आपातकाल की यादें – भाग -२ (अरुण जेटली)

आपातकाल के अत्याचार
२६ जून १९७५ को आपातकाल लगाते ही श्रीमती इंदिरा गांधी ने धारा ३५९ के तहत नागरिकों के मौलिक अधिकार निलंबित करने का आदेश जारी कर दिया। इसके परिणामस्वरूप अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और व्यक्तिगत स्वतंत्रता दोनों पर पाबंदी लगा दी गई। केवल सेंसर की अनुमति से प्रकाशित समाचार ही उपलब्ध थे। २९ तारीख को इंदिरा जी ने भारतीय अर्थव्यवस्था में सुधार के नाम पर बीस-सूत्रीय कार्यक्रम की घोषणा की, हालांकि वास्तव में इसका उद्देश्य इस बात से ध्यान हटाना था कि भारत में लोकतंत्र को खत्म कर दिया गया है। इन बीस बिन्दुओं में कई तो वास्तव में प्रतिगामी आर्थिक उपाय थे, जिन्हें १९९१ के आर्थिक सुधारों के बाद रद्द करना पड़ा। पूरे देश में हज़ारों राजनैतिक कार्यकर्ताओं, पत्रकारों और विद्वानों को नज़रबंद कर दिया गया। जेलों में क्षमता से अधिक लोग ठूंस दिए गए थे। जेलों की हालत वाकई भयानक थी।

मुझे एक हफ़्ते के लिए दिल्ली की तिहाड़ जेल में रखा गया था। उसके बाद, २० अन्य नज़रबंदियों के साथ मुझे अंबाला सेन्ट्रल जेल भेज दिया गया। नज़रबंदी के नियमों की शर्तों के अनुसार, हमें प्रतिदिन का राशन आवंटित किया जाता था और उसी में हमें दिन-भर के सारे खानपान की व्यवस्था करनी पड़ती थी। हर व्यक्ति के दिन-भर के भोजन के लिए तीन रूपये का बजट मिलता था। इस तरह अगर एक वार्ड में बीस बंदी हों, तो उन बीस लोगों की सुबह की चाय, नाश्ता, लंच, शाम की चाय और डिनर का पूरा खर्च केवल साठ रुपयों में पूरा करना पड़ता था। कई महीनों के आन्दोलन के बाद, यह राशि बढ़ाकर ५ रूपये प्रति व्यक्ति की गई। शुरुआती कुछ महीनों के दौरान, परिवार के सदस्य महीने में एक बार आकर कुछ मिनटों के लिए बंदियों से मिल सकते थे, बाद में इसे बढ़ाकर प्रति सप्ताह एक बार कर दिया गया। मैं उस समय क़ानून का छात्र था और मेरी फाइनल परीक्षा बाकी थी। कई कैदियों ने अपनी गिरफ़्तारी को चुनौती देने वाली याचिकाएँ दायर की थीं। मैंने भी ऐसी ही एक याचिका दायर की। बाद में मैंने कई बार अदालत से यह अनुरोध भी किया कि मुझे जेल से ही अपनी आखिरी साल की परीक्षा देने की अनुमति दी जाए, लेकिन दिल्ली विश्विद्यालय से कहकर यह नियम लागू करवा दिया गया कि परीक्षा देने के लिए परीक्षा केंद्र में स्वयं आना अनिवार्य होगा। तब मैंने अनुरोध किया कि मुझे पुलिस की निगरानी में परीक्षा केंद्र ले जाया जाए, लेकिन सरकार ने यह कहकर उसे ठुकरा दिया कि परीक्षा केंद्र में मेरी उपस्थिति से व्यवस्था बिगड़ने का खतरा था। उन्नीस महीनों की उस नज़रबंदी के दौरान मैंने अपनी पढ़ाई का एक साल गँवा दिया और दूसरा साल भी गंवाने का खतरा महसूस हो रहा था। लेकिन इस याचिका के कारण मुझे अंबाला से वापस तिहाड़ जेल में भेज दिया गया।

जेल से बाहर पूरे देश में भय और आतंक का माहौल छाया हुआ था। राजनैतिक गतिविधि पूरी तरह ठप हो चुकी थी। आपातकाल का विरोध करने वाले अधिकाँश लोग विपक्षी दलों के राजनैतिक कार्यकर्ता और संघ के स्वयंसेवक थे। उन्होंने लगातार सत्याग्रह करना जारी रखा, जिनमें कई लोग गिरफ़्तारी देते थे। शिरोमणि अकाल दल को भी इस बात का श्रेय दिया जाना चाहिए कि पूरे आपातकाल के दौरान उसने स्वर्ण मंदिर के बाहर रोज़ अपने सत्याग्रही भेजे और गिरफ्तारियां दी। इसके कारण पूरे देश में अकाली दल को बहुत आदर मिला। आपातकाल में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ पर भी अन्यायपूर्वक प्रतिबंध लगा दिया गया था, और संघ ने भी बड़ी संख्या में अपने स्वयंसेवकों को सत्याग्रह के लिए भेजा।

प्रेस पूरी तरह दहशत में थी। अधिकतर संपादकों और पत्रकारों ने घुटने टेक दिए थे और तानाशाही में जीने का विचार स्वीकार कर लिया था। काँग्रेस पार्टी के अखबार “नेशनल ” ने अपने संपादकीय में लिखा कि अब वह समय आ गया है, जब भारत को एकदलीय लोकतंत्र स्वीकार कर लेना चाहिए। स्वयं श्रीमती गांधी ने भी कहा कि भारतीय लोकतंत्र को अब परिपक्व होकर एक “अनुशासित लोकतंत्र” में बदल जाना चाहिए। आपातकाल को सही ठहराने के प्रयास में आचार्य विनोबा भावे ने इसे “अनुशासन पर्व” की संज्ञा देकर वास्तव में अपनी ही विश्वसनीयता गँवा दी। हालांकि, मीडिया में भी असहमति के कुछ स्वर अवश्य उभरे थे। द इन्डियन एक्सप्रेस और द स्टेट्समेन ने इसमें बड़ी भूमिका निभाई। रामनाथ गोयनका, सी.आर. ईरानी और संपादक कुलदीप नैय्यर आपातकाल के दौरान प्रेस की स्वतंत्रता के प्रतीक बन गए।

क्या आपातकाल की पटकथा पहले ही लिखी जा चुकी थी?
आपातकाल के बारे में पत्रकार कूमी कपूर की सन २०१५ में प्रकाशित पुस्तक में सिद्धार्थ शंकर रे का एक हस्तलिखित दस्तावेज़ है, जिसमें उन्होंने श्रीमती इंदिरा गांधी से उन लोगों की सूची का अनुरोध किया था, जिन्हें गिरफ़्तार कर लिया जाना चाहिए और कुछ अन्य आवश्यक उपायों के बारे में भी लिखा था। उस दस्तावेज़ पर ८ जनवरी १९७५ की तारीख है।

यह भी रोचक है कि लगभग उसी दौरान जनवरी १९७५ में “मदरलैंड” नामक अखबार, जिसके संपादक के. आर. मलकानी थे, में पहले ही पन्ने पर जनसंघ के सांसद और ज्योतिष डॉ. वसंत कुमार पंडित का एक लेख प्रकाशित हुआ था, जिसमें उन्होंने आपातकाल, सभी विपक्षी सदस्यों की गिरफ़्तारी, मीडिया पर सेंसरशिप और भारत में तानाशाही शासन लागू हो जाने की भविष्यवाणी की थी। जब यह लेख प्रकाशित हुआ था, तब मैंने इस भविष्यवाणी को अविश्वसनीय मानकर ख़ारिज कर दिया था। आपातकाल के दौरान के. आर. मलकानी स्वयं भी मेरे साथ ही जेल में बंद थे। मलकानी जी ने मुझे बताया था कि उन्हें २६ जून की आधी रात को गिरफ़्तार किया गया था। उनके साथियों को तो सीधे रोहतक जेल ले जाया गया, लेकिन मलकानी जी को तीन दिनों तक हरियाणा के एक गेस्ट हाउस में रखा गया और उसके बाद उन्हें जेल भेजा गया। उन तीन दिनों के दौरान ख़ुफ़िया विभाग के लोगों ने उनसे इस बात को लेकर कड़ी पूछताछ की थी कि आपातकाल की भविष्यवाणी करने वाले उनके उस लेख का आधार क्या था। खुफ़िया एजेंसियों को शक था कि वास्तव में ऐसा सरकार में ही किसी मुखबिर के कारण हुआ था, इसलिए इस मामले की जाँच उस एंगल के की जा रही थी।

हालांकि मलकानी जी लगातार यही दोहराते रहे कि वह लेख केवल ज्योतिषीय अनुमान पर आधारित था। अंततः इन तथ्यों के कारण मुझे विश्वास हो गया कि आपातकाल की पटकथा जनवरी १९७५ में ही लिखी जा चुकी थी। हालांकि इलाहाबाद उच्च न्यायालय के निर्णय के कारण इंदिरा जी की कुर्सी ख़तरे में पड़ गई थी, जिसके चलते आपातकाल तुरंत लागू कर दिया गया।

क्या आपातकाल की स्क्रिप्ट १९३३ के नाज़ी जर्मनी के इतिहास से प्रेरित थी?
३० जनवरी १९३३ को हिटलर जर्मनी का चांसलर बना। उसके पास संसद में पूर्ण बहुमत तक नहीं था। २८ फरवरी को उसके कहने पर राष्ट्रपति ने धारा ४८ लागू कर दी, जिससे उसे “राज्य के नागरिकों की ” के लिए आपातकालीन शक्तियां प्राप्त हो गईं। ये शक्तियां प्रदान करने वाले आदेश के अनुसार व्यक्तिगत स्वतंत्रता, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, सभा करने का अधिकार, संगठन बनाने का अधिकार, निजता के उल्लंघन, घरों की तलाशी लेने आदि से संबंधित अधिकारों पर प्रतिबंध लग गए और संपत्ति व अन्य सभी अधिकारों को सीमित कर दिया गया। आपातकाल लगाने के लिए यह कारण बताया गया था कि २७ फ़रवरी को जर्मनी के संसद भवन “राइखस्टाग” में आग लग गई थी। हिटलर ने दावा किया कि यह सभी सरकारी इमारतों और संग्रहालयों को जला देने की वामपंथियों की साज़िश का हिस्सा था। तेरह वर्षों बाद न्यूरेमबर्ग के मुकदमों के दौरान यह खुलासा हुआ कि वास्तव में संसद भवन को जलाने की साज़िश नाज़ियों ने ही रची थी और यह गोएबल्स की योजना थी। हिटलर ने यह दोहराना जारी रखा कि उसके सभी काम संविधान के दायरे में ही हो रहे थे। श्रीमती इंदिरा गांधी ने भी धारा ३५२ के अंतर्गत आपातकाल लागू किया, धारा ३५९ के अंतर्गत मौलिक अधिकार निलंबित कर दिए और यह दावा किया कि “विपक्ष देश में अराजकता फैलाने की कोशिश कर रहा है”। सुरक्षा बालों से यह कहा गया था कि वे गैरकानूनी आदेशों को न मानें, और इस कारण देश के हित में यह आवश्यक था कि भारत को एक “अनुशासित ” बनाया जाए।

हिटलर हो या श्रीमती गांधी, दोनों ने ही संविधान को कभी निरस्त नहीं किया। लेकिन उन्होंने एक गणतांत्रिक संविधान का दुरुपयोग करके लोकतंत्र को तानाशाही में बदल दिया।

हिटलर ने अधिकतर विपक्षी सांसदों को गिरफ़्तार कर लिया था, और इस तरह संसद में अल्पमत वाली अपनी सरकार को दो-तिहाई बहुमत वाली सरकार में बदल लिया था। इसलिए उसने संविधान में अनेक संशोधन करके सभी शक्तियां एक ही व्यक्ति में निहित कर दीं। श्रीमती इंदिरा गांधी ने भी अधिकाँश विपक्षी सांसदों को गिरफ़्तार कर लिया और इस तरह उन्हें हटाने के बाद संसद में उपस्थित बचे सदस्यों का दो-तिहाई बहुमत हासिल कर लिया, जिसके आधार पर उन्होंने संविधान में बदलाव करके इसमें कई आपत्तिजनक संशोधन जोड़ दिए। बयालीसवें संशोधन के द्वारा समादेश याचिका (writ petition) जारी करने का उच्च न्यायालय का अधिकार समाप्त कर दिया गया, जबकि डॉ. आंबेडकर ने इसे संविधान की आत्मा करार दिया था। सरकार ने धारा ३६८ को भी संशोधित कर दिया, ताकि किसी भी संवैधानिक संशोधन को अदालतों में चुनौती न दी जा सके।

कुछ ऐसी बातें भी हैं, जो हिटलर ने नहीं की थीं, लेकिन इंदिरा जी ने की। उन्होंने संसद की कार्यवाही को मीडिया के लिए प्रकाशित करने पर रोक लगा दी। जिस क़ानून के द्वारा मीडिया को संसद की कार्यवाही प्रकाशित करने का अधिकार मिला था, वह फ़िरोज़ गांधी बिल के नाम से प्रसिद्ध है क्योंकि स्व. फ़िरोज़ गांधी ही वह अकेले व्यक्ति थे, जिन्होंने संसद में हरिदास मूंदड़ा विवाद उठाने के बाद उनके लिए आवाज़ उठाई थी। हिटलर के स्वयं के निर्वाचन का कोई मामला नहीं था, इसलिए उसने इस मामले में कोई बदलाव नहीं किए। श्रीमती गांधी ने संविधान और जनप्रतिनिधित्व क़ानून दोनों में ही बदलाव कर दिए। संविधान में संशोधन किया गया, ताकि प्रधानमंत्री का निर्वाचन अदालतों के अधिकार-क्षेत्र से बाहर हो जाए। जनप्रतिनिधित्व क़ानून में किए गए संशोधन को पुरानी तारीख से लागू किया गया, ताकि इन बदलावों के द्वारा श्रीमती गांधी के पिछले चुनाव को वैध ठहराया जा सके। हिटलर से भी आगे बढ़कर इंदिरा जी ने भारत को एक “वंशवादी लोकतंत्र” में बदल दिया था।

गोएबल्स का दावा था कि “जर्मन क्रान्ति की शुरुआत हो चुकी है”। सभी भारतीय राजदूतों और हाई कमिश्नरों से भी यह प्रचारित करने को कहा गया कि भारत में जो हो रहा है, वास्तव में वह भी किसी क्रांति से कम नहीं है। भारत में और जर्मनी में प्रेस की स्वतंत्रता पर लगाई गई सेंसरशिप लगभग एक समान थी। वास्तव में एक दलीय प्रणाली लागू की जा चुकी थी।

नाज़ी नेता जोआखिम रिबनट्रॉप, जो बाद में हिटलर का विदेश मंत्री बना, ने एक नई कानूनी प्रणाली की आवश्यकता की बात की थी। उसका तर्क था कि इसे प्रणाली को बदला जाना आवश्यक है क्योंकि “किसी भी अन्य आम आदमी के समान एडोल्फ हिटलर पर भी इसके तहत मुकदमा चलाया जा सकता है”। संविधान के ३९ वें संशोधन के द्वारा प्रधानमंत्री के निर्वाचन को चुनौती दिए जा सकने का विकल्प खत्म करके और प्रधानमंत्री पर मुकदमा चलाए जा सकने की व्यवस्था को ख़त्म करके वास्तव में इंदिरा जी ने उसी सुझाव को लागू कर दिया था। संविधान के ४२ वें संशोधन के द्वारा स्वर्ण सिंह समिति ने संविधान में अनेक बदलाव किए।

सर्वाधिक आपत्तिजनक बदलाव यह था कि संसद का कार्यकाल दो वर्ष बढ़ा दिया गया। संविधान के अनुसार लोकसभा का कार्यकाल पाँच वर्षों का होता है। लोकतंत्र में सबसे बड़ी शक्ति जनता की होती है, जिसके द्वारा लोकसभा को सीमित अधिकार दिए गए हैं। इसे अपनी अवधि को स्वयं ही बढ़ाने का अधिकार नहीं है। लेकिन फिर भी ऐसा किया गया। वास्तव में सन १९७१ से १९७७ तक लोकसभा छः वर्षों तक अस्तित्व में रही। बाद में जनता सरकार के द्वारा इस संशोधन को रद्द किया गया।

एक नाज़ी नेता ने घोषणा की थी कि “आज जर्मनी में केवल एक ही आदेश सर्वोपरी है और वह है हिटलर
का आदेश”। एआईसीसी के अध्यक्ष देवकांत बरुआ ने भी घोषणा की कि “इंदिरा ही इण्डिया है और इण्डिया ही इंदिरा है”। नज़रबंदी के दौरान जेपी ने एक पत्र में इंदिरा को लिखा था कि “स्वयं को राष्ट्र समझने की भूल मत करो। राष्ट्र अमर है, तुम नहीं”। नाज़ियों और आपातकाल की स्क्रिप्ट में सबसे अद्भुत समानता यह है कि इस बारे में आदेश जारी किए गए थे कि गेस्तापो के कार्यों की न्यायिक समीक्षा नहीं की जा सकती। गेस्तापो हिटलर का ख़ुफ़िया पुलिस विभाग था। जब नजरबंदियों ने उच्च न्यायालय में बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिकाएँ दायर कीं, तो सर्कार ने दलील दी थी कि जीवन और स्वतंत्रता का अधिकार केवल धारा २१ में प्रदत्त है। यदि धारा २१ निलंबित हो, तो जीवन या स्वतंत्रता का अधिकार स्वयं ही समाप्त हो जाता है। चाहे गैरकानूनी ढंग से ही किसी का जीवन या स्वतंत्रता क्यों न समाप्त कर दी जाए, किसी नागरिक को इस पर अपील करने का अधिकार नहीं है। लेकिन उच्च न्यायालयों ने नागरिकों के पक्ष में निर्णय दिया। जब सुप्रीम कोर्ट में भी यही दलील दी गई, तो जस्टिस एच. आर. खन्ना की खंडपीठ ने अटॉर्नी जनरल निरेन डे से पूछा कि अगर किसी व्यक्ति को जान से मारने की धमकी दी गई हो, तो उसे आपातकाल के दौरान न्याय माँगने का अधिकार है या नहीं? निरेन डे ने तुरंत जवाब दिया “मेरे जवाब से मेरी स्वयं की अंतरात्मा भी चकित है। इस जवाब से आपकी अंतरात्मा को भी अचरज होगा। लेकिन मेरी दलीलों का स्वाभाविक निष्कर्ष यही है कि क़ानूनन उस व्यक्ति को न्याय माँगने का कोई अधिकार नहीं है”। अपनी सेवानिवृत्ति के कई वर्षों बाद जस्टिस खन्ना ने मुझे बताया कि वह जवाब सुनकर उन्होंने इस उम्मीद में अपने अन्य चारों सहयोगी जजों की ओर देखा था कि शायद वे भी यह सुनकर चकित हुए होंगे। लेकिन जब वे सभी जज नज़रें चुराने लगे, तब जस्टिस खन्ना को अहसास हुआ कि वे लोग क्या फ़ैसला सुनाने वाले थे। अंततः सभी उच्च न्यायालयों द्वारा एकमत से सुनाए गए निर्णय को सुप्रीम कोर्ट ने पलट दिया और निरेन डे के तात्कालिक तर्क को स्वीकार कर लिया गया। केवल जस्टिस खन्ना ने ही इस पर असहमति जताई थी। अपनी इस असहमति के बाद जस्टिस खन्ना एक ‘लिविंग लेजेंड’ बन चुके थे। उन्होंने लिखा था कि उनकी यह असहमति क़ानून की विचारणीय दशा के विरुद्ध एक चुनौती है और उन्हें उम्मीद है कि जजों ने बहुमत से अपने फ़ैसले में जो गलती की है, उसे भावी पीढ़ियाँ सुधारने की बुद्धिमानी दिखाएंगी। बाद में इस गलती को जनता सरकार ने चौवालीसवें संशोधन के द्वारा विधायिका में सुधारा और धारा २१ को अपरिवर्तनीय बना दिया, लेकिन भावी पीढ़ियों की समझदारी के कारण अंततः सुप्रीम कोर्ट के वर्तमान न्यायाधीश धनंजय चंद्रचूड ने बहुमत के उस निर्णय को पलट दिया और इस तरह बंदी प्रत्यक्षीकरण के मामले में अपने ही पिता के निर्णय का ख़ारिज कर दिया।

चुनाव का मुकदमा
चुनाव का मुकदमा भी न्यायिक कुरूपता का एक और उदाहरण बन गया। संविधान और जनप्रतिनिधित्व क़ानून दोनों में ही पुरानी तारीख से बदलाव कर दिया गया था, ताकि श्रीमती गांधी के चुनाव को वैध ठहराया जा सके। लेकिन श्री शान्ति भूषण ने हार नहीं मानी। उन्होंने तर्क दिया कि एक स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव संविधान की मूल संरचना का भाग है और किसी अवैध चुनाव को वैध घोषित कर देना संविधान की मूल भावना का उल्लंघन होगा। लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने श्रीमती गांधी की मदद करने के लिए कानूनी उलझने पैदा कर दीं। संविधान की मूल भावना वाले तर्क का उपयोग केवल संविधान संशोधन के मामले में किया जा सकता था, आम क़ानून के मामले में नहीं। इसलिए उन्होंने संविधान के ३९ वें संशोधन को ख़ारिज कर दिया, लेकिन यह आदेश दिया कि सामान्य क़ानून को संविधान की मूल भावना की कसौटी पर नहीं कसा जा सकता। इसलिए जनप्रतिनिधित्व क़ानून में किए गए बदलाव श्रीमती गांधी पर लागू होंगे, और इसलिए पुरानी तारीख से लागू किए गए इस बदलाव के अनुसार उनका निर्वाचन वैध माना जाएगा। जो काम संसद दो-तिहाई बहुमत के बावजूद भी नहीं कर सकती थी, वह केवल सामान्य बहुमत के द्वारा किया जा सकता था। हालांकि बाद में क़ानून का यह प्रावधान भी बदला गया।

निरंकुश सत्ता निरंकुश रूप से भ्रष्ट भी बनाती है
अपनी निरंकुश सत्ता का उपयोग करते हुए सरकार ने प्रत्येक संस्थान पर अत्याचार किए। देश में किसी कब्रिस्तान जैसा सन्नाटा पसरा हुआ था। विरोध के स्वर केवल समर्पित विपक्षी कार्यकर्ताओं की ओर से ही सुनाई पड़ते थे। उच्च न्यायालय तो मज़बूती से डटे रहे, लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने घुटने टेक दिए। उच्च न्यायालय के चौदह स्वतंत्र जजों को अन्य उच्च न्यायालयों में स्थानांतरित कर दिया गया।

इंदिरा जी के छोटे बेटे संजय गांधी ने काँग्रेस पार्टी और युवक काँग्रेस की बागडोर अपने हाथों में ले ली थी। युवक काँग्रेस खुद ही अपने आप में क़ानून बन चुकी थी। इसकी कार्यशैली से समाज में दहशत थी। हिटलर ने पच्चीस-सूत्रीय आर्थिक कार्यक्रम की घोषणा की थी। इंदिरा जी ने बीस-सूत्रीय कार्यक्रम घोषित किया। इस अंतर को पूरा करने के लिए संजय गांधी ने भी अपने पंच-सूत्रीय आर्थिक और सामाजिक कार्यक्रम की घोषणा कर दी। असहमति अपराध और चापलूसी ही क़ानून बन चुकी थी। फिल्म अभिनेताओं और गायकों से युवक काँग्रेस और इसके सहयोगी संगठनों में शामिल होने को कहा गया। जिन्होंने मना किया, उन्हें सूचना-प्रसारण मंत्री विद्याचरण शुक्ल से धमकियां मिलने लगीं। प्रसिद्ध गायक किशोर कुमार को आकाशवाणी से प्रतिबंधित कर दिया गया और आकाशवाणी पर उनके गीतों का प्रसारण बंद कर दिया गया क्योंकि उन्होंने युवक काँग्रेस की रैलियों में गाने से मना कर दिया था। देवानंद ने अपनी आत्मकथा में लिखा है कि जब उन्होंने और दिली[प कुमार ने युवक काँग्रेस की रैली में शामिल होने से इनकार कर दिया, तो विद्याचरण शुक्ल से उन्हें धमकियां मिलीं। लेकिन दोनों अपनी बात पर अड़े रहे। गुलज़ार की फ़िल्म “आंधी” पर प्रतिबंध लगा दिया गया। चूँकि निरंकुश सत्ता व्यक्ति को पूरी तरह भ्रष्ट बना देती है, इसलिए अत्याचारी शासकों को लगता है कि उन्हें हर तरह का अत्याचार करने का अधिकार है। जनसंख्या नियंत्रण संजय गांधी के नारों में से एक था, इसलिए जबरन नसबंदी की जाने लगी। गाँव में पुलिस की जीप को देखते ही गाँव के युवा जबरन नसबंदी के डर से अपने घरों की बजाय खेतों में ही रात बिताते थे। आम आदमी भले ही तानाशाही के राजनैतिक प्रभावों को न समझ सकता हो, लेकिन इस जबरन नसबंदी अभियान के कारण वह इसे समझ गया। किसी ने इन शब्दों में इसका वर्णन किया था:

दाद देता हूँ मैं मर्द-ए-हिंदुस्तान की, सर कटा सकते हैं लेकिन नस कटा सकते नहीं।

इस तानाशाह शासन को अहसास नहीं हुआ कि ऐसी हर हरकत उसे जनता से दूर कर रही थी। सरकार को जानकारी देने वाला केवल एक ही स्त्रोत था, जो उसे बता रहा था कि सरकार की लोकप्रियता लगातार बढ़ती जा रही है और कोई इसका विरोध नहीं कर रहा है। जब अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर रोक लगा दी जाए और केवल सरकारी प्रचार की ही अनुमति हो, तो ऐसा करने वाला ही इसका सबसे पहला शिकार बनता है क्योंकि वह धीरे-धीरे स्वयं ही अपने झूठे प्रचार पर भरोसा करने लगता है और उसी को एकमात्र अंतिम सत्य मानने लगता है।

[भाग ३ (अंतिम भाग) कल प्रकाशित होगा।]

स्त्रोत: मूल पोस्ट

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