायदे की बात थी कि काँग्रेस से आम आदमी को कोई सरोकार नहीं था। ब्रिटिशों ने भी काँग्रेस के नेताओं को उनकी राजभक्ति के बदले बराबर उपकृत किया। काँग्रेस के कई नेताओं को ब्रिटिश सरकार ने अनेक पदों पर नियुक्त किया। कुछ को हाईकोर्ट का जज बनाया गया, कुछ को भारत सरकार की काउंसिल में शामिल किया गया, कुछ को अन्य समितियों में नियुक्त किया गया। इस तरह काँग्रेस और ब्रिटिश सरकार की सांठ-गांठ चलती रही।

लेकिन तिलक जी जैसे लोग इसके विरोधी थे। वे चाहते थे कि काँग्रेस ब्रिटिशों के आगे गिडगिडाना बंद करे और भारत के लोगों को साथ लेकर स्वराज्य के लिए संघर्ष करे। काँग्रेस के नेताओं को यह बात मंजूर नहीं थी। इसलिए काँग्रेस में धीरे-धीरे दो गुट बनने लगे।

सन १९०५ में ब्रिटिश सरकार ने बंगाल को दो भागों में बाँटने का निर्णय किया। आज के बिहार, झारखंड, उड़ीसा और पश्चिम बंगाल को मिलाकर पश्चिमी बंगाल बना और आज के बांग्लादेश और असम को मिलाकर पूर्वी बंगाल बना। पश्चिमी बंगाल की राजधानी कलकत्ता और पूर्वी बंगाल की राजधानी ढाका बनी। कलकत्ता उस समय ब्रिटिश भारत की भी राजधानी थी। इस तरह बांग्लाभाषियों को दो प्रान्तों में बाँट दिया गया।

अंग्रेज़ों ने इस विभाजन का कारण यह बताया था कि इतने बड़े राज्य का प्रशासन चलाना कठिन है, इसलिए इसे दो भागों में बाँटा जा रहा है। पूर्वी बंगाल में उस समय अधिकतर मुस्लिम जनसंख्या थी। अंग्रेज़ों का एक तर्क यह भी था कि बंगाल में पूरा व्यापार हिन्दुओं के नियंत्रण में है, इसलिए पूर्वी बंगाल के साथ बहुत भेदभाव होता है और वहाँ के मुसलमानों की आर्थिक प्रगति नहीं हो पा रही है। लेकिन बंगाल के अधिकतर लोगों को लगता था कि वास्तव में ब्रिटिश सरकार बंगाल में बढ़ती राष्टवाद की भावना को कमज़ोर करना चाहती है और अपनी ‘फूट डालो – राज करो’ वाली नीति के तहत मुसलमानों को अलग करके उन्हें राष्ट्रवादी आन्दोलन से दूर रखना चाहती है। इस बँटवारे के कारण पूर्वी बंगाल में मुसलमानों का बहुमत हो गया था। ढाका के नवाब ने इस बँटवारे का समर्थन किया।

दूसरी ओर हिन्दू बहुल पश्चिमी बंगाल में इस विभाजन का कड़ा विरोध हो रहा था। इसके कई कारण थे। एक तो बंगाल के लोग इस बात से नाराज़ थे कि अंग्रेज़ों ने उनकी मातृभूमि के टुकड़े कर दिए। दूसरा पश्चिमी बंगाल में बिहार और उड़ीसा को मिला देने कारण बांग्ला-भाषी लोग अब यहाँ अल्पसंख्यक हो गए थे। इससे उनकी शक्ति भी कम हो गई और उन्हें अपनी संस्कृति व परंपराओं के मिटने का खतरा महसूस होने लगा। विभाजन के कारण उनके व्यवसाय और उद्योग-धंधों पर भी प्रभाव पड़ना स्वाभाविक था।

काँग्रेस के नेता अपनी आदत के अनुसार इस विभाजन के खिलाफ़ भी सरकार को प्रार्थना-पत्र लिखते रहे। जन-समर्थन पाने के लिए उन्होंने एक हस्ताक्षर अभियान भी चलाया और सरकार को याचिकाएँ सौंपीं। इनका न कोई असर होना था और न हुआ।

लेकिन कुछ नेता इस बँटवारे के कारण बहुत नाराज़ थे। इनमें तीन नेता प्रमुख हैं: बंगाल के विपिनचंद्र पाल, पंजाब के लाला लाजपतराय और महाराष्ट्र के लोकमान्य बालगङ्गाधर तिलक। इन्हें ‘लाल-बाल-पाल’ के नाम से जाना जाता है। इन तीनों नेताओं ने बंगाल के विभाजन के खिलाफ़ पूरे देश में तीव्र आन्दोलन चलाया। काँग्रेस के भीतर भी इन्होने माँग उठाई कि स्वराज्य और स्वदेशी को काँग्रेस का लक्ष्य घोषित किया जाए। १९०५ में बनारस में काँग्रेस के अधिवेशन में भी जोर-शोर से यह माँग उठी। इसी अधिवेशन में विदेशी वस्तुओं के बहिष्कार का प्रस्ताव भी पारित हुआ।

लेकिन इसी अधिवेशन से काँग्रेस में विभाजन की शुरुआत भी हुई। लाला लाजपतराय और लोकमान्य तिलक की माँग थी कि बंगाल के विभाजन के विरोध में काँग्रेस को प्रिंस ऑफ़ वेल्स के बहिष्कार की घोषणा करनी चाहिए। लेकिन नरम दल के लोग इस तरह के किसी भी विरोध से असहमत थे।

इसी दौरान भारत की राजनीति में श्री अरविन्द घोष का भी पदार्पण हुआ। उनका जन्म बंगाल में ही हुआ था, लेकिन बचपन से ही उनकी सारी शिक्षा-दीक्षा अंग्रेज़ी भाषा और अंग्रेज़ी माहौल में हुई थी। उच्च-शिक्षा के लिए वे इंग्लैण्ड चले गए और कैम्ब्रिज के किंग्स कॉलेज में अपनी पढ़ाई पूरी की। आईसीएस की परीक्षा में भी उन्होंने २५० छात्रों के बीच ११ वां स्थान प्राप्त किया था, लेकिन इसमें उनकी रुचि नहीं थी, इसलिए उन्होंने १८९३ में भारत लौटने पर उन्होंने बड़ौदा रियासत में नौकरी का प्रस्ताव स्वीकार कर लिया। अगले तेरह वर्षों तक वे बड़ौदा रियासत में विभिन्न पदों पर रहे। बंगाल विभाजन के बाद सन १९०६ में वे कलकत्ता लौट गए और धीरे-धीरे वे राजनैतिक व सामाजिक गतिविधियों में अधिक सक्रिय होने लगे। उन्होंने अंग्रेज़ों के विरुद्ध उग्र आन्दोलन करने की ‘लाल-बाल-पाल’ की नीति का खुलकर समर्थन किया।

इसी माहौल में सन १९०६ में काँग्रेस का अधिवेशन कलकत्ता में हुआ। ‘नरम दल’ के नेता अब स्पष्ट रूप से समझने लगे थे कि जनता उनकी कमज़ोर नीतियों को पसंद नहीं करती है और लोगों का पूरा समर्थन तिलक जी के नेतृत्व वाले ‘गरम दल’ के पक्ष में है। वे यह भी समझ गए थे कि उनकी याचिकाओं और प्रार्थना पत्रों का ब्रिटिशों पर कोई असर नहीं होने वाला है। लेकिन इसके बावजूद भी वे काँग्रेस पर अपना नियंत्रण बनाए रखने के प्रयासों में लगे रहे।

१९०६ के अधिवेशन में नरम दल वालों को डर था कि दूसरे गुट के नेता इस अधिवेशन पर हावी न हो जाएँ। इसलिए उन्होंने दादाभाई नौरोजी का नाम अध्यक्ष पद के लिए प्रस्तावित किया। दादाभाई बहुत वरिष्ठ नेता थे और दोनों गुटों के लोग उनका सम्मान करते थे। इसलिए उनके नाम का विरोध किसी ने नहीं किया।

लेकिन गरम दल के लोग फिर भी इस अधिवेशन में हावी रहे। उन्होंने चार विषयों के लिए प्रस्ताव पारित करवा लिये। ये विषय थे – बंगाल के विभाजन का विरोध, स्वराज्य की माँग, स्वदेशी का समर्थन, और विदेशी सामान के बहिष्कार की अपील।

नरम दल वालों को यह डर भी था कि अगर उन्होंने ऐसी बातों का समर्थन किया, तो ब्रिटिश सरकार की नाराज़गी उन्हें भी झेलनी पड़ेगी। इसलिए उन्होंने गोल-मोल बातें करने की नीति जारी रखी। इन प्रस्तावों के मामले में भी उन्होंने ‘स्वराज’ वाले प्रस्ताव में थोड़ा-सा बदलाव करके यह लाइन जोड़ दी कि ‘स्वराज का मतलब है ब्रिटिश शासन के अधीन रहते हुए ही स्वशासन का अधिकार’!

स्वाभाविक रूप से गरम दल वालों को ऐसा लगा कि उनके साथ धोखा हुआ है। अब काँग्रेस में टूट अटल थी। लेकिन काँग्रेस टूटी कैसे? यह अगले भाग में पता चलेगा!

Comments

comments

One thought on “बंगाल का विभाजन (काँग्रेस कथा – ३)”

प्रातिक्रिया दे

आपका ईमेल पता प्रकाशित नहीं किया जाएगा.