यूरोप से भारत का समुद्री मार्ग

राजनीति के अलावा इतिहास भी मेरा पसंदीदा विषय है।

इन दिनों मैं पुर्तगालियों के बारे में एक पुस्तक पढ़ रहा हूँ, जो इतिहास के लगभग ६०० साल पुराने कालखंड के बारे में है। ये वो दौर था, जब यूरोप के देशों में आपसी होड़ मची हुई थी कि भारत तक पहुँचने का समुद्री मार्ग ढूँढना है। कोलंबस भी भारत ही ढूँढने निकला था लेकिन वह वेस्ट इंडीज़ जा पहुँचा।

समुद्री मार्ग से भारत तक पहुँचने वाला पहला यूरोपीय नाविक वास्को डी गामा था, जो १४९८ में कालीकट आया था। उसके पहले भी कई दशकों तक पुर्तगाली यह मार्ग ढूँढने का प्रयास करते रहे। उन अभियानों में उनके कई नाविक मारे गए, कई जहाज बर्बाद हुए, और हर अभियान में विफलता ही हाथ लगी। वे अफ्रीका से आगे नहीं पहुँच पाए।

लेकिन यह बात भी बिल्कुल सही है कि हर विफलता कुछ न कुछ नया सिखाती भी है। पुर्तगालियों को भी अपने हर अभियान में कुछ न कुछ नई जानकारी मिलती गई और अंततः ये सारी कड़ियाँ जोड़कर वे पुर्तगाल से केन्या तक पहुँचने में सफल हुए, जहाँ से आगे एक गुजराती मुस्लिम व्यापारी की मदद से वास्को डी गामा कालीकट तक पहुँच पाया।

अभी मैंने यह पुस्तक पूरी नहीं पढ़ी है। अभी तक जितना पढ़ा है, उसमें पुर्तगाली राजाओं के प्रारंभिक प्रयासों, विफलताओं, योजनाओं और अंततः वास्को डी गामा की कालीकट तक की यात्रा का वर्णन है। ये पूरा वर्णन बहुत रोचक और विस्तृत है। मुझ जैसे इतिहास के शौकिया छात्र के लिए तो यह बहुत ज्ञानवर्धक भी है। पुस्तक में छोटी-छोटी बातों और घटनाओं का भी विस्तार से वर्णन है, जो मुझे बहुत उपयोगी लगा, जैसे उस समय के पुर्तगाली और योरोपीय जहाज कैसे थे, किस तरह बनाए जाते थे, उन लोगों के पास किस तरह के नक्शे उपलब्ध थे, इतनी लंबी समुद्री यात्रा के लिए किस तरह की तैयारियां की जाती थी, यात्रा के दौरान क्या-क्या चुनौतियां आती थीं, कई-कई महीनों तक चलने वाली इन यात्राओं के दौरान, भोजन, पानी, मनोरंजन, बीमार पड़ने पर उपचार आदि की क्या व्यवस्था रहती थी, किसी की मौत हो जाए तो क्या करते थे, इस अभियान के लिए वास्को डी गामा का चयन कैसे हुआ, उसे कितना धन मिला, कितने जहाज, कितने लोग और कितना सामान उसके साथ भेजा गया, कोलंबस को क्यों नहीं चुना गया आदि बहुत सारी बातों की नई जानकारी मुझे इसमें मिली।

इसके अलावा कालीकट पहुँचने के बाद से लेकर वापस पुर्तगाल लौटने तक का वर्णन जिस अध्याय में है, उसमें मुझे भारत की तत्कालीन व्यवस्था, कालीकट के राजा का वर्णन, वहाँ की सामाजिक स्थिति, राजनीति आदि के बारे में भी बहुत सारी जानकारी मिली।

अभी तक मैंने जितना पढ़ा है, उससे मेरी बहुत सारी पुरानी धारणाएं बदल रही हैं। अब पता चल रहा है कि बहुत-कुछ जो पहले पढ़ा-सुना था, वो बहुत अधूरा या कई मामलों में पूरी तरह गलत था। उसे सुधारने का मौका अब मिल रहा है। लेकिन यह विषय सिर्फ पुर्तगालियों तक सीमित नहीं है। इसमें चीनी, अरबी, स्पेनी, फ्रांसीसी, अंग्रेज आदि कई अन्य खिलाड़ी भी शामिल थे। अब यह पुस्तक पूरी करने के बाद मैं एक-एक करके इन सबके बारे में भी पढ़ने वाला हूँ। इसके अलावा मैं इन दिनों दो पुस्तकें और पढ़ रहा हूँ, जिनमें से एक इस्लाम के प्रारंभ से लेकर अब तक के पूरे इतिहास के बारे में है और दूसरी ईस्ट इंडिया कंपनी के इतिहास के बारे में है, जिसमें अमरीका से लेकर अफ्रीका, भारत और इंडोनेशिया तक फैली इस कंपनी की गतिविधियों का पूरा वर्णन है। इस तरह की कई और पुस्तकें मैं आगे पढ़ने वाला हूँ। भारत के पिछले हजार वर्षों के इतिहास को अच्छी तरह समझने में और कुछ पुरानी गलत धारणाओं और जानकारी को सुधारने में इससे बहुत मदद मिल रही है।

पुर्तगालियों वाली इस पुस्तक से अब तक दो-तीन मुख्य बातों का संकेत मुझे मिल गया है। उस समय का यूरोप बहुत गरीब था और भारत विश्व का सबसे समृद्ध देश था, इस बात का वर्णन उन्हीं यूरोपियों की पुस्तकों में लिखा हुआ है। भारत के साथ व्यापार करना उनका एक उद्देश्य था, लेकिन उनके पास ऐसी कोई वस्तु ही नहीं थी, जो भारत में उपलब्ध किसी भी उत्पाद से श्रेष्ठ हो और जिसके बदले वे यह से रत्न, मसाले और वस्त्र आदि ले जाकर यूरोप में बेच सकें। इसलिए उन्हें शुरू में बहुत कठिनाई हुई। ये समस्या हल कैसे हुई, इसका वर्णन मैं फिर कभी लिखूँगा।

दूसरी बात यह स्पष्ट हो गई कि व्यापार के अलावा धर्मांतरण उनका बहुत बड़ा उद्देश्य था। पूरी दुनिया में ईसा मसीह का संदेश फैलाना और अन्य मजहबों को नष्ट करके सबको ईसाई बनाना उनका एक घोषित लक्ष्य था। ऐसे समुद्री अभियानों के लिए पोप से अनुमति मांगते समय एक बड़ा कारण यही दिया जाता था। ये इस्लाम और ईसाइयत के बीच धर्मयुद्धों (क्रूसेड/जिहाद) वाला दौर भी था। ये भी एक कारण था कि यूरोप के लोग अरब और मध्यपूर्व के ज़मीनी मार्ग से भारत के साथ व्यापार करने की बजाय समुद्री मार्ग खोज रहे थे, ताकि इस्लामी राज्यों से गुज़रे बिना ही व्यापार किया जा सके। उस दौर की कई व्यापारिक और सैन्य लड़ाइयों का एक बड़ा कारण यह धार्मिक खींचतान भी थी।

इसके विपरीत भारत के समुद्र तटीय प्रदेशों में हिन्दुओं और मुसलमानों के बीच कटुता या वैमनस्य न के बराबर था। इनमें से बहुत-से इलाकों में इस्लाम व्यापार के माध्यम से फैला था, तलवार के माध्यम से नहीं। इसलिए दोनों समुदायों के बीच समन्वय अधिक और संघर्ष बहुत कम था। कुछ राज्यों में तो दोनों के बीच आपसी सहमति भी थी कि हिन्दू सुअर का मांस नहीं खाएँगे और मुसलमान गाय-बैल का मांस नहीं खाएँगे। इस तरह दोनों एक-दूसरे की धार्मिक मान्यताओं का आदर करते हुए सौहार्द्रपूर्वक रह रहे थे। लेकिन बाद में यूरोपीय लोगों ने इसमें दरारें डालनी शुरू की। इसकी शुरुआत तो वास्को डी गामा के समय में पुर्तगालियों ने ही कर दी थी, लेकिन इसे बाद में ईस्ट इंडिया कंपनी ने और अंग्रेज़ों ने और आगे बढ़ाया, जिसके दंश हिन्दू और मुसलमान दोनों ही आज तक झेल रहे हैं।

व्यापार के मामले में भी अफ्रीका से इंडोनेशिया और चीन तक हिन्द महासागर के पूरे क्षेत्र में लगभग शान्ति थी। व्यापारिक प्रतिस्पर्धा तो स्वाभाविक थी, लेकिन समुद्री मार्ग पर, समुद्री व्यापार पर या पूरे महासागर पर ही एकाधिकार कर लेने की नीयत यहाँ के किसी भी शासक या व्यापारी की कभी नहीं रही। कुछ उचित नियमों के अधीन व्यापार बेरोकटोक चलता था और वे नियम सबके लिए बराबर थे, इसलिए किसी के साथ कोई भेदभाव नहीं था, जिसके कारण संघर्ष भी न के बराबर था। लेकिन यूरोपियों ने ही धीरे-धीरे इस व्यवस्था को भी तहस-नहस किया, जिसके कारण अगली कुछ शताब्दियों तक अरब और अफ्रीका से लेकर भारत और इंडोनेशिया तक का पूरा क्षेत्र अस्थिर हो गया और ये अव्यवस्था व संघर्ष आज तक जारी है। उसकी शुरुआत भी पुर्तगालियों के समय ही हो गई थी, लेकिन अंग्रेजों, फ्रांसीसी, डच, स्पेनी आदि सभी यूरोपीय देश इस पाप में बराबर के भागीदार हैं।

बहुत सारी बातें जैसी मैं पहला समझता था, वैसी नहीं हैं। बहुत-सी पुरानी जानकारी गलत थी और बहुत-सी नई जानकारी मुझे अब मिल रही है। आगे जैसे-जैसे और पढूँगा, तब आप तक भी उसमें से थोड़ी-बहुत बातें पहुँचाता रहूँगा। वैसे भी यह विषय एक पोस्ट में समेटने का नहीं है। मैं धीरे-धीरे पिछले ३-४ हजार वर्षों का पूरी दुनिया का इतिहास पढ़ रहा हूँ और एक-एक करके अलग-अलग कड़ियों को जोड़कर विषय के सभी पहलुओं को समझने की कोशिश कर रहा हूँ। इन पहलुओं में केवल इतिहास नहीं है, बल्कि राजनीति, व्यापार, धर्म, तत्कालीन सामाजिक स्थितियाँ आदि बहुत-कुछ शामिल हैं। ये सब पढ़ने और समझने में निःसन्देह मुझे कई वर्ष लगेंगे। ये सब एक लेख में समेटकर स्पष्ट नहीं किया जा सकता। ये कई पुस्तकों का विषय है। फिलहाल तो मैं समय-समय पर अपने लेखों के माध्यम से आप तक थोड़ी-बहुत जानकारी पहुँचाता रहूँगा। संभव है कि आपको भी कुछ नया जानने को मिल जाए और आपकी भी कुछ पुरानी धारणाएँ बदल जाएँ। सादर!

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