अमरीका में अपनी कार (अमरीकी डायरी – १०)

हमारी कार

दक्षिण अमरीकी देश कोलंबिया की राजधानी बोगोटा के महापौर एनरिक पेनालोसा ने एक बहुत अच्छी बात कही थी-

“विकसित देश वह नहीं है जहां गरीब व्यक्ति भी कार खरीद सकता हो, बल्कि विकसित देश वह होता है, जहां अमीर लोग भी सार्वजनिक परिवहन सेवाओं का उपयोग करते हैं।”

मैं उनकी इस बात से सहमत हूं। महानगरों में बसों और मेट्रो आदि की सुविधा ही इतनी बढ़िया और आरामदायक होनी चाहिए कि लोगों को कारों की ज़रूरत ही न पड़े। सिंगापुर ऐसा ही एक विकसित देश है। अमरीका में भी शायद न्यूयॉर्क शहर ऐसा ही है। लेकिन कैलिफोर्निया का हमारा इलाका नहीं। इसलिए कार खरीदना यहां शौक या विलासिता से ज़्यादा ज़रूरत या मजबूरी है। हम जहां रहते हैं, सौभाग्य से वहां पास ही एक छोटा-सा स्टोर है, जहां हमें भारतीय किराना और फल-सब्जियां आदि मिल जाते हैं और मेरे ऑफिस का बस स्टॉप भी पास ही है, इसलिए हम ४ महीने बिना कार के भी गुज़ारा कर पाए। लेकिन उसके अलावा कहीं भी आना-जाना लगभग असंभव था। जब मैं जुलाई में अमरीका आया, उसी समय से यह काम मेरी लिस्ट में था, अंततः कल पूरा हुआ। तो आइये आज अमरीकी डायरी में बात करें, यहां कार खरीदने के अनुभव की।

२०१५! मैं पुणे में रहता था। मेरे मन में कार खरीदने का विचार चल रहा था। मैंने इंटरनेट पर खोजबीन की, अपने बजट के अनुसार २-३ मॉडल छांटे, कंपनियों की वेबसाइटों से ब्रोशर डाउनलोड किए, फीचर्स देखे, एक कार फाइनल की, कौन-सा मॉडल लेना है, ये तय किया। किस मॉडल की कीमत कितनी है, टैक्स कितना है, ये सब भी ऑनलाइन पता चल ही गया था। फिर मैं डीलर के यहां गया, कार के बारे में जानकारी ली, ऑफर्स के बारे में पूछा, गाड़ी किस तारीख को मिलेगी, भुगतान कैसे होगा, क्या-क्या दस्तावेज़ लगेंगे आदि बातें तय हुईं, काम पूरा हो गया। मैंने कुछ एडवांस देकर गाड़ी बुक,. करवा ली, और नियत तारीख पर दस्तावेजों के साथ बाकी रकम चुकाई, गाड़ी के कागज़ात, वॉरंटी, बीमा आदि के दस्तावेज़ भी डीलर से लिये और कार मेरी हो गई।

२०१७! मैं अमरीका में रहने आया। अब मुझे फिर यहां कार लेनी थी। लेकिन यहां के बाकी सारे कामों के समान ही कार खरीदना भी यहां एक लंबी और ऊबाऊ प्रक्रिया थी।

भारत के समान यहां अमरीका में गाड़ियों की तय फिक्स नहीं होती है। अपने हर मॉडल के लिए कंपनियां एक अनुमानित कीमत बताती हैं। इसे मैन्युफैक्चरर्स सजेस्टेड रिटेल प्राइस या संक्षेप में एमएसआरपी कहते हैं। इसका मतलब है कंपनी द्वारा सुझाया गया अधिकतम मूल्य। जैसा अपने यहां एमआरपी होता है।

इसका मतलब ये है कि आपको कार के लिए उससे ज्यादा कीमत नहीं चुकानी चाहिए। आपको डीलर से मोलभाव और सौदेबाजी करके कीमत इससे कम करवानी चाहिए। कितनी कम करवाई जा सकती है? जितना आप मोलभाव कर सकें! मैं इस मामले में बहुत ही कच्चा हूं। भारत में सब्जी वाले से २ रुपये कम करवाना भी मुझे बहुत कठिन काम लगता था, इसलिए मैं कभी मोलभाव करता भी नहीं था। लेकिन यहां तो कोई विकल्प ही नहीं था! मैंने इस काम के लिए कुछ वेबसाइटों की और मित्रों की मदद ली।

सबसे पहले तो मैंने अपना बजट तय किया और हिसाब लगाया कि मैं कार के लिए कितने पैसे खर्च करना चाहता हूं। घर खरीदना एक निवेश हो सकता है क्योंकि आज आपने घर खरीदने में जितने पैसे खर्च किए, कल आपको वही घर बेचने में उससे ज़्यादा पैसे मिल सकते हैं। लेकिन कार कोई निवेश नहीं है, कार एक खर्च है क्योंकि उससे मुझे कोई आर्थिक लाभ नहीं होने वाला है और न खरीदी हुई कार बेचने पर कभी भी मुझे ज़्यादा कीमत मिलेगी।

बजट तय करने के बाद मैंने उससे कम कीमत वाली कारों की जानकारी इंटरनेट पर ढूंढना शुरू किया। उसमें से मैंने ३-४ मॉडल छांटे। साथ ही, मैंने यहां के अपने मित्रों से भी फीडबैक और सलाह ली। सारी जानकारी लेने के बाद मैंने टोयोटा कोरोला लेना तय किया। लेकिन दूसरे विकल्प के रूप में होंडा सिविक भी मैंने लिस्ट में रखी थी।

अब चूंकि अमरीका में कारों की कीमत तय नहीं है, इसलिए मुझे यह जानकारी जुटानी थी कि कोरोला का जो मॉडल मैंने चुना है, उसके लिए मुझे अधिकतम कितनी कीमत चुकानी चाहिए। यह जानकारी पाने के लिए भी मैंने एक वेबसाइट की मदद ली।

यहां trucar.com नामक एक वेबसाइट है, जिसमें आप कार के किसी भी मॉडल के लिए यह देख सकते हैं कि बाज़ार में उसका औसत मूल्य क्या है और आपके इलाके में अन्य लोगों ने उस मॉडल को खरीदने के लिए क्या कीमत चुका रहे हैं। वहां जानकारी देखने के लिए अपना ईमेल आईडी भी देना पड़ता है। यह वेबसाइट यह जानकारी आसपास के डीलरों को भेज देती है और तुरंत ही डीलरों से ऑफर आने लगते हैं।

असली खेल अब शुरू होता है। मैंने भी खेल के नियमों का पालन किया। सभी डीलरों से मिले ऑफर्स देखे, कुछ डीलर तो ६०-७० मील दूर के शहरों के थे, उन्हें खारिज कर दिया। बाकी जो बचे, उनमें से मैंने सबसे कम कीमत वाले तीन डीलर छांटे। उन तीनों में से जो सबसे कम रेट वाला कोटेशन था, वह मैंने बाकी दो डीलर्स को ईमेल द्वारा भेजकर उनसे पूछा कि क्या वे इससे कम कीमत में मुझे कार बेच सकते हैं? उनमें से एक ने तो पहली ही बार में हाथ खड़े कर लिए। दूसरे ने रेट कम किया। अब फिर मैंने यह कोटेशन पिछले वाले डीलर को भेजा। इस तरह एक का कोटेशन दूसरे को भेजकर रेट कम करवाने का प्रयास चलता रहा। अंततः एक सीमा के बाद दोनों ही डीलर अब कीमत और कम कर पाने में असमर्थ हो गए। यह सारा मोलभाव ईमेल द्वारा ही हुआ था। इस दौरान मैंने किसी डीलर का कॉल नहीं लिया और न खुद किसी को कॉल किया क्योंकि मैं सारी बातें ईमेल द्वारा लिखित रूप में ही करना चाहता था।

अब लगभग तय हो गया था कि इन्हीं में से एक डीलर से मैं कार खरीदूंगा। लेकिन अब मुझे यह भी तय करना था कि क्या मैं पूरी कीमत एक ही बार में दे सकता हूं या मुझे ऋण लेना चाहिए। इसका निर्णय करने में यहां एक मित्र से विस्तृत चर्चा करके मैंने सलाह ली।

इस बारे में कोई निर्णय करने से पहले मैंने दोनों डीलरों से मिलना तय किया। अपने एक मित्र के साथ मैं दोनों जगह गया, उनके प्रतिनिधियों से बातचीत की और उनसे सारी जानकारी ली, जैसे अगर मैं XXX डॉलर डाउन पेमेंट करूं, तो ईएमआई कितनी होगी, शर्तें क्या होंगी, कौन-कौन से दस्तावेज़ देने पड़ेंगे आदि बातों की जानकारी मैंने उनसे मांगी। वह सब लिखित में ले लेने के बाद मैंने अपने बैंक से भी संपर्क किया और यह जानकारी ली कि क्या मुझे कार खरीदने के लिए ऋण मिल सकता है, उसकी दर व शर्तें क्या होंगी, कौन-से दस्तावेज़ लगेंगे और प्रक्रिया पूरी होने में कितना समय लगेगा।

इन सबके आधार पर मैंने निर्णय लिया कि मुझे गाड़ी खरीदने के लिए पूरी कीमत एक साथ ही दे देनी चाहिए या ऋण लेना चाहिए। हालांकि मैं यहां नहीं बताऊंगा कि मैंने दोनों में से कौन-सा विकल्प चुना है क्योंकि यह चयन तो अपनी-अपनी परिस्थितियों के अनुसार सबका अलग-अलग हो सकता है।

अब यह निर्णय होने के बाद मैंने गाड़ी के लिए बाहर और अंदर के रंग तय किए और दोनों डीलरों को जानकारी दी। हर गाड़ी की पहचान के लिए एक विशिष्ट संख्या होती है, जिसे वीआईएन अर्थात व्हीकल आइडेंटिफिकेशन नंबर कहते हैं। मेरी पसंद के रंगों वाले वाहन के लिए दोनों डीलरों ने मुझे विन नंबर भेज दिए। उस जानकारी की आवश्यकता मुझे इंश्योरेंस के लिए थी।

भारत में कार खरीदते समय डीलर ही पहले साल के इंश्योरेंस की रकम भी कार की कुल कीमत में जोड़कर डिलीवरी के समय इंश्योरेंस की व्यवस्था भी कर देता है, लेकिन यहां इंश्योरेंस भी ग्राहक को खुद ही करवाना पड़ता है। अब मैंने एक मित्र द्वारा सुझाई गई बीमा कंपनियों की वेबसाइट पर जाकर कोटेशन चेक किए। इसके लिए फॉर्म में अपने बारे में प्राथमिक जानकारी, ड्राइविंग हिस्ट्री, और गाड़ी का विन नंबर डालते ही कोटेशन मिल गया। उसमें से एक को चुनकर मैंने ऑनलाइन भुगतान कर दिया।

अब तक मैंने तय कर ही लिया था कि मुझे दोनों में से किस डीलर से गाड़ी खरीदनी है। इसलिए मैंने उस डीलर को बता दिया कि मैं डील फाइनल करने और गाड़ी की डिलीवरी लेने के लिए किस दिन आऊंगा। उस दिन मैं कैलिफोर्निया का अपना ड्राइविंग लाइसेंस और कुछ अन्य आवश्यक दस्तावेज़, जैसे इंश्योरेंस पॉलिसी की कॉपी और मेरे घर के पते की पुष्टि के लिए बिजली के बिल की कॉपी आदि लेकर अपने एक मित्र के साथ वहां गया और कागज़ी कार्यवाही पूरी करने के बाद कार मुझे मिल गई।

गाड़ी की कीमत के अलावा मुझे सेल्स टैक्स और डीएमवी (मतलब अमरीका का आरटीओ) में गाड़ी का पंजीयन करवाने के लिए रजिस्ट्रेशन टैक्स देना पड़ा, जो मैंने डीलर को ही दिया। अब मेरे दस्तावेज़ों के साथ डीलर मेरा आवेदन डीएमवी कार्यालय को भेजेगा और वे लोग मेरे नाम पर गाड़ी का रजिस्ट्रेशन करने के बाद मुझे डाक द्वारा गाड़ी के कागजात और नंबर प्लेट भेज देंगे। तब अमरीका में मेरी कार खरीदने की प्रक्रिया पूरी हो जाएगी।

भारत की तुलना में एक और अंतर यह भी है कि यहां गाड़ी का रजिस्ट्रेशन सिर्फ एक साल के लिए होता है। हर साल मुझे एक निश्चित शुल्क देकर उसे रिन्यू करवाना पड़ेगा। भारत में इंश्योरेंस भी सामान्यतः कम से कम एक साल के लिए होता है। लेकिन यहां ऐसी कोई न्यूनतम सीमा नहीं है। हम अपनी इच्छा से अवधि चुन सकते हैं और जब चाहें तब इंश्योरेंस कंपनी बदलकर दूसरी कंपनीं से भी इंश्योरेंस करवा सकते हैं। यहां तक कि आप कंपनी को कॉल करके प्रीमियम की राशि कम करवाने के लिए भी मोलभाव कर सकते हैं! यह आपकी कुशलता पर निर्भर है।

भारत और अमरीका में कार खरीदने के अपने अनुभवों के आधार पर मैं बेझिझक कह सकता हूं कि भारत में कार खरीदने की प्रक्रिया यहां की तुलना में बहुत सरल और सुविधाजनक है। वह वैसी ही बनी रहनी चाहिए। लेकिन भारत में लाइसेंस बनवाने की प्रक्रिया में बहुत कमियां हैं और खूब बेईमानी भी होती है। इसमें सुधार होना बहुत ज़रूरी है। देश में रोज़ होने वाली दुर्घटनाओं में उससे अवश्य ही कमी आएगी। लेकिन पता नहीं आरटीओ के कर्मचारी और भारत के नागरिक कब इसका महत्व समझेंगे।

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