मालदीव का राजनैतिक संकट

#मालदीव हिन्द महासागर में बिखरा हुआ एक छोटा-सा देश है। मैं सोच-समझकर ही इसे हिन्दी महासागर में ‘फ़ैला हुआ’ देश नहीं कह रहा हूँ, बल्कि बिखरा हुआ देश कह रहा हूं क्योंकि यह देश वास्तव में यह बहुत छोटे-छोटे १,१९२ द्वीपों की एक श्रृंखला है। वैसे राजनैतिक अर्थ में भी यह बिखरा हुआ देश ही है क्योंकि यहां के शासन में पिछले कई वर्षों से बहुत अस्थिरता ही रही है।

पिछले साल मैं कुछ दिनों के लिए मालदीव गया था, उस समय मैंने इस देश के बारे में दो लेख लिखे थे, जो आप यहां और यहां पढ़ सकते हैं। इससे आपको मालदीव के बारे में और भी जानकारी मिल जाएगी। आज का लेख मालदीव में इन दिनों जारी तनाव और खींचतान के विषय पर है। उसे समझने के लिए आपको बहुत संक्षेप में मालदीव का पिछली सदी का राजनैतिक इतिहास भी बता देता हूं।

मालदीव का इतिहास वैसे तो सैकड़ों वर्ष पुराना है, लेकिन आज के लिए मैं केवल १९३२ से ही शुरुआत कर रहा हूं क्योंकि इसी वर्ष मालदीव में पहला लोकतांत्रिक संविधान लागू हुआ था। उस समय यह एक तरह से ब्रिटेन का उपनिवेश ही था।

१९६५ में मालदीव एक अलग सल्तनत (गणतंत्र नहीं) के रूप में स्वतंत्र हुआ। १९६८ में एक जनमत संग्रह के द्वारा सल्तनत की व्यवस्था खत्म करके मालदीव ने इब्राहिम नासिर को अपना राष्ट्रपति चुना। वे इस पद पर १० वर्षों तक रहे और १९७८ में नासिर ने राजनीति से संन्यास ले लिया। इसके बाद मौमून अब्द अल-गयूम मालदीव के राष्ट्रपति बने। गयूम का शासन वास्तव में तानाशाही जैसा ही था। उस ज़माने में मालदीव में एकदलीय शासन प्रणाली थी, जिसका मतलब ये है कि देश में केवल एक ही पार्टी थी। राष्ट्रपति चुनाव में गयूम ही एकमात्र प्रत्याशी होते थे और मतदाता केवल हाँ या नहीं में वोट देते थे। इस तरह गयूम १९७८ से २००८ तक लगातार ३० वर्षों तक राष्ट्रपति रहे।

मौमून गयूम

इसी बीच १९८८ में श्रीलंका के एक उग्रवादी संगठन की मदद से मालदीव के ही एक व्यापारी ने गयूम को हटाकर देश पर कब्जा करने का प्रयास भी किया था, लेकिन उस समय भारत ने सेना भेजकर यह प्रयास विफल कर दिया था।

लेकिन २००३ में मालदीव की जेल में एक कैदी की मृत्यु के बाद पूरे देश में सरकार के खिलाफ आंदोलन और विरोध प्रदर्शन शुरू हो गए। लोकतंत्र की स्थापना और नागरिकों के अधिकारों की मांग उठने लगी। इसका नेतृत्व मोहम्मद नशीद कर रहे थे।

१९६७ में माले में जन्मे नशीद की प्राथमिक शिक्षा मालदीव में और आगे की पढ़ाई श्रीलंका व इंग्लैंड में हुई थी।

मोहम्मद नशीद

१९९१ से ही नशीद सरकार के खिलाफ लेख लिखकर और आंदोलनों के द्वारा अपना विरोध जताते रहते थे। इसके कारण अक्सर उन्हें गिरफ्तार भी कर लिया जाता था। गयूम के शासन काल में कुल २० बार नशीद को जेल भेजा गया था। २००३ के आंदोलन के पीछे भी नशीद का ही हाथ था।

यह आंदोलन सफल रहा और अंततः २००५ में सरकार को झुकना पड़ा। अब मालदीव में लोगों को अपनी राजनैतिक पार्टियां बनाने की अनुमति मिली। इसके बाद देश के संविधान में भी बदलाव हुआ और २००८ में नए संविधान के अनुसार चुनाव हुआ।

यह देश के लिए एक ऐतिहासिक चुनाव था। यह पहला ऐसा चुनाव था, जिसमें एक से ज्यादा पार्टियां थीं और यह पहला ऐसा चुनाव था, जिसमें गयूम की हार हुई! मोहम्मद नशीद के हाथों ही गयूम के ३० वर्षों के शासन का अंत हुआ।

लेकिन सरकार चलाने में नशीद को लगातार मुसीबतों का सामना करना पड़ा। कभी विरोधी पार्टियां संसद का कामकाज नहीं चलने देती थीं, कभी नशीद के मंत्री ही विरोध में खड़े हो जाते थे, तो कभी किसी मामले में सुप्रीम कोर्ट के दखल के कारण नशीद को झुकना पड़ता था।

बढ़ती महंगाई और बेरोज़गार के विरोध में दिसंबर २०११ में मालदीव में शांतिपूर्ण आंदोलन शुरू हो गया। अगले ही महीने अदालत के एक फैसले के विरोध में नशीद ने सुप्रीम कोर्ट के एक जज को ही बर्खास्त कर दिया। इसके कारण आंदोलन और भी भड़क गया। अंततः २०१२ में नशीद को इस्तीफा देना पड़ा। तब नशीद ने माले के भारतीय दूतावास में ही शरण ली थी।

अब्दुल्ला यामीन

इसके बाद अब्दुल्ला यामीन राष्ट्रपति बने। वे गयूम के सौतेले भाई हैं। सत्ता संभालते ही उन्होंने अपने विरोधियों को कुचलना शुरू कर दिया। २०१५ में नशीद पर आतंकवाद के आरोप लगाकर उन्हें और उनकी सरकार के कुछ पूर्व-मंत्रियों को १३ सालों की सज़ा सुनाई गई।

जेल में नशीद को पीठ दर्द की शिकायत हुई और उनका आरोप था कि बार-बार की गिरफ्तारियों और जेल में होने वाले टॉर्चर के कारण ही उन्हें यह समस्या हुई है। अंततः २०१६ में ब्रिटेन, अमरीका और संयुक्त राष्ट्र संघ के दबाव में यामीन ने नशीद को इलाज के लिए ३० दिनों के लिए ब्रिटेन जाने की अनुमति दी। लेकिन उसके बाद नशीद वापस मालदीव लौटे ही नहीं। वे आज भी ब्रिटेन में राजनैतिक शरणार्थी के रूप में रहते हैं।

नशीद के साथ जो अन्य लोग गिरफ्तार हुए थे, वे अभी भी जेल में ही हैं। इसी साल १ फरवरी को सुप्रीम कोर्ट ने फैसला दिया कि इन सभी लोगों पर लगे आरोप राजनैतिक और झूठे हैं, इसलिए इन्हें तुरन्त रिहा कर दिया जाए। इसके अलावा पिछले वर्ष १२ सांसद यामीन की पार्टी को छोड़कर विपक्षियों में शामिल हो गए थे और उनकी सदस्यता रद्द कर दी गई थी। अदालत ने इसे भी अवैध ठहराया और उनकी सदस्यता बहाल कर दी।

लेकिन राष्ट्रपति यामीन ने अदालत का आदेश मानने की बजाय देश में आपातकाल लगा दिया और उन जजों को ही गिरफ्तार कर लिया। इसका मुख्य कारण यह है कि अगर उन १२ सांसदों को मान्यता मिल गई, तो यामीन की सरकार गिर जाएगी। इसके अलावा यामीन को यह आशंका भी है कि अगर विपक्षी नेताओं को रिहा कर दिया गया और नशीद को भी मालदीव लौटने की छूट दे दी गई, तो यामीन के विरोध में देश में चल रहा आंदोलन और मज़बूत हो जाएगा। इसी साल वहां राष्ट्रपति चुनाव होने वाला है और यामीन को डर है कि इस विरोधी माहौल के कारण इस चुनाव में उनकी करारी हार होगी।

फिलहाल आपातकाल १५ दिनों के लिए है। विरोधियों को चिंता है कि इस दौरान यामीन अपने समर्थक जजों को नियुक्त करके सारे फैसले पलट देंगे। वास्तव में ऐसा ही हो भी रहा है। आपातकाल की घोषणा के अगले ही दिन यामीन ने नए जज नियुक्त किए, जिन्होंने सुप्रीम कोर्ट के पुराने आदेश पर रोक लगा दी है। पुलिस विभाग के दो मुख्य अधिकारी भी हटाए जा चुके हैं। पूर्व राष्ट्रपति गयूम को भी नज़रबंद कर दिया गया है। देश में आपातकाल की अवधि बढ़ाई भी जा सकती है।

इस बात से परेशान होकर नशीद ने भारत सरकार से मांग की है कि वह १९८८ के समान ही फिर एक बार अपनी सेना भेजकर मालदीव को यामीन के चंगुल से मुक्त करवाने में मदद करे। भारत सरकार ने अभी इस पर कोई फैसला नहीं किया है।

लेकिन मामला सिर्फ इतना ही नहीं है। चीन ने भारत का नाम लिए बिना चेतावनी दी है कि मालदीव के आंतरिक मामलों में कोई तीसरा देश हस्तक्षेप न करे।

मालदीव के राष्ट्रपति यामीन की चीन से पुरानी दोस्ती है। कुछ सालों पहले जब नशीद राष्ट्रपति थे, तब भारत की जीएमआर कंपनी को मालदीव में एक नया हवाई अड्डा बनाने का ५० करोड़ डॉलर का ठेका मिला था। २०१३ में राष्ट्रपति बनते ही यामीन ने वह सौदा अचानक रद्द कर दिया। अगले वर्ष २०१४ में चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग की मालदीव यात्रा के दौरान ही मालदीव सरकार ने यह ठेका चीन की एक सरकारी कंपनी को दे दिया। मालदीव चीन ने वन बेल्ट वन रोड प्रोजेक्ट में भी शामिल हो गया। पिछले साल दिसंबर में मालदीव ने चीन के साथ एक मुक्त व्यापार समझौता भी किया है। भारत ने इसका कड़ा विरोध किया था।

मालदीव में चीन का बढ़ता दखल और भारत का कम होता प्रभाव निश्चित ही हमारे लिए चिंता का विषय होना चाहिए क्योंकि यह केवल व्यापारिक सौदों की बात नहीं है। यह भारत की सुरक्षा का भी मुद्दा है।

चीन लगातार भारत को चारों तरफ से घेर रहा है। भारत के आसपास के सभी देशों में चीन अपना दखल बढ़ा रहा है। चीन इनमें से कई देशों में अपने बंदरगाह बना भी बना रहा है। पिछले ही वर्ष अगस्त में चीन ने मालदीव में अपने तीन नौसैनिक जहाज भी तैनात कर दिए थे।

हिन्द महासागर में यूरोप, अफ्रीका और अरब देशों से पूर्वी एशिया की ओर जाने वाले वैश्विक जलमार्ग में मालदीव की भौगोलिक स्थिति बहुत महत्वपूर्ण है। अगर मालदीव पर चीन का नियंत्रण हो गया, तो इस पूरे जलमार्ग पर चीन का नियंत्रण हो जाएगा और यहां भी चीन अन्य देशों के विरुद्ध वैसी ही गतिविधियां शुरू कर देगा, जैसा वह पूर्वी एशिया में साउथ चाइना सी के मामले में आसियान देशों के साथ कर रहा है। मालदीव के जलमार्ग पर चीनी कब्जे से भारत की खनिज तेल की आपूर्ति भी प्रभावित हो सकती है क्योंकि हम जो तेल दूसरे देशों से खरीदते हैं,उसे लाने का एक मुख्य रास्ता यही जलमार्ग है। मालदीव पर जिसका नियंत्रण रहेगा, यह जलमार्ग और इससे होने वाला व्यापार भी उसी के नियंत्रण में रहेगा।

चीन की मालदीव में रुचि इसलिए भी है क्योंकि चीन ने यहां भारी निवेश किया हुआ है। चीन के पर्यटकों में भी मालदीव बहुत लोकप्रिय स्थान है। इसलिए चीन मालदीव में अपनी संपत्ति और नागरिकों की सुरक्षा के लिए भी चिंतित है।

मालदीव में सेना भेजी जाए या नहीं, इस बारे में अभी तक भारत सरकार ने कोई फैसला नहीं किया। संभवतः सरकार दूसरे तरीकों से मामला सुलझाने की कोशिश करेगी, जैसे अमरीका और सऊदी अरब से मालदीव को मिलने वाली आर्थिक सहायता रोकने की कोशिश की जा सकती है, या मालदीव की सरकार और विरोधियों के बीच बातचीत या समझौते के प्रयासों में भारत सरकार मध्यस्थता कर सकती है। दूसरी तरफ चीन भी मालदीव में वर्तमान सरकार को बनाए रखने के लिए सभी प्रयास जारी रखेगा।

राष्ट्रपति यामीन ने मालदीव में राष्ट्रपति चुनाव समय से पहले करवाने की बात कही है। आगे क्या होगा, यह तो अभी कहना मुश्किल है, लेकिन इतना स्पष्ट है कि चीन और भारत के बीच लगातार जारी शीत युद्ध का केन्द्र फ़िलहाल मालदीव ही है!

(सभी चित्र गूगल से)

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