“स्टार्टअप नेशन” (भाग २)

(इस लेख का पहला भाग आप यहां क्लिक करके पढ़ सकते हैं)

कल इस लेख के पहले भाग में मैंने आपको बताया था कि १९४८ में जब इज़राइल दुनिया के नक्शे पर आया, तब वहां बहुत गरीबी थी और इस देश के पास प्राकृतिक संसाधनों और पानी जैसी मूलभूत सुविधाओं का भी अभाव था। लेकिन आज स्थिति बदल चुकी है और इज़राइल तकनीक और इंटरनेट के उपयोग जैसे कई क्षेत्रों में दुनिया के अन्य देशों से बहुत आगे निकल चुका है। स्टार्टअप कंपनियों की संख्या के मामले में भी यह दुनिया में पहले स्थान पर है। कल के लेख में हमने इंटेल का उदाहरण भी देखा था। आज इस बारे में बात करेंगे कि इज़राइल की उन्नति और यहां की स्टार्टअप कंपनियों की सफलता के पीछे इज़राइली सेना का क्या योगदान है?

जैसा कि आप जानते ही हैं, इज़राइल चारों तरफ दुश्मन देशों से घिरा हुआ है और अपने जन्म से लेकर आज तक इज़राइल को कई बार युद्ध का सामना करना पड़ा है। अभी भी यहां लगातार संघर्ष चलता रहता है और युद्ध का खतरा भी हमेशा बना रहता है।

स्वाभाविक है कि ऐसी स्थिति में देश की सुरक्षा के लिए एक सशक्त सेना का होना आवश्यक है। लेकिन बहुत थोड़ी-सी जनसंख्या वाला छोटा-सा देश बहुत बड़ी सेना कैसे बनाए?

इज़रायल ने अनिवार्य सैन्य सेवा के द्वारा इसका समाधान निकाला। १८ वर्ष की आयु पूरी करने पर सभी युवक-युवतियों को २ से ३ वर्ष के लिए सेना में काम करना पड़ता है। हालांकि, कुछ लोगों को इससे बाहर रखा गया है, लेकिन उसके बारे में मैं लेख के अगले भाग में बात करूंगा।

सेना में २-३ वर्षों की इस सक्रिय सेवा को एक्टिव ड्यूटी कहा जाता है। लेकिन कई बार उसके बाद भी आपातकालीन स्थिति में सेना इन पूर्व-सैनिकों की मदद लेती है। इसके अलावा बीच-बीच में उन्हें प्रशिक्षण या अन्य कार्यक्रमों के लिए भी बुलाया जाता है। ऐसा कई वर्षों तक चलता रहता है। एक्टिव ड्यूटी के बाद होने वाली यह सर्विस रिज़र्व ड्यूटी कहलाती है।

भारत सहित अधिकांश अन्य देशों के छात्र स्कूल की पढ़ाई पूरी करने के दौरान आमतौर पर यह सोच रहे होते हैं कि उन्हें किसी अच्छे कॉलेज या यूनिवर्सिटी में अपनी पसंद के कोर्स में एडमिशन मिल जाए। लेकिन इज़राइल के छात्रों का ध्यान इस बात पर लगा होता है कि उनका चयन सेना में उनकी मनपसंद यूनिट में हो जाए!

सेना में इतनी केएक्टिव ड्यूटी पूरी करने के बाद अधिकांश युवा यूनिवर्सिटी में प्रवेश लेते हैं और अपनी डिग्री पूरी करते हैं। भारत में इतनी सुविधाओं और विकल्पों के बावजूद भी केवल ८-९% लोग कॉलेज तक की पढ़ाई पूरी करते हैं, जबकि इज़राइल में यह आंकड़ा लगभग ४५% है।

सेना की हर यूनिट का एक अलग काम और विशेषज्ञता होती है। हर यूनिट में प्रवेश के मापदंड भी अलग-अलग और बहुत कठिन होते हैं। लेकिन सैन्य सेवा का प्रशिक्षण लेने और सेना की विशिष्ट यूनिट में काम करने के कारण ये युवा किसी न किसी विशेष विषय में निपुण भी हो जाते हैं। आगे जब वे निजी क्षेत्र में नौकरी करने जाते हैं या अपनी स्टार्टअप कंपनी शुरू करते हैं, तो यह ज्ञान, अनुभव और विशेषज्ञता उनके बहुत काम आती है।

उदाहरण के लिए, यूनिट ८२०० इज़राइली सेना में सबसे महत्वपूर्ण खुफिया विभाग है। इसके सदस्य कंप्यूटर के अपने ज्ञान का उपयोग आतंकियों की पहचान और निगरानी के लिए करते हैं। आगे जब यही सैनिक निजी क्षेत्रों में काम करने जाते हैं, तो वे अपने ज्ञान, कौशल और अनुभव का उपयोग ऑनलाइन धोखाधड़ी और साइबर हमलों की पहचान करने और उन्हें रोकने में करते हैं। इनमें से कई लोगों ने बहुत सफल कंपनियों की स्थापना की है। ऐसी ही एक कंपनीं का नाम है – चेकपॉइंट, जो कि अमरीकी स्टॉक एक्सचेंज नैस्डेक तक में सूचीबद्ध है और इसका मूल्य ५ अरब डॉलर आंका गया है। फ्रॉड साइंसेज़ भी ऐसी ही एक कंपनी है। इसे पेपाल ने लगभग १७ करोड़ डॉलर में खरीदा है।

इस अनिवार्य सैन्य सेवा का एक और प्रभाव भी होता है। चूंकि हाईस्कूल की पढ़ाई पूरी करते ही इन युवाओं को तुरन्त ही सेना के कठोर अनुशासन और चुनौतियों वाले जीवन में ढाल दिया जाता है, इसलिए वे कम उम्र में ही बहुत परिपक्व और मानसिक रूप से मज़बूत बन जाते हैं। भविष्य में अपने व्यवसाय या जीवन की चुनौतियों का सामना करने में भी इससे उन्हें मदद मिलती है।

रिज़र्व ड्यूटी का एक और फायदा भी है। चूंकि इज़राइल के अधिकांश लोग किसी न किसी समय सेना में नौकरी कर चुके होते हैं और आगे भी कई वर्षों तक रिज़र्व ड्यूटी के कारण सेना से जुड़े रहते हैं, इसलिए देश में सामाजिक और व्यापारिक संबंधों का एक बहुत विशाल नेटवर्क भी तैयार हो गया है। इसका भी लाभ अंततः पूरे देश को मिलता रहता है।

इज़राइली सेना की एक विशेषता यह भी है कि अन्य देशों की तुलना में ये अपने ऑफिसरों को ज्यादा अधिकार और फैसले लेने की अधिक स्वतंत्रता देती है। उदाहरण के लिए वहां एक लेफ्टिनेंट के पास जितनी अथॉरिटी है, उतनी दुनिया की किसी सेना के लेफ्टिनेंट के पास नहीं है। सेना की टुकड़ी का आकार भी छोटा होता है, इसलिए हर सैनिक पर भी यह दबाव रहता है कि वह बेहतर प्रदर्शन करे, कुछ अलग हटकर सोचे और कुछ बड़ा काम करके दिखाए।

इज़राइली सेना ने ऐसा करके भी दिखाया है। सन १९६७ में अचानक फ्रांस ने इज़राइल की सेना को हथियार बेचना बंद कर दिया। इसके जवाब में इज़राइल ने स्वदेशी हथियारों के निर्माण का पूरा उद्योग ही खड़ा कर लिया। फ्रांस ने शस्त्रों की आपूर्ति रोक दी, तो मजबूरन इज़राइल को आत्मनिर्भर बनना पड़ा। लेकिन बड़ी बात ये है कि इज़राइल ने केवल छोटे-मोटे हथियार बनाकर ही अपनी पीठ नहीं थपथपा ली, बल्कि एक दशक के भीतर ही उसने युद्धक टैंकों और लड़ाकू विमानों जैसे उन्नत हथियार भी विकसित कर दिखाए। इतना ही नहीं, १९८८ आते-आते इज़राइल दुनिया के उन गिने-चुने १०-१२ देशों में शामिल हो चुका था, जिन्होंने अपना स्वयं का उपग्रह अंतरिक्ष में भेज पाने की क्षमता हासिल कर ली थी।

इज़राइल की इस विशिष्ट परिस्थिति के कारण इज़राइल के बच्चे-बच्चे को घर में, स्कूल में और सेना की नौकरी में आक्रामकता और नवाचार की सीख मिलती है। धीरे-धीरे यह उसकी आदत ही बन जाती है। इसी कारण लोग कुछ नया करने, नई चुनौतियों को स्वीकारने या जोखिम उठाने में हिचकते नहीं हैं। इसी के परिणामस्वरूप आज इज़राइल कई क्षेत्रों में अपनी उपलब्धियों व सफलताओं के झंडे गाड़ चुका है, और इसमें सेना की बहुत बड़ी भूमिका है।

अब लेख के अगले और अंतिम भाग में मैं इज़राइल की आर्थिक नीति और कुछ सामाजिक पहलुओं के बारे में बात करके इस विषय को समाप्त करूंगा। आपको यह लेख कैसा लगा, मुझे कमेन्ट के द्वारा बताइये।

(अगला भाग आप यहाँ क्लिक करके पढ़ सकते हैं)

(स्त्रोत: १) स्टार्टअप नेशन पुस्तक)

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4 thoughts on ““स्टार्टअप नेशन” (भाग २)”

  1. चुनौतियाँ, व्यक्ति/राष्ट्र के विकास के लिए महत्वपूर्ण पक्ष होती हैं ! इसराइल,जापान,इसके प्रत्यक्ष उदाहरण हैं ! भारत की शिक्षा पद्धति और राजनैतिक नेतृत्व,भारत के विकसित न होने का कारण है ! अब बदलाव आ रहा है,किन्तु बहुत बड़ी जनसंख्या के कारण कम लगता है ! समय लगेगा,एवम् सबको बदलाव को अंगीकार करना पड़ेगा व् सहयोग देना पड़ेगा !

    1. आपकी बात सही है. सिंगापुर और दक्षिण कोरिया भी ऐसे ही दो देश हैं, जिन्होंने कुछ ही सालों में अत्यधिक प्रगति कर ली, भारत में अब बदलाव हो रहा है, लेकिन यहाँ की जनसंख्या, आकार, विविधताओं और जटिलताओं के कारण भारत में चुनौतियां भी बहुत ज्यादा हैं.

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