श्री गुरुजी को अटलजी की श्रद्धांजलि (जून 1973)

शूलों की शय्या पर इच्छा-मरण

– (श्री) अटलबिहारी वाजपेयी

(५ जून १९७३)
सवेरे का समय, चाय-पान का वक्त, पूजनीय श्री गुरुजी के कमरे में (उसे कोठरी कहना ही अधिक उपयुक्त होगा) जब हम लोग प्रविष्ट हुए तब वे कुर्सी पर बैठे हुए थे। चरण स्पर्श के लिए हाथ बढ़ाये। सदैव की भांति पाँव पीछे खींच लिये। मेरे साथ आये हुए स्वयंसेवकों का परिचय हुआ। उनमें आदिलाबाद के एक डॉक्टर थे। श्री गुरुजी विनोदवार्ता सुनाने लगे कि एक मरीज एक डॉक्टर के पास गया। डॉक्टर ने पूछा – क्या कष्ट है? सारी कहानी सुनाओ।

मरीज बिगड़ गया और बोला – अगर मुझे ही अपना रोग बताना है तो फिर आप निदान क्या करेंगे? बिना बताये जो बीमारी समझे, ऐसा डॉक्टर मुझे चाहिए। डॉक्टर एक क्षण चुप रहे। फिर बोले – ‘ठहरो, तुम्हारे लिए दूसरा डॉक्टर बुलाता हूँ।’ जो डॉक्टर आया, वह जानवरों का डॉक्टर था। बिना कुछ कहे सब कुछ समझ लेता था।

कथा सुनकर हँसी का फव्वारा फूट पड़ा। रात्रि भर के जागरण की थकान पल भर में दूर हो गयी। श्री गुरुजी स्वयं हँसी में शामिल हो गये। फिर एक और किस्सा सुनाया। हँसते-हँसते पेट में बल पड़ गये।

इतने में चाय आ गयी। चाय सबको मिली या नहीं, इसकी चिन्ता श्री गुरुजी स्वयं कर रहे थे। कौन चाय नहीं पीता, किसको दूध की आवश्यकता है, इसका उन्हें बड़ा ध्यान रहता था। सबके बाद स्वयं चाय ली। कप में नाम मात्र की चाय थी। उन्होंने उसे और कम करवाया। शायद हमारा साथ देने के लिये ही वे चाय-पान कर रहे थे। निगलने में बड़ा कष्ट था। साँस लेने में अत्यधिक पीड़ा थी।

किन्तु चेहरे पर थी वही मुक्त मोहिनी मुस्कान। हृदय-हृदय को हरने वाला हास्य। मुरझाये मन की कली-कली को खिलाने वाली खिलखिलाहट। निराशा, हताशा और दुराशा को दूर भगाने वाला दुर्दम्य आत्मविश्वास।

कमरे के किसी कोने में मौत खड़ी थी। शरीर छूट रहा था। एक-एक कर सभी बन्धन टूट रहे थे। महामुक्ति का मंगल मुहूर्त निकट था। एक क्षण के लिये मुझे लगा, शूलों की शय्या पर भीष्म पितामह मृत्यु की बाट जोह रहे हैं, इच्छा-मरण सुना भर था, आज आँखों से देख लिया।

सायंकाल उन्हें कुर्सी में ही बैठकर प्रार्थना करने के लिए कहा गया तथा रात्रि नौ बजकर पांच मिनट पर उन्होंने इहलोक यात्रा पूर्ण की।

अनन्त निद्रा में निमग्न
(६ जून १९७३)

हेडगेवार भवन। एक दिन में कितना अन्तर हो गया। कल सब शान्त था, आज शोक का निस्तब्ध चीत्कार हृदय को चीर रहा था। कल सब अपने काम में लगे थे, आज जैसे सब कुछ खोकर खाली हाथ खड़े थे। आँखों में पानी, हृदयों में हाहाकार, कभी न भरने वाला घाव, कभी न मिटने वाला दर्द।

पूजनीय श्री गुरुजी का पार्थिव शरीर दर्शन के लिये कार्यालय के कमरे में रखा था। आज उन्होंने मुझे चरण स्पर्श करने से नहीं रोका। अपने पाँव पीछे नहीं हटाये। हार पहनने में विरोध नहीं किया। सिर पर प्रेम से हाथ नहीं फेरा। प्यार भरी मुस्कान से नहीं देखा। हाल-चाल नहीं पूछा। वे अनन्त निद्रा में निमग्न थे। हंस उड़ चुका था, काया के पिंजड़े को तोड़कर पूर्ण में विलीन हो चुका था।

गुरुजी नहीं रहे। उनका विराट व्यक्तित्व छोटी-सी काय में कब तक कैद रहता? जीवन भर तिल-तिल जलकर लाखों जीवनों को आलोकित-प्रकाशित करने वाला तेजपुंज मुट्ठी भर हाड़-मांस के शरीर में कब तक सीमित रहता?

लेकिन गुरुजी हमेशा रहेंगे, हमारे जीवन में, हृदयों में, कार्यों में। अग्नि उनके शरीर को निगल सकती है, हृदय-हृदय में उनके द्वारा प्रदीप्त प्रखर राष्ट्रप्रेम तथा निस्स्वार्थ समाजसेवा की चिनगारी को कोई नहीं बुझा सकता।

डाउनलोड: श्री नरेन्द्र मोदी द्वारा लिखित पुस्तक: श्री गुरुजी – एक स्वयंसेवक डाउनलोड करने के लिए यहां क्लिक करें।

लेख स्त्रोत:
1. श्री गुरुजी – व्यक्तित्व एवं कृतित्व (डॉ. कृष्ण कुमार बवेजा)
2. http://bit.ly/1Gb7sOJ
3. http://bit.ly/1JvfIKo
4. http://bit.ly/1Ms8IOm
5. http://bit.ly/1Qbdgyj

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