मीडिया का एजेंडा?

कल शाम दिल्ली नगर निगम चुनाव के लिए मतदान खत्म हुआ। और सुना है कि उसके कुछ ही समय बाद दिल्ली के जंतर-मंतर पर चल रहा एक आंदोलन भी समाप्त हो गया। क्या इन दो बातों के बीच कोई संबंध है? क्या वे आंदोलनकारी वाकई किसान थे या तमिलनाडु की किसी जनजाति के संपेरे थे? क्या वे वामपंथी गैंग के सदस्य थे या ग्रीनपीस एनजीओ के कार्यकर्ता थे? क्या ये सही है इंडिया टुडे के कुछ ‘पत्रकार’ (?) उनमें से कुछ लोगों को नोएडा के पास एक गांव के सूखे खेतों में फोटो खिंचवाने के लिए साथ ले गए और अब इंडिया टुडे पत्रिका के अगले अंक में उन्हीं फोटो को तमिलनाडु के बताकर छापा जाएगा? क्या ये सही है कि गरीब और कर्ज से पीड़ित होने का दावा कर रहे इन लोगों के लिए दिल्ली के एक बढ़िया रेस्तरां से रोज भोजन और महंगा बोतलबंद मिनरल वॉटर आ रहा था? क्या ये सही है कि कल आंदोलन खत्म होने के बाद ये ४० गरीब लोग रात की फ्लाइट से चेन्नई वापस लौटे?

इनमें से कितनी बातें कितनी सही हैं, ये मैं नहीं जानता। न मैं जानने का यत्न करूंगा और न आपको बताने का प्रयास करूंगा क्योंकि मुझे मालूम है कि जो लोग इन्हें किसान मानते हैं और जो लोग इन्हें फर्जी मानते हैं, वे दोनों ही अपनी-अपनी बात को सही साबित करने के लिए कुछ न कुछ तर्क गढ़ ही लेंगे।

लेकिन मैं इतना जानता हूं कि पिछले ३०-४० दिनों से चल रहा आंदोलन कल शाम दिल्ली का मतदान पूरा होने के बाद तमिलनाडु के मुख्यमंत्री के केवल एक आश्वासन के बाद समाप्त हो गया। क्या इन दो बातों की टाइमिंग केवल संयोग है या इनमें कोई संबंध है? अगर आंदोलनकारी केवल तमिलनाडु के मुख्यमंत्री के आश्वासन से ही संतुष्ट हो जाने वाले थे, तो ये काम चेन्नई में ही बैठे-बैठे हो सकता था, उसके लिए दिल्ली तक आने-जाने का क्या प्रयोजन था? ये प्रश्न निश्चित ही मेरे मन में संदेह उत्पन्न करते हैं।

लेकिन यह आंदोलन और इसका सच-झूठ क्या है, ये मेरे पोस्ट का विषय नहीं है। पोस्ट का विषय ये है कि अपने देश के लोग आज भी कोई भी खबर देखते ही उसके बारे में पूरी जानकारी लिए बिना, कुछ भी सोचे-समझे बिना सीधे कूदकर किसी निष्कर्ष पर क्यों पहुंच जाते हैं?

किसी ने भ्रष्टाचार मिटाने और लोकपाल क़ानून लाने का दावा किया, तो तुरंत उसे दिल्ली में सत्ता सौंप दी। उसके बाद ये नहीं पूछा कि भ्रष्टाचार का क्या हुआ और लोकपाल का क्या हुआ? वो सब भूलकर मोदी-अंबानी-अदानी और बिजली-पानी की कीमतों में उलझकर बैठ गए। एक सैनिक का स्टिंग देखा और सरकार को कोसने बैठ गए, इस पर ध्यान नहीं दिया कि उस सैनिक को आत्महत्या के लिए उकसाने के मामले में एक पत्रकार (?) पर अब केस चल रहा है। किसी ने दिखाया कि किसान धरने पर बैठे हैं, लोग मामले को जाने-समझे बिना तुरंत भावुक और उत्तेजित हो गए। कुछ सालों पहले दिल्ली में हुई एक जघन्य घटना के बाद सब उत्तेजित थे। वही घटना जिसे मीडिया ने ‘निर्भय कांड’ कहा। लेकिन उसके बाद सब शांत बैठ गए। क्या देश में उसके बाद से वैसी कोई घटना नहीं हुई है? घटनाएं तो रोज होती होंगी, लेकिन लोग ध्यान नहीं देते क्योंकि मीडिया दिखाता नहीं। आप सिर्फ उन्हीं घटनाओं पर ध्यान देते हैं, जिनके बारे में मीडिया आपको बताता है और आप घटना के सिर्फ उसी पहलू पर ध्यान देते हैं, जो पहलू मीडिया आपको दिखाता है। आपका एजेंडा आज भी मीडिया से ही तय हो रहा है, सत्य से नहीं!

यही हमारे भ्रम का बड़ा कारण भी है। यही कारण है कि हम समस्याओं का समाधान नहीं ढूंढ पाते क्योंकि हम समस्याओं पर केवल तभी तक ध्यान देते हैं, जब तक मीडिया उन पर हमें ध्यान दिलाता है। मीडिया रोज एक समस्या उछालता है और उसे सुलझाए बिना अगले दिन अगली समस्या पर पहुंच जाता है और उसके पीछे-पीछे हम भी रोज पुराना मुद्दा भूलकर नए मुद्दे पर चर्चा करने लगते हैं। लेकिन हमें ये याद रखना चाहिए कि मीडिया के लिए ये मुद्दे केवल टीआरपी पाने और अपनी कमाई बढ़ाने के साधन हैं, जबकि हमारे लिए ये अस्तित्व का सवाल हो सकता है क्योंकि जो समस्या आज मीडिया में देखकर आप उस पर चर्चा कर रहे हैं और कल भूल जाएंगे, उसी संकट या समस्या से परसों आपको खुद भी जूझना पड़ सकता है। और अगर आज चर्चा करने के बाद कल मीडिया ने वह मुद्दा छोड़ दिया है, परसों आपकी बात पर ध्यान देने कोई नहीं आएगा क्योंकि जो आम लोग बिना सोचे-समझे अनजाने में ही मीडिया के एजेंडा के पीछे चल रहे हैं, वे इस पर तब तक ध्यान नहीं देंगे, जब तक मीडिया वह मुद्दा न उछाले और मीडिया उस मुद्दे को नहीं उछालेगा क्योंकि उसके लिए वह मुद्दा तब तक पुराना हो चुका होगा। वरना महिलाओं के साथ वारदातें आज भी हो रही होंगी, दुर्भाग्य से लापरवाही के कारण छोटे बच्चे आज भी बोरवेल में गिरते होंगे, किसान कई राज्यों में आज भी आत्महत्या कर रहे होंगे, और हर तरह की समस्याएं आज भी हर जगह मौजूद होंगी। लेकिन ये सब मीडिया में अब नहीं आती क्योंकि मीडिया ये सारे मुद्दे केवल अपना फायदा-नुकसान देखकर उठाता है। अफ़सोस ये है कि लोग भी सिर्फ उसी समय तक इन पर ध्यान देते हैं, जब तक मीडिया में ये मुद्दे छाए रहते हैं।

शायद स्वामी विवेकानंद ने ही कहा था कि किसी भी बात को तर्क की कसौटी पर कसे बिना स्वीकार नहीं करना चाहिए। उन्होंने तो ईश्वर का अस्तित्व भी तब जाकर स्वीकार किया, जब उन्होंने स्वयं माँ काली के रूप में ईश्वर को महसूस किया। आप और हम शायद उस उच्चतम स्तर तक नहीं जा सकेंगे, लेकिन दैनिक जीवन में होने वाली जिन घटनाओं पर हम केवल अफवाहों या सुनी-सुनाई बातों के आधार पर कुछ भी जांचे-परखे बिना तुरंत उत्तेजित होकर प्रतिक्रिया देने लगते हैं, क्या हम कम से कम उन घटनाओं पर कुछ बोलने-मानने से पहले थोड़ा संयम रखकर विश्वसनीय जानकारी ढूँढने का प्रयास नहीं कर सकते? पुराने समय में ये बात मानी जा सकती थी कि लोगों के पास खबरों की सत्यता जानने के साधन बहुत सीमित थे, इसलिए जो अखबारों में छप गया या दूरदर्शन-आकाशवाणी पर बता दिया गया, वही सत्य मानना पड़ता था। लेकिन आज तो इंटरनेट है, गूगल है, सोशल मीडिया है और हर तरह के साधन अपने फोन पर ही उपलब्ध हैं। फिर हम किसी भी बात की सत्यता को जानने की थोड़ी भी कोशिश किए बिना क्यों तुरंत आवेश में आकर एक-दूसरे से ही लड़ने-भिड़ने लगते हैं? जबकि आज पेड न्यूज, फर्जी खबरों, अफवाहों, एजेंडा जर्नलिज्म आदि भी चरम पर है और सोशल मीडिया के कारण अब कोई भी व्यक्ति कहीं भी बैठकर अपनी मनमर्जी से कुछ भी लिख सकता है, इसलिए यह तो और भी महत्वपूर्ण है कि कुछ शेयर करने या सच मानने से पहले हम थोड़ा तर्क और थोड़ा इंटरनेट का उपयोग करके उस बात की सत्यता की पुष्टि करने का प्रयास तो अवश्य करें। यह तो और भी दुखद है कि किसी राजनेता या किसी पार्टी का समर्थन या विरोध करने जैसी बात को लेकर लोग दोस्त से दुश्मन बन जाते हैं और समर्थन और विरोध से आगे जाकर आपसी अपमान, अपशब्द, कटुता आदि पर उतर आते हैं। यह बचकाना भी है और खतरनाक भी! मुझे रोटी पसंद है और आपको चावल या मुझे लाल रंग पसंद है और आपको हरा या मुझे एक पार्टी पसंद है और आपको दूसरी, तो इस बात का कोई कारण नहीं है कि हम आपस में लड़ने लगें। २-४ बातों में मतभेद होते हुए भी २-४ हजार ऐसी बातें हो सकती हैं, जिन पर आपकी और मेरी पसंद एक जैसी हो। लेकिन उन बातों में हमारी कोई रुचि नहीं होती, हमारी रुचि अक्सर मतभेदों को ढूंढने, उभारने और उनके बहाने आपस में लड़ने पर होती है। भाषा की बात आती है, तो हम ये चर्चा कभी नहीं करते कि किस भाषा में क्या खूबियाँ हैं, बल्कि हम इस बात पर लड़ते हैं कि कौन-सी भाषा श्रेष्ठ है। यहां तक कि रसगुल्ले जैसी मीठी चीज के लिए भी दो राज्य लड़ रहे थे कि रसगुल्ला किसका है! मुझे नहीं पता उस लड़ाई का परिणाम क्या हुआ, लेकिन रसगुल्ले की मिठास को कम से कम कड़वाहट से बचाया जा सकता था।

मुझे लगता है कि मीडिया हो या सोशल मीडिया, सत्य और असत्य दोनों ही इनमें मिले हुए हैं, जैसे नमक में चीनी मिली हुई हो। जिसको जैसा स्वाद मिला, वह उसे वैसा ही बताता है, इसलिए जरूरी नहीं है कि आप जिसे सच मान रहे हैं केवल वही सच है या आप जिसे झूठ समझ रहे हैं, वह वाकई झूठ ही है। एक कमी ये भी है कि अक्सर लोग आजकल सच और झूठ की पहचान करके सच को स्वीकारने के लिए बहस या चर्चा नहीं करते, बल्कि पहले ही अपने मन में एक धारणा बना लेते हैं कि सच क्या है और फिर उसी धारणा को सही साबित करने के लिए तर्क देते रहते हैं। यह अज्ञान और अहंकार का लक्षण है, इससे हम सत्य को कभी नहीं समझ सकेंगे।

अटलजी की एक कविता है – ‘यक्षप्रश्न’, मुझे उसकी कुछ पंक्तियाँ याद आ रही हैं:

सत्य क्या है?
होना या न होना?
या दोनों ही सत्य हैं?

जो है, उसका होना सत्य है,
जो नहीं है, उसका न होना सत्य है।

मुझे लगता है कि
होना-न-होना एक ही सत्य के
दो आयाम हैं,
शेष सब समझ का फेर,
बुद्धि के व्यायाम हैं।

समस्या ये है कि हम दो आयामों के अस्तित्व को ही मानने को तैयार नहीं हैं। हम केवल अपने ही आयाम को सही मानकर थोपना चाहते हैं और इससे दूसरों के मन में कटुता और अपने मन में क्रोध और हताशा भरते जा रहे हैं। क्या हम कभी जागेंगे या किसी और के द्वारा तय होते एजेंडे के अनुसार रोज इसी तरह भागते, लड़ते रहेंगे, जैसे जंगल में जानवरों के झुंड लड़ते हैं? सादर!

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