“शिप ऑफ़ फूल्स” (मूर्खों का जहाज)

पिछले कुछ दिनों से मैं यह पुस्तक पढ़ रहा था, जो कि आज पूरी हुई।

पुस्तक मुख्यतः अमरीकी राजनीति पर केंद्रित है और अमरीकी वामपंथ के विरुद्ध है। यह ध्यान रखें कि अमरीका में वामपंथ का स्वरूप भारत से बिल्कुल अलग है।

लेखक का तर्क है कि अमरीका का पूरा नियंत्रण राजनेताओं और उद्योगपतियों के एक छोटे-से वर्ग के हाथों में आ गया है। ये लोग जनता से पूरी तरह कटे हुए हैं और अमरीका के आम आदमी के मुकाबले इनकी दुनिया पूरी तरह अलग है। उनकी समस्याएं और उनके इरादे भी बिल्कुल अलग हैं। उन्हें आम लोगों से, उनकी चिंताओं से, समस्याओं से और आम आदमी के उत्थान से कोई सरोकार नहीं है। वे सारी नीतियां अपने फायदे के लिए बनाते हैं और उन गलत नीतियों की सज़ा आम अमरीकी समाज को भुगतनी पड़ रही है।

लेखक का दावा है कि वास्तविक समस्याओं से ध्यान हटाने के लिए कई अनावश्यक विषय जबरन उछाले जाते हैं। छात्रों में पढ़ाई का स्तर सुधारने या लोगों को रोजगार के लिए कुशल बनाने पर ध्यान देने के बजाय उन्हें अल्पसंख्यक, समलैंगिक, अश्वेत, महिला, आप्रवासी आदि आदि वर्गों में बाँटने और उसके आधार पर उन्हें विशेष अधिकार, महत्व और सुविधाएं देने की राजनीति चल रही है। जो भी इसके विरुद्ध कुछ बोले, उसे तुरंत दकियानूसी, दक्षिणपंथी, कट्टर, मानवता-विरोधी, पुरुषवादी, असहिष्णु और अत्याचारी आदि ठहरा दिया जाता है। इन सब समूहों की सारी समस्याओं के श्वेत अमरीकियों को दोषी ठहरा दिया जाता है।

भारत में वामपंथी, कांग्रेस और उसके साथ खड़ी विपक्षी पार्टियों के लोग जिस तरह की बातें करते हैं, उनसे यहाँ मुझे बहुत समानता दिखाई दी। वहाँ भी अधिकतर राजनैतिक दल शिक्षा, स्वास्थ्य, न्याय व्यवस्था, रोज़गार, बिजली, पानी, सड़क जैसे ज़रूरी विषयों के बजाय दलित, सवर्ण, अल्पसंख्यक, असहिष्णुता, आरक्षण जैसे मुद्दों को उछलते रहते हैं और छोटी-छोटी बातों को भी इतना बढ़ा-चढ़ाकर बताते रहते हैं, ताकि असली मुद्दों की तरफ लोगों का ध्यान ही न जाए। और पॉलिटिकल करेक्टनेस का दबाव इतना ज्यादा बना दिया गया है कि ऐसे मुद्दों के विरुद्ध कोई भी कुछ बोलने की हिम्मत नहीं करता है।

लेखक की राय है कि यह नरेटिव इतनी मज़बूती से स्थापित कर पाने में ये लोग इतने सफल इसलिए होते हैं क्योंकि समाज को प्रभावित करने वाले हर वर्ग में इनकी घुसपैठ और नियंत्रण है। अकादमिक संस्थानों पर उन्हीं लोगों का कब्जा है। फ़िल्म, मीडिया, लेखक-वर्ग, एनजीओ आदि सभी का एक तगड़ा नेटवर्क बना हुआ है। सारे मिलकर किसी भी मुद्दे को हर तरफ से इतना ज्यादा उछलते हैं कि असहमति और विरोध की सारी आवाज़ें दब जाती हैं और उनका नरेटिव स्थापित हो जाता है। फिर भी जो न माने, उसके खिलाफ हिंसा, मारपीट तोड़फोड़ या उग्र विरोध के अन्य तरीके अपनाए जाते हैं। जहाँ संभव हो, वहाँ ऐसे लोगों की नौकरी या रोजगार के अवसर छीन लेने का प्रयास किया जाता है। अगर ऐसे लोग लेखक या वक्ता हैं, तो उनके कार्यक्रमों का विरोध किया जाता है, उन्हें बोलने नहीं दिया जाता, किसी कार्यक्रम में उन्हें आमंत्रित किया गया हो, तो आयोजकों पर दबाव डालकर कार्यक्रम रद्द करवाए जाते हैं। लेखक ने कई अमरीकी विश्विद्यालयों के उदाहरण बताए हैं, जहाँ छात्रों ने प्रोफेसरों को धमकाया या ऐसे कई वक्ताओं के कार्यक्रम या भाषण सिर्फ इसी कारण नहीं होने दिए क्योंकि उनकी राय इस स्थापित वामपंथी नरेटिव के विपरीत थी या उससे अलग थी।

भारत में भी तो एफटीआईआई, जेएनयू और ऐसे कई अन्य विश्वविद्यालयों में इसी तरह की घटनाएँ आज भी होती हैं।

दूसरी एक और बात लेखक ने यह रेखांकित की है कि इन सारी बातों के किए समाज के श्वेत वर्ग को दोषी ठहराया जाता है। ऐसा माहौल बनाया जा रहा है कि इन गोरे लोगों ने सदियों से समाज के अन्य सभी वर्गों का पूरी तरह शोषण किया है और उसकी नीयत आज भी वही है। इसलिए उसे पूरी तरह बहिष्कृत कर दिया जाना चाहिए और उससे सारे अधिकार छीन लेने चाहिए। यहाँ तक कि गोरों को कॉलेज में पढ़ने या अपनी बात कहने तक का अधिकार नहीं होना चाहिए। बिना जाँच, बिना सुनवाई, बिना सबूत यह मान लेना चाहिए कि हर गोरा व्यक्ति अपराधी है और शोषण का दोषी है।

भारत में ब्राह्मणवाद का शोर मचाकर जिस तरह एक वर्ग-विशेष को दोषी ठहराने का काम अनवरत चलता रहता है, मुझे पुस्तक पढते समय वही बात याद आई थी।

लेखक का विचार है कि जब ऐसी असमानता और अन्याय बढ़ता है, तो इसकी परिणति समाज में असंतोष और आंदोलन के रूप में होती है। लोकतांत्रिक समाज में लोग ऐसी पार्टियों को चुनाव में सबक सिखाते हैं। लेकिन फिर भी राजनेता अपनी गलतियों को मानने की बजाय मतदाताओं को ही दोषी मानते हैं और कुछ तो यह तर्क भी देने लगते हैं कि ऐसे मतदाताओं को महत्व देने की बजाय बाहर से आने वाले अवैध घुसपैठियों को संरक्षण देकर अपना नया वोट बैंक खड़ा करना चाहिए। इसी कारण मेक्सिको के रास्ते दुनियाभर से अमरीका में गैरकानूनी तरीके से बिना वीज़ा के घुसने वाले लोगों को बचाने और इस तरह की घुसपैठ को बढ़ावा देने के काम लगातार किए जाते हैं। आपको महसूस हो ही गया होगा कि ठीक यही काम भारत में भी कुछ राजनैतिक पार्टियों द्वारा किया जाता है।

लेखक का कहना है कि इन सारी बातों से अंततः अमरीका का ही नुकसान हो रहा है। समाज में असमानता, असन्तोष, समस्याएं और दूरियां लगातार बढ़ रही हैं। परिवार टूट रहे हैं। लोग तनाव और अवसाद का शिकार बन रहे हैं। इसके कारण नशे और ड्रग्स की लत बढ़ रही है, जिसके परिणामस्वरूप अपराध भी बढ़ रहे हैं। हर तरह से अमरीका का नुकसान हो रहा है।

पुस्तक के अनुसार इसे बदलने का उपाय ये है कि सदियों पुरानी बातों के लिए भी आज की पीढ़ी के किसी एक वर्ग को ही दोषी ठहराकर सारी समस्याओं का जिम्मेदार बता देना मूर्खता है। समाज में हर वर्ग को एक अलग पहचान के आधार पर बांटने और लड़वाने के बजाय अमरीकी राष्ट्रीयता और साझा परंपरा, इतिहास और एकता की भावना के द्वारा सबको जोड़ा जाना चाहिए। विभिन्नताओं की बजाय समानताओं पर ध्यान दिया जाना चाहिए। तभी अमरीका सशक्त और विकसित बन सकेगा।

पुस्तक में लिखी हुई कितनी बातें और कितने दावे सही या गलत हैं, इस बारे में मैं कुछ नहीं कह सकता। लेखक की बातों से मैं सहमत हूँ या असहमत हूँ, यह भी अप्रासंगिक है। मेरे लिए महत्वपूर्ण यह था कि इस पुस्तक से मुझे अमरीका के बारे में बहुत-कुछ नया जानने को मिला और यह भी पता चला कि भारत में लगातार समाज को तोड़ने और विभिन्न वर्गों को आपस में लड़वाने के जो प्रयास चलते रहते हैं, उनका स्रोत शायद अमरीका में ही है।

कुल मिलाकर यह पुस्तक मुझे रोचक लगी और इससे मुझे बहुत-सी नई जानकारी भी मिली।

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