हैलो ट्रैक्टर!

आज मैंने अफ्रीकी देश केन्या की एक कंपनी के बारे में खबर पढ़ी। इस कंपनी का नाम हैलो ट्रैक्टर है।

जैसे भारत में अक्सर हम लोग कहीं आने-जाने के लिए टैक्सी चाहिए हो, तो ओला या उबर के ऐप से कैब बुलवाते हैं, उसी तरह यह कंपनी केन्या में (और शायद नाइजीरिया में भी) किसानों को खेत जोतने के लिए छोटे ट्रैक्टर किराए पर उपलब्ध करवाती है।

मैंने जो लेख पढ़ा, उसके अनुसार इन अफ्रीकी देशों में ट्रैक्टर का औसत मूल्य लगभग ४० हज़ार डॉलर है। इतनी बड़ी रकम जुटाना हर किसान के लिए संभव नहीं है। कुछ मामलों में तो किसान कई सालों तक पैसे बचाकर इतनी रकम जमा पाता है कि ट्रैक्टर खरीद सके। लेकिन ट्रैक्टर खरीदने के बाद उसके रखरखाव, मरम्मत और ईंधन (पेट्रोल/डीज़ल) आदि का खर्च भी तो होता है! अफ्रीका के कुछ इलाकों में ये हाल है कि ट्रैक्टर का छोटा-सा पुर्जा भी खराब हो जाए, तो नया पुर्जा पाने और उसे बदलवाने में कई बार कुछ महीनों का समय भी लग जाता है। दूसरी समस्या ये भी है कि कई गांवों में खेतों में काम करने के लिए पर्याप्त संख्या में मजदूर भी नहीं मिलते।

हैलो ट्रैक्टर कंपनी ने इन समस्याओं को सुलझाने का प्रयास किया। उन्होंने ४० हजार डॉलर कीमत वाले बड़े ट्रैक्टर की बजाय मात्र ४ हजार डॉलर का एक छोटा ट्रैक्टर किसानों के लिए बनाया। इनके हर ट्रैक्टर में जीपीएस लगा हुआ है, जिससे ट्रैक्टर की लोकेशन पता चलती है। ट्रैक्टर खरीदने वाला किसान उसका उपयोग खुद के खेत में तो करता ही है, लेकिन इसके साथ ही वह अपने गांव में और आसपास के गांवों में भी दूसरे किसानों के खेत जोत देता है और इससे उसे अतिरिक्त कमाई होती है। इसके लिए कंपनी ने एक ऐप बनाया है। जिस किसान को ट्रैक्टर की ज़रूरत है, वह ऐप के माध्यम से कंपनी से संपर्क करता है। कंपनी का सिस्टम जीपीएस के माध्यम से पता लगाता है कि आसपास कहां ट्रैक्टर उपलब्ध है और उस ट्रैक्टर के मालिक को सूचना भेज देता है। यह वैसा ही है, जैसे उबर या ओला जैसी कंपनियां करती हैं।

अब ट्रैक्टर वाला किसान दूसरे किसान का खेत जोतता है और बदले में उसे पैसे मिलते हैं। शायद कंपनी भी इसमें कुछ हिस्सा लेती होगी। इस तरह तीनों को इसमें फायदा होता है। कंपनी का बिजनेस हो रहा है, जिसके पास ट्रैक्टर है उसे अतिरिक्त कमाई हो रही है और जिसके पास ट्रैक्टर खरीदने लायक पैसे नहीं है, वह कर्ज लेने या ट्रैक्टर खरीदने के बाद उसके ईंधन, रखरखाव और मरम्मत जैसे खर्चों के बोझ में दबे बिना कम खर्चे में अपने खेत के लिए ट्रैक्टर का फायदा उठा पाता है।

इसके अलावा इस ऐप के कुछ फायदे और भी हैं। जीपीएस के माध्यम से ही ऐप इस बात की निगरानी करता है कि ट्रैक्टर कितना चल चुका है। जब सर्विसिंग का समय आ गया हो, तो ऐप ही ट्रैक्टर के मालिक को इस बारे में रिमाइंडर भेज देता है। इसके कारण ट्रैक्टर का रखरखाव ठीक से करने में सुविधा होती है। इसी तरह अगर कोई पुर्जा खराब हो जाए, तो इसी ऐप के माध्यम से ट्रैक्टर का मालिक कंपनी को मैसेज भेजकर जानकारी दे देता है और कंपनी वह पुर्जा पहुंचाने की व्यवस्था करवा देती है।

यह पढ़ते समय मुझे कई बार लगा कि खेती की ऐसी ही समस्याएं तो अपने भारत में भी हैं। लेकिन मुझे मालूम नहीं कि ऐसी कोई कंपनी या सुविधा भारत के किसानों के लिए भी उपलब्ध है या नहीं। आप में से जो लोग खेती-किसानी से जुड़े हुए हैं या जो गांवों में रहते हैं, वे कृपया मुझे इस बारे में जानकारी दें।

गांवों से मेरा संपर्क ज्यादा नहीं रहा है और न खेती-किसानी के बारे में मुझे कोई जानकारी है। लेकिन मुझे ये मालूम है कि भारत के गांवों में जीवन बहुत कठिन है और किसानों के सामने बहुत सारी चुनौतियां हैं, जिन्हें सुलझाने के लिए हम सभी को मिलकर कोशिश करनी चाहिए क्योंकि हम सारे लोग किसान का उपजाया हुआ अन्न ही खाते हैं। मुझे लगता है कि भारत के युवाओं को और विशेषतः ग्रामीण क्षेत्रों के पढ़े-लिखे युवाओं को इधर-उधर भटकने या सिर्फ दूसरों की देखादेखी शहरों की तरफ भागने की बजाय इस तरह के नए विकल्पों के बारे में कुछ सोचना और करना चाहिए, जिससे उन्हें स्वयं को रोजगार भी मिले और ग्रामीण क्षेत्रों व किसानों की समस्याएं दूर करने में भी मदद मिले।

सिर्फ प्रत्यक्ष खेती ही नहीं, बल्कि उससे जुड़ी बहुत सारी चीजें हैं, जिनके लिए ऐसे कुछ नए प्रयोग या तकनीकों का उपयोग किया जा सकता है। इस बारे में अवश्य कुछ सोचा और किया जाना चाहिए। आपको अगर ऐसे प्रयासों में से किसी के बारे में जानकारी हो, तो कृपया मुझे भी बताएं।

(चित्र गूगल से)

Comments

comments

प्रातिक्रिया दे

आपका ईमेल पता प्रकाशित नहीं किया जाएगा.