आपातकाल की यादें (अंतिम भाग) – अरुण जेटली

आपातकाल कैसे हटा?
आपातकाल की अवधि बढ़ते जाने के साथ ही इंदिरा जी पर एक बात के कारण दबाव भी बढ़ने लगा था। अंतरराष्ट्रीय मीडिया और विश्व के नेता इस बात से  चकित थे कि नेहरु जी की बेटी ही लोकतंत्र की राह को छोड़कर तानाशाह बन गई थी। अंतरराष्ट्रीय जगत को यह समझाना इंदिरा जी के लिए बहुत कठिन होता जा रहा था कि आपातकाल का दौर वाकई अस्थायी है और हमेशा आपातकाल लागू नहीं रहेगा। हालांकि उनकी पार्टी की राय थी कि चूंकि संसद की अवधि दो वर्षों के लिए बढ़ाई जा चुकी है, इसलिए अब १९७८ से पहले चुनाव नहीं करवाया जाना चाहिए।

उनका राजनैतिक फ़ीडबैक और ख़ुफ़िया विभाग की राय यह थी कि चूंकि अब कोई विपक्ष बचा ही नहीं है, इसलिए इंदिरा जी को तुरन्त ही आकस्मिक चुनाव की घोषणा कर देनी चाहिए, ताकि विपक्षी दलों को चुनाव की तैयारी का समय ही न मिल पाए और काँग्रेस बहुत आसानी से चुनाव जीत जाए। अंत में यही राय मानी गई और १८ जनवरी १९७७ को इंदिरा जी का राष्ट्र के नाम एक संबोधन प्रसारित हुआ, जिसमें घोषित कर दिया गया कि मार्च में चुनाव होगा। विपक्षी नेता अभी भी जेलों में थी, आपातकाल अभी भी जारी था और जारी ही रहने वाला था। यह तय माना जा रहा था कि आकस्मिक चुनाव के कारण विपक्ष चकित रह जाएगा, और काँग्रेस की विजय के कारण इंदिरा जी की सरकार को नैतिक मान्यता भी मिल जाएगी। चूंकि तिहाड़ जेल ही विपक्षी गतिविधियों का केंद्र था, इसलिए इस घोषणा के तुरन्त बाद सभी राजनैतिक बंदियों की एक बैठक हुई। इसमें दो स्पष्ट मत थे। जॉर्ज फर्नांडिस और सी.जी.के. रेड्डी ने जोर देकर कहा कि यह फ़र्ज़ी चुनाव है और इसका बहिष्कार किया जाना चाहिए। अन्य लोगों की राय थी कि चुनाव आपातकाल के खिलाफ़ और लोकतंत्र के समर्थन में प्रचार करने का एक अच्छा मंच है। जेल में बन्द अन्य वरिष्ठ नेताओं की भी यही राय थी। खराब स्वास्थ्य के कारण जेपी को पहले ही रिहा कर दिया गया था। उन्होंने आगे बढ़कर घोषणा की कि वे विपक्षी गठबंधन में शामिल होंगे और उसे अपना समर्थन भी देंगे, किन्तु यह शर्त भी रखी कि सभी विपक्षी दल एक ही पार्टी के बैनर तले साथ मिलकर चुनाव लड़ें। अगले एक-दो दिनों में राजनैतिक बंदियों की रिहाई भी शुरू हो गई। लेकिन जॉर्ज फर्नांडिस, नानाजी देशमुख और संघ से जुड़े अन्य लोगों को चुनाव खत्म होने के बाद ही छोड़ा गया। प्रेस सेंसरशिप में ढील तो दी गई थी, लेकिन उसे पूरी तरह खत्म नहीं किया गया था।

२५ जनवरी १९७७ को मुझे रिहा किया गया। २७ जनवरी को अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद के मेरे मित्रों ने एक बड़ी रैली आयोजित की और मुझे यूनिवर्सिटी परिसर में हर कॉलेज में ले गए। मुझे आशंका थी कि मेरा सामना भयभीत और आशंकित छात्रों से होगा। लेकिन इसके विपरीत, हम जहाँ भी गए, वहाँ हमें उत्साहित छात्रों का हुजूम ही मिला। दिल्ली के रिहा किए गए राजनैतिक बंदियों में से हम कुछ लोग शाम ७ बजे जंतर-मंतर पर मिले, जो अंततः जनता पार्टी का मुख्यालय बना। ३० जनवरी को श्री मोरारजी देसाई और श्री अटल बिहारी वाजपेयी एक रैली को संबोधित करने वाले थे। हमें ऐसे अपार जनसमर्थन की उम्मीद नहीं थी, इसलिए हमने चाँदनी चौक में रैली करने की अनुमति मांगी थी। लेकिन पुलिस ने भगदड़ की आशंका बताकर वह अनुरोध रद्द कर दिया और जबरन हमें अपनी रैली रामलीला मैदान में आयोजित करनी पड़ी।

यह रैली अत्यंत सफल साबित हुई। अब डर खत्म होने लगा था। लोग आगे आकर अपनी आवाज़ उठाने लगे थे। लगभग उन्नीस महीनों के बाद, अब लोग बेचैन हो उठे थे और “वाजपेयी की वाणी” सुनने को उतावले थे। रामलीला मैदान में जब अटलजी अपने भाषण के लिए खड़े हुए, तो कई मिनटों तक भीड़ ने अपार उत्साह और नारों के साथ उनका अभिवादन किया। अपनी विशिष्ट काव्य शैली में, उन्होंने इस शेर के साथ अपनी बात शुरू की:

बड़ी मुद्दत के बाद मिले हैं दीवाने,
कहने सुनने को हैं बहुत से अफ़साने,
आओ जल्दी से दो बातें कर लें
ये आज़ादी कब तक रहेगी कौन जाने।

घटनाक्रम बहुत तेज़ी से बदल रहा था। २ फरवरी को, काँग्रेस के ३ नेता – बाबू जगजीवन राम, हेमवती नंदन बहुगुणा और नंदिनी सत्पथी ने काँग्रेस पार्टी से इस्तीफ़ा दे दिया “काँग्रेस फ़ॉर डेमोक्रेसी” नाम से एक नई पार्टी बनाई। उन्होंने जनता पार्टी का साथ देने मे फैसला किया। ६ फरवरी को उन्होंने जनता पार्टी के अन्य नेताओं में साथ रामलीला मैदान में एक विशाल आमसभा को संबोधित किया। छात्र नेता के रूप में इस गठबंधन का युवा चेहरा होने के नाते, मुझे सभा में शुरुआती भाषण के द्वारा माहौल बनाने की ज़िम्मेदारी सौंपी गई और उसके बाद कुछ अन्य नेताओं के भाषण हुए और फिर बहुगुणा जी व बाबू जगजीवन राम ने अपनी बात रखी। निसंदेह यह मेरे लिए अब तक की सबसे बड़ी रैली थी, जिसमें मैंने भाषण दिया था। श्रीमती गांधी ने जगजीवन राम पर गद्दारी का इल्ज़ाम लगाया था। उनका आरोप था कि आपातकाल के दौरान हो रही गलतियों के बारे में जगजीवन राम ने उन्हें अँधेरे में रखा। बाबूजी एक ओजस्वी एवं प्रभावी वक्ता थे। उन्होंने रैली में इस आरोप का जवाब कुछ इस अंदाज़ में दिया:

“कैसे बता देते? बता देते तो जगजीवन कहीं होते और राम कहीं।”

इस रैली की विशालता और उत्साह से पूरे देश में यह सन्देश पहुँच गया था कि जनता लहर बनने लगी है। विद्याचरण शुक्ल ने एक ओछी हरकत आज़माई। रैली से ठीक पहले उन्होंने घोषणा की कि लोकप्रिय “बॉबी” फ़िल्म दूरदर्शन पर दिखाई जाएगी। लेकिन काँग्रेस-विरोधी लहर इतनी मजबूत थी कि लोगों ने “बॉबी” देखने की बजाय रैली में शामिल होने का विकल्प चुना। इस रैली के लिए लोग कई किलोमीटर दूर से पैदल चलकर आए थे क्योंकि सरकार ने बस सेवा रुकवा दी थी।

यह मेरे लिए किसी चुनाव अभियान में शामिल होने का पहला मौका था। मैंने उत्तर भारत के राज्यों का दौरा किया और मैं पूरे उत्तर प्रदेश में भी घूमा, जहाँ आखिरी एक हफ्ता मैंने इंदिरा जी और संजय गांधी के चुनाव क्षेत्रों रायबरेली और अमेठी में बिताया। इसके बाद राजस्थान का दौरा करते हुए मैं मुंबई और अंत में पुणे तक गया। लगभग हर जगह हमें इस चुनाव अभियान में जनता की सक्रिय भागीदारी देखने को मिल रही थी। चुनाव में इंदिरा जी और संजय दोनों की हार हुई।

चुनाव परिणाम से यह स्पष्ट हो गया था कि उत्तर भारत के सभी राज्यों ने जनता पार्टी के पक्ष में एकतरफा मतदान किया था। सभी हिन्दी प्रदेशों में मिलाकर काँग्रेस केवल मप्र में एक और राजस्थान में एक सीट जीत पाई। उप्र, बिहार, दिल्ली आदि की सभी सीटों पर उसकी हार हुई। हालांकि दक्षिण भारत में उसे कुछ सीटें मिलीं, जहाँ आपातकाल में तुलनात्मक रूप से कम क्रूरता हुई थी। जनता पार्टी को दो-तिहाई बहुमत मिला। अपना त्यागपत्र देने से पहले इंदिरा जी ने आपातकाल हटाया और धीरे-धीरे सभी बंदी रिहा कर दिए है। पूरे देश ने फिर एक बार आज़ादी की हवा में सांस ली।

संस्थागत सुरक्षा और विचलित करने वाली बातें
आपातकाल की सबसे परेशान करने वाली घटना वह थी, जब केंद्र सरकार तानाशाह बन गई थी, और पूरे सिस्टम ने उसके आगे घुटने टेक दिए। सुप्रीम कोर्ट भी झुक गया और मीडिया ने घुटने टेक दिए। आपातकाल के बाद आडवाणी जी ने दिल्ली की मीडिया से कहा, “जब आपसे झुकने को कहा गया, तब आप तो रेंगने ही लगे थे”। दो लाख से ज़्यादा फ़र्ज़ी एफआईआर दर्ज की गई थीं, लेकिन शायद किसी पुलिस अधिकारी ने इसके विरोध में कोई आवाज़ उठाई। हज़ारों लोगों को किसी भी आधार के बिना बंदी बना लेने के आदेश दिए गए थे। शायद ही किसी कलेक्टर ने ऐसे अवैध गिरफ़्तारी के आदेश को मानने से मना किया। यहाँ तक कि चुनाव अभियान के दौरान भी, जब परिणाम बिल्कुल साफ़ दिखाई देने लगा था, तब भी इंदिरा जी ने सत्य को स्वीकार नहीं किया। उन्होंने जस्टिस एच. आर. खन्ना की वरिष्ठता की उपेक्षा करते हुए जस्टिस बेग को भारत का मुख्य न्यायाधीश नियुक्त कर दिया। श्री पालखीवाला ने तब टिप्पणी की थी कि जस्टिस खन्ना के लिए अब मुख्य न्यायाधीश का पद बहुत छोटा हो गया है।

मोरारजी देसाई के नेतृत्व वाली जनता पार्टी ने आपातकाल के कई फैसलों को पलट दिया, ताकि कोई भी शासक भविष्य में तानाशाही का ऐस प्रयोग दोबारा न कर सके। आंतरिक अव्यवस्था की स्थिति में आपातकाल लगाने का अधिकार देने वाली धारा ३५२ को अब सीमित कर दिया गया। धारा २१ को निलंबित करने की शक्ति समाप्त कर दी गई। अदालतों को गिरफ्तारी के आदेशों की न्यायिक समीक्षा का अधिकार दिया गया। संविधान के ४२ वें संशोधन के अधिकतर प्रावधानों को ४४ वें संशोधन के द्वारा पलट दिया गया। यह संस्थाओं की सुरक्षा का एक मुख्य उपाय था।

तकनीकी सुधार एक और महत्वपूर्ण पहलू है जिसके कारण मीडिया पर सेंसरशिप लागू कर पाना असंभव हो चुका है। अब आप लोगों को जानकारी से वंचित नहीं रख सकते।

राजनैतिक दलों की भूमिका
भारत के वामपंथी दलों को देखकर मैं हमेशा असमंजस में रहता हूँ। सीपीआई आपातकाल की प्रबल समर्थक थी। उसका राजनैतिक तर्क यह था कि आपातकाल फासीवाद के खिलाफ युद्ध है। हालांकि सीपीआई (एम) ने सैद्धांतिक रूप से आपातकाल का विरोध और आलोचना की, लेकिन आपातकाल के खिलाफ चले संघर्ष में इसकी कोई सक्रिय भूमिका नहीं रही। इसके केवल दो सांसदों की गिरफ्तारी हुई थी। इसके पोलित ब्यूरो में सदस्य, केंद्रीय समितियों के सदस्य और छात्र नेता गिरफ्तारी से पूरी तरह सुरक्षित रहे। काँग्रेस (ओ), समाजवादी दलों, स्वतंत्रता पार्टी, जनसंघ और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने ही आपातकाल के विरुध्द चले सत्याग्रह और संघर्ष में प्रमुख भूमिका निभाई। डॉ. लोहिया के समाजवाद और आपातकाल के बाद उसमें हुए क्रमिक परिवर्तनों में मुझे एक रोचक रुझान दिखाई पड़ता है। डॉ. राम मनोहर लोहिया ने १९६० के दशक की शुरुआत में “काँग्रेस हटाओ, देश बचाओ” का नारा दिया था। जॉर्ज फर्नांडिस, मधु लिमये और राज नारायण ने उनकी विरासत को आगे बढ़ाया और ये तीनों लगातार काँग्रेस का विरोध करते रहे। आज उप्र में श्री मुलायम सिंह यादव और बिहार में श्री नीतीश कुमार को वह विरासत मिली है।

हालांकि काँग्रेस-विरोध के लक्षण तो इन दोनों की राजनीति में यदा-कदा दिख जाते हैं, लेकिन श्री मुलायम सिंह यादव की पार्टी हमेशा ही काँग्रेस के साथ समझौता करने को तैयार दिखाई पड़ती है। मुझे अक्सर बहुत गंभीर आशंका होती है कि डॉ. लोहिया और पंडित नेहरू के राजनैतिक डीएनए पर दावा करने वाले आखिर लंबे समय तक एक साथ कैसे काम कर सकते हैं। हालांकि मेरी राय है कि अब भारत में आपातकाल लागू कर पाना किसी के लिए भी असंभव हो चुका है, लेकिन जैसा कि एक प्रसिद्ध उक्ति में कहा गया है, “लोकतंत्र लोगों के हृदय में बसता है। अगर वहाँ यह खत्म हो जाए, तो कोई संविधान इसे बचा नहीं सकता और कोई अदालत इसकी रक्षा नहीं कर सकती।

एक निजी बात
केंद्रीय मंत्री श्री विजय गोयल ने आज (२६ जून २०१८) एक चिठ्ठी अपने ट्वीट में शेयर की थी, जो मैंने आपातकाल के दौरान उन्हें और श्री रजत शर्मा को लिखी थी। विजय जी ! विजय गोयल और रजत शर्मा आपातकाल के दौरान मेरे दो सबसे करीबी साथी थे।

उन्होंने २६ जून १९७५ को आपातकाल के विरोध में कार्यक्रम आयोजित करने में मेरी मदद की थी। जब मुझे गिरफ़्तार किया जा रहा था, तो मैंने उन दोनों से अनुरोध किया कि वे भूमिगत हो जाएँ और २९ जून से शुरू होने वाले सत्याग्रह में हिस्सा लें। उन दोनों ने सत्याग्रह का नेतृत्व किया। उनका साहस अनुकरणीय था। आज विजय गोयल हमारी पार्टी और सरकार में एक महत्वपूर्ण साथी हैं। रजत ने राजनीति छोड़ दी और वे पत्रकार बने। आज वे भारत के सबसे प्रसिद्ध पत्रकारों में से एक हैं। वे दोनों आज भी मेरे बहुत घनिष्ठ मित्र बने हुए हैं – बिल्कुल एक परिवार की तरह।

(समाप्त)

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