“स्टार्टअप नेशन” (अंतिम भाग)

इस लेखमाला के पिछले २ भागों में हमने इज़राइल की स्टार्टअप कंपनियों की सफलता के कुछ उदाहरण देखे हैं। (पिछले २ भाग आप यहाँ पढ़ सकते हैं: भाग -१ और भाग -२)

हमने इस बारे में भी बात की थी कि किस तरह इज़राइल आधुनिक तकनीक के उपयोग, और सरकार, समाज व सेना के आपसी सहयोग के द्वारा इज़राइल में उद्यमिता के लिए अनुकूल माहौल बना, जिसके परिणामस्वरूप इज़राइल आज दुनिया के सबसे विकसित देशों की पंक्ति में पहुंच गया है, जबकि केवल ५०-६० वर्षों पहले तक यह अत्यंत गरीब और संघर्षरत देश था।

आइये आज इस अंतिम भाग में इज़राइल के आर्थिक इतिहास और सामाजिक परिस्थितियों को संक्षेप में देखें।

इज़राइली अर्थव्यवस्था के विकास के मुख्यतः दो चरण हैं। पहला सन १९४८ से १९७० का कालखंड और दूसरा सन १९९० से आगे का कालखंड।

आधुनिक इज़राइल का जन्म १९४८ में हुआ। उसी समय अरब और इज़राइल के बीच युद्ध भी छिड़ गया था। लाखों की संख्या में यूरोप और अरब देशों से यहूदी शरणार्थी इज़राइल पहुंच रहे थे। अर्थव्यवस्था बुरे हाल में थी। बेरोजगारी की समस्या विकराल रूप धारण कर चुकी थी। हालत इतनी बिगड़ गई कि सरकार को खर्च कम करने और राशनिंग की व्यवस्था लागू करने का उपाय करना पड़ा। ये व्यवस्था १९४९ से १९५९ तक लागू रही।

हिटलर के दौर में जर्मनी के यहूदियों के साथ जो अमानवीय अत्याचार और सामूहिक हत्याएं हुई थीं, वह यूरोप के इतिहास का एक काला अध्याय है। विश्व-युद्ध के बाद कई मुकदमे चले और पश्चिमी जर्मनी (उस समय जर्मनी दो भागों में बंटा हुआ था) को हर्जाने के तौर पर इज़राइल को बड़ी भारी रकम चुकानी पड़ी। आज के मूल्य के अनुसार यह राशि करोड़ों डॉलर में थी, जो कि कुछ वर्षों की अवधि के दौरान इज़राइल को दी गई।

इसके अलावा इज़राइली सरकार ने अमरीका और कनाडा में रहने वाले यहूदियों के लिए इज़राइली बॉन्ड जारी किए। इनसे भी सरकार को आमदनी हुई। कुछ धनवान यहूदियों ने बड़ी धनराशि दान में भी दी। अमरीकी सरकार से भी इज़राइल को समय-समय पर कर्ज या अन्य तरीकों से आर्थिक सहायता मिलती रही।

इन सबका उपयोग विभिन्न औद्योगिक व कृषि परियोजनाओं के लिए किया गया, जिसके कारण कुछ ही वर्षों में इज़राइल एक आत्मनिर्भर देश बन गया।

लेकिन १९७३ में फिर अरब देशों व इज़राइल के बीच एक युद्ध हुआ और इज़राइल की अर्थव्यवस्था में गिरावट हुई। यह अगले कई वर्षों तक जारी रही। १९८४ में तो एक समय ऐसा भी आया था, जब महंगाई लगभग ४५०% तक बढ़ गई थी और यह अनुमान लगाया गया था कि उसके अगले वर्ष यह वृद्धि १०००% तक पहुंच जाएगी। लेकिन १९८५ में सरकार ने आर्थिक स्थिरता के लिए योजना लागू की। इसके अंतर्गत सरकारी खर्चों में कमी, मजदूर संगठनों के साथ समझौते, इज़राइली मुद्रा के मूल्य में गिरावट आदि सहित अर्थव्यवस्था को संभालने के कई उपाय किए गए। धीरे-धीरे गाड़ी फिर पटरी पर आ गई।

आगे जब १९८९-१९९० में सोवियत रूस कई टुकड़ों में बिखर गया, तो बड़ी संख्या में वहां रहने वाले यहूदी नागरिक उन देशों को छोड़कर इज़राइल आ गए। उनकी संख्या १० लाख से भी अधिक थी। इनमें से कई लोग बहुत उच्च-शिक्षित व प्रतिभाशाली थे, जिन्होंने इज़राइल में नए व्यवसायों उद्यमों और कंपनियों की शुरुआत की।

इसके परिणामस्वरूप इज़राइल में विदेशी निवेश भी तेज़ी से बढ़ा। उदाहरण के लिए, सिस्को कंपनी ने १९९८ में इज़राइल में एक शोध और विकास केंद्र स्थापित किया, जिसमें लगभग ७०० कर्मचारी थे। आगे सिस्को ने इज़राइल की ९ स्टार्टअप कंपनियों का अधिग्रहण कर लिया और इस तरह कंपनी का इज़राइल में विस्तार होता चला गया। सिस्को ने इज़राइल की कुछ अन्य स्टार्टअप कंपनियों में लगभग २ अरब डॉलर का निवेश भी किया।

आर्थिक वृद्धि की गति बढ़ाने के उद्देश्य से इज़राइल की सरकार और कुछ निजी निवेशकों ने मिलकर लगभग १० करोड़ डॉलर लगाकर एक एजेंसी की शुरुआत की, जिसकी मदद से कई स्टार्टअप कंपनियों को ऋण मिलने में सुविधा हुई। यह मॉडल इतना अधिक सफल हुआ कि बाद में जापान और ऑस्ट्रेलिया जैसे देशों ने भी इसे अपने देश में अपनाया। संभव है कि भारत में भी मुद्रा योजना जैसी कुछ योजनाओं को इससे भी प्रेरणा मिली हो।

सन २००३ में इज़राइल ने कुछ और आर्थिक सुधार लागू किए। टैक्स की दर कम की गई, सरकारी एयरलाइन और टेलीकॉम कंपनी का निजीकरण किया गया और खर्चों में कटौती की गई। आर्थिक विकास जारी रहा।

आज इज़राइल विश्व के २० सबसे विकसित देशों में से एक है। यहां बेरोजगारी की दर केवल ४% के लगभग है। महंगाई की दर केवल आधा प्रतिशत के आसपास है। यह उपलब्धि इज़राइल की सरकार और समाज के साझा प्रयासों का परिणाम है।

शिक्षा के प्रति इज़राइल के लोगों की जागरूकता और सकारात्मक दृष्टिकोण की भी इसमें बड़ी भूमिका है। इज़राइल में लोग आरक्षण या सरकारी नौकरी पाने से ज्यादा ध्यान अच्छी शिक्षा पर देते हैं। इस छोटे से देश की जनसंख्या अपने मुंबई और दिल्ली जैसे शहरों से भी कम है, लेकिन यहां उच्च शिक्षा के लिए २७ कॉलेज और ८ विश्विद्यालय हैं। अपने भारत में शिक्षा की हजारों दुकानें खुली हुई हैं, लेकिन दुर्भाग्य से अपना शायद ही कोई विश्वविद्यालय विश्व के शीर्ष १०० में भी आता होगा, जबकि इज़राइल के ८ में से ४, विश्वविद्यालय विश्व के सर्वश्रेष्ठ १५० शिक्षा संस्थानों की सूची में शामिल हैं।

पिछले २ भागों में इज़राइल की प्रगति का वर्णन पढ़कर आपमें से कई लोगों ने कमेन्ट लिखे थे कि इज़राइल में शायद सभी लोग देशभक्त होंगे, जबकि अपने यहां ऐसी स्थिति नहीं है। यह सही है कि भारत की परिस्थिति इज़राइल या किसी भी अन्य देश की तुलना में अधिक जटिल और कठिन है, लेकिन इज़राइल में भी इतनी सारी उपलब्धियों और प्रगति के बावजूद कुछ सामाजिक चुनौतियां भी मौजूद हैं।

इज़राइल की लगभग आधी जनसंख्या विभिन्न कारणों से इस आर्थिक प्रगति में शामिल नहीं है। उदाहरण के लिए अरबी मूल के इज़राइली नागरिकों की जन्मदर बहुत अधिक है। सैन्य सेवा में भी उनकी भागीदारी नहीं है, इसलिए भी उनका सामाजिक और व्यावसायिक दायरा बहुत छोटा ही रहता है। इज़राइली समाज के कई लोग महिलाओं को बराबरी का दर्जा देने या नौकरियों में महिलाओं को काम करने की अनुमति देने के खिलाफ हैं, इसलिए वे ऐसी कंपनियों में काम ही नहीं करते। ऐसे कई कारणों से उनका दायरा बहुत सीमित हो जाता है।

हर व्यक्ति, समाज या राष्ट्र के सामने कई तरह की चुनौतियां आती ही हैं। भारत और इज़राइल दोनों ही इसके अपवाद नहीं हैं। अपनी इच्छाशक्ति के द्वारा इज़राइल के नागरिकों और सरकार ने साथ मिलकर अपने देश को गरीबी और संकटों से बाहर निकाला और विश्व का एक विकसित देश बनाकर दिखा दिया। सिंगापुर, दक्षिण कोरिया आदि कई देशों ने भी बहुत कम समय में ऐसी प्रगति कर दिखाई है। यहां तक कि चीन भी बहुत तेज़ी से आगे बढ़ा है।

कई लोगों के मन में सवाल उठता है कि अगर इतने सारे देश इतने कम समय में तरक्की कर सकते हैं, तो भारत क्यों पीछे है? इस बारे में सबकी राय अलग हो सकती है, लेकिन इसका जवाब हम सबको साथ मिलकर सोचना चाहिए।

कुछ लोग कहते हैं कि जनसंख्या के कारण हम पीछे हैं, कुछ लोग सोचते हैं कि बहुत विशाल आकार होने के कारण हम पीछे हैं, कुछ लोग सोचते हैं कि अपने दुश्मन देशों से उलझे रहने के कारण हम पीछे हैं। कुछ लोग सरकारों को देश देते हैं, कुछ धार्मिक कट्टरता को, कुछ सांप्रदायिकता, जातिवाद और आरक्षण जैसी बातों को दोषी मानते हैं।

मुझे लगता है कि कुछ हद तक ये सारे कारण इसके लिए ज़िम्मेदार हो सकते हैं, लेकिन सबसे बड़ा कारण शायद हमारी मानसिक गुलामी और स्वार्थ है। हम इन दो चीज़ों से बाहर निकल जाएं, तो फिर बाकी कोई चुनौती हमें रोक नहीं सकेगी और ये बदलाव भारतीय समाज को स्वयं करना होगा क्योंकि कोई भी सरकार केवल नीतियां बदल सकती है, लोगों को अपनी सोच तो खुद ही बदलनी पड़ेगी।

आपकी इस बारे में क्या राय है? कृपया नीचे कमेंट में बताइये। इसके अलावा मुझे यह भी बताइये कि आपको इस लेख के तीनों भाग कैसे लगे और आगे आप किन विषयों के बारे में जानना चाहेंगे? मैं उन विषयों का अध्ययन करके आपको सरल शब्दों में जानकारी देने का प्रयास करता रहूंगा। सादर!

Comments

comments

3 thoughts on ““स्टार्टअप नेशन” (अंतिम भाग)”

  1. हमने आपके द्वारा पोस्ट किये गये तीनों भाग पढ़ा , , यह बहुत ही ज्ञानवर्धक शोध-पत्र है .
    आगे हम आपसे चाहते है कि “आतंकवाद “पर विस्तार से हमें जानकारी दें .इसकी शुरुआत कैसे हुई ? आतंकवाद इस्लाम से कैसे जुड़ा ? इसके लिये अमेरिका कितना दोषी है ? वर्तमान में कितने आतंकी संगठन हैं , और उनका संक्षिप्त इतिहास ?

सुमंत को प्रतिक्रिया दें जवाब रद्द करें

आपका ईमेल पता प्रकाशित नहीं किया जाएगा.