अकेलापन…

लोग आते रहे-जाते रहे मैं अकेला था, अकेला ही रहा। हर बार कोई आने वाला, कुछ साथ लिए आता है। जाते-जाते जाने वाला, टुकड़ा मन का ले जाता है। ऐसे टुकड़े मेरे मन के, बनते रहे, बिखरते रहे। उन सभी अकेले टुकड़ों में, मैं अकेला था, अकेला ही रहा। जीवन एक यात्रा है अनंत, सदियों तक चलती जानी है। यह एक जन्म की व्यथा नहीं, कई जन्मों की कहानी है। सौ जन्मों की इस यात्रा में, लोग मिलते रहे, बिछड़ते रहे। उन सभी अकेले जन्मों में, मैं अकेला था, अकेला ही रहा। यही अकेलापन मेरा, जन्मों-जन्मों का साथी है। जब आगे पढ़ें …

झरना…

अब खुश और संतुष्ट लोग बहुत कम मिलते हैं. हम किसी से भी बात करें – वह शिकायतों का पिटारा खोल देता है. ‘मेरे पास समय ही नहीं रहता, मेरे पास पैसे नहीं हैं, दुनिया की इस दौड़ में मैं कैसे टिकूंगा, ओह, आज तो बारिश हो रही है, आज मेरा मूड नहीं है!’ ये सब अपनी खुशी को ‘टालने’ के बहाने हैं. कुछ काम ऐसे हैं, जिनसे हमें ही खुशी मिलेगी – लेकिन हम ही उन बातों की खुशी गंवा रहे हैं! क्या यह अजीब नहीं लगता? किसी फूल की खुशबू का मज़ा लेने में कितना समय चाहिए? उगते-डूबते आगे पढ़ें …