अफ़्रीका में हलचल

द. अफ्रीका

कल अपने लेख में मैंने मालदीव के राजनैतिक संकट की बात की थी। आज दक्षिण अफ्रीका की बात करने वाला हूं। इन दिनों वहां भी राजनैतिक हलचल जारी है। लेकिन वहां तक पहुंचने से पहले हमें उत्तर प्रदेश जाना पड़ेगा क्योंकि द.अफ्रीका के कई लोगों की राय है कि उनके देश की वर्तमान सरकार के भ्रष्टाचार के पीछे उप्र के एक परिवार का बड़ा हाथ है। तो आइए आज कुछ नई कड़ियाँ जोड़ने का प्रयास करें।

सन १९९३ तक दक्षिण अफ्रीका में रंगभेद बहुत बड़े पैमाने पर था। कई मामलों में यह केवल सामाजिक ही नहीं था, बल्कि कई मामलों में तो कानून बनाकर इसे संरक्षण दिया गया था। वास्तव में अफ्रीका में रंगभेद का इतिहास बहुत पुराना है, लेकिन १९४८ में यह सरकार की आधिकारिक नीति का हिस्सा बन गया। उस वर्ष अफ्रीका में नेशनल पार्टी की सरकार बनी थी और रंगभेद उस पार्टी का मुख्य सिद्धांत था।

नेशनल पार्टी १९९३ तक लगातार सत्ता में बनी रही और यह रंगभेद की नीति भी लगातार जारी रही। नेल्सन मंडेला के नेतृत्व में चले लंबे संघर्ष के बाद अंततः १९९३ में यह नीति बदली और नया संविधान लागू हुआ। इसके बाद १९९४ के चुनाव में पहली लोकतांत्रिक सरकार चुनी गई और मंडेला द.अफ्रीका के पहले राष्ट्रपति बने।

१९९३ में दक्षिण अफ्रीका में यह ऐतिहासिक परिवर्तन हुआ और उसी वर्ष भारत में उप्र के सहारनपुर के एक व्यवसायी शिवकुमार गुप्ता ने अपने बेटे अतुल गुप्ता को दक्षिण अफ्रीका में अपना व्यापार शुरू करने के लिए भेजा। वहां उन्होंने सहारा कंप्यूटर्स के नाम से एक छोटी-सी कंपनी की शुरुआत की (इसका भारत के सहारा ग्रुप से कोई संबंध नहीं है)।

कुछ समय बाद उसी परिवार के दो अन्य भाई अजय व राजेश भी दक्षिण अफ्रीका आ गए। तीनों भाइयों ने मिलकर अपना व्यापार बढ़ाया और कंप्यूटर के अलावा खनन, हवाई यात्रा, ऊर्जा, प्रौद्योगिकी और मीडिया के क्षेत्र में भी कारोबार करने लगे। आज गुप्ता परिवार द. अफ्रीका की कई कंपनियों का मालिक है और इनके कर्मचारियों की संख्या लगभग १० हज़ार है। गुप्ता परिवार की संपत्ति करोड़ों डॉलर की है।

लेकिन सहारनपुर में छोटा-सा व्यापार करने वाले परिवार ने द.अफ्रीका में इतनी जबरदस्त सफलता कैसे पाई और दक्षिण अफ्रीका की राजनैतिक हलचल के बारे में बात करने की बजाय मैं आपको गुप्ता परिवार की कहानी क्यों सुना रहा हूं? इसका जवाब आपको आगे मिलेगा, जब आप द.अफ्रीका के राष्ट्रपति जैकब ज़ुमा की कहानी भी सुन लेंगे।

राष्ट्रपति जैकब ज़ुमा

मंडेला की ही अफ्रीकन नेशनल पार्टी के नेता जैकब ज़ुमा पहली बार २००९ में देश के राष्ट्रपति बने और अभी तक वे इस पद पर बने हुए हैं। इससे पहले दिसंबर २००७ से दिसंबर २०१७ तक वे सत्ताधारी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष भी रहे। उससे भी पहले १९९९ से २००५ तक वे देश के उपराष्ट्रपति थे। संक्षेप में, ज़ुमा पिछले कई वर्षों से दक्षिण अफ्रीका के संभवतः सबसे शक्तिशाली नेता रहे हैं।

लेकिन इन दिनों श्री ज़ुमा राजनैतिक संकटों से घिरे हुए हैं। पिछले कुछ वर्षों में उन पर भ्रष्टाचार, सरकारी धन के दुरुपयोग, हथियारों के दलालों से सांठगांठ, पैसों की हेराफेरी और यहां तक कि बलात्कार के आरोप भी लगते रहे हैं। इन आरोपों की शुरुआत २००५ में हुई थी। तब उन पर आरोप लगा कि १९९९ में हथियारों के एक दलाल की मदद करने के बदले उन्होंने लाखों डॉलर की रकम ली थी। २००९ में राष्ट्रपति चुनाव से कुछ ही समय पहले राष्ट्रीय जांच प्राधिकरण ने यह आरोप खारिज कर दिया। हालांकि प्राधिकरण का यह निर्णय भी विवादित है।

ज़ुमा एक बहुत गरीब परिवार में जन्मे थे। उनकी विधवा मां ने जैसे-तैसे उनका पालन-पोषण किया। ज़ुमा को कभी स्कूली शिक्षा भी नहीं मिल पाई। बहुत कम उम्र में ही उन्होंने अफ्रीकन नेशनल पार्टी के समर्थन में हथियार उठा लिए थे और उसके सशस्त्र आंदोलन में वे सक्रिय रहे। इसी पृष्ठभूमि के कारण अधिकांश मतदाता यह महसूस करते थे कि ज़ुमा उन्हीं में से एक हैं। ‘लोकनेता’ वाली इसी छवि के कारण ज़ुमा को २००९ के चुनाव में इतनी सफलता मिल पाई थी।

लेकिन २०१३ आते-आते यह छवि टूटने लगी। लोगों को जब पता चला कि ज़ुमा ने अपने निजी मकान के विस्तार और वहां स्विमिंग पूल, थिएटर आदि सुख-सुविधाओं के निर्माण के लिए सरकारी धन का दुरुपयोग किया है, तो लोगों का आक्रोश फूट पड़ा। इस मामले में २०१६ में अदालत ने फैसला सुनाया कि अपने निजी मकान के लिए सरकारी धन खर्च करके ज़ुमा ने कानून तोड़ा है। ज़ुमा को वह रकम सरकारी ख़ज़ाने में जमा करवानी पड़ी।

इसी साल २०१६ में ही राष्ट्रपति ज़ुमा के खिलाफ उठे एक बहुत बड़े मुद्दे ने द.अफ्रीका में हलचल मचा दी। इस बार आरोप लगा था कि ज़ुमा, उनके परिवार के लोगों और उनकी पार्टी एएनसी के कुछ बड़े नेताओं की गुप्ता परिवार के साथ बहुत ज़्यादा नज़दीकी है और ज़ुमा की सरकार व पार्टी के लोगों ने पिछले कुछ वर्षों में कई अनैतिक तरीकों से गुप्ता परिवार की कंपनियों को फायदा पहुंचाया है।

इसकी शुरुआत एएनसी के ही एक पूर्व सांसद के आरोपों के साथ हुई थी। इस सांसद ने दावा किया २०१० में गुप्ता भाइयों ने उसे प्रस्ताव दिया था कि हर वह उनके हित में काम करने को तैयार हो, तो वे उसे ज़ुमा की सरकार में मंत्री बनवा देंगे। ऐसा ही दावा एक पूर्व वित्त-मंत्री ने भी किया।

विपक्षी पार्टियों ने तुरन्त इस मुद्दे को पकड़ लिया। उन्होंने गुप्ता परिवार पर ‘स्टेट कैप्चर’ का आरोप लगाया, जिसका आशय यह है कि ज़ुमा सरकार पर वास्तव में पूरा नियंत्रण गुप्ता भाइयों का था और सरकार इस परिवार को फायदा पहुंचाने के लिए सब-कुछ कर रही थी। इसके बाद तो कई पुराने मामले में भी सामने आने लगे।

मीडिया ने दावा किया कि ज़ुमा की एक पत्नी (उनकी कई पत्नियां हैं) गुप्ता परिवार की खनन कंपनी में जनसंपर्क अधिकारी के पद पर रही थी और उन्हीं के माध्यम से परिवार ज़ुमा के संपर्क में आया था। यह आरोप भी है कि प्रिटोरिया में ज़ुमा परिवार के बंगले के निर्माण के लिए गुप्ता भाइयों ने लाखों रैंड (द.अफ्रीकी मुद्रा) की रकम दी थी। राष्ट्रपति ज़ुमा की एक बेटी गुप्ता परिवार की कंपनी सहारा कंप्यूटर्स के निदेशकों में से एक थी। ज़ुमा का बेटा भी गुप्ता समूह की कुछ कंपनियों में निदेशक था, लेकिन यह मामला चर्चा में आने के बाद दबाव में उन दोनों को इस्तीफा देना पड़ा। शायद गुप्ता परिवार भी इस हंगामे के बाद दक्षिण अफ्रीका से दुबई शिफ्ट हो गया है।

इससे पहले भी गुप्ता परिवार पर २०१३ में एक और आरोप लगा था कि उनके परिवार की एक शादी में २०० मेहमानों को भारत की जेट एयरवेज़ (शायद इस कंपनी में गुप्ता परिवार की भी हिस्सेदारी है) के निजी हवाई जहाज को सरकार ने नियम तोड़कर एयरफोर्स बेस पर उतरने की अनुमति दी और वहां से पुलिस सुरक्षा के बीच मेहमानों के काफिले को विवाह-स्थल तक ले जाया गया।

यह आरोप भी है कि राष्ट्रपति बनने के बाद जब २०१० में ज़ुमा भारत की आधिकारिक यात्रा पर आए थे, तो गुप्ता भाई भी उनके साथ थे और दक्षिण अफ्रीका में व्यापार या निवेश के संदर्भ में भारत के जितने भी उद्यमी राष्ट्रपति ज़ुमा से मिलना चाहते थे, उनसे कहा गया कि वे गुप्ता भाइयों से ही बात करें और उनकी सहमति के बाद ही कोई काम किया जाएगा, जिससे नाराज़ होकर कई लोगों ने मिलने से मना कर दिया। ऐसे और भी कई आरोप हैं।

दक्षिण अफ्रीका के पब्लिक प्रोटेक्टर (जैसे भारत में सीएजी है) ने इन मामलों की जांच की और कई अवरोधों के बाद अंततः नवंबर २०१६ में ‘स्टेट ऑफ कैप्चर’ रिपोर्ट जारी हुई। इसके आधार पर अदालत ने ज़ुमा सरकार को आदेश दिया कि इस पूरे मामले की जांच के लिए एक न्यायिक आयोग का गठन किया जाए और ६ माह के भीतर उसकी रिपोर्ट प्रकाशित की जाए।

स्वाभाविक है कि गुप्ता परिवार और जैकब ज़ुमा दोनों ही इन आरोपों से इनकार करते हैं। लेकिन विपक्षी दल, जनता का एक बड़ा वर्ग और खुद ज़ुमा की पार्टी के कई लोग उनके विरोध में खड़े हो गए हैं। यह मांग उठ रही है कि ज़ुमा को इस्तीफा दे देना चाहिए और उनकी बजाय उपराष्ट्रपति रैम्फोसा को राष्ट्रपति बनाया जाए। बहुत ज्यादा संभावना है कि इस तरह की मांग खुद रैम्फोसा के इशारे पर ही उठ रही हो क्योंकि उन्हें ज़ुमा-विरोधी गुट का माना जाता है।

उपराष्ट्रपति रैम्फोसा

पिछले ९ वर्षों के कार्यकाल में राष्ट्रपति जैकब ज़ुमा के विरुद्ध अब तक ९ बार अविश्वास प्रस्ताव लाया जा चुका है, लेकिन हर बार वे अपनी कुर्सी बचाए रखने में सफल हुए हैं। हाल के दिनों में भी उन्हें पद छोड़ने के लिए मनाने के रैम्फोसा और उनकी पार्टी के अन्य नेताओं के प्रयास अभी तक विफल ही रहे हैं। ज़ुमा दो बार देश के राष्ट्रपति रह चुके हैं, और संविधान के अनुसार वे अब फिर से राष्ट्रपति नहीं बन सकते। लेकिन ज़ुमा की कोशिश है कि अगली बार उनकी पत्नी को उम्मीदवारी मिले। इसीलिए उनकी पत्नी ने दिसंबर २०१७ में पार्टी अध्यक्ष पद का चुनाव भी लड़ा था, हालांकि इस चुनाव में जीत रैम्फोसा की ही हुई।

ज़ुमा की पार्टी और विपक्षी पार्टियां दोनों ही खुलकर ज़ुमा के विरोध में खड़ी हो गई हैं, लेकिन फिर भी पिछले कई दिनों से जारी प्रयासों के बावजूद वे लोग ज़ुमा को हटा नहीं पाए हैं। एएनसी की कोशिश है कि ज़ुमा को संसद में अविश्वास प्रस्ताव के द्वारा न हटाना पड़े क्योंकि ऐसा होने पर पूरी केबिनेट को इस्तीफा देना पड़ेगा और २१ फरवरी को देश का बजट भी पारित नहीं हो पाएगा।

इतना तो तय है कि दक्षिण अफ्रीका में अगले कुछ दिन बहुत उथल-पुथल भरे रहने वाले हैं।

(नोट: यह पोस्ट इंटरनेट पर कई मीडिया वेबसाइटों से प्राप्त जानकारी पर आधारित है।)

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