आपातकाल की यादें (अंतिम भाग) – अरुण जेटली

आपातकाल कैसे हटा? आपातकाल की अवधि बढ़ते जाने के साथ ही इंदिरा जी पर एक बात के कारण दबाव भी बढ़ने लगा था। अंतरराष्ट्रीय मीडिया और विश्व के नेता इस बात से  चकित थे कि नेहरु जी की बेटी ही लोकतंत्र की राह को छोड़कर तानाशाह बन गई थी। अंतरराष्ट्रीय जगत को यह समझाना इंदिरा जी के लिए बहुत कठिन होता जा रहा था कि आपातकाल का दौर वाकई अस्थायी है और हमेशा आपातकाल लागू नहीं रहेगा। हालांकि उनकी पार्टी की राय थी कि चूंकि संसद की अवधि दो वर्षों के लिए बढ़ाई जा चुकी है, इसलिए अब १९७८ से आगे पढ़ें …

आपातकाल की यादें – भाग -२ (अरुण जेटली)

आपातकाल के अत्याचार २६ जून १९७५ को आपातकाल लगाते ही श्रीमती इंदिरा गांधी ने धारा ३५९ के तहत नागरिकों के मौलिक अधिकार निलंबित करने का आदेश जारी कर दिया। इसके परिणामस्वरूप अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और व्यक्तिगत स्वतंत्रता दोनों पर पाबंदी लगा दी गई। केवल सेंसर की अनुमति से प्रकाशित समाचार ही उपलब्ध थे। २९ तारीख को इंदिरा जी ने भारतीय अर्थव्यवस्था में सुधार के नाम पर बीस-सूत्रीय कार्यक्रम की घोषणा की, हालांकि वास्तव में इसका उद्देश्य इस बात से ध्यान हटाना था कि भारत में लोकतंत्र को खत्म कर दिया गया है। इन बीस बिन्दुओं में कई तो वास्तव में आगे पढ़ें …

आपातकाल की यादें – भाग १ (अरुण जेटली)

(यह लेख तीन भागों में है) आपातकाल लगाने की नौबत क्यों आई? वर्ष १९७१ और १९७२ श्रीमती इंदिरा गांधी के राजनैतिक करियर के सुनहरे वर्ष थे। उन्होंने अपनी ही पार्टी के वरिष्ठ नेताओं को और विपक्षी दलों के महागठबंधन को चुनौती दी थी। १९७१ के आम चुनाव में उनकी स्पष्ट विजय हुई। अगले पाँच वर्षों तक वे राजनैतिक सत्ता का सबसे प्रमुख केंद्र बानी रहीं। उनकी पार्टी में कोई नेता नहीं था, जो उन्हें चुनौती दे सके। १९७१ में ही पाकिस्तान के आम चुनाव में शेख मुजीबुर्रहमान की अवामी लीग पार्टी को पाकिस्तानी संसद में स्पष्ट बहुमत मिला था, जिसके आगे पढ़ें …

घुसपैठ…

बांग्लादेश का निर्माण: सन १९४७ में भारत का अंतिम विभाजन हुआ और पाकिस्तान बना। आगे १९७१ में हुए युद्ध के बाद पाकिस्तान के भी दो टुकड़े हुए और बांग्लादेश का निर्माण हुआ। इस बारे में मैंने विस्तार से एक लेख लिखा था, जो आप यहाँ क्लिक करके पढ़ सकते हैं। १९७१ के युद्ध और बांग्लादेश के निर्माण का मुख्य कारण यह था कि बांग्लादेश के लोगों को यह महसूस होता था कि पाकिस्तान सरकार भाषा, प्रशासन, राजस्व, प्रतिनिधित्व आदि सभी मामलों में बांग्लादेश के साथ भेदभाव करती है। इसे लेकर लगातार आंदोलन चलते रहते थे और उनके दमन के लिए सेना आगे पढ़ें …

अफ़्रीका में हलचल

कल अपने लेख में मैंने मालदीव के राजनैतिक संकट की बात की थी। आज दक्षिण अफ्रीका की बात करने वाला हूं। इन दिनों वहां भी राजनैतिक हलचल जारी है। लेकिन वहां तक पहुंचने से पहले हमें उत्तर प्रदेश जाना पड़ेगा क्योंकि द.अफ्रीका के कई लोगों की राय है कि उनके देश की वर्तमान सरकार के भ्रष्टाचार के पीछे उप्र के एक परिवार का बड़ा हाथ है। तो आइए आज कुछ नई कड़ियाँ जोड़ने का प्रयास करें। सन १९९३ तक दक्षिण अफ्रीका में रंगभेद बहुत बड़े पैमाने पर था। कई मामलों में यह केवल सामाजिक ही नहीं था, बल्कि कई मामलों आगे पढ़ें …

शिमला समझौता

पिछले लेख में मैंने १९४७ में पाकिस्तान के जन्म से लेकर १९७१ में बांग्लादेश के जन्म तक के इतिहास के बारे में संक्षेप में आपको जानकारी दी थी। आज उसके आगे की बात करने वाला हूं। हालांकि कुछ बातों का संदर्भ स्पष्ट करने के लिए बीच-बीच में इतिहास के कुछ अन्य प्रसंगों का भी उल्लेख करूंगा। तो आइये कल की बात को आगे बढ़ाएं। १६ दिसंबर १९७१; केवल १३ दिनों की लड़ाई के बाद ही पाकिस्तान ने घुटने टेक दिए। युद्ध के दौरान वहां का सरकारी मीडिया लोगों को गलत खबर देता रहा कि पाकिस्तान बहुत मज़बूत स्थिति में है आगे पढ़ें …

भारत के अदृश्य (प्रथम) नागरिक!

भाजपा और उसके सहयोगी दलों ने जब श्री रामनाथ कोविंद को राष्ट्रपति पद के लिए अपना प्रत्याशी घोषित किया, तो बंगाल की मुख्यमंत्री सुश्री ममता बनर्जी ने कथित रूप से पत्रकारों से पूछा था: ये रामनाथ कोविंद कौन है? और ऐसा पूछने वाली वे अकेली नहीं थीं। सोशल मीडिया पर भी कई लोगों ने कहा कि रामनाथ कोविंद को कोई नहीं ‘पहचानता’ और वे कोई ‘बड़े’ नेता नहीं हैं। इसलिए जिन लोगों ने उनका नाम नहीं सुना था, उन्हें लगा कि भाजपा ने केवल वोटबैंक की राजनीति के लिए एक दलित को अपना प्रत्याशी बनाया है और ऐसा करके राष्ट्रपति आगे पढ़ें …

मीडिया का एजेंडा?

कल शाम दिल्ली नगर निगम चुनाव के लिए मतदान खत्म हुआ। और सुना है कि उसके कुछ ही समय बाद दिल्ली के जंतर-मंतर पर चल रहा एक आंदोलन भी समाप्त हो गया। क्या इन दो बातों के बीच कोई संबंध है? क्या वे आंदोलनकारी वाकई किसान थे या तमिलनाडु की किसी जनजाति के संपेरे थे? क्या वे वामपंथी गैंग के सदस्य थे या ग्रीनपीस एनजीओ के कार्यकर्ता थे? क्या ये सही है इंडिया टुडे के कुछ ‘पत्रकार’ (?) उनमें से कुछ लोगों को नोएडा के पास एक गांव के सूखे खेतों में फोटो खिंचवाने के लिए साथ ले गए और आगे पढ़ें …

फ्रांस राष्ट्रपति चुनाव २०१७

आज २३ अप्रैल को फ्रांस में राष्ट्रपति चुनाव के लिए पहले चरण का मतदान हो रहा है। पिछले दो वर्षों में, विशेषतः सीरिया में जारी युद्ध, आइसिस के उभार और यूरोप में बढ़े शरणार्थी संकट के बाद से परिस्थिति बहुत संवेदनशील हो गई है। अधिकांश देशों में शरणार्थियों के मामले को लेकर तीखी प्रतिक्रिया और आपसी विरोध दिखाई पड़ रहा है। हर देश में कुछ गुट या पार्टियां इनके समर्थन में हैं और कुछ पूरी तरह विरोध में। इसके अलावा यूरोपीय देशों के लोग हाल ही में उभरी कुछ अन्य समस्याओं, जैसे बढ़ते अपराधों और आतंकी हमलों से भी चिंतित आगे पढ़ें …

राष्ट्रवादी मित्रों का कन्फ्यूजन

  वास्तव में अब देश को मोदी और डोभाल की जरूरत नहीं रही। सोशल मीडिया पर ही कई धुरंधर हैं, जो युद्ध नीति, कूटनीति, राजनीति, राष्ट्रनीति, सैन्य संचालन आदि आदि सभी मामलों के जानकार, अनुभवी और विशेषज्ञ हैं। ये वही लोग हैं जो लाहौर में एक हमला होने पर पाकिस्तान से सहानुभूति जताने के लिए अपना प्रोफ़ाइल फोटो काला कर रहे थे, और फिर बुरहान वानी के एनकाउंटर के बाद पाकिस्तान के उकसाने पर भारतीय सेना के समर्थन में भी प्रोफ़ाइल फोटो बदल रहे थे। ये वही लोग हैं, जो आज पकिस्तान को गालियां देते हैं और कल भारत-पाकिस्तान क्रिकेट आगे पढ़ें …