राजीव गांधी: मिस्टर क्लीन या मिस्टर भ्रष्ट?

इंदिरा गांधी की हत्या के कुछ ही घंटों बाद 31 अक्टूबर 1984 को राजीव गांधी भारत के प्रधानमंत्री बनाए गए।डेढ़ महीने बाद ही दिसंबर में लोकसभा चुनाव हुआ और इंदिरा गांधी की हत्या से उपजी सहानुभूति की लहर में कांग्रेस को ऐतिहासिक बहुमत मिला। लोकसभा की 541 में से 414 सीटें कांग्रेस ने जीतीं। कांग्रेस को सीटें इतनी ज्यादा मिली थीं कि लोकसभा में न तो कोई अधिकृत विपक्षी दल था और न कोई नेता प्रतिपक्ष। राज्यसभा में भी कांग्रेस का ही बहुमत था।राजीव गांधी में वाकई कोई अनुभव और क्षमता होती, तो इतने बड़े बहुमत के द्वारा वे पाँच आगे पढ़ें …

काँग्रेस का घोषणापत्र (२०१९)

काँग्रेस का घोषणापत्र मैंने आज देखा। मेरी समझ में जो आया, उनमें से कुछ मुख्य बातें आपकी जानकारी के लिए यहाँ दे रहा हूँ – १. अर्द्ध-कुशल युवाओं को कोई हुनर सिखाने की बजाय काँग्रेस उनसे तालाब खुदवाएगी और बंजर जमीनों पर मजदूरी करवाएगी। इस तरह लाखों रोजगार दिए जाएँगे। तालाब खोदने और मज़दूरी करने को रोजगार माना जाए या नहीं, ये आपको तय करना चाहिए। २. सरकारी विभागों के बीस लाख पद जब तक नहीं भर जाते, तब तक राज्यों के विकास कार्यों का फंड रोककर रखेगी। विकास कार्यों के रुक जाने से देश के करोड़ों लोगों जो तकलीफ आगे पढ़ें …

उथल-पुथल (काँग्रेस कथा – ५)

सन १८९७ में अंग्रेज़ों ने तिलक जी पर पहली बार राजद्रोह का मुकदमा चलाया था। मुंबई के वकील दिनशॉ डॉवर ने उनका मुकदमा लड़ा था। तब उन्हें अठारह माह की सज़ा सुनाई गई थी। अगली बार १९०८ में फिर एक मुकदमा चला। संयोग से वही दिनशॉ डॉवर अब जज बन चुके थे और मुकदमा उन्हीं की अदालत में चला। इस बार मुंबई के वकील मोहम्मद अली जिन्ना ने अदालत में उनके पक्ष में पैरवी की। यह बात बड़ी अजीब लगती है कि पहले वाले मुकदमे के दौरान तिलक जी की ज़मानत की अपील करते समय उनके वकील डॉवर ने जो आगे पढ़ें …

काँग्रेस का विभाजन (काँग्रेस कथा – ४)

सन १८८५ में काँग्रेस की स्थापना के समय से ही इसका नियंत्रण नरम दल वाले नेताओं के हाथों में रहा था। लेकिन १९०५ में बंग-भंग की घोषणा (बंगाल का विभाजन) हुई और नरम दल वालों की सभी याचिकाओं और आवेदनों को अंग्रेज़ों ने कूड़े में दाल दिया, तब यह बात उनकी समझ में आई कि अंग्रेज़ों के आगे गिडगिडाने से कुछ हासिल होने वाला नहीं है। ये नेता आम जनता से भी दूर रहते थे, और न लोगों की समस्याओं को ठीक से समझते थे, इसलिए इन्हें कोई ख़ास जन-समर्थन भी हासिल नहीं था। दूसरी ओर गरम दल वाले नेता आगे पढ़ें …

बंगाल का विभाजन (काँग्रेस कथा – ३)

(पिछले भाग यहाँ पढ़ें) लोकमान्य तिलक सन १८९० में काँग्रेस से जुड़े। उस समय काँग्रेस की नीति सरकार से याचना करने, अपनी माँगों के लिए प्रार्थना-पत्र लिखने, और ब्रिटिश शासन की कृपा के लिए धन्यवाद देते रहने की ही थी। काँग्रेस के अधिकतर नेता वाकई मानते थे कि ब्रिटिश शासन भारत के लिए एक वरदान है और ब्रिटिशों के कारण ही भारत के लोगों को आधुनिक शिक्षा पाने के अवसर मिल रहे हैं। उन नेताओं का यह विश्वास भी था कि ब्रिटिश शासक सचमुच विश्व के सबसे ईमानदार और निष्पक्ष शासक हैं और अंग्रेज़ भारत के सच्चे हितैषी हैं। उस आगे पढ़ें …

याचना या संघर्ष? (काँग्रेस कथा – २)

(पहला भाग यहाँ पढ़ें) पिछले भाग में मैंने आपको बताया था कि अंग्रेज़ अधिकारी ह्यूम को इस बारे में जानकारी मिली कि अंग्रेज़ों की क्रूरतापूर्ण नीतियों के कारण पूरे भारत में अंसतोष बढ़ रहा है और लोग फिर से १८५७ जैसी क्रांति करने की तैयारी में हैं। ह्यूम ने इस बारे में ब्रिटिश सरकार को पत्र लिखकर बताया कि – ‘मुझे सात बड़ी-बड़ी फ़ाइलों में भारत के लगभग हर जिले, तहसील और शहर से कुल मिलाकर लगभग ३० हजार से अधिक सूचनाएँ मिली हैं, जिनसे पता चलता है कि लोगों में अंग्रेज़ों के खिलाफ़ भारी गुस्सा है। कई जगहों से आगे पढ़ें …

आडवाणी जी के बहाने काँग्रेस की बेशर्मी

आजकल काँग्रेस के लोगों को आडवाणी जी की चिंता सता रही है। वैसे इसकी शुरुआत तभी से हो गई थी, जब २०१४ में मोदीजी प्रधानमंत्री बने। पहले काँग्रेस को यह चिंता हुई कि मोदी ने आडवाणी जी को प्रधानमंत्री नहीं बनने दिया, उसके बाद यह चिंता हुई कि राष्ट्रपति भी नहीं बनाया और अब चिंता हो रही है कि उन्हें इस चुनाव में टिकट भी नहीं दिया जा रहा है। यह वही काँग्रेस है, जो उससे पहले लगातार ५० सालों तक आडवाणी जी की आलोचना और अपमान करती रही है। यह वही काँग्रेस है, जिसने १९७५ में आपातकाल लगाकर आडवाणी आगे पढ़ें …

एक्सिडेंटल प्राइम मिनिस्टर (भाग – १)

हैदराबाद के संजय बारू ने कई सालों तक पत्रकारिता के क्षेत्र में काम किया। इस दौरान कई सालों तक वे ‘द बिज़नेस स्टैंडर्ड’, ‘इकोनॉमिक टाइम्स’ और ‘टाइम्स ऑफ इंडिया’ जैसे अखबारों और पत्रिकाओं में रहे। इनमें से कोई भी अखबार नरेन्द्र मोदी या भाजपा का समर्थक नहीं है। इंदिरा गांधी के प्रेस सचिव, और उनके भाषण लिखने वाले, एच. वाय. शारदा प्रसाद और उनके परिवार से संजय बारू की पत्नी के पारिवारिक संबंध थे। जिस समय मनमोहन सिंह भारत के वित्त सचिव थे, उस दौरान बारू के पिता भी उनकी टीम में काम करते थे। इनमें से भी कोई भाजपा आगे पढ़ें …

महारानी विक्टोरिया की जय! (काँग्रेस-कथा १)

“महारानी विक्टोरिया की… जय” २८ दिसंबर १८८५ को मुंबई के गोकुलदास तेजपाल संस्कृत महाविद्यालय का परिसर ब्रिटिश महारानी की जय के नारों से गूंज उठा। इसी नारे के साथ ब्रिटिश भारत में एक नई संस्था का जन्म हुआ, जिसका नाम था – इंडियन नेशनल कांग्रेस (भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस)। ये नारा लगा रहे थे, ब्रिटिश भारत के बॉम्बे और मद्रास राज्यों से आए ७२ भारतीय प्रतिनिधि, जो ब्रिटिश अधिकारी एलन ऑक्टेवियन ह्यूम के निमंत्रण पर वहाँ आए थे। ह्यूम के अलावा उस सभा में दो अन्य ब्रिटिश सदस्य भी थे- विलियम वेडरबर्न और जस्टिस जॉन जार्डिन। ये सभी लोग तत्कालीन ब्रिटिश आगे पढ़ें …

घुसपैठ…

बांग्लादेश का निर्माण: सन १९४७ में भारत का अंतिम विभाजन हुआ और पाकिस्तान बना। आगे १९७१ में हुए युद्ध के बाद पाकिस्तान के भी दो टुकड़े हुए और बांग्लादेश का निर्माण हुआ। इस बारे में मैंने विस्तार से एक लेख लिखा था, जो आप यहाँ क्लिक करके पढ़ सकते हैं। १९७१ के युद्ध और बांग्लादेश के निर्माण का मुख्य कारण यह था कि बांग्लादेश के लोगों को यह महसूस होता था कि पाकिस्तान सरकार भाषा, प्रशासन, राजस्व, प्रतिनिधित्व आदि सभी मामलों में बांग्लादेश के साथ भेदभाव करती है। इसे लेकर लगातार आंदोलन चलते रहते थे और उनके दमन के लिए सेना आगे पढ़ें …