प्रम्बानन: इंडोनेशिया का सबसे बड़ा हिन्दू मंदिर

भारत के दक्षिण-पूर्व में हिन्द महासागर व प्रशांत महासागर के बीच फैला इंडोनेशिया विश्व का सबसे बड़ा द्वीप-राष्ट्र है। लगभग १९ लाख वर्ग किमी क्षेत्रफल के साथ यह विश्व का चौदहवां सबसे बड़ा देश है। जनसंख्या के मामले यह विश्व में चौथे स्थान पर है और यह विश्व में सर्वाधिक मुस्लिम जनसंख्या वाला राष्ट्र भी है।

इंडोनेशिया का मानचित्र

इंडोनेशिया में कुल १३ हजार द्वीप हैं, जिनमें सुमात्रा और जावा सबसे बड़े दो द्वीप हैं। इसी जावा द्वीप पर प्रम्बानन (Prambanan) नामक हिन्दू मंदिर स्थित है, जो कि इंडोनेशिया का सबसे बड़ा हिन्दू मंदिर है। भारत में भले ही अधिकांश लोगों को इस मंदिर के बारे में शायद जानकारी न हो, किन्तु यह मंदिर यूनेस्को की विश्व धरोहर सूची में शामिल है और प्रतिवर्ष इंडोनेशिया से और विश्व-भर से लाखों लोग इस मंदिर को देखने आते हैं। आइये आज इस मंदिर के बारे में हम भी कुछ जानें।

इंडोनेशिया के सेंट्रल जावा प्रान्त में योग्यकर्ता नामक महानगर से लगभग १७ किमी की दूरी पर स्थित प्रम्बानन मंदिरों का निर्माण आठवीं से दसवीं शताब्दी ईस्वी के दौरान हुआ था। इन मंदिरों का निर्माण माताराम नामक हिन्दू राजवंश के शासक संजय द्वारा प्रारंभ करवाया गया था। यहाँ तीन मुख्य मंदिर हैं, जो ब्रह्म, विष्णु और शिव को समर्पित हैं। इनमें से सबसे पहले मंदिर का निर्माण लगभग ८५० ईस्वी में शुरू हुआ था। यह शिव मंदिर था, जिसे उस समय शिवगृह या शिवालय के नाम से जाना जाता था। यह शिवालय और ब्रह्म तथा विष्णु के मंदिर पूर्व दिशा की ओर हैं। इन तीनों मंदिरों के आगे ही शिव के साथ उनके वाहन नंदिनी (नंदी), ब्रह्म के साथ उनके वाहन अंग्स (संभवतः हंस) और विष्णु के साथ उनके वाहन गरुड़ के मंदिर भी पश्चिम दिशा की ओर हैं। इन प्रमुख मंदिरों के निर्माण के बाद भी अगले कई दशकों तक इस परिसर का विस्तार होता रहा और नए मंदिरों का निर्माण भी चलता रहा। प्रम्बानन उस समय माताराम राज्य का शाही मंदिर था और राजपरिवार व राज्य के समस्त धार्मिक कार्य यहीं संपन्न करवाए जाते थे। मंदिर के अतिरिक्त इसी परिसर में धार्मिक शिक्षा का बड़ा केंद्र भी था, जहाँ सैकड़ों विद्वान और उनके शिष्य निवास करते थे। इस परिसर से कुछ ही दूरी पर प्रम्बानन नगर और राजदरबार था।

मुख्य मंदिर परिसर

आगे लगभग ९३० ईस्वी में माताराम राजवंश के शासक ने अपनी राजधानी यहाँ से हटाकर पूर्वी जावा में बसा ली। संभवतः ऐसा पास ही स्थित माउंट मरापी नामक ज्वालामुखी के विस्फोट या निकटवर्ती शैलेन्द्र राज्य के साथ चले संघर्ष के कारण करना पड़ा था। कारण चाहे जो भी रहा हो, किन्तु इस घटना के बाद से ही धीरे-धीरे प्रम्बानन मंदिर का महत्व कम होता गया और कुछ ही वर्षों में यह वीरान हो गया। अगली कई शताब्दियों तक ये मंदिर और परिसर निर्जन ही रहे। सोलहवीं शताब्दी में आए एक विनाशकारी भूकंप के कारण मंदिरों का बहुत-सा हिस्सा नष्ट हो गया। सन १७५५ में योग्यकर्ता और सुराकार्ता सल्तनतों के बीच माताराम राज्य का बंटवारा हुआ। इसी के बाद से इन दोनों पक्षों ने इन मंदिरों के खंडहर और यहाँ से बहने वाली ओपाक नदी को योग्यकर्ता और सेंट्रल जावा की सीमा-रेखा के रूप में स्वीकार किया।

यद्यपि स्थानीय ग्रामीणों को इन मंदिरों के अस्तित्त्व के बारे में जानकारी तो थी, किन्तु वे इनके ऐतिहासिक महत्व से अनभिज्ञ थे। आगे सन १८११ में ब्रिटिश ईस्ट इण्डिया कंपनी के सर थॉमस स्टैम्फ़र्ड राफेल्स (जो कि सिंगापुर में ब्रिटिश उपनिवेश के संस्थापक भी थे), को इस परिसर की जानकारी मिली और उन्होंने यहाँ विस्तृत उत्खनन करवाने का आदेश दिया, किन्तु कुछ ही समय बाद इस क्षेत्र का नियंत्रण ब्रिटिशों के हाथों से निकल जाने के कारण यह कार्य बंद हो गया। आगे सन १९१८ में यहाँ के डच शासकों ने इन मंदिरों का पुनर्निर्माण प्रारंभ करवाया। यहाँ के मुख्य शिव मंदिर का पुनर्निर्माण सन १९५३ में पूरा हुआ था और आज भी वर्तमान इंडोनेशिया सरकार के निरीक्षण में इस परिसर में पुनर्निर्माण का कार्य जारी है। सन १९९० के दशक में सरकार ने इस परिसर के आसपास स्थित बाजार और दुकानों को हटवाकर यहाँ एक पुरातात्विक उद्यान का निर्माण करवाया। इसके अतिरिक्त यहाँ त्रिमूर्ति ओपन-एयर थिएटर और इनडोर स्टेज का निर्माण भी करवाया गया है, जहाँ रामायण महाकाव्य और जावा के अन्य पारंपरिक नृत्यों का मंचन होता है। सरकार की सक्रिय सहभागिता के कारण अब यह मंदिर परिसर पुनः एक बार जावा क्षेत्र में हिन्दुओं का एक महत्वपूर्ण धार्मिक केंद्र बन गया है।

सन २००६ में योग्यकर्ता में आए भीषण भूकंप के कारण फिर एक बार मंदिर की बहुत क्षति हुई, किन्तु कुछ ही सप्ताहों के भीतर इसका सुधार-कार्य करके मंदिर पुनः आगंतुकों के लिए खोल दिया गया। सन २०१० में मेरापी ज्वालामुखी विस्फोट के बाद यह मंदिर सुरक्षित बचे रहे थे, किन्तु वर्ष २०१४ में योग्यकर्ता से लगभग २०० किमी दूर पूर्वी जावा में स्थित केलुद ज्वालामुखी में हुए भीषण विस्फोट के बाद फैली राख के कारण इस क्षेत्र पर भीषण दुष्प्रभाव पड़ा और इस परिसर को कुछ समय तक पर्यटकों के लिए बंद कर देना पड़ा था।

मंदिर परिसर में होने वाला रामायण का मंचन

मूलतः इस परिसर में छोटे-बड़े सब मिलाकर कुल २४० मंदिर थे, किन्तु सभी मंदिरों का पुनर्निर्माण संभव न होने के कारण सरकार ने यह निर्णय लिया था कि जिन मंदिरों का कम से कम ७५% भाग उपलब्ध है, केवल उन्हीं का पुनर्निर्माण किया जाए। अब इनमें से सभी १६ मुख्य मंदिरों का पुनर्निर्माण कर लिया गया है, किन्तु छोटे २२४ मंदिरों में से केवल २ ही पुनः बनाए जा सके हैं। यहाँ के कुछ प्राचीन मंदिरों में रामायण की कथा भी पत्थरों पर उकेरी गई थी, जिसे भी पुनर्निर्मित मंदिरों में उकेरा गया है। प्रत्येक पूर्णिमा के दिन शाम को यहाँ के त्रिमूर्ति ओपन-एयर थिएटर में राम-कथा का मंचन नृत्य के माध्यम से किया जाता है।

यहाँ के मुख्य शिव मंदिर में कुल चार कक्ष हैं, जिनमें से एक में शिवजी की प्रतिमा, दूसरे में उनके गुरु अगस्त्य और तीसरे में उनके पुत्र गणेश जी की प्रतिमा है। चौथे कक्ष में दुर्गा की मूर्ति है, जिन्हें यहाँ ‘रोरो जोंग्गरंग’ के नाम से पूजा जाता है। रोरो जोंग्गरंग के बारे में यहाँ एक दंतकथा भी प्रचलित है।

सुबह की ओस में घिरे मंदिर का सुंदर दृश्य

ऐसा माना जाता है कि बांडुंग बोन्दोवोसो नामक एक युवक ने रोरो जोंग्गरंग को विवाह का प्रस्ताव दिया। रोरो जोंग्गरंग उससे घृणा करती थी क्योंकि वह उसके पिता का हत्यारा था। अतः उसने युवक का प्रस्ताव अस्वीकार करने के लिए यह शर्त रख दी कि यदि बोन्दोवास एक ही रात में एक हजार मूर्तियों का निर्माण कर दे, तो वह उससे विवाह कर लेगी। बांडुंग बोन्दोवोसो के पास प्रेतात्माओं की एक अदृश्य सेना थी, और उसके लिए एक रात में एक हजार मूर्तियों का निर्माण करना कोई कठिन कार्य नहीं था। बोन्दोवोसो ने प्रेतात्माओं का आह्वान किया और मूर्तियों का निर्माण-कार्य प्रारंभ हो गया। सुबह होने में अभी बहुत समय बाकी था और ९९९ मूर्तियों का निर्माण पूरा हो चुका था। इससे चिंतित रोरो जोंग्गरंग ने ग्रामीणों से कहकर आस-पास चावल के सभी खेतों में आग लगवा दी, ताकि इसका प्रकाश फैल जाने के कारण यह आभास हो कि सुबह हो गई है। उस प्रकाश को देखते ही सभी प्रेतात्माएं वापस लौट गईं और अंतिम मूर्ति का निर्माण नहीं हो सका। इस धोखे से क्रोधित बांडुंग बोन्दोवोसो ने रोरो जोंग्गरंग को श्राप दे दिया कि वही उसकी हजारवीं मूर्ति हो। तभी से रोरो जोंग्गरंग पत्थर की हो गई और आज भी यहाँ शिव मंदिर में उसी रूप में मौजूद है।

इस तरह की मान्यताओं में कितनी सच्चाई है, इस पर हमें संदेह हो सकता है, किन्तु इस बात में कोई संदेह नहीं कि प्रम्बानन के मंदिर विश्व के सबसे सुंदर व दर्शनीय हिन्दू मंदिरों में से एक हैं। यदि कभी आपको इंडोनेशिया जाने का अवसर मिले, तो इन मंदिरों को देखने अवश्य जाइए और हाँ, यह लेख आपको कैसा लगा इस बारे में अपनी राय भी अवश्य बताइये। धन्यवाद!

स्त्रोत:
१. http://borobudurpark.com
२. https://www.yogyes.com
3. विकिपीडिया

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