भारत के अदृश्य (प्रथम) नागरिक!

भाजपा और उसके सहयोगी दलों ने जब श्री रामनाथ कोविंद को राष्ट्रपति पद के लिए अपना प्रत्याशी घोषित किया, तो बंगाल की मुख्यमंत्री सुश्री ममता बनर्जी ने कथित रूप से पत्रकारों से पूछा था: ये रामनाथ कोविंद कौन है?

और ऐसा पूछने वाली वे अकेली नहीं थीं।

सोशल मीडिया पर भी कई लोगों ने कहा कि रामनाथ कोविंद को कोई नहीं ‘पहचानता’ और वे कोई ‘बड़े’ नेता नहीं हैं। इसलिए जिन लोगों ने उनका नाम नहीं सुना था, उन्हें लगा कि भाजपा ने केवल वोटबैंक की राजनीति के लिए एक दलित को अपना प्रत्याशी बनाया है और ऐसा करके राष्ट्रपति पद की गरिमा घटाई है।

श्री रामनाथ कोविंद बिहार के राज्यपाल हैं। वे भूतपूर्व प्रधानमंत्री मोरारजी देसाई के निजी सहायक रह चुके हैं। वे लगभग बीस वर्षों तक हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट में वकालत करते रहे हैं। वे बारह वर्षों तक भाजपा की ओर से राज्यसभा के सदस्य रहे हैं और संसदीय समितियों में उन्होंने सक्रिय भूमिका निभाई है। वे भाजपा दलित मोर्चा के अध्यक्ष थे। वे इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ मैनेजमेंट के बोर्ड मेंबर थे और वे संयुक्त राष्ट्र में भारत का प्रतिनिधित्व भी कर चुके हैं।

आप शायद सोच रहे होंगे कि इस बायोडेटा में ऐसा कुछ भी नहीं है, जिसे भारत के राष्ट्रपति पद की योग्यता माना जाए, ले

किन वास्तव में इसके बावजूद भी यह पूर्व इस विशिष्ट पद पर रहे कुछ लोगों के बायोडेटा से यह बेहतर ही है। इसलिए श्री कोविंद के विरोध का एकमात्र कारण यही प्रतीत होता है कि अन्य नेताओं के समान प्रसिद्ध नहीं हैं।

वे ‘हम में से एक’ नहीं हैं।

क्या कारण है कि इतने सारे राजनैतिक पदों पर काम करने के बावजूद उन्हें वे ज्यादा प्रसिद्ध नहीं हैं? वे हमेशा मीडिया और आम जनता की नज़रों से अदृश्य क्यों रहे? आखिर उनकी ओर कभी हमारा ध्यान क्यों नहीं गया?

जब से राष्ट्रपति पद के लिए श्री कोविंद के नाम की घोषणा हुई है, उसके बाद से अनेक सामाजिक विश्लेषकों, बुद्धिजीवियों और पत्रकारों ने ये सवाल पूछे हैं।

राजनैतिक विश्लेषक स्वपन दासगुप्ता ने ट्विटर पर लिखा: ““कोविंद कौन हैं?” यह प्रश्न भारत की राजनैतिक पत्रकारिता की अवस्था दर्शाता है, जो एक छोटे-से समूह और उत्तराधिकारी “स्त्रोतों” पर आधारित व्यवस्था है।”

मैंने एक बात का उल्लेख नहीं किया था कि सन २०१० में कोविंद जी भाजपा के राष्ट्रीय प्रवक्ता भी रहे हैं। प्रवक्ता होने के कारण वे मीडिया को इंटरव्यू देने या किसी भी मुद्दे पर पार्टी की राय बताने के लिए उपलब्ध रहते थे। लेकिन हमने उन्हें शायद ही कभी देखा या उनके बारे में कुछ सुना होगा, जबकि भाजपा के मीडिया रूम में माइक, कैमरा या नोटपैड लेकर आने वाले हर पत्रकार के लिए वे उपलब्ध रहते थे। वे पार्टी के आधिकारिक वक्ता थे, किन्तु फिर भी उनकी आवाज़ को मीडिया ने कभी महत्वपूर्ण नहीं माना।

मीडिया में जो लोग ये तय करते हैं कि ‘असली खबर’ क्या है, शायद उन्हें नहीं कभी नहीं लगा कि कोविंद जी की आवाज़ महत्व देने लायक है। वरिष्ठ पत्रकार नितिन गोखले ने ट्विटर पर लिखा: “न्यूज़ टीवी पर बुलाए जाने वाले मेहमानों के मामले में वरिष्ठता का एक अलिखित क्रम है। आप चाहे इसे जाति के आधार पर भेदभाव कह सकते हैं, लेकिन यही कड़वा सच है।”

उस दौर में कई पत्रकार कोविंद जी को अनदेखा कर देते थे। शायद मीडिया के लोगों की नज़र में वे अन्य प्रवक्ताओं जितने प्रभावी या आकर्षक नहीं थे। शायद पत्रकारों ने स्वयं ही यह राय बना ली थी कि अगर रामनाथ कोविंद को टीवी पर बुलाया गया, तो उनमें बहुत कम ही लोगों की दिलचस्पी होगी।

इस बात को एक पत्रकार ने एकदम स्पष्ट रूप से स्वीकार किया, जब हाल ही में उन्होंने अपने Facebook पोस्ट में लिखा कि कोविंद जी की साउंड-बाइट लेने में उस समय के पत्रकारों की कोई दिलचस्पी नहीं थी। वे लिखते हैं, “लेकिन हम लोग – जिनके पास सर्वशक्तिमान माइक होता था – रविशंकर प्रसाद या राजीव प्रताप रूडी या यहाँ तक कि प्रकाश जावडेकर की प्रतीक्षा में दिन-भर बैठे रहते थे। लेकिन हम कभी भी कोविंद जी की बात रिकॉर्ड नहीं करते थे।”

इतना ही नहीं, उन्होंने आगे यह भी लिखा कि इसके लिए केवल वे रिपोर्टर दोषी नहीं हैं। जो लोग मीडिया संस्थानों के कार्यालयों में बैठते हैं और इस बात का निर्णय लेते हैं कि बहस की दिशा क्या हो, वे भी इस बात के लिए उतने ही ज़िम्मेदार हैं। “किसी दिन अगर अन्य प्रवक्ता बिल्कुल ही उपलब्ध न हों, तो मैं अपने ऑफिस के लोगों से कोविंद जी को रिकॉर्ड करने के बारे में पूछता था, लेकिन वे लोग फिर भी मना कर देते थे।”

हालांकि, कोविंद जी ऐसे पहले या आखिरी व्यक्ति नहीं हैं, जिनकी इस तरह उपेक्षा की गई। एक अन्य वरिष्ठ पत्रकार मृत्युंजय कुमार झा ने कहा कि वर्तमान प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी को भी अपने राजनैतिक जीवन में इसी तरह की परिस्थिति से गुज़रना पड़ा था। उन्होंने ट्विटर पर लिखा, “मुझे वे दिन याद हैं, जब मोदी जी भाजपा मुख्यालय में रहा करते थे, और हर पत्रकार उनकी बाइट रिकॉर्ड करता था, लेकिन स्टूडियो में बैठे संपादक उसके प्रसारण की अनुमति नहीं देते थे।”

कोविंद जी आज देश के सर्वोच्च संवैधानिक पद पर विराजित होने की दिशा में बढ़ रहे हैं, लेकिन देश में अभी भी उनके जैसे हजारों लोग हैं, जो देखे और सुने जाने की प्रतीक्षा कर रहे हैं। जब भी जाति-आधारित भेदभाव की बात होती है, तो अक्सर हमारा ध्यान रुढ़ियों और पारंपरिक नियमों के आधार पर चलने वाली संस्थाओं पर ही जाता है, लेकिन हम यह भूल जाते हैं कि वास्तव में यह भेदभाव आधुनिक लगने वाले और निष्पक्ष होने का दावा करने वाले संस्थानों सहित, सामाजिक संरचना के सभी स्तरों में व्याप्त है।

किसी भी डर या भेदभाव के बिना प्रश्न पूछना ही इसे सुनिश्चित करने का एकमात्र तरीका है।

आज रामनाथ कोविंद देश के उस नव-मध्यमवर्ग के वास्तविक प्रतिनिधि हैं, जो लगातार पुरानी सीमाओं से संघर्ष कर रहा है और उन्हें तोड़ रहा है। कोविंद जी को राष्ट्रपति पद का प्रत्याशी बनाकर प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी और भाजपा के नेतृत्व ने समाज के उपेक्षित वर्ग से एक ऐसे व्यक्ति को चुना है, जिसने अनेक कठिनाइयों के बावजूद मुख्यधारा में आने में सफलता पाई।

कोविंद जी ने हमारे समाज के कठोर वास्तविकताओं के विरुद्ध संघर्ष करके अपना विशिष्ट स्थान बनाया है। सत्ताधारी गठबंधन के राष्ट्रपति प्रत्याशी के रूप में उनका नामांकन उन सभी अदृश्य नागरिकों का सम्मान है, जो आज भी उपेक्षित हैं और मुख्यधारा में आने व अपनी बात सुनाने के लिए संघर्षरत हैं।

(नोट: यह भाजपा युवामोर्चा के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष और दिल्ली विश्वविद्यालय में राजनैतिक विज्ञान के प्राध्यापक श्री स्वदेश सिंह के लेख का हिन्दी अनुवाद है। मूल अंग्रेज़ी लेख यहां उपलब्ध है।)

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