मालदीव: हिन्द महासागर में द्वीपों का देश

कुछ तथ्य:
क्षेत्रफल– ९० हजार वर्ग किमी (केवल २९८ वर्ग किमी भूमि)
कुल द्वीप – ११९० (मानव बस्ती केवल १८८)
जनसंख्या – ४ लाख ७ हजार
राजधानी – माले (जनसंख्या १ लाख १६ हज़ार)
स्थानीय समय – जीएमटी +५
भाषा – दिवेही (आधिकारिक), अंग्रेज़ी
धर्म – इस्लाम (१००%)
मुद्रा – रुफिया

मालदीव का मानचित्र (वीकिपीडिया से)

भारत के दक्षिण पश्चिम में लक्षद्वीप से कुछ ही दूरी पर एशिया का सबसे छोटा देश ‘मालदीव’ स्थित है। यह ९० हजार वर्ग किमी में फैले १९ प्रवाल द्वीपसमूहों (स्थानीय भाषा में एटोल) की एक श्रृंखला है, जिसमें लगभग ११९२ द्वीप हैं। लेकिन इसका १ प्रतिशत से भी कम, केवल २९८ वर्ग किमी, क्षेत्र ही भूमि है; शेष पानी है। इन ११९२ में से केवल १८८ द्वीपों पर ही मानव-बस्ती है। यह भौगोलिक रूप से विश्व का सर्वाधिक बिखरा हुआ देश और क्षेत्रफल व जनसंख्या के मामले में एशिया का सबसे छोटा देश है। इसकी कुल जनसंख्या लगभग ४ लाख ७ हजार है। साथ ही, यह विश्व की सबसे नीची भूमि भी है।

नामकरण:
मालदीव का इतिहास कम से कम ढाई हजार वर्ष पुराना है। इसका प्राचीन संस्कृत नाम ‘मालाद्वीप’ (द्वीपों की माला) था। वास्तव में मानचित्र में भी यह द्वीपों की माला या हार जैसा ही दिखाई देता है। तमिल, मलयालम, कन्नड़ आदि भाषाओं में भी इसके प्राचीन नाम इसी अर्थ वाले थे। वैदिक काल में इसे लक्षद्वीप (एक लाख द्वीपों का समूह) का ही एक भाग माना जाता था। श्रीलंका में पाली भाषा के प्राचीन ग्रंथ ‘महावंश’ में एक ‘महिलाद्वीप’ का उल्लेख मिलता है, जिसे मालदीव माना गया था, लेकिन संभवतः वह हमारे लक्षद्वीप का मिनिकॉय द्वीप है। मालदीव को महलद्वीप भी कहा जाता था। इसी से मालदीव की राजधानी का नाम ‘महा-ले’ (माले) पड़ा है क्योंकि जिस द्वीप पर वर्तमान माले शहर है, वहीं मालदीव के राजा का महल था और तब यह महलद्वीप कहलाता था।

संक्षिप्त इतिहास और वर्तमान शासन प्रणाली:
हिन्द महासागर के मुख्य समुद्री मार्ग पर स्थित होने के कारण प्राचीन काल से ही मालदीव का रणनीतिक महत्व रहा है। मालदीव की मौखिक, सांस्कृतिक व भाषाई परंपराओं के अध्ययन के आधार पर यह प्रमाणित हुआ है कि यहां सबसे पहले बसने वाले लोग तमिलनाडु और केरल के दक्षिणी तटों व श्रीलंका के उत्तरी तटों से आए नाविक थे। इन्हीं लोगों ने यहां के एक द्वीप पर अपना शहर बसाया, जो अब मालदीव की राजधानी माले है। संभवतः देबल बंदरगाह (जो वर्तमान पाकिस्तान के कराची के पास था) से  कुछ सिंधी नाविक भी यहां आए थे। जातक कथाओं व पुराणों में भी इस द्वीप से भारत व श्रीलंका के बीच होने वाले व्यापार का उल्लेख मिलता है।

प्राचीन काल में यहां हिन्दू राज्य था और यहां के शासक सूर्यवंशी थे। दसवीं शताब्दी में एक चन्द्रवंशी राजा ने उन्हें हराकर माले पर अधिकार प्राप्त कर लिया। इस प्रकार मालदीव पर सूर्यवंशी और चन्द्रवंशी दोनों राजवंशों के शासक रहे थे। आगे इन दो वंशों के बीच कुछ वैवाहिक संबंध भी बने। इसी कारण सन १९६८ में राजशाही समाप्त होने तक यहां के राजाओं के आधिकारिक उपाधियों में ‘कुल सुधा इरा’ शब्द भी रहते थे, जिनका अर्थ है -‘सूर्य और चन्द्र के वंशज’।

सम्राट अशोक के काल में बौद्ध धर्म मालदीव भी पहुंचा और आगे बारहवीं शताब्दी तक यहां बौद्ध धर्म का प्रभाव रहा। उस काल के अनेक बौद्ध स्तूपों, मूर्तियों आदि के अवशेष यहां के कुछ द्वीपों पर मिले थे, जिनमें से कुछ को माले के राष्ट्रीय संग्रहालय में रखा गया था। दुर्भाग्य से सन २०१२ में राजनैतिक उथल-पुथल के दौरान ही एक सुनियोजित हमले में लगभग समस्त प्राचीन सामग्री नष्ट कर दी गई।

अब मालदीव एक इस्लामी देश है। यहां की १००% जनसंख्या मुसलमान है। मालदीव के कानून के अनुसार यहां की नागरिकता केवल मुस्लिमों को ही मिल सकती है। किसी भी अन्य धर्म के लिए मालदीव में कोई स्थान नहीं है। इसीलिए यहां कोई मंदिर, चर्च आदि नहीं हैं। यहां तक कि मालदीव के कस्टम-इमिग्रेशन फॉर्म पर भी स्पष्ट लिखा हुआ है कि इस देश में कोई भी धार्मिक मूर्ति ले जाना भी प्रतिबंधित है।

मालदीव का इतिहास उथलपुथल से भरा रहा है। बारहवीं शताब्दी में यहां के अंतिम बौद्ध राजा ने इस्लाम स्वीकार किया। आगे मालदीव ने ब्रिटिशों के साथ सुरक्षा-संधि कर ली, जिसके अंतर्गत एक निश्चित वार्षिक शुल्क के बदले ब्रिटेन ने मालदीव की सुरक्षा और विदेशी मामलों का जिम्मा लिया। सन १९६८ में यह व्यवस्था समाप्त हुई। उसी वर्ष मालदीव में सल्तनत भी खत्म हुई और मालदीव एक गणराज्य बना।

लेकिन यहां लोकतंत्र भी अस्थिर रहा है। कई बार तख्ता पलट और विरोधियों को जेल भेजने, निर्वाचित प्रधानमंत्री को निष्कासित कर देने आदि की घटनाएं होती रही हैं। मालदीव के पूर्व-राष्ट्रपति शायद अभी भी आतंकवाद के आरोप में जेल में बंद हैं। १९८८ में यहां की तत्कालीन सरकार के विरुद्ध मालदीव के ही एक व्यापारी ने श्रीलंका के पीपल्स लिबरेशन ऑर्गनाइजेशन ऑफ तमिल ईलम (यह संगठन कुख्यात लिट्टे से अलग होकर बना था) को धन देकर मालदीव में तख्तापलट का प्रयास किया। इस संगठन के ८० हथियारबंद हमलावरों ने रात के अंधेरे में मालदीव के हवाई अड्डे पर कब्जा कर लिया। हालांकि वे राजधानी माले पर अधिकार नहीं पा सके। तत्कालीन राष्ट्रपति को घर से भागकर अपनी जान बचानी पड़ी और उन्होंने हमलावरों से निपटने के लिए भारत से मदद मांगी। केवल १२ घंटों में ही भारतीय सेना के पैराट्रूपर्स ऑपरेशन कैक्टस के लिए मालदीव में उतरे और जीत हासिल की। इस बारे में विस्तार से किसी और पोस्ट में लिखूंगा।

भारत और मालदीव के संबंध:
हालांकि भारत और मालदीव के बीच प्राचीन काल से राजनैतिक और व्यापारिक संबंध रहे हैं, किन्तु आधुनिक काल में सन १९६८ से इन संबंधों का नया अध्याय प्रारंभ हुआ। भारत सन १९६८ में मालदीव गणराज्य को सबसे पहले मान्यता देने वाले देशों में से एक था। मालदीव दक्षेस (सार्क) के संस्थापक देशों में से एक है। यह गुटनिरपेक्ष आंदोलन, संयुक्त राष्ट्र संघ आदि का सदस्य भी है। पिछले वर्ष तक यह कॉमनवेल्थ का सदस्य भी था, लेकिन अस्थिर लोकतंत्र के कारण हुई कुछ आलोचनाओं से नाराज़ होकर मालदीव ने कॉमनवेल्थ की सदस्यता छोड़ दी (मेरी हमेशा से यह राय रही है कि भारत को भी गुलामी के प्रतीक कॉमनवेल्थ से बाहर निकल जाना चाहिए)।

भारत ने समय-समय पर मालदीव को आर्थिक, तकनीकी, सैन्य और मानवीय सहायता दी है। उपरोक्त ऑपरेशन कैक्टस उसी का एक उदाहरण है। मालदीव की वायुसेना के पास केवल दो हैलीकॉप्टर हैं और ये दोनों ही उसे भारतीय वायुसेना से उपहार में मिले हैं। नौसेना ने भी मालदीव को एक जहाज उपहार में दिया था। इसके अलावा मालदीव पुलिस के कई अधिकारी हमारे हैदराबाद की पुलिस अकादमी में प्रशिक्षण ले चुके हैं। मालदीव के आर्थिक विकास में सहयोग के लिए भारतीय स्टेट बैंक ने मालदीव को ५० करोड़ की सहायता दी थी। आज भी भारत के लगभग २९ हजार कुशल व अकुशल कर्मी मालदीव में डॉक्टर, शिक्षक, तकनीकी विशेषज्ञ, इंजीनियर, अकाउंटेंट, मैनेजर, मजदूर, दर्जी, प्लंबर आदि के रूप में भी कार्यरत हैं। सन २०१४ में मालदीव में पानी की आपूर्ति करने वाला एकमात्र संयंत्र ठप हो गया था, उस समय भी भारत ने ही तुरंत वायुसेना के दो मालवाहक विमानों से लाखों बोतल पानी मालदीव भेजा था और बाद में नौसेना के जहाजों, टैंकरों आदि के द्वारा भी पानी की आपूर्ति की थी।

हालांकि अब मालदीव में चीन का दखल भी बढ़ रहा है। मालदीव का मुख्य हवाई अड्डा राजधानी माले से कुछ ही दूरी पर हुलहुले नामक द्वीप पर है। माले को इस द्वीप से जोड़ने के लिए चीन की मदद से एक पुल का निर्माण किया जा रहा है, जिसका नाम चाइना-मालदीव फ्रेंडशिप ब्रिज है। इसी बहाने चीन के कई लोग भी मालदीव पहुंच गए हैं।

पर्यटन:
पर्यटन ही मालदीव की अर्थव्यवस्था की रीढ़ है। यहां के शांत समुद्र तट, सुंदर प्राकृतिक दृश्य, साहसिक खेल, नौकायन आदि गतिविधियों के कारण मालदीव विश्व भर के लाखों पर्यटकों को आकर्षित करता है। यहां पर्यटकों के लिए सैकड़ों होटल और रिसॉर्ट उपलब्ध हैं। अधिकांश द्वीप बहुत छोटे आकार के हैं। एक द्वीप पर एक ही रिसॉर्ट होता है, इसलिए भीड़भाड़ और शोरगुल के बिना लोग शांति से अपनी छुट्टी का मज़ा ले सकते हैं। हर रिसॉर्ट में पर्यटकों के ठहरने, खाने-पीने, मनोरंजन, साहसिक खेलों, मसाज और स्पा आदि हर तरह की सुविधाएं होती हैं। कम बजट में घूमने के इच्छुक लोग अक्सर माले शहर में या हवाई अड्डे के पास स्थित नए हुलहुमाले द्वीप पर स्थित कम महंगे होटलों में ठहरते हैं और पूरे दिन या आधे दिन का टूर पैकेज लेकर किसी द्वीप पर स्थित रिसॉर्ट में समय बिताने जा सकते हैं। रिसॉर्ट्स के आसपास महासागर की गहराई कम होने और शांत जल होने के कारण बच्चे-बूढ़े सभी यहां पानी का मज़ा ले सकते हैं। यहां के पानी का रंग भी बहुत अलग और बहुत सुंदर है। समुद्र के जल में नीले रंग के अलग-अलग शेड्स देखने को मिलते हैं, जो बहुत अद्भुत लगते हैं। किनारे की रेत भी बहुत अलग तरह की है। इसका रंग एकदम सफेद है और यह छोटे कंकरों जैसी खुरदुरी नहीं, बल्कि मिट्टी जैसी मुलायम है।

पर्यटन के मामले में मालदीव की प्रसिद्धि ही हमारे लिए भी मालदीव आने का मुख्य कारण थी।

मालदीव की मेरी यात्रा का अनुभव आप यहां क्लिक करके पढ़ सकते हैं

मालदीव के कुछ और फोटो आप यहां क्लिक करके मेरे फेसबुक पेज पर देख सकते हैं

भविष्य:
ग्लोबल वॉर्मिंग के कारण विश्व-भर में हो रहे बदलाव का सबसे बुरा असर मालदीव जैसे देशों पर पड़ने की संभावना है। मालदीव पूरी तरह समुद्र से घिरा हुआ छोटे-छोटे द्वीपों वाला देश है और यहां भूमि की औसत ऊंचाई समुद्र तल से केवल डेढ़ मीटर है। यहां तक कि मालदीव का सबसे ऊंचा प्राकृतिक बिंदु भी समुद्र तल से केवल २.४ मीटर ऊंचा है। इसी कारण मालदीव के अस्तित्व पर भी संकट मंडरा रहा है और ग्लोबल वॉर्मिंग व बढ़ते समुद्री जलस्तर के कारण यह आशंका है कि सन २१०० तक मालदीव पूरी तरह समुद्र में समा जाएगा। इसके प्रति विश्व का ध्यान आकर्षित करने के लिए मालदीव की सरकार ने सन २००९ में केबिनेट की एक बैठक समुद्र के अंदर आयोजित की थी। उसी वर्ष सरकार ने २०१९ तक मालदीव को ‘कार्बन-न्यूट्रल’ बनाने का संकल्प भी लिया था। लेकिन अगर ये प्रयास विफल रहे या अपर्याप्त साबित हुए, तो फिर यहां के निवासियों का क्या होगा? मालदीव की सरकार उस दिशा में भी प्रयास कर रही है। इसके लिए सरकार भारत, श्रीलंका या ऑस्ट्रेलिया में कोई द्वीप या भूभाग खरीदने की संभावना पर विचार कर रही है, ताकि भविष्य में पूरे देश की जनसंख्या को वहां स्थानांतरित किया जा सके। कुछ वर्षों पहले यहां की सरकार ने निर्णय लिया था कि हर वर्ष देश की आय का कुछ भाग अलग रखा जाएगा और उसका उपयोग नई भूमि खरीदने के लिए किया जाएगा। यह विश्व के सामने भी एक अभूतपूर्व स्थिति है क्योंकि संभवतः पहले कभी ऐसा नहीं हुआ है कि कोई पूरा देश ही इस तरह मिटने वाला हो। साथ ही, यह विश्व के सभी देशों के लिए एक चेतावनी भी है कि हमें पर्यावरण का विनाश रोकना होगा क्योंकि आज जो मालदीव की स्थिति है, वही कल अन्य देशों की नियति भी बन सकती है।

स्त्रोत:
१. वीकिपीडिया
२. सभी चित्र गूगल से

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