कॉमनवेल्थ: गुलामी की निशानी

कॉमनवेल्थ के सदस्य देश
(चित्र: विकिपीडिया से)

सोलहवीं शताब्दी से ब्रिटेन ने दुनिया भर के देशों पर कब्जा करना और उन्हें गुलाम बनाना शुरू किया। इन देशों को ब्रिटिश कॉलोनियां या उपनिवेश कहा गया। इन देशों का शासन पूरी तरह ब्रिटिश सरकार के अधीन था। भारत भी इनमें से एक था।

उन्नीसवीं शताब्दी में इन देशों को स्वतंत्रता या स्वायत्तता मिलना शुरू हुई। सन १८६७ में कनाडा को डोमिनियन का दर्जा मिला। इसका मतलब ये था कि अब कनाडा का शासन ब्रिटिश सरकार नहीं, बल्कि कनाडा के लोग ही चलाएंगे। लेकिन, कनाडा पूरी तरह स्वतंत्र नहीं हुआ था। डोमिनियन होने का मतलब था कि अभी भी ब्रिटेन की रानी को ही अपना सर्वोच्च नेता और राष्ट्र-प्रमुख मानेगा। कनाडा के बाद अगले कुछ वर्षों में ऑस्ट्रेलिया (१९००), न्यूज़ीलैंड (१९०७), दक्षिण अफ्रीका (१९१०) और आइरिश फ्री स्टेट (१९२१) भी डोमिनियन बने।

ब्रिटिश राज के अधीन रहे जिन देशों को स्वशासन या डोमिनियन का दर्जा मिल गया था, उनके नेता जब विशेष अवसरों पर लंदन जाते थे, तब कभी-कभार उनका सम्मेलन आयोजित किया जाता था, जिसे कॉलोनियल कांफ्रेंस कहते थे। इसकी शुरुआत सन १८८७ में हुई। आगे १९०७ में इसका नाम बदलकर “इम्पीरियल कांफ्रेंस” कर दिया गया।

सन १९२६ की इम्पीरियल कांफ्रेंस में एक महत्वपूर्ण घोषणा हुई। इसे “बेल्फोर डिक्लेरेशन” कहा जाता है। ब्रिटेन ने आधिकारिक रूप से यह घोषित किया कि ‘ये सभी देश ब्रिटिश साम्राज्य के अधीन स्वायत्त देश होंगे, उन सभी का दर्जा आपस में बराबरी का होगा, लेकिन वे सभी ब्रिटिश क्राउन (अर्थात ब्रिटिश सम्राट या रानी) के प्रति वफ़ादार रहेंगे’। इन सभी देशों के समूह के लिए इसी कांफ्रेंस में पहली बार “कॉमनवेल्थ” शब्द का उपयोग भी हुआ।

इस समय तक इन देशों में नियुक्त गवर्नर जनरल ही ब्रिटिश क्राउन के प्रतिनिधि होते थे। लेकिन अब हाई कमिश्नर का पद बनाया गया। हाई कमिश्नर का पद वास्तव में राजदूत जैसा ही है, लेकिन इस शब्द का उपयोग केवल कॉमनवेल्थ देशों में ही किया जाता है।

कृपया ध्यान रखें कि इन सब चर्चाओं और बदलावों में अभी तक भारत की कोई भूमिका नहीं थी क्योंकि भारत तब ब्रिटेन का गुलाम था, डोमिनियन नहीं। भारत १९४७ में डोमिनियन बना।

हमने इतिहास में पढ़ा है कि १९४७ में भारत आज़ाद हो गया। लेकिन वास्तव में भारत तब केवल एक डोमिनियन बना था, जिसका अर्थ यह था कि अब भारत के लोग ही यहाँ की सरकार चलाएंगे, लेकिन ब्रिटेन की रानी ही हमारी राष्ट्र-प्रमुख रहेगी और भारत की सरकार उसी के आदेश पर काम करेगी। इसी को “ट्रांसफर ऑफ पॉवर” या “सत्ता का हस्तांतरण” कहते हैं। यह स्थिति १९५० में बदली, जब भारत का अपना संविधान लागू हुआ और भारत एक गणतंत्र बना। इसी के साथ भारत में गवर्नर जनरल का पद भी समाप्त हो गया।

भारत की स्थिति अन्य देशों की तुलना में थोड़ी अलग थी। कनाडा, ऑस्ट्रेलिया आदि देशों में ज्यादातर जनसंख्या ब्रिटिश मूल के लोगों की थी। सत्ता भी उन्हीं लोगों के हाथों में थी। इस कारण उन्हें ब्रिटेन की रानी को अपना राष्ट्र-प्रमुख मानने में कोई आपत्ति नहीं थी। आज भी इन देशों में राष्ट्रपति पद नहीं है, बल्कि ब्रिटेन की रानी ही इनकी मुखिया है। लेकिन भारत की आज़ादी के समय यह पहली बार हो रहा था कि शासन उसी देश के मूल नागरिकों के हाथों में आ गया और भारत की संविधान सभा ने अब ब्रिटेन की रानी को अपना राष्ट्र-प्रमुख मानने से भी इनकार कर दिया।

सन १९४९ में कॉमनवेल्थ देशों के प्रधानमंत्रियों की नियमित बैठक हुई, जिसमें नेहरुजी भी शामिल थे। वहाँ नेहरुजी ने कॉमनवेल्थ संगठन को बताया कि भारत एक गणतंत्र बनने के बाद भी कॉमनवेल्थ का सदस्य बना रहना चाहता था।

इससे कॉमनवेल्थ में एक नई स्थिति उत्पन्न हो गई, जो पहले कभी नहीं बनी थी। ऐसा इसलिए क्योंकि कॉमनवेल्थ संगठन केवल ऐसे ही देशों के लिए था, जो ब्रिटेन की रानी को अपना मुखिया स्वीकार करते थे। अब उस बैठक में चर्चा के बाद सभी देश इस बात पर सहमत हुए कि ब्रिटेन की रानी को अपना राष्ट्र-प्रमुख न मानने वाले देश भी कॉमनवेल्थ के सदस्य हो सकते हैं, लेकिन शर्त यह थी कि वे पहले कभी ब्रिटेन के गुलाम रहे हों और कॉमनवेल्थ के सभी देशों को जोड़ने वाली साझा कड़ी के रूप में ब्रिटिश क्राउन को कॉमनवेल्थ का मुखिया स्वीकार करते हों। सीधी भाषा में इसका अर्थ ये है कि आपको ब्रिटेन की गुलामी पर गर्व हो और आप ब्रिटेन की रानी को आज भी अपना मुखिया मानते हों।

भारत ने यह शर्त स्वीकार की और इस तरह एक गणतंत्र होते हुए भी भारत कॉमनवेल्थ का सदस्य बना रहा। आगे कई अन्य देश भी इसी आधार पर कॉमनवेल्थ के सदस्य बने।

लेकिन ब्रिटेन से आज़ादी मिलने के बाद कई देशों ने कॉमनवेल्थ में शामिल होने से इनकार कर दिया। बर्मा भी १९४७ में आज़ाद हुआ और उसने कॉमनवेल्थ में शामिल होने से इनकार कर दिया। मध्यपूर्व के देशों ने भी इसमें शामिल नहीं होने का फैसला किया। आयरलैंड ने १९४९ में कॉमनवेल्थ की सदस्यता छोड़ दी। १९७२ में पाकिस्तान को तोड़कर बांग्लादेश बना और कई देशों ने इस नए देश को मान्यता दे दी, जिसके विरोध में पाकिस्तान भी कॉमनवेल्थ से बाहर निकल गया, हालांकि १९८९ में वह फिर इसमें शामिल हुआ। इसी तरह मालदीव भी स्वतंत्रता के कई वर्षों बाद तक कॉमनवेल्थ में शामिल नहीं हुआ। कुछ अन्य देश विभिन्न कारणों से इसमें आते-जाते रहे।

कॉमनवेल्थ की संरचना और कार्यप्रणाली में आगे की बदलाव हुए। लेकिन कुछ चीज़ें वैसी ही बनी रहीं। उदाहरण के लिए ब्रिटिश क्राउन ही कॉमनवेल्थ का अध्यक्ष होता है। फिलहाल ब्रिटेन की रानी इसकी अध्यक्ष है, जो आजीवन इस पद पर रहेगी। कॉमनवेल्थ में इतने सारे देश हैं, जिनकी इतनी सारी भाषाएँ हैं, लेकिन कॉमनवेल्थ की एकमात्र आधिकारिक भाषा का दर्जा केवल ब्रिटेन की राष्ट्रभाषा अंग्रेज़ी को ही प्राप्त है और कॉमनवेल्थ का सारा कामकाज केवल अंग्रेज़ी में ही होता है। यहाँ तक संयुक्त राष्ट्र संघ में भी सदस्य देश अपनी भाषाओं में अपनी बात कह सकते हैं, लेकिन कॉमनवेल्थ में नहीं।

दुनिया में विभिन्न देशों के कई सारे क्षेत्रीय और अंतरराष्ट्रीय संगठन हैं, लेकिन शायद कॉमनवेल्थ ही ऐसा इकलौता संगठन है, जो गुलामी के आधार पर देशों को सदस्यता देता है। केवल एक अपवाद को छोड़कर इसके सारे सदस्य केवल वही देश हैं, जो ब्रिटेन के गुलाम रहे और यह कॉमनवेल्थ में शामिल होने की सबसे बड़ी शर्त है। दुनिया के अन्य देशों में हमारे देश का प्रतिनिधि राजदूत कहलाता है और उसके कार्यालय को दूतावास कहते हैं, लेकिन कॉमनवेल्थ देशों में नहीं। इन देशों में वह हाई कमिश्नर और उसका कार्यालय हाई कमीशन कहलाता है।

यह अंतर क्यों है? अगर कॉमनवेल्थ के सभी देश बराबर हैं, तो केवल ब्रिटेन की ही भाषा क्यों कॉमनवेल्थ की आधिकारिक भाषा है? क्यों केवल ब्रिटेन का शासक ही कॉमनवेल्थ का अध्यक्ष हो सकता है? ये सारी बातें मुझे मंज़ूर नहीं हैं।

इन सभी कारणों से मैं कॉमनवेल्थ को केवल गुलामी का प्रतीक मानता हूँ। चार सालों में एक बार होने केलय कॉमनवेल्थ खेलों में हासिल होने वाले कुछ पदकों के अलावा इससे भारत को कुछ नहीं मिलता है। न इन देशों में व्यापार करने के लिए कोई अतिरिक्त सुविधा मिलती है, न इन देशों में जाने वाले भारतीयों को वीज़ा पाने में कोई छूट मिलती है और न अन्य किसी तरह का कोई लाभ मिलता है। अगर किसी देश में कुछ विशेष दर्जा मिलता भी हो, तो वह भारत और उस देश के आपसी संबंधों के कारण मिलता है, कॉमनवेल्थ के कारण नहीं। तो हम गुलामी के इस प्रतीक को क्यों गर्व से अपने सिर पर ढो रहे हैं?

एक तरफ भारत विश्व-शक्ति बनने की बात करता है, दुनिया के देशों का नेतृत्व करने की आकांक्षा रखता है और दूसरी तरफ ब्रिटिश गुलामी का तमगा अपने सीने पर लगाकर घूमता है, यह बड़ी विचित्र बात लगती है। जब हम ही इस तरह किसी दूसरे देश के पिछलग्गू बनकर घूमते हों, तो कोई अन्य देश किस आधार पर हमारा नेतृत्व स्वीकार करेगा? गुलाम को कौन अपना नेता बनाना चाहेगा?

भारत के लिए अपना सम्मान, स्वाभिमान और अपना हित सबसे ऊपर होना चाहिए। अगर कॉमनवेल्थ की सदस्यता से हमें इनमें से कुछ भी नहीं मिल रहा है, तो कॉमनवेल्थ से हमको बाहर निकल जाना चाहिए। मुझे अचरज है कि जिस संगठन को तोड़ने और ब्रिटेन की शक्ति को कम करने में भूमिका निभाने की बजाय भारत इसे मज़बूत करने में योगदान दे रहा है।

मुझे आशा है कि कभी तो वह दिन आएगा, जब भारत स्वयं को कॉमनवेल्थ से अलग कर लेगा। आपको क्या लगता है? कृपया नीचे कमेन्ट में अपनी राय अवश्य बताइये।

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