संगीत की भाषा

भारत की लोकगीत-लोकसंगीत की परंपरा अत्यंत समृद्ध रही है। कुछ वर्षों पहले तक यह आशंका होती थी कि ये सब कलाएं, परंपराएं और संगीत कहीं अंग्रेज़ी पॉप कल्चर और बॉलीवुड की आंधी में उड़कर लुप्त न हो जाएं। लेकिन अब डिजिटल युग में ये चिंता दूर हो गई है। क्षेत्रीय भाषाओं-बोलियों के पारंपरिक गीत भी अब म्यूजिक अल्बम और वीडियो रिकॉर्डिंग के रूप में जाने-अनजाने में ही सुरक्षित-संरक्षित हो रहे हैं।
करीब १०-१२ वर्षों पहले अपने कॉलेज के दिनों में जब मैं बालाघाट में रहता था, तो नवरात्रि के दौरान हर गली, हर पंडाल में शहनाज़ अख्तर के देवी-गीतों के अल्बम बजते रहते थे। ये शायद सिवनी की गायिका हैं। इसी तरह बालाघाट जिले के ही एक लोकगायक प्रेम ‘बालाघाटी’ द्वारा डोंगरगढ़ स्थित माँ बमलेश्वरी की आराधना में लिखे-गाए गीत भी कई बार सुनने को मिलते थे।
भक्ति-गीतों के अलावा उन्हीं दिनों छत्तीसगढ़ की गायिका सीमा कौशिक के भी कुछ गीत बहुत लोकप्रिय हुआ थे। आगे मैं २ वर्षों तक मथुरा में रहा, तब कुछ ब्रज-भाषा के लोकगीत, भक्तिगीत आदि सुनने को मिलते थे। वहां कुछ सहकर्मी हरियाणा और राजस्थान के भी थे, जिनसे कुछ हरियाणवी और राजस्थानी गीतों के बारे में भी पता चला। इसी तरह कई सालों पहले कभी किसी टीवी चैनल पर पहली बार वडाली ब्रदर्स की एक प्रस्तुति देखी थी। उनका स्वर और शैली भी मेरे मन को छू गई। फिर उनके कई गीत ऑनलाइन सुने। इसी तरह आबिदा परवीन, कविता कृष्णमूर्ति, अनूप जलोटा, राहत फतह अली खां और शंकर महादेवन जैसों के गैर-फिल्मी गीतों, भजनों, कव्वालियों आदि को सुना। वडाली ब्रदर्स पंजाब के हैं, पर एक दिन अचानक उनका एक तमिल गीत भी कहीं सुनने को मिला था! ऐसे कई गायकों के कई भाषाओं के कई गीत मैं आज भी कभी-कभार यूट्यूब पर देखता-सुनता रहता हूं। हालांकि, मैं इन सभी भाषाओं के शब्द और अर्थ नहीं समझ सकता, लेकिन संगीत की मधुरता में अवश्य ही डूबकर खो सकता हूं।
इन सबके अलावा एक और स्वर है, जिसे सुनकर मुझे दिव्यता और ईश्वर की अनुभूति होती है, शास्त्रीय गायिका श्रीमती किशोरी अमोणकर का स्वर। उनके गाए भजनों को भी मैं अक्सर सुनता हूं। आर्ट ऑफ लिविंग के भी कुछ भजन बहुत अच्छे हैं, हालांकि गायकों-गायिकाओं के नाम मुझे मालूम नहीं। तिब्बत और लद्दाख का बौद्ध संगीत भी मुझे बहुत अद्भुत लगता है।
आज शनिवार की छुट्टी है, इसलिए थोड़ा समय संगीत के लिए निकाला और कुछ राजस्थानी, छत्तीसगढ़ी गीत सुने। अंत में पद्मश्री और पद्मभूषण से सम्मानित छत्तीसगढ़ की पंडवानी गायिका तीजन बाई की एक प्रस्तुति सुनी, जिसमें महाभारत के एक प्रसंग का वर्णन और गायन चल रहा था, जिसमें श्रीकृष्ण पांडवों का शान्ति-प्रस्ताव लेकर कौरवों की सभा में जाते हैं और कौरव यह प्रस्ताव ठुकरा देते हैं। मुझे पता नहीं आपमें से कितने लोगों ने तीजन बाई का नाम भी सुना है। ऐसे लोकगीत सुनकर अहसास होता है कि रामायण-महाभारत का इतिहास भारतीय जनमानस में कितनी गहराई तक समाया हुआ है। महाभारत का यह प्रसंग सुनते समय मुझे अचानक कश्मीर समस्या और वहां की वर्तमान स्थिति याद आ रही थी और कई समानताएं भी महसूस हो रही थीं। वाकई कुछ समस्याएं बातचीत से नहीं, बल्कि युद्ध और शक्ति से ही सुलझ सकती हैं।
आज शाम को सिंगापुर में एक कार्यक्रम में जाने का विचार है, जहां कुछ मराठी संतों की रचनाओं, भजनों, अभंगों आदि का गायन सुनने को मिलेगा। कुछ समय पहले इंडोनेशिया के बाली द्वीप की यात्रा के दौरान मुझे महाभारत के एक प्रसंग का मंचन देखने को मिला था। अब मैं एक बार इंडोनेशिया और थाईलैंड की पारंपरिक रामायण प्रस्तुतियां भी अवश्य देखना-सुनना चाहता हूं। मैंने पढ़ा है कि उनकी रामायण की कहानी हमारी रामायण से थोड़ी-सी अलग है। लेकिन रामायण-महाभारत आज भी वहां के जीवन और संस्कृति का अभिन्न अंग हैं और शायद भारत के लोगों से भी ज्यादा इंडोनेशिया और थाईलैंड के लोग इन ऐतिहासिक प्रसंगों व उस संस्कृति पर गर्व करते हैं।
ये सही है कि संगीत की कोई भाषा और सीमा नहीं होती। आशा है कि हम भारत के लोग न सिर्फ अपनी समृद्ध परंपराओं को बचाए रखेंगे, बल्कि इन दूसरे देशों के आचरण-अनुभव से कुछ प्रेरणा लेकर अपने इतिहास व संस्कृति पर गर्व करना भी सीखेंगे!
आप भी कमेन्ट में अपने कुछ पसंदीदा गीतों और गायकों के बारे में बताइये, ताकि मैं उन्हें भी सुन सकूं। आभार!

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