शिमला समझौता

पिछले लेख में मैंने १९४७ में पाकिस्तान के जन्म से लेकर १९७१ में बांग्लादेश के जन्म तक के इतिहास के बारे में संक्षेप में आपको जानकारी दी थी। आज उसके आगे की बात करने वाला हूं। हालांकि कुछ बातों का संदर्भ स्पष्ट करने के लिए बीच-बीच में इतिहास के कुछ अन्य प्रसंगों का भी उल्लेख करूंगा। तो आइये कल की बात को आगे बढ़ाएं।

१६ दिसंबर १९७१; केवल १३ दिनों की लड़ाई के बाद ही पाकिस्तान ने घुटने टेक दिए। युद्ध के दौरान वहां का सरकारी मीडिया लोगों को गलत खबर देता रहा कि पाकिस्तान बहुत मज़बूत स्थिति में है और जल्दी ही उसकी निर्णायक जीत होने वाली है।

लेकिन वास्तविकता कुछ और ही थी। इसीलिए जब पाकिस्तान के लोगों ने पाकिस्तानी सेना को ढाका में भारतीयों के सामने सिर झुकाकर आत्मसमर्पण करते हुए देखा, तो ये उनके लिए बहुत बड़ा झटका था। लोगों का गुस्सा अपनी ही सरकार के खिलाफ फूट पड़ा। पाकिस्तान के कई शहरों में हिंसक प्रदर्शन शुरू हो गए। सरकार का भारी विरोध होने लगा। अंततः २० दिसंबर को याह्या खान ने राष्ट्रपति पद छोड़कर ज़ुल्फ़िकार अली भुट्टो को सत्ता सौंप दी।

युद्ध की इस हार ने पाकिस्तान को हिलाकर रख दिया। पूर्वी पाकिस्तान का पूरा हिस्सा हाथ से निकल चुका था। इसके अलावा पाकिस्तान की आधी नौसेना, एक चौथाई वायुसेना और एक तिहाई थलसेना भी चली गई। जनसंख्या का एक बड़ा हिस्सा भी अब बांग्लादेश में था और अर्थव्यवस्था को भी भारी नुकसान पहुंचा। इससे पहले तक पाकिस्तान ही विश्व का सबसे बड़ा मुस्लिम राष्ट्र था, अब वह स्थान भी छिन गया था। और इन सबके साथ ही भारत को तोड़कर पश्चिमी पाकिस्तान से पूर्वी पाकिस्तान को जोड़ने वाला लगभग हज़ार मील लंबा इस्लामी गलियारा बनाने का स्वप्न भी धरा रह गया। धर्म के आधार पर भारत के टुकड़े करके बनाया गया देश सिर्फ २५ वर्षों में ही भाषा के आधार पर टूट गया। ये केवल पाकिस्तान के टुकड़े नहीं हुए थे, बल्कि द्वि-राष्ट्रवाद का मोहम्मद अली जिन्ना का पूरा सिद्धांत ही इस बंटवारे के साथ चकनाचूर हो गया था।

बांग्लादेश के लिए लड़ रहे लोगों को इस युद्ध में बहुत-कुछ हासिल हुआ। उनको केवल ज़मीन का टुकड़ा नहीं, बल्कि अपना स्वतंत्र राष्ट्र मिल गया था। उनकी भाषा, संस्कृति, इतिहास, साहित्य का सम्मान उन्हें वापस मिल गया था। विश्व में अपनी अलग पहचान हासिल हो चुकी थी। उनके संघर्ष को सफलता मिल चुकी थी।

लेकिन इस पूरे झमेले में भारत को क्या मिला? अंतरराष्ट्रीय मंच पर शायद थोड़ी प्रशंसा मिली होगी, बांग्लादेश की ओर से धन्यवाद के शब्द भी शायद मिले होंगे। लेकिन क्या कुछ ठोस प्राप्ति भी हुई या कोरी प्रशंसा ही मिली? पाकिस्तान के लगभग ९३००० सैनिक भारत के युद्धबंदी थे। पश्चिमी पाकिस्तान का लगभग ५००० वर्गमील का क्षेत्र भारतीय सेना ने जीत लिया था। स्थिति हर तरह से भारत के अनुकूल थी। लेकिन क्या भारत इसका कोई लाभ उठा सका?

यह जानने के लिए हमें शिमला चलना पड़ेगा क्योंकि भारत-पाकिस्तान के बीच यहीं वार्ता चल रही थी। १९७२ में पाकिस्तानी राष्ट्रपति ज़ुल्फ़िकार अली भुट्टो अपने प्रतिनिधिमंडल के साथ भारतीय प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी से मिलने शिमला पहुंचे। साथ में भुट्टो की बेटी बेनज़ीर भी थी।

शायद आपको याद होगा कि कुछ सालों पहले पाकिस्तान की विदेश मंत्री हिना रब्बानी जब भारत आई थी, तो अपने मीडिया चैनल काम की खबरें दिखाने की बजाय पूरे समय केवल उनके फैशन, कपड़ों और पर्स की तारीफ़ में कसीदे पढ़ते रहे!

ठीक यही १९७२ में भी हो रहा था। भारतीय मीडिया में सबसे ज्यादा चर्चा बेनज़ीर के आकर्षण, फैशन और कपड़ों आदि की ही हो रही थी। पत्रकार उसका इंटरव्यू लेने को उतावले थे। वह बाज़ार में घूमने निकली तो लोगों ने उत्सुकतावश घेर लिया। कहीं फ़िल्म देखने के निमंत्रण, तो कहीं भोज के निमंत्रण दिए जाते रहे!

इंदिरा जी को भी विशेष चिंता इस बात की थी कि पाकिस्तानी ‘मेहमानों’ की भावनाओं को ठेस न पहुंचे या उनकी आवभगत में किसी तरह की कमी न रहे। पाकिस्तानियों के आने से एक दिन पहले इंदिरा गांधी स्वयं शिमला पहुंची और पूरा इंतज़ाम खुद देखकर यह तसल्ली की कि कहीं कोई कमी नहीं रह गई है!

१९४७ में आज़ादी के कुछ ही महीनों बाद पाकिस्तान ने कश्मीर पर हमला किया और हमारी लगभग ५ हज़ार वर्गमील ज़मीन दबा ली। माउंटबेटन की सलाह मानकर नेहरुजी ये मामला संयुक्त राष्ट्र संघ में ले गए और उसके परिणामस्वरूप आज तक आधा कश्मीर पाकिस्तान के पास ही है।

१९७१ में भारतीय सेना ने पश्चिमी पाकिस्तान की लगभग उतनी ही ज़मीन जीत ली थी। क्या हम यह शर्त नहीं रख सकते थे कि यह ५ हज़ार वर्गमील ज़मीन हम तभी लौटाएंगे, जब पाकिस्तान के कब्जे वाला कश्मीर का हिस्सा हमें वापस मिल जाएगा?

लेकिन हमने ऐसा कुछ भी नहीं किया। पाकिस्तान को उसकी ज़मीन बिना शर्त लौटा दी। बदले में हमें क्या मिला? कुछ भी नहीं! भुट्टो को इंदिरा ने विकल्प दिया था कि या तो हम ज़मीन वापस देंगे या बंदी सैनिक लौटाएंगे। चालाक भुट्टो ने ज़मीन वापस मांग ली क्योंकि उन्हें पता था कि ९३००० सैनिकों को लंबे समय तक जेल में बंद रखना और खिलाना भारत के लिए कठिन भी होगा और खर्चीला भी। देर-सवेर भारत को उन्हें रिहा करना ही पड़ेगा। और हुआ भी ऐसा ही। १९७४ तक हमने उनके ९३००० युद्धबंदी भी वापस दे दिए। बदले में हमें क्या मिला? अपने ५४ सैन्य अधिकारी भी हम शायद पाकिस्तान के कब्जे से नहीं छुड़ा सके।

शिमला समझौते के द्वारा भारत ने जीता हुआ युद्ध अपनी हार में बदल लिया। पाकिस्तान को बहुत-कुछ मिला, भारत को केवल कोरे आश्वासन मिले। पाकिस्तान की ज़मीन वापस दे दी गई, उनके ९३ हज़ार सैनिक भी १९७४ में लौटा दिए गए। कश्मीर की स्थिति में कोई परिवर्तन नहीं हुआ। बातचीत से मुद्दा सुलझाने की कोरी बातें हुईं। वह मुद्दा आज ४५ साल बाद भी नहीं सुलझा है। शिमला समझौते को सफल मानना है या विफल, ये आप खुद तय कीजिए।

चलते-चलते ज़रा भारत रत्न की भी बात हो जाए। यह भारत का सर्वोच्च नागरिक सम्मान है। इसकी शुरुआत १९५४ में हुई थी।

सरदार पटेल ने ५५० टुकड़ों में बंटे भारत को एक संगठित इकाई के रूप में जोड़ने का अभूतपूर्व कार्य किया था। उनका योगदान अतुलनीय है। उनकी मृत्यु १९५० में हुई, लेकिन नेहरुजी से लेकर इंदिराजी और राजीव जी सहित किसी प्रधानमंत्री ने उन्हें भारत रत्न देना उपयुक्त नहीं समझा। उन्हें १९९१ में मरणोपरांत यह सम्मान मिला, जब नरसिंहराव प्रधानमंत्री थे। संयोग से उसी वर्ष राजीव गांधी को भी मरणोपरांत भारत रत्न दिया गया। उनके किस योगदान के लिए दिया गया, इस बारे में मुझे पता नहीं।

संविधान के निर्माण में डॉ आंबेडकर के योगदान के बारे में खूब चर्चा होती है। उनकी मृत्यु सन १९५६ में हुई थी। नेहरुजी १९४७ से लेकर १९६४ में अपनी मृत्यु तक प्रधानमंत्री थे, इंदिराजी १९६६ से १९७७ और १९८० से १९८४ तक प्रधानमंत्री थीं, राजीव जी १९८४ से १९८९ तक प्रधानमंत्री थे, लेकिन डॉ आंबेडकर को भारत रत्न १९९० में प्रधानमंत्री वीपी सिंह की सिफारिश पर ही मिल सका!

ऊपर मैंने बार-बार नेहरुजी और इंदिराजी का उल्लेख क्यों किया है? इसलिए किया है क्योंकि भारत रत्न प्रधानमंत्री की सिफारिश पर ही दिया जाता है। नेहरुजी को भारत रत्न १९५५ में दिया गया, और तब प्रधानमंत्री वे स्वयं ही थे। मतलब उन्होंने खुद ही खुद को पुरस्कार देने के लिए सिफारिश की थी। फिर पटेल या आंबेडकर के लिए क्यों नहीं? बांग्लादेश युद्ध के तुरंत बाद १९७१ में इंदिराजी को भी भारत रत्न से सम्मानित किया गया। तब प्रधानमंत्री कौन था?

देश के लिए नेहरुजी या इंदिराजी के योगदान के बारे में मुझे कोई संदेह नहीं है, लेकिन खुद को खुद ही सम्मानित कर लेना और दूसरे महत्वपूर्ण लोगों की जानबूझकर उपेक्षा करते रहना सही है या गलत है, ये तय करने का काम मैं आप पर छोड़ रहा हूं। सादर!

(चित्र गूगल से)

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