एक्सिडेंटल प्राइम मिनिस्टर (भाग – १)

हैदराबाद के संजय बारू ने कई सालों तक पत्रकारिता के क्षेत्र में काम किया। इस दौरान कई सालों तक वे ‘द बिज़नेस स्टैंडर्ड’, ‘इकोनॉमिक टाइम्स’ और ‘टाइम्स ऑफ इंडिया’ जैसे अखबारों और पत्रिकाओं में रहे। इनमें से कोई भी अखबार नरेन्द्र मोदी या भाजपा का समर्थक नहीं है। इंदिरा गांधी के प्रेस सचिव, और उनके भाषण लिखने वाले, एच. वाय. शारदा प्रसाद और उनके परिवार से संजय बारू की पत्नी के पारिवारिक संबंध थे। जिस समय मनमोहन सिंह भारत के वित्त सचिव थे, उस दौरान बारू के पिता भी उनकी टीम में काम करते थे। इनमें से भी कोई भाजपा आगे पढ़ें …

महारानी विक्टोरिया की जय! (काँग्रेस-कथा १)

“महारानी विक्टोरिया की… जय” २८ दिसंबर १८८५ को मुंबई के गोकुलदास तेजपाल संस्कृत महाविद्यालय का परिसर ब्रिटिश महारानी की जय के नारों से गूंज उठा। इसी नारे के साथ ब्रिटिश भारत में एक नई संस्था का जन्म हुआ, जिसका नाम था – इंडियन नेशनल कांग्रेस (भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस)। ये नारा लगा रहे थे, ब्रिटिश भारत के बॉम्बे और मद्रास राज्यों से आए ७२ भारतीय प्रतिनिधि, जो ब्रिटिश अधिकारी एलन ऑक्टेवियन ह्यूम के निमंत्रण पर वहाँ आए थे। ह्यूम के अलावा उस सभा में दो अन्य ब्रिटिश सदस्य भी थे- विलियम वेडरबर्न और जस्टिस जॉन जार्डिन। ये सभी लोग तत्कालीन ब्रिटिश आगे पढ़ें …

घुसपैठ…

बांग्लादेश का निर्माण: सन १९४७ में भारत का अंतिम विभाजन हुआ और पाकिस्तान बना। आगे १९७१ में हुए युद्ध के बाद पाकिस्तान के भी दो टुकड़े हुए और बांग्लादेश का निर्माण हुआ। इस बारे में मैंने विस्तार से एक लेख लिखा था, जो आप यहाँ क्लिक करके पढ़ सकते हैं। १९७१ के युद्ध और बांग्लादेश के निर्माण का मुख्य कारण यह था कि बांग्लादेश के लोगों को यह महसूस होता था कि पाकिस्तान सरकार भाषा, प्रशासन, राजस्व, प्रतिनिधित्व आदि सभी मामलों में बांग्लादेश के साथ भेदभाव करती है। इसे लेकर लगातार आंदोलन चलते रहते थे और उनके दमन के लिए सेना आगे पढ़ें …

शिमला समझौता

पिछले लेख में मैंने १९४७ में पाकिस्तान के जन्म से लेकर १९७१ में बांग्लादेश के जन्म तक के इतिहास के बारे में संक्षेप में आपको जानकारी दी थी। आज उसके आगे की बात करने वाला हूं। हालांकि कुछ बातों का संदर्भ स्पष्ट करने के लिए बीच-बीच में इतिहास के कुछ अन्य प्रसंगों का भी उल्लेख करूंगा। तो आइये कल की बात को आगे बढ़ाएं। १६ दिसंबर १९७१; केवल १३ दिनों की लड़ाई के बाद ही पाकिस्तान ने घुटने टेक दिए। युद्ध के दौरान वहां का सरकारी मीडिया लोगों को गलत खबर देता रहा कि पाकिस्तान बहुत मज़बूत स्थिति में है आगे पढ़ें …