यूरोप से भारत का समुद्री मार्ग

राजनीति के अलावा इतिहास भी मेरा पसंदीदा विषय है। इन दिनों मैं पुर्तगालियों के बारे में एक पुस्तक पढ़ रहा हूँ, जो इतिहास के लगभग ६०० साल पुराने कालखंड के बारे में है। ये वो दौर था, जब यूरोप के देशों में आपसी होड़ मची हुई थी कि भारत तक पहुँचने का समुद्री मार्ग ढूँढना है। कोलंबस भी भारत ही ढूँढने निकला था लेकिन वह वेस्ट इंडीज़ जा पहुँचा। समुद्री मार्ग से भारत तक पहुँचने वाला पहला यूरोपीय नाविक वास्को डी गामा था, जो १४९८ में कालीकट आया था। उसके पहले भी कई दशकों तक पुर्तगाली यह मार्ग ढूँढने का आगे पढ़ें …

महारानी विक्टोरिया की जय! (काँग्रेस-कथा १)

“महारानी विक्टोरिया की… जय” २८ दिसंबर १८८५ को मुंबई के गोकुलदास तेजपाल संस्कृत महाविद्यालय का परिसर ब्रिटिश महारानी की जय के नारों से गूंज उठा। इसी नारे के साथ ब्रिटिश भारत में एक नई संस्था का जन्म हुआ, जिसका नाम था – इंडियन नेशनल कांग्रेस (भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस)। ये नारा लगा रहे थे, ब्रिटिश भारत के बॉम्बे और मद्रास राज्यों से आए ७२ भारतीय प्रतिनिधि, जो ब्रिटिश अधिकारी एलन ऑक्टेवियन ह्यूम के निमंत्रण पर वहाँ आए थे। ह्यूम के अलावा उस सभा में दो अन्य ब्रिटिश सदस्य भी थे- विलियम वेडरबर्न और जस्टिस जॉन जार्डिन। ये सभी लोग तत्कालीन ब्रिटिश आगे पढ़ें …

पुस्तकें

जीवन में कब, क्या हो जाए, ये कोई नहीं बता सकता। ये बात कम से कम मैंने तो अपने जीवन में सैकड़ों बार महसूस की है। उसका एक पुराना उदाहरण पिछले हफ्ते याद आया, आज समय मिला है, तो सोचा आपको भी बताऊँ। मैं बड़ा होकर क्या बनना चाहता हूँ, मेरी ये इच्छा उम्र के साथ-साथ बदलती रही। लेकिन ७-८ साल की उम्र में एक पड़ाव ऐसा भी आया, जब मैं नौसेना में जाना चाहता था। घर-परिवार से भी इसके लिए प्रोत्साहन मिला और फिर मैं नासिक में एक सैनिक स्कूल में पढ़ाई के लिए पहुँच गया। तब मेरी उम्र आगे पढ़ें …

श्रीलंका में राजनैतिक संघर्ष

भारत में जब आप पिछले दो महीनों के दौरान कुछ विधानसभा चुनावों की ख़बरें जानने में व्यस्त थे, उसी दौरान श्रीलंका में भी एक बड़ी राजनैतिक हलचल हो रही थी। इसकी शुरुआत २६ अक्टूबर को हुई। राष्ट्रपति मैत्रीपाल श्रीसेन ने प्रधानमंत्री रानिल विक्रमसिंघे को पद से हटाए बिना ही महेंद्र राजपक्षे को प्रधानमंत्री नियुक्त कर दिया। इसका मतलब एक ही समय पर देश में दो प्रधानमंत्री हो गए। इसके कारण देश में एक बड़ा संवैधानिक संकट खड़ा हो गया था। रानिल विक्रमसिंघे ने राजपक्षे की नियुक्ति को अवैध बताया और पद छोड़ने से इनकार कर दिया। उन्होंने संसद का सत्र आगे पढ़ें …

चाय

पी.वी. नरसिंहराव मेरे पसंदीदा राजनेताओं में से एक हैं। वे बहुत विद्वान व्यक्ति थे, कई भाषाओं के जानकार भी थे और अच्छे लेखक व अनुवादक भी। उन्होंने कई भाषाओं में पुस्तकों के अनुवाद किए और कई पुस्तकें स्वयं भी लिखीं। उन्हीं में से एक थी, ‘द इनसाइडर’। हालांकि, नरसिंहराव ने इसे एक काल्पनिक उपन्यास के रूप में लिखा है, लेकिन उसके नायक की कहानी बहुत हद तक उनके स्वयं के जीवन से मिलती-जुलती है। लेकिन आज मैं बात उस पुस्तक की नहीं करने वाला हूँ। बात मैं चाय की करने वाला हूँ। सोशल मीडिया पर कई लोगों की पोस्ट देखकर आगे पढ़ें …

सोशल मीडिया का राजनैतिक हिंदुत्व

जितने लोग सुबह-शाम भाजपा पर हिंदुत्व से हटकर विकास की ओर भटक जाने का इल्ज़ाम लगाते रहते हैं, उनमें से कितनों ने वाकई पिछले कुछ चुनावों के भाजपा के घोषणा पत्र पढ़े हैं? अगर पढ़े हैं, तो बताएं कि उसमें राम मंदिर या हिंदुत्व पर कितने प्रतिशत फोकस था और विकास पर कितने प्रतिशत था? भाजपा का एजेंडा क्या है, उससे ज्यादा बड़ी समस्या आजकल ये है कि सोशल मीडिया के ज्ञानियों का निजी एजेंडा क्या है। कुछ लोग बिना पढ़े कुछ भी ऊलजलूल लिखकर बाकियों को बहका रहे हैं और कुछ लोग अपने निजी कारणों से जानबूझकर दूसरों को आगे पढ़ें …

राफ़ेल (भाग – २)

राफ़ेल का पूरा मामला आखिर क्या है? क्या वाकई मोदी सरकार इसमें बेईमानी कर रही है? क्या रिलायंस को फ़ायदा पहुँचाने के लिए कोई हेराफेरी की गई है? जानने के लिए मेरा यह लेख पढ़ें।

राफ़ेल (भाग – १)

राफ़ेल का पूरा मामला आखिर क्या है? क्या वाकई मोदी सरकार इसमें बेईमानी कर रही है? क्या रिलायंस को फ़ायदा पहुँचाने के लिए कोई हेराफेरी की गई है? जानने के लिए मेरा यह लेख पढ़ें।

आपातकाल की यादें (अंतिम भाग) – अरुण जेटली

आपातकाल कैसे हटा? आपातकाल की अवधि बढ़ते जाने के साथ ही इंदिरा जी पर एक बात के कारण दबाव भी बढ़ने लगा था। अंतरराष्ट्रीय मीडिया और विश्व के नेता इस बात से  चकित थे कि नेहरु जी की बेटी ही लोकतंत्र की राह को छोड़कर तानाशाह बन गई थी। अंतरराष्ट्रीय जगत को यह समझाना इंदिरा जी के लिए बहुत कठिन होता जा रहा था कि आपातकाल का दौर वाकई अस्थायी है और हमेशा आपातकाल लागू नहीं रहेगा। हालांकि उनकी पार्टी की राय थी कि चूंकि संसद की अवधि दो वर्षों के लिए बढ़ाई जा चुकी है, इसलिए अब १९७८ से आगे पढ़ें …

आपातकाल की यादें – भाग -२ (अरुण जेटली)

आपातकाल के अत्याचार २६ जून १९७५ को आपातकाल लगाते ही श्रीमती इंदिरा गांधी ने धारा ३५९ के तहत नागरिकों के मौलिक अधिकार निलंबित करने का आदेश जारी कर दिया। इसके परिणामस्वरूप अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और व्यक्तिगत स्वतंत्रता दोनों पर पाबंदी लगा दी गई। केवल सेंसर की अनुमति से प्रकाशित समाचार ही उपलब्ध थे। २९ तारीख को इंदिरा जी ने भारतीय अर्थव्यवस्था में सुधार के नाम पर बीस-सूत्रीय कार्यक्रम की घोषणा की, हालांकि वास्तव में इसका उद्देश्य इस बात से ध्यान हटाना था कि भारत में लोकतंत्र को खत्म कर दिया गया है। इन बीस बिन्दुओं में कई तो वास्तव में आगे पढ़ें …