अमरीका में हज़ार मील (अमरीकी डायरी – ११)

आज मेरी कार 🚗 का ओडोमीटर १००० मील (किमी नहीं) पर पहुँच गया है। इसका मतलब यह भी है कि मैंने अमरीका में १००० मील से ज़्यादा गाड़ी चला ली है। (फोटो नीचे कमेन्ट में है :P)

अभी फ़रवरी २०१८ चल रहा है और मुझे फ़रवरी २०१६ के दिन फिर से याद आ रहे हैं। तब मैं जीवन में पहली बार भारत 🇮🇳 से बाहर निकला था और सीधे अमरीका 🇺🇸 ही आया था।

तब यहां की यातायात व्यवस्था और नियमों को समझने में बहुत दिक्कत होती थी। भारत में गाड़ियां सड़क 🛣 की दायीं ओर चलती हैं, जबकि यहां बायीं ओर, इसलिए पैदल 🚶सड़क पार करते समय मैं हमेशा कन्फ्यूज़ रहता था कि वाहन किस तरफ़ से आएंगे। 🤔

पहले-पहल तो मुझे यह भी नहीं पता था कि चौक पर लगे सिग्नल 🚥 के खंभों में एक बटन भी होता है और पैदल सड़क पार करनी हो, तो पहले रुककर वह बटन दबाना पड़ता है, तभी पैदल चलने वालों के लिए हरा सिग्नल मिलता है।

मुझे अमरीका में यह भी बहुत अटपटा लगता था कि बड़ी या छोटी कोई भी सड़क हो, शहर में हो या शहर के बाहर हो, यहां सड़कों पर केवल कारें ही कारें दिखती थीं और पैदल चलने वाले लोग न के बराबर! 🚷

उसके बाद भी अगले एक वर्ष में ३-४ बार अमरीका आना हुआ और यहां की बहुत-सी बातें समझ आने लगीं।

लेकिन पिछली जुलाई में मुझे अमरीका में रहने ही आना पड़ा, जिसका मतलब यह भी था कि अब मुझे भी यहां खुद कार चलानी पड़ेगी। कार के बिना यहां ज़िंदगी बहुत मुश्किल है और वाकई शुरू के कुछ महीनों तक हमें बहुत ज्यादा कठिनाई झेलनी भी पड़ी।

लेकिन कुछ अच्छे मित्र मदद के लिए हमेशा तैयार रहे। कुछ समय बाद मैंने भी यहां की प्रक्रिया पूरी करके ड्राइविंग लाइसेंस पा लिया और गाड़ी भी खरीद ली। वह पूरी कथा आप उस समय की मेरी पोस्ट में पढ़ ही चुके होंगे, इसलिए यहां दोहराऊंगा नहीं। 🙂

मैंने जीवन की पहली कार २०१५ में पुणे में टाटा ज़ेस्ट खरीदी थी। वहां के अव्यवस्थित ट्रैफिक और भीड़भाड़ में कार चलाना मुझे बहुत भयावह लगता था। जब तक मजबूरी न हो, मैं कार निकलता ही नहीं था। मुझे वैसे भी कार से ज्यादा अपनी बाइक बजाज पल्सर ही पसन्द थी।

जब मैं यहां अमरीका में रहने आया, तब भी मुझे यह बात बिल्कुल असंभव लगती थी कि मैं कभी यहां के नियमों को समझ सकूंगा और कभी यहां गाड़ी चला सकूंगा। भारत में तो केवल इतना समझना पर्याप्त होता है कि किस रंग के सिग्नल का क्या मतलब है और बस यह ध्यान रखना पड़ता है कि वहां नियमों का पालन कोई नहीं करता व सड़क पर कोई भी गाड़ी, व्यक्ति या पशु कभी भी कहीं से भी आ सकता है।

लेकिन यहां तो सड़क पर कहीं एक सफेद पट्टी होती, तो कहीं दो; कहीं पीली पट्टियां, 🚧 तो कहीं डैश वाली लाइनें; कहीं सॉलिड लाइनें, कहीं साइकल की अलग लेन; कहीं यूटर्न ले सकते हैं, तो कहीं मना है; कहीं सिग्नल लाल होने पर भी दायीं तरह मुड़ सकते हैं, तो कहीं केवल हरा होने पर ही; गति सीमा के भी नियमों का पालन किया जाता है और सीटबेल्ट के भी; छोटे बच्चों के लिए भी किस उम्र तक किस तरह की चाइल्ड सीट होनी चाहिए और उसे कार में किस सीट पर किस तरह जोड़ा जाना चाहिए, उसके भी नियम हैं, जिनका पालन किया जाता है। मुझे नहीं लगता था कि मैं कभी भी यह सब सीख-समझ सकूँगा।

लेकिन धीरे-धीरे प्रयास करते-करते मैं सीखता गया। मैंने डीएमवी (यहां का आरटीओ) की वेबसाइट से बुकलेट डाउनलोड की और ऑफिस आते-जाते समय बस में बैठकर पढ़ता रहता था। कभी सड़क पर चल रही अन्य गाड़ियों को ध्यान से देखता था, कभी हमारी बस के ड्राइवर के गाड़ी चलाने के तरीके पर ध्यान देता था। इसके अलावा मित्रों से भी प्रश्न पूछ-पूछकर नई जानकारी बटोरता रहता था। बाकी जानकारी ड्राइविंग क्लास के दौरान मिल गई।

लेकिन यह सब किताबी ज्ञान था। वास्तविक अनुभव और अभ्यास तो गाड़ी खरीदने के बाद ही मिला और सिर्फ गाड़ी चलाने का ही नहीं, बल्कि यहां तो पेट्रोल पंप (यहां की भाषा में गैस स्टेशन) पर जाकर खुद ही पाइप उठाकर अपने हाथों से अपनी कार में पेट्रोल ⛽ भरने जैसे कुछ नए काम करने का अनुभव भी मिला।

हालांकि अभी भी मुझे यहां की मापन प्रणालियां समझ नहीं आती। मेरा दिमाग आज भी किलोमीटर, लीटर, सेल्सियस आदि को ही समझता है, जबकि यहां सारा हिसाब-किताब मील, गैलन, फ़ारेनहाइट आदि में चलता है। मुझे विश्वास है कि कभी न कभी मैं ये सब भी समझ ही लूंगा।

६ महीने पहले मैं जब यहां आया था, तब मैं कैसा था और आज कैसा हूं, इस बात की जब तुलना करता हूं, तो मुझे यह स्पष्ट दिखता है कि मैंने इस दौरान बहुत-कुछ सीखा है और मुझमें बहुत सुधार आया है। मेरे व्यक्तित्व में भी बहुत बदलाव आया है। लेकिन वह दूसरा विषय है, इसलिए उस पर फिर कभी लिखूँगा।

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