भारत के अदृश्य (प्रथम) नागरिक!

भाजपा और उसके सहयोगी दलों ने जब श्री रामनाथ कोविंद को राष्ट्रपति पद के लिए अपना प्रत्याशी घोषित किया, तो बंगाल की मुख्यमंत्री सुश्री ममता बनर्जी ने कथित रूप से पत्रकारों से पूछा था: ये रामनाथ कोविंद कौन है? और ऐसा पूछने वाली वे अकेली नहीं थीं। सोशल मीडिया पर भी कई लोगों ने कहा कि रामनाथ कोविंद को कोई नहीं ‘पहचानता’ और वे कोई ‘बड़े’ नेता नहीं हैं। इसलिए जिन लोगों ने उनका नाम नहीं सुना था, उन्हें लगा कि भाजपा ने केवल वोटबैंक की राजनीति के लिए एक दलित को अपना प्रत्याशी बनाया है और ऐसा करके राष्ट्रपति आगे पढ़ें …

मीडिया का एजेंडा?

कल शाम दिल्ली नगर निगम चुनाव के लिए मतदान खत्म हुआ। और सुना है कि उसके कुछ ही समय बाद दिल्ली के जंतर-मंतर पर चल रहा एक आंदोलन भी समाप्त हो गया। क्या इन दो बातों के बीच कोई संबंध है? क्या वे आंदोलनकारी वाकई किसान थे या तमिलनाडु की किसी जनजाति के संपेरे थे? क्या वे वामपंथी गैंग के सदस्य थे या ग्रीनपीस एनजीओ के कार्यकर्ता थे? क्या ये सही है इंडिया टुडे के कुछ ‘पत्रकार’ (?) उनमें से कुछ लोगों को नोएडा के पास एक गांव के सूखे खेतों में फोटो खिंचवाने के लिए साथ ले गए और आगे पढ़ें …

राष्ट्रवादी मित्रों का कन्फ्यूजन

  वास्तव में अब देश को मोदी और डोभाल की जरूरत नहीं रही। सोशल मीडिया पर ही कई धुरंधर हैं, जो युद्ध नीति, कूटनीति, राजनीति, राष्ट्रनीति, सैन्य संचालन आदि आदि सभी मामलों के जानकार, अनुभवी और विशेषज्ञ हैं। ये वही लोग हैं जो लाहौर में एक हमला होने पर पाकिस्तान से सहानुभूति जताने के लिए अपना प्रोफ़ाइल फोटो काला कर रहे थे, और फिर बुरहान वानी के एनकाउंटर के बाद पाकिस्तान के उकसाने पर भारतीय सेना के समर्थन में भी प्रोफ़ाइल फोटो बदल रहे थे। ये वही लोग हैं, जो आज पकिस्तान को गालियां देते हैं और कल भारत-पाकिस्तान क्रिकेट आगे पढ़ें …