असंभव आगमन (अमरीकी डायरी – १)

अमरीकी राष्ट्रध्वज (चित्र विकिपीडिया से)

जीवन में कई बार असंभव लगने वाली बातें भी संभव हो जाती हैं। मेरा अमरीका आगमन भी मेरे लिए ऐसी ही असंभव और अविश्वसनीय लगने वाली बात है और इसका कारण भी है। कुछ वर्षों पहले जब मैं कॉलेज में पढ़ता था, उस समय तक आईटी और सॉफ्टवेयर का क्षेत्र बहुत बढ़ चुका था और इसमें नौकरी मिलने का मतलब था, अमरीका जाने की संभावना। वास्तव में अधिकांश लोग इस क्षेत्र में यही आशा लेकर आते थे कि एक दिन उन्हें भी किसी प्रोजेक्ट के लिए अमरीका जाने का अवसर मिलेगा और उनका ‘अमेरिकन ड्रीम’ अंततः सच हो जाएगा।

लेकिन मेरा ऐसा कोई सपना नहीं था। वास्तव में मेरा तो आईटी या कंप्यूटर विज्ञान के क्षेत्र में करियर बनाने का भी कोई इरादा नहीं था, इसलिए कंप्यूटर साइंस में ३ डिग्रियां पाने के बावजूद मैंने उस क्षेत्र में नौकरी के लिए कभी प्रयास नहीं किया। फिर मैं उन विषयों की पढ़ाई करने गया ही क्यों था? इस प्रश्न का उत्तर बहुत लंबा है, इसलिए उस बारे में फिर कभी किसी अन्य पोस्ट में लिखूंगा।

फिलहाल तो इतना लिखना पर्याप्त होगा कि मेरे मन में शुरू से ही भाषाओं के प्रति आकर्षण था और बचपन के संस्कारों व सैनिक स्कूल में पढ़ाई के कारण देश के लिए कुछ करने की इच्छा भी थी। इसलिए कॉलेज की पढ़ाई के बाद जब अधिकांश सहपाठी आईटी के क्षेत्र में अवसर ढूंढने निकले, तब तक मैं लेखन और अनुवाद को अपना व्यवसाय बना चुका था।

सन २००६ से २०१६ तक दस वर्षों के दौरान अधिकांशतः मैंने विश्वभर में फैली लगभग १०० से अधिक कंपनियों के साथ फ्रीलांस लेखक और अनुवादक के तौर पर स्वतंत्र रूप से काम किया, लेकिन बीच-बीच में थोड़े समय के लिए मैंने कुछ कंपनियों में नौकरी भी की। उन संक्षिप्त नौकरियों के दौरान एक-दो बार विदेश जाने की संभावना भी बनी थी, लेकिन मैं उन अवसरों के प्रति उदासीन ही रहा क्योंकि मेरे मन में यह बात पहले से तय थी कि मुझे अपनी भाषा के लिए और अपने देश के लिए ही काम करना है। इसलिए अगर विदेश भी जाऊंगा, तो सिर्फ तभी जब हिन्दी में काम करना हो और उससे अपने देश के लोगों का कोई लाभ होने वाला हो। विदेश में, और वो भी अमरीका में, हिन्दी के लिए काम करने कोई कंपनी बुलाएगी, ये बात उस समय तक लगभग असंभव लगती थी। इसलिए मैंने शुरू में लिखा कि मेरा अमरीका आगमन एक असंभव लगने वाली बात है। मुझे जानने वाले किसी भी व्यक्ति ने और खुद मैंने भी कुछ सालों पहले तक ये कभी नहीं सोचा होगा कि मैं एक दिन अमरीका में रहने आऊंगा। वास्तव में, मैं तो अपने बालाघाट शहर से बाहर भी नहीं जाना चाहता था, फिर अमरीका तो बहुत दूर की बात है। मैं बालाघाट से पुणे, वहां से सिंगापुर और वहां से अमरीका कैसे आया, ये भी बड़ी रोचक कहानी है। उस बारे में भी मैं आगे कभी किसी पोस्ट में अवश्य लिखूंगा। फिलहाल तो यही वास्तविकता है कि मैं अब अमरीका आ गया हूं, इसलिए यह लेख और इस श्रृंखला में हर हफ्ते आने वाले लेख मैं अमरीका के अपने अनुभवों के बारे में लिखने तक ही सीमित रखूंगा।

अमरीका के बारे में लिखना शुरू करने से पहले मैं आपको याद दिलाना चाहता हूं कि मैं जो भी लिखूंगा, वह सब केवल मेरे व्यक्तिगत अनुभवों पर आधारित होगा। मैं जो देखूंगा, समझूंगा, महसूस करूंगा, वही मैं लिखूंगा। इसलिए इस वर्णन का दायरा बहुत सीमित रहेगा। मैं जो लिखूंगा, केवल उसी के आधार पर कृपया पूरे अमरीका के बारे में कोई राय न बनाएं। क्षेत्रफल के लिहाज से अमरीका का आकार भारत से लगभग तीन गुना बड़ा है। इतने विस्तार वाले इस देश के अलग-अलग हिस्सों की परिस्थितियों, प्रणालियों, मौसम, जीवनशैली आदि में बहुत विविधता है। जैसे भारत में भी अगर मैं कश्मीर के मौसम का वर्णन करूं, तो उसका अर्थ ये नहीं लगाया जा सकता कि पूरे भारत का मौसम वैसा ही होता है। उसी तरह अमरीका के बारे में मैं जो लिखूंगा, वह केवल मेरे अनुभव और मेरी जानकारी पर आधारित रहेगा। उसे पढ़कर आपको अमरीका के कुछ पहलुओं की जानकारी अवश्य मिल सकती है, लेकिन केवल उसी के आधार पर किसी को यह निष्कर्ष नहीं निकालना चाहिए कि पूरा अमरीका ऐसा ही है। मुझे विश्वास है कि आप मेरी बात से सहमत होंगे। तो आइए मेरे साथ अमरीका घूमने चलिए।

७ जुलाई २०१७ को मैं अपने परिवार के साथ अमरीका आने के लिए सिंगापुर से निकला। वैसे हमारी फ्लाइट का समय सिंगापुर से शाम ६ बजे का था, लेकिन चूंकि अब हम सिंगापुर हमेशा के लिए छोड़ रहे थे, इसलिए हम निकलने से पहले कुछ समय सिंगापुर के हवाई अड्डे पर भी बिताना चाहते थे। यह विश्व का सर्वश्रेष्ठ हवाई अड्डा माना जाता है और हवाई अड्डे में कई दुकानें, मॉल, सुंदर उद्यान आदि हैं। इसमें फिलहाल ३ टर्मिनल हैं और चौथा भी जल्दी ही शुरू होने वाला है।

हम दोपहर १२ बजे ही हवाई अड्डे पर आ गए थे और सबसे पहले हमने एयरलाइन के काउंटर पर अपना सामान देकर बोर्डिंग पास ले लिया। उसके बाद ३-४ घंटे हम एयरपोर्ट परिसर में ही घूमे, फिर कुछ देर एयरलाइन के बिजनेस क्लास के लाउंज में आराम किया और फिर तय समय पर शाम ६ बजे हमारी यात्रा शुरू हुई।

सिंगापुर एयरलाइंस की हमारी उड़ान हांगकांग होते हुए १८ घंटों में अमरीका के सैन फ्रांसिस्को पहुंचने वाली थी। तो अगर मैं सिंगापुर से ७ जुलाई की शाम ६ बजे निकल रहा था, तो १८ घंटों बाद जब मैं उतरा, उस समय ८ जुलाई की दोपहर १२ बजे का समय होना चाहिए था। लेकिन पृथ्वी के दूसरे हिस्से में स्थित होने के कारण सैन फ्रांसिस्को का समय सिंगापुर से १५ घंटे पीछे है। अतः १८ घंटों की यात्रा के बाद जब हम वहां उतरे, तो वास्तव में वहां ७ जुलाई की रात ९ बजे का समय हुआ था। हालांकि सिंगापुर में उस समय ८ जुलाई की दोपहर १२ बजे का ही समय हुआ होगा।

जब हम इस तरह अलग-अलग टाइम ज़ोन के बीच यात्रा करते हैं, तो हमारे शरीर को नए समय के अनुसार ढलने में थोड़ा समय लगता है। ऐसा इसलिए क्योंकि हमारी जैविक घड़ी तुरंत नए क्षेत्र के अनुसार एडजस्ट नहीं हो पाती। जैसे मैं इतने महीनों से सिंगापुर में रह रहा था, इसलिए मेरी दिनचर्या वहां के समय के अनुसार चलती थी। जब सिंगापुर में सुबह होगी, तब मैं जागूंगा और वहां रात होगी, तब मुझे नींद आने लगेगी। लेकिन जब मैं अचानक इस तरह एक नए टाइम ज़ोन में आऊंगा, जो सिंगापुर से लगभग उल्टा है, तो उसके अनुसार एडजस्ट होने में मुझे कुछ दिनों का समय लगेगा। इसे ‘जेट लैग’ कहते हैं। ऐसा नाम इसलिए पड़ा है क्योंकि जेट विमानों के आविष्कार के बाद ही इतनी तेज गति से यात्राएं होने लगीं और लोग एक ही दिन में कई समय क्षेत्रों को पार करने लगे। उससे पहले अधिकतर यात्राएं जहाजों से होती थीं, इसलिए जेटलैग की समस्या नहीं थी।

जेट लैग के कारण होता ये है कि नए समय क्षेत्र में आ जाने के बावजूद आपका शरीर पुराने समय क्षेत्र के अनुसार ही काम करता रहता है। इसलिए अमरीका आने के बाद भी कुछ दिनों तक आपको दिन में नींद आएगी और रात भर आप जागते रहेंगे, या शाम को सोएंगे और सुबह २-३ बजे नींद खुल जाएगी क्योंकि नए समय क्षेत्र के अनुसार एडजस्ट होने में आपके शरीर को कुछ दिनों का समय लगता है। इस समस्या को कम करने के कुछ उपाय हैं और चूंकि मैं इससे पहले भी ४ बार अमरीका आ चुका हूं, इसलिए मुझे जेटलैग से सामान्यतः कोई दिक्कत नहीं होती है। लेकिन मेरे परिवार के लिए यह पहली इतनी लंबी यात्रा और जेटलैग का पहला अनुभव था, इसलिए उन्हें नए टाइमज़ोन में एडजस्ट होने में लगभग एक सप्ताह का समय लगा।

किसी भी देश के हवाई अड्डे पर उतरने के बाद सबसे पहले आव्रजन अधिकारी से सामना होता है। वह आपसे कुछ सवाल पूछता है, जैसे आप इस देश में क्यों आए हैं, कब तक रहेंगे, कहाँ ठहरेंगे आदि आदि। साथ ही, अधिकांश देशों में एक कस्टम और सीमाशुल्क का फॉर्म भी भरना पड़ता है। यदि आप दूसरे देश से बड़ी मात्रा में नकदी या मूल्यवान वस्तुएं ला रहे हैं, किसी व्यापारिक उत्पाद के सैंपल या कोई वनस्पति, बीज आदि जैसी चीजें ला रहे हैं, तो उसकी जानकारी इस फॉर्म में भरनी पड़ती है। इसके अलावा आप इससे पहले किन देशों में गए थे, क्या आप वहां पशु-पक्षियों, मिट्टी आदि के संपर्क में आए थे (जैसे किसी पोल्ट्री फार्म या खेत में गए थे), तो वो आपको इस फॉर्म में बताना पड़ता है।

हमने भी ये सब प्रक्रियाएं पूरी कीं और बाहर निकलकर अपना बेल्ट से अपना सामान उठाया। मैं हमेशा कम से कम समान लेकर यात्रा करता हूं, लेकिन चूंकि अब हम लंबे समय के लिए यहां आ रहे थे और परिवार भी साथ था, तो हमारे सामान के भी लगभग ७-८ बैग हो गए थे। हर एयरलाइन में इस बात की सीमा तय होती है कि आप कुल कितना सामान ले जा सकते हैं। यह सीमा घरेलू और अंतरराष्ट्रीय उड़ानों के लिए अलग-अलग होती है। इसी तरह यात्रा की श्रेणी के आधार पर भी अलग-अलग सीमा होती है। सामान का वजन या बैगों की संख्या उससे ज्यादा हो, तो मोटी फीस चुकानी पड़ती है। इसलिए यात्राओं में हमेशा इस बात का ध्यान रखना चाहिए। खैर हमारे ८ बैग होने के बावजूद हम इस सीमा के अंदर ही थे, इसलिए हमें एक्स्ट्रा चार्ज की नहीं, बस पूरा सामान संभालने और ढोने की चिंता करनी थी। सैन फ्रांसिस्को में उतरने तक मैं ये सोच रहा था कि हमने शायद बहुत ज्यादा सामान रख लिया है, लेकिन वहां उतरने के बाद पता चला कि कई परिवार तो १० या १२ बैग लेकर यात्रा कर रहे थे! उस लिहाज से तो हमारा सामान कम ही था!!

यहां एचएसएस के मेरे एक मित्र श्री अरुण जी हमें लेने एयरपोर्ट पर आ गए थे। एचएसएस के बारे में मैं आगे किसी पोस्ट में विस्तार से लिखूंगा। लेकिन अभी एक बात अवश्य लिखना चाहता हूं। अपने पिछले ३-४ अनुभवों से मैंने ये पाया है कि सिंगापुर के समान ही यहां भी एचएसएस के लोग मदद करने के लिए हमेशा तैयार और उपलब्ध रहते हैं। बहुत ज्यादा परिचय या मित्रता न होने के बावजूद उनसे मिलकर हमेशा ऐसा लगता है, जैसे हम उनके परिवार के ही एक सदस्य हैं। सिंगापुर में हमारे अमित करपे जी और वहां के अन्य सभी स्वयंसेवक भी ऐसे ही मिलनसार और मित्रवत थे। यहां भी अरुण जी और कई अन्य लोग मिले हैं, जो बिल्कुल वैसे ही हैं। मैं पहली बार उनसे इसी साल मार्च में अमरीका आने पर मिला था, लेकिन पहली मुलाक़ात के समय से ही वे इतनी आत्मीयता से मिलते हैं, जैसे उनसे हमारा बहुत पुराना परिचय हो। ऐसा न होता, तो रात १० बजे अपना आराम छोड़कर वे हमें लेने लगभग २०-२५ मील दूर सैन फ्रांसिस्को तक क्यों आते? उन्हें यही चिंता थी कि मुझे और मेरे परिवार को यहां आने पर कोई दिक्कत न हो। ऐसे मित्रों से संपर्क होना वास्तव में सौभाग्य की ही बात है।

अरुण जी यहां के फॉस्टर सिटी नामक शहर में रहते हैं। यहां पहुंचने पर शुरू में कुछ दिनों के लिए हमें पालो आल्टो शहर के एक होटल में रुकना था। अरुण जी फॉस्टर सिटी से हमें लेने सैन फ्रांसिस्को हवाई अड्डे तक आए और वहां से हमें पालो आल्टो के होटल तक पहुंचाकर रात ११ बजे अपने घर के लिए वापस गए। अब होटल के छोटे-से कमरे में हमने अपना सामान जमाया और इस तरह पहला दिन खत्म हुआ।

अब हफ्ते भर के अनुभवों की जानकारी आपको अगले लेख में बताऊंगा क्योंकि विषय-प्रवेश के कारण यह लेख बहुत लंबा हो गया है और मैं ज्यादा लिखकर आपको बोर नहीं करना चाहता। 🙂

इस लेख में आपको क्या अच्छा और क्या बोरिंग लगा, उस बारे में कमेंट द्वारा मुझे अवश्य बताइये, ताकि मैं अगले लेखों को बेहतर और आपके लिए ज्यादा उपयोगी बना सकूं। धन्यवाद!

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