काश्मीर में भाजपा-पीडीपी का गठबंधन

कुछ भाजपा समर्थक मित्रों की राय है कि मुफ़्ती की हरकतों को देखते हुए भाजपा को तुरंत कश्मीर सरकार से समर्थन वापस ले लेना चाहिए। लेकिन शायद प्रबल भावनाओं के प्रभाव में उन्होंने इस बात पर ध्यान नहीं दिया है कि इससे समस्या हल नहीं होगी बल्कि बढ़ेगी।
1. स्वाभाविक है कि भारत विरोधी विचारधारा वाले लोग नहीं चाहते कि जम्मू-कश्मीर सरकार में ऐसे लोगों का

प्रभाव बढ़े, जिनकी निष्ठा भारत के प्रति है। इसलिए सरकार में भाजपा की हिस्सेदारी से कइयों को दर्द हो रहा है। आज जब इस आतंकी की जमानत का विरोध हो रहा है तो विपक्षी दलों के लोग सवाल भाजपा से ही पूछ रहे हैं, मुफ़्ती से नहीं। वे भाजपा को उकसा रहे हैं कि वह मुफ़्ती सरकार से समर्थन वापस ले ले। इसका कारण साफ़ है कि वे कश्मीर की सरकार में राष्ट्रवादी प्रभाव को कम करना चाहते हैं। भाजपा समर्थन वापस ले लेगी तो वे अपना समर्थन देकर मुफ़्ती सरकार को बचा लेंगे।
2. बहुत से मित्रों का ध्यान इस बात पर नहीं है कि जम्मू-कश्मीर में विधानसभा के अलावा एक विधान परिषद भी है। परिषद के सदस्यों का चुनाव विधानसभा के सदस्य करते हैं। पहली बार विधानसभा में बड़ी संख्या में राष्ट्रवादी विचारधारा वाले लोग पहुंचे हैं। स्वाभाविक है कि वे परिषद के लिए भी राष्ट्रवादी विचारधारा वालों का चुनाव करेंगे।
3. किसी भी राज्य की कोई भी समस्या आप उस राज्य की असेंबली में बहुमत के बिना हल नहीं कर सकते। कश्मीर पर भी यही बात लागू है। जिनको भाजपा से उम्मीदें हैं वो इस बात को समझते होंगे कि कश्मीर की समस्याएं तब तक हल नहीं होंगी, जब तक वहां भाजपा को पूर्ण बहुमत न मिल जाए। भाजपा को पूर्ण बहुमत तब तक नहीं मिलेगा, जब तक काश्मीर घाटी के इलाके में भाजपा का जन-समर्थन न बढ़ जाए। इस लक्ष्य को पूरा करने की एक बड़ी आवश्यकता लाखों कश्मीरी शरणार्थियों को वापस उनकी जमीनों पर बसाना है। उसके लिए केंद्र सरकार और कश्मीर सरकार दोनों को विशेष प्रावधान करने होंगे। इसलिए ज़रूरी है कि दोनों सरकारों में भाजपा की हिस्सेदारी हो।
4. सौ बात की एक बात ये है कि उस अलगाववादी को आरोपों और मुकदमों से बरी नहीं किया गया है। उसे सिर्फ ज़मानत पर रिहाई मिली है। और ऐसा पहली बार नहीं हुआ है कि वह जेल से ज़मानत पर निकला है। आज राजनाथ सिंह जी संसद में बताया कि उस व्यक्ति पर 27 मुक़दमे चल रहे हैं। उसे ज़मानत भी सशर्त मिली है। तो समझने वालों को इशारा काफी होना चाहिए कि कल फिर इनमें से किसी न किसी मुक़दमे में उसे ज़मानत की शर्तों के उल्लंघन के लिए अंदर किया जा सकता है या कोई नया अपराध पता चलने पर फिर एक मुकादम दर्ज करके जेल भेजा जा सकता है।
5. राजनीति में सारी बातें खुलेआम घोषणा करके नहीं की जा सकतीं और न ही भावनाओं के आवेश में तुरंत कोई निर्णय लेकर लंबी अवधि के लिए नुकसान उठाना समझदारी है। इसलिए मेरा अनुरोध है कि थोड़ा धैर्य रखें।
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(चित्र वीकिपीडिया से)

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