अकेलापन…

लोग आते रहे-जाते रहे
मैं अकेला था,
अकेला ही रहा।

हर बार कोई आने वाला,
कुछ साथ लिए आता है।
जाते-जाते जाने वाला,
टुकड़ा मन का ले जाता है।

ऐसे टुकड़े मेरे मन के,
बनते रहे, बिखरते रहे।
उन सभी अकेले टुकड़ों में,
मैं अकेला था, अकेला ही रहा।

जीवन एक यात्रा है अनंत,
सदियों तक चलती जानी है।
यह एक जन्म की व्यथा नहीं,
कई जन्मों की कहानी है।

सौ जन्मों की इस यात्रा में,
लोग मिलते रहे, बिछड़ते रहे।
उन सभी अकेले जन्मों में,
मैं अकेला था, अकेला ही रहा।

यही अकेलापन मेरा,
जन्मों-जन्मों का साथी है।
जब कोई साथ नहीं होता,
तब याद इसी की आती है।

इन बार-बार की यादों में,
ये आता रहा, जाता रहा।
इससे मिलकर मैंने जाना,
मैं अकेला न था, अकेला नहीं रहा।

-सुमंत.

 

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10 thoughts on “अकेलापन…”

  1. जे बात! …अब कविता भी…बहुत खूब…लेकिन ईमानदारी से बोलूं तो मुझे तुम्हारे गद्य की प्रतीक्षा रहती है। लेकिन इसका कतई यह अर्थ नहीं है कि कविता कहीं से भी कमजोर है। और हाँ…. सुमंत न अकेला था, न है और न रहेगा…. !

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