राफ़ेल (भाग – २)

(इस लेख का पहला भाग पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें)

इस लेख के पहले भाग में मैंने इस बारे में लिखा था कि राफ़ेल डील की शुरुआत कब हुई, पिछली यूपीए सरकार के समय उसमें किन कारणों से देरी हुई व बाद में मोदी सरकार ने पुरानी डील रदद् करके सीधे फ़्रांस की सरकार के साथ क्यों डील की और १८ के बजाय ३६ विमान खरीदने का निर्णय क्यों लिया गया।

लेकिन इसमें रिलायंस की क्या भूमिका है और सरकारी कंपनी एचएएल का नाम इसमें शामिल क्यों नहीं है? क्या सरकार ने अनिल अंबानी को फ़ायदा पहुँचाने के लिए एचएएल का कॉन्ट्रैक्ट छीनकर रिलायंस को दे दिया है? क्या काँग्रेस का यह आरोप सही है कि अंबानी ने इस डील से सिर्फ़ १२ दिन पहले रिलायंस डिफेंस नाम से रातोंरात एक कंपनी बनाई और मोदी सरकार ने फ़्रांस पर दबाव डालकर उस कंपनी को ठेका दिलवाया? आज मैं इन्हीं मुद्दों पर बात करूँगा।

३१ जुलाई २०१८ को कांग्रेस के मुखपत्र ‘नेशनल हेराल्ड’ में एक लेख छपा था। यह वही नेशनल हेराल्ड है, जिसके पैसों और संपत्ति की हेराफेरी और टैक्स चोरी के मामले में फ़िलहाल राहुलजी और सोनियाजी जमानत पर बाहर हैं। इस लेख में आरोप लगाया गया है कि १० अप्रैल २०१५ को जब मोदीजी ने अपने फ़्रांस दौरे में राफ़ेल डील की घोषणा की थी, उससे सिर्फ १२ दिन पहले अनिल अंबानी ने ५ लाख रुपये की पूंजी के साथ ‘रिलायंस डिफेन्स लिमिटेड’ नाम से एक कंपनी का रजिस्ट्रेशन किया और फिर मोदी सरकार ने फ़्रांस पर दबाव डालकर इस कंपनी को राफ़ेल डील में एक ठेका दिलवाया है, जिससे रिलायंस और अंबानी को ४५ हजार करोड़ का फ़ायदा होगा। कांग्रेस का आरोप है कि इस चोरी में प्रधानमंत्री को भी हिस्सा मिला है। इसी बात को दोहराते हुए राहुल गांधी ने सितंबर २०१८ में राजस्थान की एक चुनावी रैली में कहा था कि ‘गली-गली में शोर है, देश का चौकीदार चोर है’। मैं सोच रहा हूँ कि नेशनल हेराल्ड की टैक्स चोरी के मामले में खुद जमानत पर घूम रहे व्यक्ति को क्या बिना प्रमाण दिए देश के प्रधानमंत्री पर ऐसे आरोप लगाना शोभा देता है? लेकिन उस मुद्दे की चर्चा फिर कभी करेंगे, आज रिलायंस डिफेन्स के बारे में बात करते हैं। इसके लिए हमें कुछ साल पीछे जाना पड़ेगा।

गुजरात के अमरेली जिले में अरब सागर के किनारे पीपावाव नाम का एक गांव है। यहीं पश्चिमी भारत का एक प्रमुख बंदरगाह ‘पीपावाव पोर्ट’ भी है। मुंबई के दो भाइयों निखिल गांधी और भावेश गांधी ने कुछ सालों पहले एसकेआईएल इंफ्रास्ट्रक्चर नाम से एक कंपनी बनाई। आगे उन्होंने १९९७ में पीपावाव शिपयार्ड नाम से एक और कंपनी शुरू की। १९९८ में नीदरलैंड की एक कंपनी एटीएम टर्मिनल्स को पीपावाव में बंदरगाह विकसित करने का ठेका मिला। एटीएम टर्मिनल्स पूरी दुनिया में बंदरगाहों का निर्माण और संचालन करने वाली सबसे बड़ी कंपनी है। इस कंपनी ने पीपावाव शिपयार्ड के साथ मिलकर यह बंदरगाह बनाया।

आगे २००५ से २००७ के बीच गांधी भाइयों ने अपनी कंपनी को बढ़ाने के लिए भारत के कुछ बैंकों और बड़े निवेशकों से कर्ज लिया। उसी दौरान कंपनी का नाम बदलकर उन्होंने पीपावाव शिपयार्ड लिमिटेड कर दिया। अब उनका इरादा जहाज बनाने का था। इसके बाद २००८ में उन्होंने ‘पीपावाव डिफ़ेंस एंड ऑफ़शोर इंजीनियरिंग कंपनी लिमिटेड’ के नाम से एक और कंपनी बनाई। इसके द्वारा वे सेना के लिए जहाज, हथियार और अन्य उत्पाद बनाना चाहते थे।

पीपावाव भारत की पहली निजी कंपनी है, जिसे भारतीय नौसेना ने युद्धपोत बनाने का लाइसेंस दिया है क्योंकि इस काम के लिए आवश्यक योग्यता और सुविधाएं इस कंपनी के पास हैं। मुंबई के माझगांव डॉक ने भी नौसेनिक जहाजों के निर्माण के लिए पीपावाव के साथ साझेदारी की है। भारत में मॉड्यूलर शिप बिल्डिंग की सुविधा केवल एक ही कंपनी के पास है और वह कंपनी पीपावाव ही है। बड़े विमानवाहक जहाजों की जाँच, रखरखाव और मरम्मत के लिए आवश्यक सुविधाएं भी भारत में केवल एक ही कंपनी के पास हैं, और वह कंपनी यही है। जहाजों के निर्माण और रखरखाव के अलावा यह कंपनी ऑफ़शोर ड्रिलिंग और तेल व गैस के परिवहन के लिए आवश्यक बड़ी-बड़ी मशीनों और भारी उपकरणों का निर्माण भी करती है।

२०१० में इस कंपनी को भारतीय नौसेना से ऑफ़शोर निगरानी के लिए ५ जहाज बनाने का कॉन्ट्रैक्ट मिला था। इसके अलावा २०११ से २०१५ के बीच कंपनी ने दो बड़े व्यापारिक जहाजों का निर्माण, हजारों टन वजन वाले ६ जैकअप रिग (जिनका उपयोग तेल के कुओं में किया जाता है) की मरम्मत, और कोस्टगार्ड के लिए एक जहाज का निर्माण किया है। २०११ में कंपनी ने माझगांव डॉक के साथ मिलकर जहाजों और पनडुब्बियों के निर्माण के लिए साझेदारी की। फरवरी २०१४ में जर्मनी की एक कंपनी एटलस इलेक्ट्रॉनिक ने भी टॉरपीडो (नौसेना की मिसाइलें) बनाने के लिए पीपावाव कंपनी के साथ पार्टनरशिप की।

इन उदाहरणों से हम इतना तो समझ ही सकते हैं कि यह कोई कागजी कंपनी नहीं थी, बल्कि जहाज निर्माण और रक्षा-क्षेत्र की एक बड़ी कंपनी थी। अन्यथा भारतीय नौसेना, नीदरलैंड की एटीएम टर्मिनल या जर्मनी की एटलस कंपनी इसके साथ काम क्यों करती? कृपया ध्यान रखिये कि इस पूरे कालखंड में मोदी सरकार कहीं नहीं थी। ये सारे सौदे पिछली यूपीए सरकार के दौर में हुए थे।

भारत पूरी दुनिया में हथियारों का सबसे बड़ा खरीदार है।लेकिन विदेशों से हथियार खरीदना बहुत महंगा है और इसमें देश के बजट की बहुत बड़ी रकम खर्च होती है। लेकिन ‘मेक इन इंडिया’ के अंतर्गत मोदी सरकार कोशिश कर रही है कि इस स्थिति को बदला जाए और विदेशों से हथियार खरीदने के बजाय सब-कुछ भारत में बने और यहाँ से दूसरे देशों को बेचा जाए। इसके कारण हथियार खरीदने का हमारा खर्च कम होगा, भारतीय कंपनियों को विदेशी रक्षा कंपनियों के साथ काम करने और नई तकनीक के बारे में जानने का मौका मिलेगा और जब नई फैक्ट्रियां भारत में ही लगेंगी, तो भारत के लोगों के लिए रोजगार के नए अवसर भी खुलेंगे।

पिछले कुछ वर्षों में इस क्षेत्र में बढ़ते अवसरों को देखते हुए कई नई कंपनियों ने इसमें निवेश की शुरुआत की। अनिल अंबानी की रिलायंस इन्फ्रास्ट्रक्चर भी इनमें से एक थी। रक्षा क्षेत्र में उतरने के लिए फरवरी २०१५ में रिलायंस ने तीन नई कंपनियां बनाईं – रिलायंस डिफेंस सिस्टम्स प्राइवेट लिमिटेड, रिलायंस डिफेंस टेक्नोलॉजिस प्राइवेट लिमिटेड और रिलायंस डिफेंस एंड एरोस्पेस प्राइवेट लिमिटेड।

यह कॉमन सेन्स की बात है कि कोई भी व्यक्ति अगर छोटा-मोटा व्यापार भी करता है, तो उसकी कोशिश यही रहती है कि वह अपने व्यापार को बढ़ाने के लिए नए अवसर ढूंढे और इसके लिए ज़रूरत पड़ने पर किसी और के साथ मिलकर साझेदारी में भी काम करे। पीपावाव कंपनी भी यही चाहती थी। कंपनी के मालिकों को बैंकों का कर्ज चुकाना था और अपना कारोबार बढ़ाने के लिए नए निवेशकों की भी तलाश थी। इसके लिए कंपनी के मालिक निखिल गांधी ने महिंद्रा एंड महिंद्रा, एलएंडटी, हीरो मोटर्स और अनिल अंबानी की रिलायंस इंफ्रास्ट्रक्चर जैसी कुछ बड़ी कंपनियों से संपर्क किया।

दूसरी ओर रिलायंस भी इस क्षेत्र में अपने पैर जमाना चाहती थी। पीपावाव में निवेश करना रिलायंस को फायदे का सौदा लगा क्योंकि बड़े-बड़े प्रोजेक्ट्स पर काम करने के लिए आवश्यक सारी सुविधाएं पीपावाव कंपनी के पास पहले से ही उपलब्ध थी। इसलिए बाकियों की तुलना में ज्यादा कीमत देकर रिलायंस ने गांधी भाइयों से पीपावाव के १७% शेयर खरीद लिए। इसके बाद रिलायंस ने अन्य शेयरधारकों को भी ऑफ़र दिया और उनसे भी शेयर खरीदे, जिससे पीपावाव के कुल ३६% शेयर रिलायंस के पास आ गए। इस तरह रिलायंस सबसे बड़ा शेयर होल्डर बन गया और अब अनिल अंबानी पीपावाव के चेयरमैन बने। यह मार्च २०१५ की बात है।

शायद राहुल जी इस सारे सच को छुपा रहे हैं और इसकी आड़ में केवल झूठ फैलाकर मोदी सरकार पर आरोप लगा रहे हैं, जबकि इस पूरे मामले में राफ़ेल या डासों का कोई संदर्भ ही नहीं है। तो फिर राफ़ेल डील में रिलायंस और अंबानी का नाम कहाँ से आ गया? इसका जवाब आगे है।

दरअसल सन २०१३ में यूपीए सरकार ने एक ‘डिफेंस प्रोक्योरमेंट प्रोसीजर’ बनाया था। यह एक नीतिगत दस्तावेज़ है, जिसमें बताया गया है कि कोई भी रक्षा सौदा करते समय किन नियमों का पालन करना होगा। इनमें से एक नियम यह था कि जिस भी कंपनी को ३०० करोड़ से अधिक का कोई कॉन्ट्रैक्ट मिलेगा, उसे ३० प्रतिशत पूंजी वापस भारत में निवेश करनी होगी और इसके लिए किसी भारतीय कंपनी के साथ मिलकर काम करना होगा। इसे ‘ऑफसेट’ कहा जाता है। यह एक अच्छा नियम है क्योंकि इससे भारत में रक्षा क्षेत्र में निवेश बढ़ता है और भारतीय कंपनियों को दुनिया की बड़ी कंपनियों के साथ काम करने का मौका मिलता है। बाद में २०१६ में मोदी सरकार ने इस नीति में भी कई सुधार किये हैं।

मुद्दे की बात ये है कि २०१३ की उस नीति के अनुसार डासों को भी राफ़ेल के सौदे की रकम में से कम से कम ३० प्रतिशत पूंजी का वापस निवेश करना था। वास्तव में यह भी मोदी सरकार की एक सफलता ही है कि उसने डासों को केवल ३० नहीं, बल्कि ५०% निवेश करने के लिए राजी कर लिया। इसका सीधा मतलब ये है कि राफ़ेल की डील में भारत सरकार जितना पैसा फ़्रांस को देगी, उसका एक बड़ा हिस्सा इस निवेश के रूप में वापस भारत ही आएगा। यह निवेश रक्षा क्षेत्र से संबंधित किसी भी कार्य में किया जा सकता है और इसके लिए किस कंपनी को चुनना है, यह तय करने की स्वतंत्रता डासों के पास ही है। नियम के अनुसार सरकार इसमें कोई दखल नहीं दे सकती।

कांग्रेस एक और आरोप यह भी लगा रही है कि उसके ज़माने में यह ठेका एचएएल को मिलने वाला था, जिसे अब मोदी सरकार ने छीनकर अंबानी को दे दिया है। लेकिन यह भी सच नहीं है।

कांग्रेस के समय जिस सौदे की बात हो रही थी, उसमें १८ विमान फ़्रांस से बने-बनाए आने वाले थे और १०८ विमान भारत में एचएएल के साथ मिलकर बनाए जाने थे। मैंने कल विस्तार से आपको बताया था कि कांग्रेस सरकार की सुस्ती के कारण वह सौदा बाद में रदद् हो गया और बाद में मोदी सरकार को वायुसेना की अर्जेंट आवश्यकता पूरी करने के लिए १८ के बजाय ३६ बने-बनाए विमान खरीदने का सौदा करना पड़ा। सरकार ने ऐसा वायुसेना की सहमति से ही किया है। चूंकि इस नए सौदे के अनुसार सारे विमान फ्रांस से ही बनकर आने वाले हैं और इनमें से कोई विमान भारत में नहीं बनेगा, इसलिए एचएएल को जबरन ठेका नहीं दिया जा सकता।

कृपया ध्यान रखिये कि भारत सरकार और फ़्रांस सरकार के बीच हुए राफ़ेल के इस पूरे सौदे में रिलायंस कहीं नहीं है। रिलायंस का नाम उसके बाद आता है क्योंकि उस फ़्रांसीसी कंपनी डासों को ऑफसेट नियम के अनुसार इस सौदे की रकम का एक हिस्सा वापस भारत में निवेश करना है और उसके लिए उसे भारतीय कंपनियों के साथ मिलकर काम करना पड़ेगा।

अगर कोई छोटा-सा भोजनालय भी खोलना हो, तो कई लोगों की ज़रूरत पड़ती है। कोई बर्तन मांजेगा, कोई बाजार से सब्जी लाएगा, कोई खाना पकाएगा, कोई परोसेगा, कोई ग्राहकों के बिल का हिसाब करेगा। इनमें से हर काम हर व्यक्ति नहीं कर सकता, इसलिए सही काम के लिए आपको सही व्यक्ति चुनना पड़ेगा।

ठीक उसी तरह डासों कंपनी भी उस ५०% का निवेश भारत में रक्षा क्षेत्र के अलग-अलग कामों में करने वाली है, जिसके लिए वह कई भारतीय कंपनियों के साथ काम कर रही है। जैसे, मशीनी पुर्जों, ट्यूब और पाइपों के उत्पादन के लिए बेंगलुरु की ४ और मुंबई की एक कंपनी को चुना गया है। इनमें से एक कंपनी एचएएल के साथ मिलकर यह काम करने वाली है। इसी प्रकार कुछ अन्य पुर्जों के निर्माण और असेंबली के लिए बेंगलुरु की १२, बेलगांव की २, कोयंबतूर की ३, मुम्बई की १ और पुणे की २ कंपनियां हैं और रिलायंस के साथ मिलकर डासों नागपुर में एक प्रोजेक्ट शुरू कर रही है। ऐसी लगभग ७२ कंपनियां हैं और इससे आप स्वयं समझ सकते हैं कि रिलायंस इस प्रोजेक्ट में अकेली कंपनी नहीं है, बल्कि लगभग ७२ कंपनियों के साथ डासों काम करने वाली है और रिलायंस उनमें से एक है। आपको अब शायद यह भी स्पष्ट हो गया होगा कि एचएएल से कोई प्रोजेक्ट छीनकर रिलायंस को नहीं दिया गया है।

फिर कांग्रेस सिर्फ रिलायंस का नाम क्यों उछाल रही है? इसका सीधा कारण ये है कि पिछले कुछ सालों में बार-बार दुष्प्रचार के द्वारा यह झूठ फैला दिया गया है कि अंबानी और अदानी से मोदी जी की ख़ास दोस्ती है और सरकार सारे काम उन्हीं को फायदे पहुंचाने के लिए करती है। लोग भी पूरी जानकारी ढूंढने के बजाय सिर्फ सुनी-सुनाई बातों पर तुरन्त भरोसा कर लेते हैं, जबकि उनमें से बहुतों को शायद ये भी नहीं पता होगा कि रिलायंस ग्रुप में कौन-सी कंपनी मुकेश अंबानी के पास है और कौन-सी अनिल अंबानी के पास।

कृपया यह भी ध्यान रखिये कि फरवरी २०१७ में रिलायंस को अमरीकी नौसेना की ओर से भी ५ साल के लिए १५ हजार करोड़ (२ अरब डॉलर) का एक कॉन्ट्रैक्ट मिला है, जिसके अंतर्गत प्रशांत और हिन्द महासागर में तैनात अमरीकी नौसेना के लगभग ५०७० जहाजों व पनडुब्बियों और लगभग १४० युद्धक विमानों के रखरखाव और मरम्मत की ज़िम्मेदारी रिलायंस को दी गई। फ़िलहाल अमरीकी सेना यह काम सिंगापुर और जापान में करवाती है। राहुल जी अवश्य चिल्लाते रहते हैं कि रिलायंस फ़र्ज़ी कंपनी है, लेकिन क्या आपको लगता है कि अमरीकी नौसेना ने बिना सोचे-समझे ही अरबों डॉलर का इतना महत्वपूर्ण ठेका यूं ही किसी फ़र्ज़ी कंपनी को दे दिया होगा? यह तो बिल्कुल बेतुकी बात लगती है।

कांग्रेस यह भी मांग कर रही है कि मोदी सरकार इस पूरे सौदे की सारी जानकारी सबको बताए। कांग्रेस ऐसी मांग कर सकती है क्योंकि उसे देश की सुरक्षा से ज्यादा चिंता अपनी राजनीति की है। लेकिन ये बहुत अच्छी बात है कि मोदी सरकार इस सौदे की विस्तृत जानकारी किसी को नहीं बता रही है क्योंकि जानकारी सार्वजनिक करने का सीधा मतलब ये होगा कि भारत की सुरक्षा को मजबूत बनाने के लिए इन विमानों में जो भी विशेष सुधार हमने करवाए हैं, उन सबकी पूरी जानकारी भारत के दुश्मनों को भी हासिल हो जाएगी। ये तो ऐसा ही हुआ कि आपने तिजोरी में पूरा किमती सामान जमा करके रखा है और अब राहुलजी आपसे कह रहे हैं कि उस तिजोरी की चाबियां आप पूरे मोहल्ले में बंटवा दीजिए! क्या ऐसा करना आपको उचित लगता है?

यह लेख थोड़ा लंबा हो गया, लेकिन मुझे उम्मीद है कि इससे आपको राफ़ेल के मामले को अच्छी तरह समझने में मदद मिली होगी। कृपया मुझे अवश्य बताएं कि लेख आपको कैसा लगा।

Comments

comments

3 thoughts on “राफ़ेल (भाग – २)”

प्रातिक्रिया दे

आपका ईमेल पता प्रकाशित नहीं किया जाएगा.