मंत्रिमंडल विस्तार और अनुमान

कल में केंद्रीय मंत्रिमंडल में हुए परिवर्तन के बाद सबसे ज्यादा चर्चा स्मृति ईरानी के बारे में हो रही है। मैं कल से ही देख रहा हूं कि जो लोग मोदी सरकार के विरोधी हैं, वे यह कहकर खुशी जता रहे हैं कि स्मृति ईरानी की ‘छुट्टी’ कर दी गई है या ‘डिमोशन’ हो गया है। दूसरी ओर, जो मोदी सरकार के समर्थक हैं, उनका कहना है कि स्मृति ईरानी ने मानव संसाधन मंत्री के रूप में “जबरदस्त” काम किया था और अब उन्हें उप्र चुनाव में मायावती और प्रियंका गांधी को मुंहतोड़ जवाब देने के लिए मानव संसाधन मंत्री के पद से मुक्त किया गया है।

मैं इन दोनों ही बातों से असहमत हूं, इसलिए अपने विचार इस पोस्ट के माध्यम से रख रहा हूं। लेकिन सबसे पहले मैं आपको एक बात अवश्य कहना चाहता हूं। राजनीति का क्षेत्र इतना जटिल है कि जब कोई घटना होती है, तो कई बार उसमें सम्मिलित रहे लोग स्वयं भी पूरी तरह नहीं जान पाते कि क्या हुआ है और क्यों हुआ है। आप और मैं फेसबुक पर जो भी लिखते हैं, ये सब केवल हमारे विचार और अनुमान ही होते हैं, जो सही भी हो सकते हैं और गलत भी। इसलिए मैं ऐसा कोई दावा नहीं करता हूं कि जो मैं लिखता हूं केवल वही सत्य है। मैं केवल अपने विचार रख रहा हूं।

मैंने मोदीजी के टाइम्स नाऊ वाले इंटरव्यू के बाद कई लोग नाराज़ थे कि मोदीजी ने रघुराम राजन की खूब प्रशंसा की, डॉ. स्वामी का अपमान किया और मीडिया की इतनी चालबाजियों के बावजूद अरुण जेटली पर कोई कार्यवाही नहीं हो रही है। मैंने तब भी लिखा था कि राजनीति में जो दिखता है, अक्सर वास्तविकता उससे बहुत अलग होती है। इसलिए मीडिया में आने वाली खबरों के आधार पर हमें कोई राय नहीं बनानी चाहिए। उस दिन कई लोग मेरी बात से असहमत थे, लेकिन उनमें से कुछ को शायद अब मेरी वह बात सही लगे।

कल से आज तक सबसे ज्यादा चर्चा भले ही स्मृति ईरानी की हो रही है, लेकिन वास्तव में इस मंत्रिमंडल विस्तार में सबसे ज्यादा नुकसान अरुण जेटली जी का हुआ है। एक तो उनके हाथ से एक महत्वपूर्ण मंत्रालय छिन गया, दूसरा उनके वित्त राज्य मंत्री जयंत सिन्हा को वहां से हटा दिया गया, तीसरा दो नए वित्त राज्य मंत्री उनके विभाग में बिठा दिए गए। वास्तव में पिछले कुछ महीनों के भीतर ये जेटली जी को तीन बड़े राजनैतिक झटके मिले हैं। सबसे पहले तो उनके घोर विरोध और पूरे प्रयास के बावजूद भी डॉ. स्वामी को मोदीजी राज्यसभा में ले आए। डॉ. स्वामी ने आते ही गांधी परिवार और कई अन्य लोगों पर सीधे हमले शुरू कर दिए। उसके बाद मोदी सरकार ने रघुराम राजन को दूसरा कार्यकाल देने से मना कर दिया, और तीसरा कल मंत्रिमंडल विस्तार के बाद जेटली जी की शक्ति और कम कर दी। जिन लोगों को मोदीजी से शिकायत थी कि जेटली जी के विरुद्ध वे कुछ नहीं कर रहे हैं, उन लोगों को अपनी राय पर पुनर्विचार करना चाहिए।

आइये अब स्मृति जी की बात करें। सबसे पहले तो जो विरोधी खुश हो रहे हैं कि स्मृति की छुट्टी हो गई या डिमोशन हो गया, उन्हें इस गलतफहमी से निकल जाना चाहिए। स्मृति ईरानी पहले भी केबिनेट मंत्री थीं और अब भी हैं। उनको मंत्रिमंडल से हटाया नहीं है और न केबिनेट स्तर से हटाकर राज्य मंत्री के स्तर पर भेजा गया है, इसलिए छुट्टी या डिमोशन दोनों ही नहीं हुआ है।

दूसरी ओर जो समर्थक ये कहते हैं कि स्मृति ईरानी बहुत सफल मानव संसाधन मंत्री थीं, उनसे भी मैं असहमत हूं। 2014 में जब इस पद पर उनकी नियुक्ति हुई, उस दिन भी मैंने आशंका जताई थी कि वे इस पद के लिए उपयुक्त नहीं हैं। पिछले दो सालों में मेरी राय बदली नहीं है। उनके समर्थक उनकी उपलब्धियों के नाम पर कुछ तर्क गिनवा रहे हैं कि सीबीएसई का पाठ्यक्रम और सारी पुस्तकें अब ऑनलाइन मुफ्त उपलब्ध हैं, या इसी तरह के कई नए परिवर्तन उनके मंत्री बनने के बाद हुए हैं आदि। लेकिन अगर आप मेरी राय जानना चाहें, तो मैं नहीं मानता कि स्कूलों में बच्चों को मुफ्त यूनिफॉर्म या भोजन या पुस्तकें या ऐप्स मुफ्त उपलब्ध करवा देना इस पद पर बैठे व्यक्ति की कोई उल्लेखनीय उपलब्धि है। ये सब काम अवश्य होने चाहिए, लेकिन ये उपलब्धियां केवल चुनाव में गिनवाने के काम की हैं। वास्तविक काम जो करना आवश्यक था, वो ये है कि पिछले 60-65 वर्षों से अकादमिक संस्थानों में जहां भी गलत और भ्रष्ट लोग बैठे मलाई खा रहे हैं और राष्ट्र-विरोधी एजेंडा भी चला रहे हैं, उनको पद से हटाया जाता और उन पर कार्यवाही होती। सीबीएसई जैसे महत्वपूर्ण बोर्ड में सही व्यक्ति को मुखिया नियुक्त किया जाता। विश्वविद्यालयों में जो गड़बड़ियां चलती हैं, वे रुकतीं। शिक्षा-नीति में बहुत व्यापक परिवर्तन होना आवश्यक है, इसके लिए कोई नई, प्रभावी और व्यापक शिक्षा नीति प्रस्तुत की जाती (जो नई शिक्षा-नीति आई है, उसका ड्राफ्ट मैंने पिछले हफ्ते पढ़ा है उस पर बाद में चर्चा करेंगे)। लेकिन इनमें से कुछ भी नहीं हुआ।

ऐसा न होने के मुझे दो कारण दिखते हैं। एक तो मंत्री महोदया का शायद शिक्षा के क्षेत्र से कोई गहरा संबंध या अनुभव नहीं रहा है और न वे इस विषय की गहराई, महत्व, समस्याओं और उपायों से परिचित हैं। दूसरा ये बहुत संवेदनशील मामले हैं, इसलिए इस क्षेत्र में जो भी काम होना चाहिए, वह चुपके-से करना आवश्यक है। लेकिन 2 सालों में इसका उल्टा ही होता रहा। इस मंत्रालय में काम कर और शोरगुल ज्यादा चला। कभी रोहित वेमुला का मामला, कभी चेन्नई के आंबेडकर-पेरियार स्टडी सर्कल का झमेला, कभी जेएनयू और जादवपुर विश्वविद्यालय का बवाल ही सुनाई दिया। कन्हैया कुमार जैसे को भी नहीं संभाल सके और जेएनयू में इतनी बड़ी भारत विरोधी घटना होने के बावजूद कन्हैया कुमार को हीरो बनाने में मोदी विरोधी शक्तियां सफल रहीं। इसलिए मैं नहीं मानता कि स्मृति ईरानी के कार्यकाल में 2 वर्ष में मानव संसाधन मंत्रालय ने कोई ऐसा तीर मारा है, जिसके लिए मैं तालियां बजाऊं।

कुछ लोग इसी बात से खुश हैं कि स्मृति ईरानी बहुत तेज-तर्रार महिला हैं और इंटरव्यू में पत्रकारों को खूब खरी-खोटी सुनाकर उनका मुंह बंद कर देती हैं। वास्तव में मैं मानता हूं कि इससे नुकसान खुद ईरानी जी का और सरकार का ही होता है। पिछले साल भी आजतक वाले एक कार्यक्रम के बाद भी मैंने यही लिखा था कि उस कार्यक्रम में केवल आक्रामकता और शोरगुल करने की बजाय बेहतर ढंग से एंकरों को चुप करवाया जा सकता है। ये आक्रामकता चुनाव के पहले काम की है, मंत्री बनने के बाद नहीं, और मानव संसाधन जैसे संवेदनशील मंत्रालय में तो बिलकुल नहीं। वहां तो मंत्री को लो-प्रोफ़ाइल रहकर चुपचाप काम कर देना चाहिए, ताकि विरोधियों को ज्यादा कुछ करने का अवसर न मिल सके। लेकिन ऐसा हुआ नहीं, उल्टा ज्यादा आक्रमकता और मीडिया पर सीधे हमले करने के कारण स्मृति ईरानी और उनका मंत्रालय भी मीडिया के राडार पर सबसे ज्यादा बना रहा और सबसे ज्यादा विवादित भी रहा। इसके अलावा सारे बड़े और महत्वपूर्ण विषय 2 सालों बाद भी वैसे ही लटके पड़े हैं। हालांकि जावडेकर जी क्या और कितना कर पाएंगे, इस बारे में भी आशंकित हूं।

स्मृति ईरानी का मंत्रालय बदलने का एक कारण मैं ये भी मानता हूं कि जेटली जी की शक्ति कम करने के लिए उनके समर्थकों की शक्ति भी कम की गई है। मेरे ख्याल से ईरानी का उपयोग यूपी चुनाव में अवश्य होगा, लेकिन वहां भी उनकी भूमिका केवल आक्रामक भाषण देने तक सीमित रखी जाएगी। उत्तर प्रदेश के लिहाज से वे बाहरी ही हैं और वहां के जातिगत समीकरण में भी वे कहीं फिट नहीं होती हैं। दूसरा अगर उनको बहुत ज्यादा महत्व दिया गया, तो विरोधियों द्वारा रोहित वेमुला जैसे मुद्दे भी खूब उछाले जाएंगे क्योंकि दलित कार्ड उप्र में एक प्रमुख फैक्टर है। स्मृति ईरानी अगर बहुत ज्यादा फोकस में रहेंगी, तो कन्हैया कुमार जैसे लोगों को भी आगे किया जाएगा और इन सब बातों से भाजपा को हानि भी हो सकती है। इसलिए मुझे लगता है कि उनकी भूमिका तो रहेगी, लेकिन बहुत प्रमुख भूमिका नहीं। दूसरी ओर इसी कारण ये भी संभावना है कि मीडिया जानबूझकर स्मृति ईरानी को ज्यादा फोकस में रखेगा, ताकि इससे भाजपा को नुकसान और विरोधियों को लाभ हो।

क्या होगा या नहीं होगा, ये २०१७ में ही पता चलेगा। फ़िलहाल मैंने केवल अपना अनुमान बताया है, जो सही भी हो सकता है और गलत भी। आप भी मेरी बातों से सहमत भी हो सकते हैं और असहमत भी। आपकी सहमति और असहमति दोनों का ही स्वागत है।

(सभी चित्र गूगल से)

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