काँग्रेस का विभाजन (काँग्रेस कथा – ४)

सन १८८५ में काँग्रेस की स्थापना के समय से ही इसका नियंत्रण नरम दल वाले नेताओं के हाथों में रहा था। लेकिन १९०५ में बंग-भंग की घोषणा (बंगाल का विभाजन) हुई और नरम दल वालों की सभी याचिकाओं और आवेदनों को अंग्रेज़ों ने कूड़े में दाल दिया, तब यह बात उनकी समझ में आई कि अंग्रेज़ों के आगे गिडगिडाने से कुछ हासिल होने वाला नहीं है। ये नेता आम जनता से भी दूर रहते थे, और न लोगों की समस्याओं को ठीक से समझते थे, इसलिए इन्हें कोई ख़ास जन-समर्थन भी हासिल नहीं था।

दूसरी ओर गरम दल वाले नेता अंग्रेज़ों से संघर्ष करने के पक्षधर थे और बंग-भंग के समय उनकी अपील पर स्वदेशी, स्वराज्य और बहिष्कार का जो तीव्र आन्दोलन पूरे बंगाल में चला था, उससे यह स्पष्ट हो गया था कि जनता उन्हीं के साथ खड़ी है। वे लोग इस आन्दोलन को पूरे देश में फ़ैलाना चाहते थे और हर स्तर पर अंग्रेज़ों का विरोध व बहिष्कार करना चाहते थे।

लेकिन नरम दल के नेता अभी भी इससे सहमत नहीं थे। इसलिए वे किसी न किसी तरह इसमें रोड़े अटकाने में लगे रहते थे। दुर्भाग्य से, अब साथ मिलकर अंग्रेज़ों से लड़ने की बजाय एक-दूसरे से लड़ना ही इन दोनों समूहों का मुख्य लक्ष्य बनता जा रहा था।

१९०६ में कलकत्ता के अधिवेशन में जब अध्यक्ष पद को लेकर विवाद हुआ, तो नरम दल वालों ने दादाभाई नौरोजी का नाम अध्यक्ष-पद के लिए प्रस्तावित करके गरम दल वालों को निरुत्तर कर दिया। दादाभाई बहुत वरिष्ठ नेता थे और सब उनका सम्मान करते थे, इसलिए उनके नाम का विरोध कोई नहीं कर पाया। बाद में, इसी अधिवेशन में गरम दल वालों ने अपनी बात मनवाकर चार प्रस्ताव तो पारित करवा लिए, लेकिन नरम दल वालों ने स्वराज्य वाले प्रस्ताव की भाषा में कर ही दिया और इससे गरम दल वालों की नाराज़गी और बढ़ गई।

अगले वर्ष १९०७ का अधिवेशन नागपुर में होना तय हुआ था। नागपुर उस समय मध्य-प्रांत में था। उस क्षेत्र में तिलक जी का बहुत प्रभाव भी था। नरम दल के नेता गोपाल कृष्ण गोखले को यह भय था कि अगर अधिवेशन नागपुर में हुआ, तो तिलक जी इसके अध्यक्ष चुन लिए जाएँगे और गरम दल वालों का दबदबा बढ़ जाएगा। इसलिए उन्होंने एक चाल चली।

अधिवेशन का स्थान बदलकर सूरत कर दिया गया!

सूरत के अधिवेशन में लोकमान्य तिलक और अरविन्द घोष

पुणे के साथ ही सूरत भी उस समय बॉम्बे प्रेसिडेंसी का हिस्सा था। तिलक जी भी इसी प्रदेश से थे। चूँकि अधिवेशन अब उन्हीं के राज्य में हो रहा था, इसलिए नियमानुसार वे अध्यक्ष नहीं बन सकते थे। इस तरह गोखले जी ने तिलक जी को रोक दिया।

अब तिलक जी ने अध्यक्ष पद के लिए लाला लाजपत राय का नाम प्रस्तावित किया। नरम दल वालों ने लाला लाजपत राय का नाम आगे बढ़ाया। लाला लाजपत राय ने अपना नाम वापस ले लिया। इस तरह फिर एक बार नरम दल वाले अपना अध्यक्ष चुनने में सफल हो गए।

इस अधिवेशन की शुरुआत बहुत तनाव और क्रोध के माहौल में हुई थी। पहले सत्र से ही शोर-शराबा शुरू हो गया। तिलक जी ने कुछ कहने की अनुमति माँगी, लेकिन अध्यक्ष महोदय बार-बार उनकी माँग को अस्वीकार करते रहे।

इसी बीच किसी ने मंच की तरफ जूता उछाल दिया, जो नरम दल के नेता फिरोजशाह मेहता को लगा। इसके बाद तो वहाँ हंगामा मच गया। हाथापाई होने लगी, लोग कुर्सियां उठाकर एक-दूसरे पर मारने लगे। अंततः पुलिस ने बलप्रयोग करके सभा स्थल को खाली करवा दिया। अगले दिन भी लगभग यही हाल रहा और कोई चर्चा नहीं हो सकी।

तिलक जी और गोखले, दोनों के विचारों में भारी मतभेद होते हुए भी दोनों ही इस बात से चिंतित थे कि काँग्रेस में इस तरह राष्ट्रीय आन्दोलन में फूट नहीं पड़नी चाहिए। इस बात को समझने के कारण तिलक जी ने अपने व्यक्तिगत अपमान को भुलाकर समझौते का प्रस्ताव दिया। लेकिन फिरोजशाह मेहता आदि नेताओं ने उसे ठुकरा दिया। अरविन्द घोष और विपिनचंद्र पाल जैसे नेता तिलक जी के पक्ष में खड़े थे।

अंततः गरम दल वालों ने सभा स्थल पर ही अपना अलग सम्मेलन आयोजित किया और नरम दल वालों ने अपना सम्मेलन बुलाया।

इस तरह सूरत के अधिवेशन में काँग्रेस दो टुकड़ों में बंट गई। यह दिसंबर १९०७ की बात थी।

अब काँग्रेस का नियंत्रण फिर एक बार पूरी तरह से नरम दल वालों के हाथों में आ चुका था। १९०८ में नरम दल वालों ने काँग्रेस का नया संविधान तैयार किया और गरम दल वालों को काँग्रेस से प्रतिबंधित कर दिया गया।

काँग्रेस के इस झगड़े में दोनों ही पक्षों का नुकसान हुआ, लेकिन इससे ब्रिटिश सरकार को सीधा लाभ मिला। अंग्रेज़ों ने काँग्रेस के गरम दल वाले नेताओं के खिलाफ़ दमन की कार्यवाही शुरू कर दी। १९०८ में ब्रिटिश सरकार ने एक प्रेस एक्ट लागू किया, जिसके अनुसार सरकार के खिलाफ़ अखबारों में कुछ भी लिखना राजद्रोह माना गया।

इसी क़ानून के अंतर्गत सरकार ने लोकमान्य तिलक को गिरफ़्तार करके उन पर राजद्रोह का मुकदमा चलाया।

दरअसल १९०८ में बंगाल के दो क्रान्तिक्रारियों, प्रफुल्लचन्द्र चाकी और खुदीराम बोस ने ब्रिटिश मजिस्ट्रेट किंग्सफ़ोर्ड की बग्घी पर बम फेंका था। तिलक जी ने अपने अखबार में उनके समर्थन में लेख लिखा था। इसी के आधार पर उन्हें ६ वर्षों की सज़ा सुनाकर बर्मा के मंडाले जेल में भेज दिया गया।

इसी मामले में ब्रिटिश सरकार ने अरविन्द घोष को भी इस हमले की साज़िश रचने के आरोप में गिरफ्तार किया। एक वर्ष तक उन्हें अलीपुर जेल में रखा गया। लेकिन मामले के मुख्य गवाह की मौत हो जाने के कारण आरोप साबित नहीं हो सके और सरकार को १९०९ में उन्हें छोड़ना पड़ा।

जेल की काल-कोठरी में एकांतवास के दौरान श्री अरविन्द का झुकाव अध्यात्म की ओर बढ़ता गया। वे योग और अध्यात्म से तो बड़ौदा के दिनों से ही सक्रियता से जुड़ गए थे, लेकिन बाद में उन्होंने बताया  कि अलीपुर जेल में उन्हें ऐसे दिव्य अनुभव हुए और उसके बाद उनके जीवन की दिशा पूरी तरह बदल गई।

जेल से छूटने के बाद वे राजनीति से दूर होते गए और १९१० में वे कुछ समय के लिए भूमिगत होकर रहे। ब्रिटिश सरकार ने उन्हें फंसाने के लिए एक नया मुकदमा ढूँढ लिया था और उनके नाम वारंट भी जारी कर दिया गया था। वे छिपते-छिपाते चुपचाप दक्षिण भारत में पांडिचेरी चले गए। पांडिचेरी उस समय फ्रेंच शासन के अधीन था, इसलिए अंग्रेज़ उन्हें यहाँ गिरफ्तार नहीं कर सकते थे। अंततः वारंट रद्द कर दिया गया, लेकिन अगले कई वर्षों तक ब्रिटिश सरकार के जासूस उन पर निगरानी करते रहे।

पांडिचेरी आने के बाद से महर्षि अरविन्द राजनीति से पूरी तरह अलग हो गए और अपना पूरा समय वे अध्यात्म, ध्यान और साधना में लगाने लगे। इसके बाद अपना शेष जीवन उन्होंने यहीं बिताया। अंततः दिसंबर १९५० में पांडिचेरी में ही उन्होंने अंतिम साँस ली।

इधर विपिनचंद्र पाल भी राजनीति से अलग हो गए। १९१५ में गोपाल कृष्ण गोखले की भी मृत्यु हो गई। उसी वर्ष फिरोजशाह मेहता की भी मौत हुई। १९१७ में दादाभाई नौरोजी चल बसे।

लाला लाजपत राय कुछ वर्षों के लिए अमरीका चले गए और वहाँ उन्होंने भारत की स्वतंत्रता के पक्ष में माहौल बनाने के प्रयास जारी रखे। १९१९ में वे भारत लौटे और १९२० में काँग्रेस के एक विशेष अधिवेशन की उन्होंने अध्यक्षता भी की। १९२१ से १९२३ तक सरकार ने उन्हें असहयोग आन्दोलन के कारण बंदी बनाकर रखा।

१९२८ में साइमन कमीशन के विरोध में हुए आन्दोलन के दौरान पुलिस के बर्बर लाठीचार्ज में वे घायल हो गए थे, जिसके परिणामस्वरूप १७ नवंबर १९२८ को लाहौर में उनकी मृत्यु हो गई। भगत सिंह और राजगुरु ने उन्हीं की हत्या का बदला लेने के लिए ब्रिटिश पुलिस अधिकारी जेम्स स्कॉट को मारने की योजना बनाई थी, लेकिन उसे पहचानने में हुई गलती के कारण गोली जॉन सॉण्डर्स को मार दी गई।

१९०७ में हुए विभाजन के बाद से अगले कुछ वर्षों तक काँग्रेस लगभग निष्प्रभावी हो गई थी। गरम दल के अधिकतर नेताओं को ब्रिटिश सरकार ने जेलों में डाल दिया था या निष्कासित कर दिया था। कुछ राजनीति से अलग हो गए। नरम दल वालों के साथ जनता कभी नहीं थी, इसलिए वे भी कुछ विशेष नहीं कर पाए। १९१४ में तिलक जी मंडाले जेल से छूटकर बाहर आए, और उसके बाद फिर एक बार काँग्रेस में सक्रियता की शुरुआत हुई।

इसके आगे की बात मैं अगले भाग में करूँगा।

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