श्रीलंका में राजनैतिक संघर्ष

भारत में जब आप पिछले दो महीनों के दौरान कुछ विधानसभा चुनावों की ख़बरें जानने में व्यस्त थे, उसी दौरान श्रीलंका में भी एक बड़ी राजनैतिक हलचल हो रही थी।

इसकी शुरुआत २६ अक्टूबर को हुई। राष्ट्रपति मैत्रीपाल श्रीसेन ने प्रधानमंत्री रानिल विक्रमसिंघे को पद से हटाए बिना ही महेंद्र राजपक्षे को प्रधानमंत्री नियुक्त कर दिया। इसका मतलब एक ही समय पर देश में दो प्रधानमंत्री हो गए। इसके कारण देश में एक बड़ा संवैधानिक संकट खड़ा हो गया था।

रानिल विक्रमसिंघे ने राजपक्षे की नियुक्ति को अवैध बताया और पद छोड़ने से इनकार कर दिया। उन्होंने संसद का सत्र बुलाने और बहुमत जांचने की मांग की। स्पीकर ने १६ नवंबर को संसद का सत्र बुलाने की मंज़ूरी दे दी। लेकिन इससे ठीक दो दिन पहले १४ नवंबर को राष्ट्रपति ने संसद भंग कर दी और चुनाव आयोग को फिर से चुनाव करवाने का आदेश दे दिया।

राजपक्षे की नियुक्ति और संसद को भंग करने के फैसले के खिलाफ विक्रमसिंघे की पार्टी ने सुप्रीम कोर्ट में अपील की। परसों सुप्रीम कोर्ट ने फैसला दिया कि ये दोनों आदेश असंवैधानिक थे। इसलिए अब विक्रमसिंघे फिर से प्रधानमंत्री पद की शपथ लेंगे। लेकिन एक याचिका राजपक्षे की ओर से भी लगाई गई है, जिस पर जनवरी में सुनवाई होगी। दूसरी ओर यह मांग भी उठ रही है कि अपनी शक्ति का दुरुपयोग करने वाले राष्ट्रपति के खिलाफ संसद में महाभियोग चलाकर उसे पद से हटाया जाए।

मैत्रीपाल श्रीसेन

ऊपरी तौर पर श्रीलंका की यह घटना एक बहुत साधारण-सी राजनैतिक घटना लग सकती है। लेकिन अगर आप गहराई में जाएं, तो आपको इसमें कई और पहलू दिखाई देंगे।

श्रीलंका में सिंहलियों और तमिलों के बीच संघर्ष और हिंसा का इतिहास बहुत पुराना है। यहां की अधिकांश जनता सिंहली है और उत्तर के कुछ हिस्सों में अधिकतर तमिलभाषी लोग रहते हैं। बहुत लंबे समय से तमिलों में यह भावना थी कि हर मामले में सिंहलियों का वर्चस्व है और हमारे साथ भेदभाव होता है। इसी भावना के कारण १९७६ में एलटीटीई नामक एक उग्रवादी संगठन भी जन्मा, जिसका लक्ष्य तमिलों के लिए एक अलग देश बनाना था। श्रीलंका की सेना और सरकार के साथ एलटीटीई का संघर्ष कई दशकों तक चला। राजीव गांधी की सरकार ने एलटीटीई के खिलाफ लड़ाई में श्रीलंका सरकार की मदद के लिए भारतीय सेना भी भेजी थी। बाद में इसी बात का बदला लेने के लिए एलटीटीई ने राजीव गांधी की हत्या की। लिट्टे और श्रीलंका सरकार के बीच यह गृहयुद्ध १९८३ में शुरू हुआ था और सन २००९ में राष्ट्रपति महेंद्र राजपक्षे के कार्यकाल में सेना के एक बड़े ऑपरेशन के बाद लिट्टे का खात्मा हुआ और यह संघर्ष समाप्त हुआ। इस कारण अधिकांश सिंहली जनता राजपक्षे की समर्थक है।

जैसा कि भारत में भी अक्सर होता है, श्रीलंका में भी इस गृहयुद्ध के दौरान सेना द्वारा की गई कार्रवाई के दौरान श्रीलंका सरकार और सेना पर मानवाधिकारों के उल्लंघन के कई आरोप लगे। पश्चिमी देशों ने और संयुक्त राष्ट्र संघ ने भी कई बार यह बात उठाई, लेकिन राजपक्षे ने उन आरोपों की चिंता नहीं की। इसका एक कारण यह भी हो सकता है कि राजपक्षे को चीन का समर्थन प्राप्त था। चीन में लोकतंत्र नहीं है और चीन को लोकतंत्र की कोई परवाह भी नहीं है। मैंने अपने ब्लॉग पर एक बार अफ्रीका में बढ़ते चीनी निवेश के बारे में एक लेख लिखा था। उसमें भी अफ्रीकी देशों के ऐसे कुछ उदाहरण मैंने बताए थे, जहाँ चीन ने भ्रष्टाचारी और तानाशाह शासकों का भी समर्थन किया है क्योंकि चीन को केवल अपने हितों और लाभ की चिंता रहती है, किसी मानवाधिकार की नहीं।

रानिल विक्रमसिंघे

लेकिन राजपक्षे पर परिवारवाद और भ्रष्टाचार के भी कई आरोप लगे, जो अभी भी श्रीलंका की राजनीति में एक बड़ा मुद्दा है। आगे २०१५ के राष्ट्रपति चुनाव में विपक्षी दलों ने एक साथ मिलकर गठबंधन में चुनाव लड़ने का निर्णय लिया। रानिल विक्रमसिंघे पिछले कुछ चुनावों में राजपक्षे के खिलाफ लड़े थे, लेकिन इस बार विपक्ष ने राजपक्षे के ही एक पूर्व-मंत्री मैत्रीपाल श्रीसेन को अपना साझा उम्मीदवार बनाकर राजपक्षे के खिलाफ खड़ा किया। उस चुनाव में श्रीसेन ने घोषणा की थी कि राष्ट्रपति बनने पर वे विक्रमसिंघे को प्रधानमंत्री नियुक्त करेंगे और राजपक्षे के खिलाफ मानवाधिकारों के उल्लंघन, भ्रष्टाचार और परिवारवाद के सभी आरोपों की जांच होगी।

श्रीलंका के अधिकतर सिंहली बौद्ध धर्म के अनुयायी हैं, जबकि तमिल हिन्दू हैं। श्रीलंका में लगभग १० प्रतिशत मुस्लिम जनसंख्या भी है। अधिकतर सिंहलियों का समर्थन राजपक्षे को था, जबकि तमिलों और मुस्लिमों का समर्थन विपक्षी गठबंधन को था। इस बार का चुनाव परिणाम अप्रत्याशित रहा और उसमें राजपक्षे की हार हुई। मैत्रीपाल श्रीसेन नए राष्ट्रपति बने और विक्रमसिंघे को प्रधानमंत्री नियुक्त किया गया। यह राजपक्षे के साथ-साथ ही चीन के लिए भी एक झटका था। लेकिन पश्चिमी देशों के लिए यह अच्छी खबर थी क्योंकि विक्रमसिंघे को यूरोप और अमरीका के अनुकूल माना जाता है।

भारत के उलट श्रीलंका में राष्ट्रपति का पद बहुत महत्वपूर्ण होता है और राष्ट्रपति के पास बहुत सारी शक्तियां भी होती हैं। राष्ट्रपति बनने के बाद श्रीसेन ने संसद की मदद से संविधान में कुछ सुधार किए और राष्ट्रपति के कुछ अधिकार भी संसद को स्थानांतरित किए। लेकिन राजपक्षे परिवार के विरुद्ध कोई बड़ी कार्यवाही नहीं हुई, बल्कि नए राष्ट्रपति मैत्रीपाल श्रीसेन ने भी अपने परिवार के लोगों, भाई, बेटे, बेटी, दामाद आदि को धीरे-धीरे विभिन्न पदों पर नियुक्त कर दिया। अब उन पर भी भ्रष्टाचार, परिवारवाद और पद के दुरुपयोग के आरोप लग रहे हैं।

महेंद्र राजपक्षे

यह वाकई बहुत अचरज की बात थी कि इस साल अक्टूबर में अचानक श्रीसेन ने विक्रमसिंघे को पद से हटाकर राजपक्षे को प्रधानमंत्री बनाने की कोशिश की, जबकि श्रीसेन ने पिछला चुनाव राजपक्षे के खिलाफ ही लड़ा था और विक्रमसिंघे की मदद से ही जीत मिली थी। लेकिन राजनीति में वाकई कुछ भी हो सकता है।

अब श्रीलंका का राजनैतिक संकट तो फिलहाल खत्म हो गया है लेकिन मेरा अनुमान है कि अगले कुछ महीनों में फिर ऐसा ही कोई न कोई प्रयास अवश्य ही होगा। संभव है कि इस बार राष्ट्रपति को ही पद से हटाने की कोशिश की जाए। चीन जब तक श्रीलंका में अपने अनुकूल शासक को न बिठा दे, तब तक वह शांत नहीं बैठेगा और दूसरी तरफ पश्चिमी देश चीन की उस चाल को विफल करने के लिए कुछ न कुछ प्रयास करते रहेंगे।

लेकिन श्रीलंका जैसे एक छोटे-से देश में चीन की इतनी दिलचस्पी क्यों है? इसका कारण ये है कि चीन के “स्ट्रिंग ऑफ पर्ल्स” की श्रृंखला में श्रीलंका एक बहुत महत्वपूर्ण कड़ी है। तो आखिर ये स्ट्रिंग ऑफ पर्ल्स है क्या? इसके बारे में मैं अगले कुछ लेखों में आपको जानकारी दूंगा। इस विषय के कुछ अन्य लेख आप यहाँ क्लिक करके पढ़ सकते हैं

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One thought on “श्रीलंका में राजनैतिक संघर्ष”

  1. बहुत बढ़िया जानकारी चीन हर मुमकिन कोशिश कर रहा है अपनी ताकत और पैसे के बल पर दुसरे देशों की जमीन कब्जा करने की। कुछ कुछ इस्ट इंडिया कम्पनी की तरह।

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