घुसपैठ…

बांग्लादेश का निर्माण:

सन १९४७ में भारत का अंतिम विभाजन हुआ और पाकिस्तान बना। आगे १९७१ में हुए युद्ध के बाद पाकिस्तान के भी दो टुकड़े हुए और बांग्लादेश का निर्माण हुआ। इस बारे में मैंने विस्तार से एक लेख लिखा था, जो आप यहाँ क्लिक करके पढ़ सकते हैं

१९७१ के युद्ध और बांग्लादेश के निर्माण का मुख्य कारण यह था कि बांग्लादेश के लोगों को यह महसूस होता था कि पाकिस्तान सरकार भाषा, प्रशासन, राजस्व, प्रतिनिधित्व आदि सभी मामलों में बांग्लादेश के साथ भेदभाव करती है। इसे लेकर लगातार आंदोलन चलते रहते थे और उनके दमन के लिए सेना और सरकार की तरफ से हिंसक कार्रवाई भी होती रहती थी। उन अत्याचारों से बचने के लिए लाखों की संख्या में बांग्लादेशी शरणार्थी भारत में घुसने लगे। उन्हें संभालना और पालना भारत के लिए कठिन हो गया था। इसी को आधार बनाकर भारत ने इस मामले में दखल दिया और बांग्लादेश को आज़ादी दिलाई।

इस बात पर खूब चर्चा हो चुकी है कि युद्ध के बाद अटल जी ने इंदिरा जी को ‘दुर्गा’ कहा था या नहीं कहा था। लेकिन मुझे लगता है कि उससे ज्यादा इस बात पर चर्चा होनी चाहिए थी कि इस युद्ध से वास्तव में भारत को क्या हासिल हुआ? युद्ध में भारत की जीत अवश्य हुई, लेकिन पाकिस्तान को हराने के बावजूद हम शिमला समझौते में वास्तव में कुछ भी हासिल नहीं कर पाए। उसके बारे में भी मैंने अपने ब्लॉग पर विस्तार से अपनी बात लिखी थी, जो आप यहाँ क्लिक करके पढ़ सकते हैं

एक तो हम अपनी सीमाओं को सुरक्षित नहीं रख पाए, इसलिए पहले चीन ने १९६२ में हमें हराया, फिर बांग्लादेश से भी लोग हमारी सीमा में लाखों की संख्या में घुसते रहे, जिसके कारण अंततः हमें मजबूरन अपनी सेना को युद्ध में झोंकना पड़ा। इस युद्ध के बाद इंदिरा जी ने खुद ही खुद को भारत रत्न से सम्मानित भी कर लिया।

दूसरी तरफ बांग्लादेश के निर्माण का श्रेय खुद को देकर हम अपनी पीठ ज़रूर थपथपाते रहते हैं, लेकिन बांग्लादेशी घुसपैठियों की समस्या को भी हम खत्म नहीं कर पाए। जिस देश को हमारा अहसानमंद होना चाहिए था, वहीं से होने वाली अवैध घुसपैठ आज भी हमारे कई राज्यों के लिए सबसे बड़ी समस्या बनी हुई है। इसमें पश्चिम बंगाल, असम, त्रिपुरा जैसे राज्य प्रमुख हैं और उनमें भी असम में यह समस्या सबसे विकराल है। अफसोस की बात यह है कि उसे सुलझाने के बजाय तत्कालीन सरकारों ने अपने वोट बैंक के लिए घुसपैठ को बढ़ावा ही दिया। इसी कारण यह समस्या आज तक सुलझ नहीं पाई है।

१९७१ में बांग्लादेश बनने के बाद भी सभी बांग्लादेशी नागरिक वापस नहीं गए, बल्कि भारत में उनका घुसना जारी रहा। १९७५ में इंदिरा जी और उनके बेटे ने लोकतंत्र का गला घोंटकर देश पर आपातकाल थोपा और तानाशाही शासन की शुरुआत हुई, जो अगले २ सालों तक जारी रहा। सभी विपक्षी नेताओं को और देश के हज़ारों निरपराध लोगों को जेलों में बंद कर दिया गया, मीडिया पर प्रतिबंध लगा दिया गया, अदालतों को पंगु बना दिया गया, लेकिन घुसपैठियों के मामले में शायद कुछ भी नहीं किया गया।

अपनी जीत की संभावना की गलतफहमी के कारण १९७७ में इंदिरा जी आपातकाल हटाया और देश में चुनाव हुआ। सभी विपक्षी दल एक होकर जनता पार्टी के नाम से लड़े थे और चुनाव में उनकी सरकार भी बनी। हालांकि वह आपसी झगड़ों, खींचतान और नेताओं की व्यक्तिगत महत्वाकांक्षाओं के कारण ३ साल में ही गिर गई और १९८० में फिर इंदिरा जी के नेतृत्व में कांग्रेस की सत्ता में वापसी हो गई।

असम आन्दोलन और आईएमडीटी एक्ट:

जनता पार्टी की ३ सालों की सरकार के दौरान ही १९७८ में असम की मंगलदोई लोकसभा सीट से जनता पार्टी के सांसद हीरालाल पटवारी का निधन हो गया था। इस कारण वहां उपचुनाव की घोषणा हुई। इस चुनाव की तैयारियों के दौरान जब मतदाता सूचियों की जांच शुरू हुई, तो चुनाव पर्यवेक्षकों ने पाया कि मतदाताओं की संख्या अचानक बहुत ज्यादा बढ़ चुकी थी।

असम के लोगों का कहना था कि बांग्लादेशी घुसपैठिये ही इसका कारण हैं और उन्होंने बड़ी संख्या में मतदाताओं के रूप में पंजीयन करवा लिया है। ऑल असम स्टूडेंट्स यूनियन (आसू) और ऑल असम गण संग्राम परिषद नामक संगठनों ने इसके विरोध में आंदोलन शुरू कर दिया। इन संगठनों की मांग थी कि सभी मतदाता सूचियों की दोबारा पूरी जांच करवाई जाए और घुसपैठियों को बाहर किया जाए। इस मांग को लेकर असम में उग्र आंदोलन शुरू हो गया। इसे असम आन्दोलन कहा जाता है।

यह आन्दोलन अगले कई वर्षों तक जारी रहा। इस दौरान गुवाहाटी समेत पूरे प्रदेश में कई बार हड़ताल और विरोध प्रदर्शन होते रहते थे। सामान्यतः यह अहिंसक आंदोलन था, लेकिन फरवरी १९८३ में नगाँव जिले के १४ गांवों में भारी हिंसा हुई, जिसमें केवल ६ घंटों में ही लगभग २००० लोग मारे गए। इसे नेली हत्याकांड कहा जाता है।

इसके बाद भारत सरकार की नींद खुली और प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने एक नया कानून लागू किया, जिसे आईएमडीटी एक्ट कहते हैं। इसका पूरा नाम है- Illegal Migrants (Determination by Tribunal) Act अर्थात एक आयोग द्वारा अवैध घुसपैठियों की पहचान का कानून। यह कानून विशेष रूप से केवल असम राज्य के लिए ही बनाया गया था। देश के किसी भी अन्य प्रदेश में यह लागू नहीं था। केवल असम में आईएमडीटी और बाकी सारे देश में १९४६ का फॉरेनर्स एक्ट लागू था।

लेकिन आईएमडीटी कानून के बावजूद भी घुसपैठ की समस्या हल नहीं हुई, बल्कि पहले जो समस्या केवल असम तक सीमित थी, वह बंगाल, त्रिपुरा और अन्य राज्यों में भी फैलती गई। यहां तक कि कई बार मुंबई और दिल्ली में भी बांग्लादेशी घुसपैठियों के होने की बातें सुनाई पड़ती हैं और अब तो जम्मू के इलाके तक में बर्मा और बांग्लादेश के घुसपैठियों के होने की पुष्टि हो गई है।

आपके मन में यह सवाल ज़रूर आया होगा कि आखिर आईएमडीटी कानून के बावजूद भी समस्या खत्म क्यों नहीं हुई, बल्कि और क्यों बढ़ी? इसका कारण ये है कि वास्तव में आईएमडीटी कानून घुसपैठियों को भगाने के लिए नहीं, बल्कि उनकी मदद करने के लिए तैयार किया गया था! नेली हत्याकांड के कारण संभवतः इंदिरा जी की सरकार को चिंता हुई कि ऐसे लोगों की रक्षा की जानी चाहिए। इसके बाद असम के ही एक कांग्रेसी विधायक अब्दुल मुहिब मज़ूमदार ने इसके लिए एक कानून का ड्राफ्ट तैयार किया और भारत की संसद ने इसे पारित कर दिया।

यह कानून सिर्फ असम में लागू था और इसमें ऐसे अजीब प्रावधान बनाए गए थे, जिनके कारण गैरकानूनी तरीके से भारत में घुसने वालों को घुसपैठिया साबित कर पाना लगभग असंभव हो गया। इस कानून के अनुसार सबसे पहला प्रावधान तो यह था कि जो लोग २५ मार्च १९७१ से पहले भारत में आ चुके थे, उन्हें घुसपैठिया नहीं माना जाएगा और उनके ख़िलाफ़ कोई कार्यवाही नहीं होगी। इसका मतलब ये हुआ कि इस तारीख से पहले घुसपैठ कर चुके लाखों लोग और उनकी आगे वाली पीढ़ियों को भारत का नागरिक मान लिया जाए!

इस तारीख के बाद जो लोग भारत में घुसे हैं, केवल उन्हीं के विरुद्ध इस कानून के आधार पर जांच की जा सकती है। लेकिन इसमें भी बहुत झमेले थे, जिनसे वास्तव में घुसपैठियों को ही मदद मिलती थी। जैसे अगर किसी को यह संदेह हो कि अमुक व्यक्ति घुसपैठिया है, तो उसके बारे में पुलिस थाने में शिकायत तो की जा सकती थी; लेकिन ऐसी शिकायत केवल वही व्यक्ति कर सकता था, जो संदिग्ध घुसपैठिये के ३ किमी के दायरे में रहता हो। शिकायत दर्ज करवाने वाले को इसके लिए एक फॉर्म भरना पड़ता था, १० रुपये फीस देनी पड़ती थी और २ गवाहों के दस्तख़त भी लाने पड़ते थे। इसके अलावा एक व्यक्ति अधिकतम १० लोगों के बारे में ही शिकायत कर सकता था। इसके बाद भी अगर प्रशासन को यह सन्देह हो कि शिकायत बदले की भावना से की गई है, तो वह खारिज कर दी जाती थी।

शिकायत करने वाला अगर इतनी झंझटों से निकल पाए, तब जाकर पुलिस मामले की जांच करती थी। संदिग्ध घुसपैठिया अगर राशन कार्ड दिखा दे, तो यह मान लिया जाता था कि वह घुसपैठिया नहीं, बल्कि भारत का नागरिक है और शिकायत खारिज हो जाती थी। ऊपर से उसे एक प्रमाणपत्र भी मिल जाता था कि उसकी जांच हो चुकी है और वह घुसपैठिया नहीं है। इस तरह वह भविष्य में किसी कार्यवाही से भी बच जाता था। आप तो जानते ही होंगे कि उस ज़माने में राशन कार्ड या ऐसे अन्य दस्तावेज़ किस तरह बनाए जा सकते थे, इसलिए घुसपैठियों के लिए यह कोई मुश्किल काम नहीं था।

फिर भी मान लीजिए कि उसे घुसपैठिया साबित करने में सफलता मिल गई, तो भी उसे तुरन्त निकाला नहीं जा सकता था। उसे भारत छोड़ने के लिए ३० दिनों का समय दिया जाता था। उस इलाके से गायब होकर कहीं और चले जाने के लिए इतना समय काफ़ी था! इस तरह यह क़ानून वास्तव में घुसपैठियों की ही मदद करता था और उन्हें बाहर निकाल पाना इसने लगभग असंभव ही बना दिया।

सन १९८३ में यह कानून लागू होने के बाद से सन २००० तक के बीच लगभग ३ लाख १० हजार लोगों के विरुद्ध शिकायत दर्ज की गई, लेकिन इनमें से केवल १० हजार लोगों को ही घुसपैठिया साबित किया जा सका और उनमें से भी केवल १४०० के लगभग लोगों को ही वास्तव में भारत से बाहर भेजा जा सका। उनके बारे में भी यह कहा जाता है कि वे १४०० लोग भी कुछ दिनों बाद फिर भारत में वापस घुस आए!

इसके विपरीत पश्चिम बंगाल में १९८३ से १९९८ के बीच लगभग ५ लाख घुसपैठियों की पहचान करके उन्हें वापस बांग्लादेश भेज दिया गया। असम में केवल १४०० और पश्चिम बंगाल में ५ लाख का ये अंतर कैसे आया? इसका कारण सिर्फ इतना है कि असम में आईएमडीटी कानून था, जबकि पश्चिम बंगाल सहित बाकी पूरे देश में फॉरेनर्स एक्ट के अनुसार कार्यवाही होती थी और फॉरेनर्स एक्ट घुसपैठियों के नहीं, बल्कि देश के हित को ध्यान में रखकर बनाया गया था। इसलिए घुसपैठियों की शिकायत करने वाले को नहीं, बल्कि जिसके खिलाफ शिकायत की जाती थी, उसी को यह साबित करना पड़ता था कि वह भारत का नागरिक है, जो कि मुश्किल काम था।

अपने राजनैतिक फायदे के लिए कांग्रेस ने जो असम में किया, वैसा ही कुछ पंजाब में भी किया था। उसका परिणाम आगे खालिस्तान समर्थक आंदोलन, हरमंदिर साहिब में सैन्य कार्रवाई, इंदिरा जी की हत्या और १९८४ के सिख नरसंहार के रूप में मिला, जिसकी कीमत देश-विदेश में आज भी भारत को चुकानी पड़ रही है। उसके बारे में भी मैं आगे एक अलग लेख में विस्तार से लिखूँगा। यह लेख केवल बांग्लादेश से घुसपैठ के बारे में है, इसलिए मैं विषय को भटकाना नहीं चाहता।

असम समझौता:

सन १९८४ में दिल्ली में ही इंदिरा जी की हत्या हो गई। उसके बाद राजीव गांधी प्रधानमंत्री बने। आसू के नेतृत्व में आईएमडीटी का विरोध जारी था। अंततः १५ अगस्त १९८५ को राजीव जी की सरकार और ऑल असम स्टूडेंट्स यूनियन के बीच एक समझौता हुआ। इसे असम अकॉर्ड (असम समझौता) कहा जाता है।

आईएमडीटी एक्ट में यह प्रावधान था कि जो लोग १९७१ से पहले असम में घुस चुके थे, उन्हें घुसपैठिया नहीं माना जाएगा और उनके ख़िलाफ़ कोई कार्यवाही नहीं होगी। लेकिन असम अकॉर्ड में इसे बदलने पर सहमति बनी। इसमें ये मुख्य बातें तय हुईं-

१. जो लोग १९५१ से १९६१ के बीच भारत में आ गए थे, केवल उन्हीं को नागरिकता दी जाएगी।
२. जो लोग १९६१ और १९७१ के बीच आए थे, उन्हें भी नागरिकों के सभी अधिकार मिलेंगे, लेकिन अगले १० सालों तक उन्हें मतदान का अधिकार नहीं मिलेगा।
३. जो लोग १९७१ के बाद भारत आए थे, उन्हें पहचानकर वापस भेजा जाएगा।
४. इसके अलावा केंद्र सरकार से असम के लिए एक आर्थिक पैकेज देने, और तेल रिफाइनरी, पेपर मिल व एक तकनीकी संस्थान बनाने पर सहमति बनी।
५. साथ ही, प्रदेश की सांस्कृतिक, सामाजिक और भाषाई परंपरा की रक्षा के लिए विशेष कानूनी और प्रशासनिक व्यवस्था करने पर भी सहमति बनी।

इस समझौते के साथ ही असम आंदोलन भी समाप्त हो गया। इसके बाद प्रदेश की विधानसभा भंग कर दी गई और दोबारा चुनाव करवाया गया। ऑल असम स्टूडेंट्स यूनियन ने भी असम गण परिषद के नाम से एक राजनैतिक पार्टी बनाई और विधानसभा का चुनाव लड़ा। इस चुनाव में उनकी जीत हुई और इसके नेता प्रफुल्ल कुमार महंत मुख्यमंत्री बने।

लेकिन इसके बावजूद भी अवैध घुसपैठ की समस्या ख़त्म नहीं हुई। राजीव जी की सरकार ने समझौते पर हस्ताक्षर तो कर दिए, लेकिन उसकी कई बातों को कभी लागू ही नहीं किया। आईएमडीटी एक्ट भी नहीं बदला गया। इसके विरोध में असम गण परिषद के सांसद सर्बानंद सोनोवाल और भाजपा सांसद चरण चन्द्र डेका ने सुप्रीम कोर्ट में एक केस दायर किया। २००५ में इस पर फ़ैसला आया। उस समय देश में सोनिया जी की सरकार थी और डॉ. मनमोहन सिंह प्रधानमंत्री थे।

अपने फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि आईएमडीटी एक्ट ही असम में घुसपैठियों की पहचान करके उन्हें भारत से बाहर निकालने में सबसे बड़ी बाधा है। इसके साथ ही कोर्ट ने आईएमडीटी एक्ट को रद्द कर दिया और सरकार को यह भी आदेश दिया कि घुसपैठियों की पहचान करने और उन्हें देश से बाहर निकालने का काम १९६४ में बनाए गए विदेशी ट्रिब्यूनल ऑर्डर के अनुसार किया जाए। यह ट्रिब्यूनल १९४६ के फॉरेनर्स एक्ट पर आधारित था और पूरे देश में लागू होता था। इसके अनुसार यह संदिग्ध घुसपैठिये को साबित करना पड़ता था कि वह भारत का नागरिक है, न कि उसकी शिकायत करने वाले को।

लेकिन सोनिया जी की सरकार को केवल अपने वोट बैंक की चिंता थी, देश के संविधान, सुरक्षा या कानून की नहीं। इसलिए कांग्रेस सरकार ने कोर्ट का आदेश मानने के बजाय १९६४ के विदेशी ट्रिब्यूनल ऑर्डर को ही बदल दिया और असम को इससे बाहर कर दिया, ताकि घुसपैठिये असम में सुरक्षित रह सकें। असम की घुसपैठ की समस्या का एक और दुःखद पहलू यह भी है कि २००४ से २०१४ तक भारत के प्रधानमंत्री रहे डॉ. मनमोहन सिंह पिछले २७ वर्षों से असम से ही राज्यसभा के सांसद हैं, लेकिन असम और देश की इतनी बड़ी समस्या के मामले में भी वे हमेशा मौन ही रहे हैं।

अब सर्बानंद सोनोवाल और चरण चन्द्र डेका फिर एक बार सुप्रीम कोर्ट में गए। अशोक देसाई, अरुण जेटली और रविशंकर प्रसाद उनके वकील थे। दिसंबर २००६ में सुप्रीम कोर्ट ने फिर एक बार इस बारे में फैसला दिया। १९६४ के ट्रिब्यूनल ऑर्डर में सोनिया जी की सरकार ने जो असंवैधानिक बदलाव किए थे, उन्हें कोर्ट ने रद्द कर दिया और कड़े शब्दों में सरकार को चेतावनी दी कि अदालत का पुराना आदेश लागू किया जाए।

कोर्ट ने यह भी कहा कि लगातार हो रही घुसपैठ के कारण सिर्फ असम ही नहीं, बल्कि पूरे पूर्वोत्तर भारत की सुरक्षा पर खतरा बढ़ रहा है। इसलिए इस पर गंभीरता से ध्यान दिया जाए। लेकिन सरकार ने फिर भी कोई तेज़ी नहीं दिखाई। जनसंख्या असंतुलन के कारण असम की संस्कृति और परंपरा नष्ट हो रही थी, अपराध बढ़ रहे थे, वहां के भारतीय नागरिकों से रोज़गार के अवसर छिन रहे थे, लेकिन कांग्रेस सरकार को इन सबकी नहीं, बल्कि अपने वोट बैंक की ही फ़िक्र थी। इसलिए घुसपैठ जारी रही और उसे रोकने का काम बहुत धीमी गति से चलता रहा। दूसरी तरफ घुसपैठियों को भारत की नागरिकता दिलवाने के लिए फ़र्ज़ी दस्तावेज़ बनवाने वाले दलाल भी सक्रिय रहे। लापरवाही, बेईमानी और भ्रष्टाचार का हाल यह था कि केवल १० हज़ार रुपये में कोई भी बड़ी आसानी से अपने लिए भारतीय पहचान पत्र हासिल कर सकता था और इसके द्वारा ख़ुद को भारतीय नागरिक साबित कर सकता था।

इसी दौर में सन २००५ में एक उद्योगपति बदरुद्दीन अजमल ने ऑल इंडिया यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट (एआईयूडीएफ) नाम से एक नई पार्टी बनाई और २००६ का चुनाव भी लड़ा। उनकी पार्टी को पहली ही बार में १० सीटें मिलीं। आगे २०११ में उन्हें १८ सीटें और २०१६ के चुनाव में इस पार्टी को २४ सीटों पर जीत मिली। २०१४ के लोकसभा चुनाव में भी इनके ३ प्रत्याशी सांसद चुने गए। खुद अजमल भी धुबरी से सांसद हैं। उनके बेटे और भाई भी राजनीति में सक्रिय हैं। ऐसा कहा जाता है कि यह पार्टी वास्तव में बांग्लादेशी घुसपैठियों के वोटों से ही जीतती है और उन्हीं को बचाने के लिए काम करती है। कुछ समय पहले भारत के सेना प्रमुख जनरल विपिन रावत ने कहा था कि असम में होने वाली घुसपैठ वास्तव में बांग्लादेश की भारत-विरोधी रणनीति का ही हिस्सा है, जिसमें चीन भी उसकी मदद कर रहा है। इसी दौरान जनरल ने अजमल की पार्टी का ज़िक्र भी किया था।

लेकिन देश की सुरक्षा से ज्यादा अपने वोट बैंक की चिंता में लगी कांग्रेस सरकारों ने असम समझौते को लागू करने या आईएमडीटी को हटाने में कोई रुचि नहीं दिखाई और जानबूझकर इस मामले को लटकाए रखा। इसका परिणाम ये हुआ कि असम और आसपास के इलाकों में घुसपैठ, तस्करी और अपराध बढ़ते रहे, जनसंख्या का संतुलन बिगड़ता गया और भारत के मूल नागरिक ही अपनी सुरक्षा, रोजगार और अधिकार से वंचित होने लगे।

दूसरी तरफ घुसपैठियों को सरकार की तरफ से लगातार प्रोत्साहन और संरक्षण मिलता रहा। उनके लिए भारत में फर्जी दस्तावेज बनवाने और वोटर लिस्ट में उनका नाम जुड़वाकर उन्हें अपना वोट बैंक बनाने का खेल भी लगातार चलता रहा। इसका असर ये हुआ कि कई इलाकों में भारत के मूल नागरिकों से ज्यादा संख्या घुसपैठियों की हो चुकी है।

असम में इसका विरोध भी लगातार जारी रहा। इस मामले में दखल देते हुए सुप्रीम कोर्ट ने फिर आदेश दिया कि १९५१ के एनआरसी के आधार पर असम में भारतीय नागरिकों और घुसपैठियों को अलग-अलग पहचानने का काम किया जाए। सन २०१०-११ में असम के कुछ जिलों में यह पायलट प्रोजेक्ट शुरू हुआ। लेकिन इसमें भी कई गड़बड़ियों की शिकायत आई। ये आरोप भी लगे कि असम की कांग्रेस सरकार यह कोशिश कर रही थी कि १९७१ की बजाय सन २००४ तक के सभी घुसपैठियों को नागरिकता मिल जाए! इन सब कारणों से यह पायलट प्रोजेक्ट समय पर पूरा नहीं हो सका और अंततः सुप्रीम कोर्ट ने खुद ही इस काम की निगरानी करने का फ़ैसला किया।

भाजपा की भूमिका:

घुसपैठ का मुद्दा असम की राजनीति का सबसे बड़ा मुद्दा है। भाजपा इस घुसपैठ की समस्या को हमेशा के लिए खत्म करने की बात कहती रही है। इसी घुसपैठ के खिलाफ पहले आसू और अगप में रहकर संघर्ष करने वाले और फिर कोर्ट में कानूनी लड़ाई लड़ने वाले सर्बानंद सोनोवाल ही आज असम के मुख्यमंत्री हैं। सन २०१४ के लोकसभा चुनाव के अपने घोषणा पत्र में भाजपा ने बांग्लादेश और बर्मा से लगने वाली भारतीय सीमा पर तारबंदी करके पूरी सीमा को सुरक्षित करने का वादा किया। गुवाहाटी में अपनी चुनावी सभा में भी मोदीजी ने सीमा को सील करने और घुसपैठियों को वापस भेजने का वादा दोहराया।

२०१४ में मोदी सरकार बनने के बाद इस मामले पर काम भी शुरू हो गया। भारत और बांग्लादेश की सीमा लगभग ४००० किमी लंबी है, जिसमें से लगभग ३००० किमी की सीमा पर बाड़ लगाने का काम पूरा भी हो चुका है। सरकार ने बाकी बचे १००० किमी का काम जून २०१८ तक पूरा करने की समय सीमा तय की है। लेकिन इस १००० में से लगभग ६०० किमी की सीमा पश्चिम बंगाल में है और वहां की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी लगातार कोशिश कर रही हैं कि यह काम पूरा न हो सके।

२०१५ में मोदी सरकार ने एक और बड़ा काम पूरा किया, जो १९७४ से ही लटका हुआ था। भारत और बांग्लादेश की सीमा के भीतर दोनों देशों के कई छोटे-छोटे भूखंड थे, जिन्हें एनक्लेव कहा जाता है। ये ज़मीन के ऐसे टुकड़े थे, जो चारों तरफ से दूसरे देश की सीमा से घिरे हुए थे, जिसके कारण सीमा को पूरी तरह बंद कर पाना असंभव हो गया था। ये अपराधियों के छिपने के लिए सुरक्षित अड्डे भी बन गए थे क्योंकि दूसरे देश का इलाका होने के कारण पुलिस वहां घुस नहीं सकती थी। ये एनक्लेव भी समस्या का एक बहुत बड़ा कारण थे। अंततः २०१५ में मोदी सरकार ने बांग्लादेश के साथ भूमि सीमांकर करार पूरा करके यह समस्या खत्म की। इसके बारे में मैंने उसी समय एक लेख लिखा था, आपको यहाँ क्लिक करके वह लेख अवश्य पढ़ना चाहिए

आगे २०१६ में असम में विधानसभा चुनाव हुआ। इसमें तरुण गोगोई सरकार की हार हुई और कांग्रेस के पिछले १५ वर्षों के शासन का अंत हो गया। इसके बाद सर्बानंद सोनोवाल के नेतृत्व में भाजपा की सरकार बनी। इस सरकार ने असम समझौते को लागू करवाने के लिए एक अलग विभाग बनाया है। यह काम पहले की किसी सरकार ने नहीं किया था। इसके अलावा सरकारी ज़मीनों से घुसपैठियों के अतिक्रमण हटाने की कार्यवाही भी बड़े पैमाने पर जारी है। सरकारी आंकड़ों के अनुसार पिछले दो सालों में ३५०० से ज्यादा लोगों को हटाया गया है, हालांकि विरोधियों का आरोप है कि सरकार ने लगभग १०००० लोगों को विस्थापित कर दिया है।

२०१६ में ही मोदी सरकार ने देश के नागरिकता कानून में भी एक संशोधन का प्रस्ताव रखा। सरकार चाहती है कि पाकिस्तान, अफगानिस्तान और बांग्लादेश में होने वाले अत्याचारों के कारण अगर वहां से हिन्दू, बौद्ध, जैन, सिख या ईसाई समुदाय के लोग भारत में शरण लेने आते हैं, तो उन्हें भारत की नागरिकता दी जाए। कांग्रेस की मांग है कि यह सुविधा मुस्लिमों को भी मिले। भाजपा इससे सहमत नहीं है क्योंकि उसका कहना है कि यह प्रावधान केवल अल्पसंख्यकों की सुरक्षा के लिए है, और इन तीनों में से किसी में भी देश में मुसलमान अल्पसंख्यक नहीं हैं। इस बहस के कारण यह संशोधन अभी तक संसद में पारित नहीं हो पाया है।

इन सबके अलावा असम में एक और बहुत बड़ा काम इन दिनों जारी है। इसके अंतर्गत वहां के प्रत्येक निवासी की नागरिकता की जांच की जा रही है। इसके अनुसार केवल उन्हीं लोगों को भारत का नागरिक माना जाएगा, जिनका नाम या जिनके पूर्वजों का नाम १९५१ के एनआरसी में या १९७१ की मतदाता सूची में हो तथा वे कोई अधिकृत दस्तावेज़ दिखाकर उन पूर्वजों के साथ अपना पारिवारिक संबंध साबित कर सकें।

उदाहरण के लिए अगर किसी व्यक्ति का जन्म १९७१ के बाद हुआ है, तो १९५१ के नागरिकता रजिस्टर में या १९७१ की मतदाता सूची में उस व्यक्ति का नाम तो नहीं होगा, लेकिन उसके पिता या दादा का नाम ज़रूर हो सकता है। तो इस व्यक्ति को पर्याप्त दस्तावेज़ दिखाकर यह साबित करना होगा कि उसके पिता का नाम पुरानी लिस्ट में है और यह भी साबित करना होगा कि वह उसी परिवार का सदस्य है। जो लोग यह साबित नहीं कर पाएंगे, उन्हें भारत का नागरिक नहीं माना जाएगा।

यह काम असम में बड़े पैमाने पर चल रहा है और इस एनआरसी का पहली लिस्ट ३१ दिसंबर २०१७ को प्रकाशित की गई थी। इसके अनुसार असम की सवा ३ करोड़ जनसंख्या में से लगभग डेढ़ करोड़ लोगों के नाम इसमें नहीं थे। अब उन डेढ़ करोड़ लोगों की जांच का काम चल रहा है, जिसके बाद अंतिम रिपोर्ट ३० जून २०१८ को प्रकाशित की जाएगी।

ऐसी उम्मीद है कि यह काम पूरा होने के बाद समस्या जड़ से खत्म हो जाएगी। हालांकि इसका विरोध भी हो रहा है और इतने सालों से जो लोग घुसपैठियों की मदद से चुनाव जीतते रहे, वे अभी भी उनके बचाव में ही खड़े हैं। ममता बनर्जी भी कह चुकी हैं कि अगर कोई भी असम से आकर पश्चिम बंगाल में बसना चाहे, तो उनकी सरकार ऐसे लोगों को पूरा संरक्षण देगी। ऐसा लगता है कि जून २०१८ के बाद यह एक बड़ा मुद्दा बन सकता है।

यह कहना कठिन है कि घुसपैठियों की पहचान होने के बाद उन्हें वापस बांग्लादेश कैसे भेजा जाएगा क्योंकि बांग्लादेश और भारत का ऐसा कोई समझौता अभी तक नहीं हुआ है। बांग्लादेश तो यह मानने को भी तैयार नहीं है कि उसके कोई नागरिक भारत में घुसपैठ करके रह रहे हैं। हालांकि ये आरोप भी बहुत समय से लगते रहे हैं कि इस घुसपैठ को वास्तव में बांग्लादेश सरकारें ही बढ़ावा देती है क्योंकि उसका लक्ष्य ग्रेटर बांग्लादेश बनाने का है, जिसके लिए असम, पश्चिम बंगाल, और बिहार-झारखंड के कुछ इलाकों तक बांग्लादेशी नागरिकों को बड़ी संख्या में बसाया जा रहा है। यह सही है या गलत ये तो मुझे पता नहीं, लेकिन इतना स्पष्ट है कि भारत के ही कई राजनैतिक दल अपने फायदे के लिए इस काम में पूरा साथ देते आ रहे हैं।

घुसपैठियों को वापस कैसे भेजा जाएगा, यह तो आगे ही पता चलेगा, लेकिन मुझे लगता है कि जब इनकी नागरिकता खत्म होने के कारण वोटर लिस्ट से इनके नाम हट जाएंगे, तो इनमें नेताओं की दिलचस्पी भी खत्म हो जाएगी। इसके अलावा इन्हें मिलने वाली सारी सुविधाएं, सब्सिडी आदि भी छिन जाएगी तो यहां रहने में इनकी दिलचस्पी भी कम होने लगेगी। जब ताकत खत्म हो जाएगी, तो घुसपैठ का आकर्षण भी खत्म हो जाएगा। सरकार भी इन्हें वापस भेजने के लिए निश्चित रूप से कुछ न कुछ करेगी ही।

यह सब जानने के बाद मुझे ऐसा लगता है कि इतने सालों तक काँग्रेस वास्तव में घुसपैठियों को बुलाने, बचाने और बढ़ाने के लिए ही काम करती रही, जबकि भाजपा लगातार घुसपैठ को खत्म करने और देश को सुरक्षित बनाने की कोशिश कर रही है। इसीलिए इस मामले में मैं पूरी तरह भाजपा के साथ हूँ। और आप?

आपको लेख कैसा लगा? कृपया कमेन्ट में बताएँ।

(नोट: यह लेख इंटरनेट पर विभिन्न स्त्रोतों से मिली जानकारी पर आधारित है। यदि इसमें से कोई बात गलत हो, तो  कृपया मुझे जानकारी दें, ताकि मैं उसे सुधार लूँ।)

सभी चित्र गूगल से लिए गए हैं।

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