भारत-बांग्लादेश भूमि सीमांकन करार

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने अपनी बांग्लादेश यात्रा के दौरान कल भारत-बांग्लादेश भूमि सीमांकन करार पर हस्ताक्षर किए। इस करार के तहत भारत और बांग्लादेश के बीच ज़मीन की अदला-बदली की जाएगी। सोशल मीडिया पर कई लोग इस बात से नाराज़ हैं कि भारत ने अपने कुछ गाँव, कुछ ज़मीन बांग्लादेश को दे दी है। लेकिन आखिर यह करार क्या है, इसकी आवश्यकता क्यों पड़ी और इससे भारत का क्या फायदा या नुकसान होगा? आइये इसके समर्थन या विरोध में कोई राय बनाने से पहले इस मामले के सभी पहलुओं को समझ लें।

एन्क्लेव मानचित्र (ऊपर की ओर पूर्व दिशा है) केसरिया क्षेत्र भारत और नीला क्षेत्र बांग्लादेश है। दोनों देशों के एन्क्लेव बिंदुओं के रूप में दिखाई दे रहे हैं।

सन 1947 में भारत विभाजन के बाद रेडक्लिफ लाइन भारत और पूर्वी पाकिस्तान के बीच अंतर्राष्ट्रीय सीमा बन गई। सन 1971 में बांग्लादेश के निर्माण के बाद यही लाइन भारत और बांग्लादेश की सीमा बनी। विभाजन के बाद दोनों देशों के बीच सीमा-निर्धारण का कार्य शुरू हुआ, लेकिन कुछ क्षेत्रों के बारे में आपसी विवाद या रेडक्लिफ लाइन की अस्पष्टता के कारण यह जल्दी काम पूरा नहीं हो सका। उदाहरण के लिए, रेडक्लिफ ने जलपाईगुड़ी जिले को दो भागों में बांटकर इसके कुछ थाने भारत को और कुछ पाकिस्तान को दिए थे। दोनों देशों की सीमा इन थानों की सीमा के आधार पर निर्धारित की गई थी। लेकिन यह विभाजन करते समय रेडक्लिफ ने एक थाने का नाम ही सूची से छोड़ दिया था और इसी कारण मानचित्र भी गलत बना। यह थाना चारों तरफ से भारत से घिरा हुआ था, लेकिन भारतीय थानों की सूची में इसका नाम छूट जाने के कारण पाकिस्तान ने इस पर अपना दावा जता दिया। ऐसे सैकड़ों छोटे-छोटे टुकड़े, खेत और गांव थे, जो चारों ओर से दूसरे देश की ज़मीन से घिरे हुए थे। इन्हें एन्क्लेव कहा जाता है।

ये एन्क्लेव दूसरे देश की सीमा में होने के कारण इन तक सीधे पहुंच पाना संभव नहीं है। उदाहरण के लिए भारत का जो गांव चारों ओर से बांग्लादेश से घिरा हुआ है, वहां तक पहुंचने के लिए बांग्लादेश की सीमा में घुसना और बांग्लादेशी क्षेत्र से होकर गुजरना अनिवार्य है। स्वाभाविक रूप से इसके लिए बांग्लादेश की अनुमति आवश्यक है। इस जटिलता और सीमित पहुंच के कारण भारतीय पुलिस और प्रशासनिक व नागरिक सेवा के विभागों के लिए इन गांवों पर नियंत्रण रखना, निगरानी करना और नागरिक सुविधाएं प्रदान करना असंभव था। जैसे यदि इस गांव तक बिजली पहुंचानी हो, तो बांग्लादेश की ज़मीन से होकर ही बिजली के खंभे लगाने पड़ेंगे, जिसकी इजाजत बांग्लादेश से नहीं मिलती थी। इसी तरह कोई अपराध हो जाए, तो भारतीय पुलिस वहां तक नहीं पहुंच सकती। यही समस्या स्कूल कॉलेज, अस्पताल, बैंक, डाकघर जैसी सभी सुविधाओं के मामले में भी है क्योंकि बांग्लादेश की अनुमति के बिना इस गांव तक पहुंचा ही नहीं जा सकता। ऐसी समस्याओं के कारण आजादी के इतने सालों बाद भी आज तक इन गांवों में रहने वाले लोगों को कोई मूलभूत सुविधाएं नहीं मिल रही थीं। यही हाल उन बांग्लादेशी गाँवों का भी है, जो भारत की सीमा में हैं।

पुलिस और कानून-व्यवस्था के अभाव में ये गांव और ऐसे एन्क्लेव अपराधियों, स्मगलरों और घुसपैठियों की शरण-स्थली बन गए थे और यहां अपराध फल-फूल रहे थे, जिनसे निपटना दोनों देशों के लिए कठिन था। दोनों देशों के बीच स्पष्ट और निश्चित सीमा-रेखा न होने के कारण सीमा की सुरक्षा और निगरानी करना या कंटीले तारों की बाड़ लगाना भी असंभव था। इसी कारण ये एन्क्लेव बांग्लादेश से भारत में होने वाली घुसपैठ का एक बड़ा कारण भी थे।

बांग्लादेश का देबीडोबा एन्क्लेव: (सफेद रेखा के अंदर वाला टुकड़ा बांग्लादेश का है, चारों ओर की भूमि भारत की है)

सीमा-विवाद को सुलझाने के लिए सन 1958 में नेहरु और नून के बीच समझौता हुआ। इसके अंतर्गत दोनों देशों ने ये क्षेत्र एक-दूसरे को सौंप देने पर सहमति जताई। अर्थात भारत का जो क्षेत्र चारों ओर से बांग्लादेश से घिरा हुआ था, वह बांग्लादेश को सौंप दिया जाए और बांग्लादेश का जो क्षेत्र चारों ओर से भारत से घिरा था, वह भारत को सौंप दिया जाए। लेकिन इसके विरोध में सुप्रीम कोर्ट में कई मुकदमे दायर किए गए, जिसके कारण यह अदला-बदली नहीं हो सकी। आगे सन 1971 में बांग्लादेश की मुक्ति के लिए युद्ध शुरू हो गया, इस कारण यह काम फिर एक बार फंस गया। सन 1974 में इंदिरा गांधी और मुजीबुर्रहमान के बीच फिर एक बार भूमि सीमाकंन समझौता हुआ। लेकिन इसके कुछ प्रावधानों की स्वीकृति के लिए भारतीय संविधान में संशोधन आवश्यक था, जो राजनैतिक कारणों से नहीं हो सका और यह मामला लटका ही रहा। इसके अलावा भारत और बांग्लादेश की लगभग 4096 किमी की सीमा में से लगभग 6 किमी की सीमा रेखा भी अनिर्धारित ही थी।

इस समस्या को पूरी तरह सुलझाने के लिए सन 1997 में दोनों देशों ने ऐसे सभी एन्क्लेव की सूची तैयार की। इन सभी एन्क्लेव का पूरा विवरण एकत्र करने, यहां के निवासियों से बात करके उनकी राय लेने और यह समस्या सुलझाने हेतु दोनों सरकारों को व्यवहारिक सुझाव देने के उद्देश्य से सन 2001 में दो जॉइंट बाउंड्री वर्किंग ग्रुप बनाए गए। सन 2011 में भारत ने 1974 के भूमि सीमांकन समझौते के लिए अतिरिक्त प्रोटोकॉल पर हस्ताक्षर किए। इसके अंतर्गत दोनों देशों ने 162 एन्क्लेव की अदला-बदली पर सहमति जताई और यहां के निवासियों को अपनी नागरिकता चुनने का अधिकार दिया गया। इसके अनुसार जो 7110 एकड़ की जो बांग्लादेशी भूमि चारों ओर से भारत से घिरी हुई है, वह भारत को मिलेगी और 17160 एकड़ की जो भारतीय भूमि चारों ओर से बांग्लादेश से घिरी हुई है, वह बांग्लादेश की हो जाएगी। यहां के निवासी पीढ़ियों से इन गांवों में रहते आ रहे हैं, इसलिए वे अपनी ज़मीनें और गांव छोड़कर जाने के इच्छुक नहीं थे। अतः उन्हें इन्हीं स्थानों पर बने रहने की अनुमति दी गई है और उनका गांव जिस देश को मिला है, उन्हें भी अब उस देश की नागरिकता के सभी अधिकार मिल जाएंगे।

मानचित्र में दहाला खगराबाड़ी की स्थिति

इन गांवों और एन्क्लेव की स्थिति कुछ मामलों में बहुत ही जटिल थी। उदाहरण के लिए दहाला खगराबाड़ी एक ऐसा भारतीय एन्क्लेव है, जो चारों ओर से एक बांग्लादेशी एन्क्लेव से घिरा हुआ है, लेकिन यह बांग्लादेशी एन्क्लेव खुद भी चारों ओर से भारतीय एन्क्लेव से घिरा हुआ है और यह भारतीय एन्क्लेव बांग्लादेशी से घिरा हुआ है। अर्थात बांग्लादेश बांग्लादेश की सीमा में एक भारतीय एन्क्लेव, उस भारतीय एन्क्लेव के अन्दर एक बांग्लादेशी एन्क्लेव और उस बांग्लादेशी एन्क्लेव के भीतर यह दहारा खगराबाड़ी एन्क्लेव है। इसका क्षेत्रफल 2 एकड़ से भी कम है और यह जूट का एक खेत है। इसी तरह नातातोका एन्क्लेव केवल 0.00105 वर्ग किलोमीटर का एक टुकड़ा है, यह चारों ओर से बांग्लादेश से घिरा हुआ है।

इस तरह के अधिकांश एन्क्लेव केवल कागजों पर ही भारत या बांग्लादेश के थे, जबकि वास्तव में दोनों ही देश इनमें से कई एन्क्लेव पर 1947 से आज तक कभी गए ही नहीं! अब यह समझौता हो जाने के कारण ऐसे सारी उलझनें दूर हो जाएंगी और एक स्पष्ट सीमा रेखा दोनों देशों के बीच निर्धारित हो जाएगी।

दोनों देशों के बीच सीमा-रेखा निर्धारित हो जाने के कारण अब कई समस्याएं सुलझ जाएंगी। एक तो सीमा स्पष्ट होने से इसकी निगरानी और नियंत्रण सरल हो जाएगा। दोनों देशों के लोगों और सुरक्षा बलों के बीच इन एन्क्लेव और गांवों के नियंत्रण व अधिकार को लेकर जो वाद-विवाद और हिंसक झड़पें होती रहती हैं, वे भी अब बंद हो जाएंगी। इसके अलावा इन क्षेत्रों से होने वाली घुसपैठ और तस्करी को रोकना संभव होगा। यहां के निवासी सन 1947 से ही स्कूल, कॉलेज, अस्पताल, पुलिस, बैंक, डाकघर, बिजली आदि जैसी सभी आवश्यक सुविधाओं से वंचित थे, उन्हें अब ये सुविधाएं मिल सकेंगी। उन्हें नागरिकता के अधिकार भी मिल जाएंगे।

इन सभी बातों के कारण और इन गांवों व एन्क्लेव की जटिल भौगोलिक स्थिति व इन पर वास्तविक नियंत्रण रखने की अव्यावहारिक संभावना को देखकर मुझे लगता है कि यह समझौता सही और आवश्यक था। इससे भारत का ही लाभ ज्यादा होगा क्योंकि बांग्लादेश से होने वाली घुसपैठ और तस्करी भारत के लिए ही बड़ी समस्या है।

दहाला खगराबाड़ी का वास्तविक चित्र

कुछ लोग यह कहकर भी मोदी सरकार की आलोचना कर रहे हैं कि आज उन्होंने भारत की ज़मीन बांग्लादेश को सौंप दी है, कल इसी तरह कश्मीर भी पाकिस्तान को दे सकते हैं। लेकिन पूरा विवरण देखने पर यह स्पष्ट हो जाता है कि इन दोनों मामलों में बहुत ज्यादा अंतर है। इसलिए दोनों की तुलना किए बिना विरोध करना केवल राजनीतिक होगा, तार्किक नहीं। साथ ही, जिन कांग्रेस समर्थकों को इस मामले में मोदी से आपत्ति है, उन्हें यह सवाल अपने नेताओं से पूछना चाहिए कि नेहरु, इंदिरा और मनमोहन सिंह ने सीमा विवाद सुलझाने के लिए ये समझौते क्यों किए थे और मोदी सरकार द्वारा मई 2015 में लाए गए संविधान संशोधन विधेयक को कांग्रेस ने अपना समर्थन क्यों दिया था?

अब बताएं कि आपकी इस मामले पर क्या राय है? क्या आपको यह समझौता सही लगता है या आप अभी भी इसके विरोध में हैं? अपनी राय नीचे कमेन्ट बॉक्स में अवश्य लिखें।

डाउनलोड: इस समझौते का आधिकारिक दस्तावेज़ भारतीय विदेश मंत्रालय की वेबसाइट से डाउनलोड करने हेतु यहां क्लिक करें।

स्त्रोत:
1. http://en.wikipedia.org/wiki/Indo-Bangladesh_enclaves
2. http://en.wikipedia.org/wiki/Tin_Bigha_Corridor
3. http://en.wikipedia.org/wiki/Dahala_Khagrabari
4. http://bit.ly/1RUgLGK
5. http://bit.ly/1cEl1KC
6. http://bit.ly/1F2iv7B
7. http://www.newsbangladesh.com/english/details/5397

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